11 Aug खनिज करों पर राज्य सरकारों के अधिकार को समाप्त करेगा केंद्र का विधेयक, विपक्ष ने की समिति की मांग
✎ खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकना है, जिससे केंद्र का नियामक नियंत्रण बढ़ेगा और संघवाद तथा राज्यों के वित्तीय अधिकारों पर बहस छिड़ गई है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: संघ और राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघवाद से संबंधित मुद्दे और चुनौतियाँ | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधन जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय
- Prelims: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, खनिज अधिकार, राज्य सूची, संघ सूची, समवर्ती सूची, राजस्व साझाकरण, संघवाद
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और भविष्य, राज्यों के वित्तीय अधिकार और आर्थिक विकास
त्वरित पुनरावृत्ति: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकना है, जिससे केंद्र का नियामक नियंत्रण बढ़ेगा और संघवाद तथा राज्यों के वित्तीय अधिकारों पर बहस छिड़ गई है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार ने लोकसभा में खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया है। इस विधेयक का उद्देश्य राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर या अन्य शुल्क लगाने से रोकना है। सरकार का तर्क है कि अत्यधिक और अप्रत्याशित कराधान खनिज क्षेत्र को व्यावसायिक रूप से अव्यवहार्य बना देगा, जबकि विपक्ष इसे राज्यों के वित्तीय अधिकारों और संघवाद पर हमला बता रहा है।
पृष्ठभूमि
- जुलाई 2024 में, उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने राज्यों के खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति को बरकरार रखा था, जो खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत देय रॉयल्टी (royalty) से अलग था।
- न्यायालय ने माना था कि अधिनियम के तहत देय रॉयल्टी कर नहीं है और MMDR अधिनियम राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति को सीमित नहीं करता है।
- इस फैसले को झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए एक बड़ी वित्तीय जीत के रूप में देखा गया था, जिससे उन्हें संभावित रूप से बड़ा राजस्व प्राप्त हो सकता था।
- हालांकि, इस फैसले से खनन कंपनियों को अप्रैल 1, 2005 से पूर्वव्यापी कराधान का सामना करना पड़ा, जिससे उद्योग पर लगभग 1.5-2 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय प्रभाव पड़ने का अनुमान था।
- केंद्र सरकार और निजी खनन संस्थाएँ अभी भी इस पूर्वव्यापी लेवी (levy) और इसके प्रतिस्पर्धी प्रभावों का विरोध कर रही हैं।
खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 क्या है?
- यह विधेयक खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 में संशोधन करना चाहता है।
- इसका मुख्य उद्देश्य राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी प्रकार का कर, उपकर या अन्य शुल्क लगाने से प्रतिबंधित करना है।
- विधेयक केंद्र सरकार को खानों पर अधिक नियामक नियंत्रण देने का प्रयास करता है, और इस शक्ति का विस्तार खनिज-युक्त भूमि तक भी करता है।
- सरकार का तर्क है कि यह ‘खनिजों के सतत और समान विकास’ के लिए ‘बड़े सार्वजनिक हित’ में है।
- यह विधेयक एक नई धारा पेश करता है जो स्पष्ट रूप से कहती है कि खनिज अधिकारों पर ‘कोई कर, उपकर या ऐसा कोई अन्य शुल्क (किसी भी नाम से पुकारा जाए)’ नहीं लगाया जाएगा।
- विधेयक का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में कराधान की अनिश्चितता को कम करना और इसे व्यावसायिक रूप से अधिक व्यवहार्य बनाना है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्य करों पर रोक | यह विधेयक राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर या अन्य शुल्क लगाने से रोकता है। इसका उद्देश्य खनन क्षेत्र में अत्यधिक और अप्रत्याशित कराधान को समाप्त करना है, जिससे यह क्षेत्र वाणिज्यिक रूप से व्यवहार्य बना रहे। |
| केंद्र सरकार की नियामक शक्ति का विस्तार | यह विधेयक केंद्र सरकार को खानों पर अधिक नियामक नियंत्रण प्रदान करता है और इस शक्ति का विस्तार खनिज-युक्त भूमि तक करता है। इसका लक्ष्य खनिजों का सतत और समान विकास सुनिश्चित करना है, जो व्यापक जनहित में है। |
| सर्वोच्च न्यायालय के जुलाई 2024 के फैसले का प्रभाव | यह संशोधन विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के जुलाई 2024 के उस फैसले के बाद लाया गया है, जिसमें राज्यों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति को बरकरार रखा गया था। न्यायालय ने रॉयल्टी को कर नहीं माना था। |
| राज्यों के राजस्व पर संभावित प्रभाव | सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों को बड़े राजस्व लाभ की उम्मीद थी। यह विधेयक इस संभावित राजस्व पर रोक लगाता है। |
| खनन कंपनियों पर पूर्वव्यापी कराधान का मुद्दा | सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद खनन कंपनियों को 1 अप्रैल, 2005 से पूर्वव्यापी कराधान का सामना करना पड़ा था, जिससे लगभग 1.5-2 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय प्रभाव अनुमानित था। यह विधेयक इस मुद्दे को संबोधित करने का प्रयास करता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- यह विधेयक खनन क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देने और उसे अधिक आकर्षक बनाने में मदद कर सकता है, क्योंकि यह कराधान की अनिश्चितता को कम करेगा।
- खनन कंपनियों पर पूर्वव्यापी कराधान के बोझ को कम करने में सहायक होगा, जिससे उनकी वित्तीय स्थिरता बढ़ेगी।
- यह खनिजों के सतत और समान विकास को सुनिश्चित करने के लिए केंद्र सरकार को अधिक नियामक शक्ति प्रदान करता है, जो देश की खनिज सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
राजकोषीय महत्व
- यह विधेयक राज्यों के लिए खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि से प्राप्त होने वाले संभावित राजस्व पर रोक लगाता है, जिससे खनिज-समृद्ध राज्यों के राजकोषीय संसाधनों पर असर पड़ सकता है।
- केंद्र और राज्यों के बीच राजस्व बंटवारे और राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) के सिद्धांतों पर बहस को बढ़ावा देगा।
नियामक महत्व
- यह विधेयक खनन क्षेत्र में एकरूपता लाने और केंद्र सरकार को ‘बड़े जनहित’ में खनिजों के विकास को विनियमित करने की अधिक शक्ति प्रदान करता है।
- यह खनन और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957) के तहत केंद्र की नियामक भूमिका को मजबूत करता है।
चुनौतियाँ
1. राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव
- यह विधेयक राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की संवैधानिक शक्ति को कम करता है, जिससे राज्यों के राजकोषीय स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगता है।
- खनिज-समृद्ध राज्य अपने राजस्व के एक महत्वपूर्ण स्रोत से वंचित हो सकते हैं, जिससे उनकी विकास परियोजनाओं पर असर पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. राज्यों के राजस्व पर असर
- सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद राज्यों को मिलने वाले संभावित राजस्व लाभ पर यह विधेयक रोक लगाता है, जिससे राज्यों के वित्तीय घाटे में वृद्धि हो सकती है।
- राज्यों को अपने बजट को संतुलित करने और सार्वजनिक सेवाओं के वित्तपोषण के लिए वैकल्पिक राजस्व स्रोतों की तलाश करनी पड़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: राजकोषीय नीति, राज्य वित्त, सार्वजनिक व्यय
3. कानूनी और संवैधानिक चुनौतियाँ
- यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के जुलाई 2024 के फैसले को प्रभावी ढंग से पलटता है, जिससे भविष्य में इसकी संवैधानिक वैधता को चुनौती दी जा सकती है।
- संविधान के तहत राज्यों की कराधान शक्तियों और केंद्र की नियामक शक्तियों के बीच संतुलन बनाए रखना एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक समीक्षा, संवैधानिक कानून, केंद्र-राज्य विधायी संबंध
4. खनन क्षेत्र में स्थिरता बनाम राज्यों की स्वायत्तता
- केंद्र सरकार का तर्क है कि यह विधेयक खनन क्षेत्र में स्थिरता और एकरूपता लाएगा, लेकिन राज्यों का मानना है कि यह उनकी स्वायत्तता का उल्लंघन करता है।
- दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना महत्वपूर्ण है ताकि खनन क्षेत्र का विकास हो सके और राज्यों के अधिकारों का भी सम्मान हो।
यूपीएससी लिंक: आर्थिक नीति, शासन, केंद्र-राज्य संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| राज्यों की कराधान शक्ति | विधेयक राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकता है, जिससे उनकी राजकोषीय स्वायत्तता कमजोर होती है। |
| राजकोषीय संघवाद | यह केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों के संवैधानिक संतुलन को बाधित कर सकता है, जिससे संघवाद की भावना पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। |
| राज्यों का राजस्व घाटा | खनिज-समृद्ध राज्यों को इस विधेयक के कारण महत्वपूर्ण राजस्व हानि हो सकती है, जिससे उनके वित्तीय संसाधनों पर दबाव पड़ेगा। |
| सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का प्रभाव | विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को अप्रभावी बनाता है जिसने राज्यों की कराधान शक्ति को बरकरार रखा था, जिससे कानूनी अनिश्चितता बढ़ सकती है। |
| उद्योग पर पूर्वव्यापी प्रभाव | सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद खनन कंपनियों पर पूर्वव्यापी कराधान का बोझ पड़ा था, जिसे यह विधेयक संबोधित करने का प्रयास करता है, लेकिन राज्यों के लिए यह राजस्व का नुकसान है। |
आगे की राह
- केंद्र और राज्यों के बीच रचनात्मक संवाद स्थापित किया जाए ताकि खनिज संसाधनों के विकास और राज्यों के राजस्व हितों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
- विधेयक को संसदीय समिति के पास भेजा जाए ताकि सभी हितधारकों, विशेषकर राज्यों के प्रतिनिधियों के विचारों को सुना जा सके और व्यापक विचार-विमर्श हो सके।
- राज्यों के लिए खनिज राजस्व के वैकल्पिक स्रोतों की पहचान की जाए या केंद्र द्वारा क्षतिपूर्ति तंत्र पर विचार किया जाए ताकि उनके वित्तीय हितों की रक्षा हो सके।
- खनिज विकास और विनियमन के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी नीति ढांचा विकसित किया जाए जो केंद्र और राज्यों दोनों की भूमिकाओं को स्पष्ट करे।
- सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के निहितार्थों का सावधानीपूर्वक विश्लेषण किया जाए और विधेयक के संवैधानिक पहलुओं पर गहन कानूनी समीक्षा की जाए।
- खनन क्षेत्र में निवेश को आकर्षित करने और सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए एक स्थिर और अनुमानित नियामक वातावरण बनाया जाए, जिसमें राज्यों के अधिकारों का भी सम्मान हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
खनिज अधिकार · राज्य कराधान · संघवाद · राजकोषीय संघवाद · संविधान की सातवीं अनुसूची · खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 · सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय · केंद्र-राज्य संबंध · खनिज क्षेत्र का विनियमन · आर्थिक व्यवहार्यता · राजस्व बंटवारा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ सूची, राज्य सूची, समवर्ती सूची’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 265’, ‘note’: ‘कानून के प्राधिकार के बिना कोई कर नहीं’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 282’, ‘note’: ‘केंद्र या राज्य द्वारा अनुदान’}
अवधारणा प्रवाह
सर्वोच्च न्यायालय का जुलाई 2024 का फैसला राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति देता है। → इस फैसले से खनिज-समृद्ध राज्यों को राजस्व लाभ की उम्मीद होती है और खनन कंपनियों पर पूर्वव्यापी कराधान का बोझ पड़ता है। → केंद्र सरकार खनन क्षेत्र में स्थिरता और एकरूपता के लिए ‘खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026’ पेश करती है। → यह विधेयक राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकता है और केंद्र की नियामक शक्ति का विस्तार करता है। → विधेयक राजकोषीय संघवाद, राज्यों के राजस्व और संवैधानिक शक्तियों के संतुलन पर बहस को जन्म देता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में ‘खनिज’ विषय राज्य सूची के अंतर्गत आता है।
2. खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 केंद्र सरकार को खनिजों के विनियमन का अधिकार देता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2024 के अपने फैसले में राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को बरकरार रखा था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 गलत है क्योंकि ‘खनिज’ विषय समवर्ती सूची में नहीं बल्कि संघ सूची की प्रविष्टि 54 के तहत केंद्र सरकार के विनियमन के अधीन है, हालांकि राज्यों को कुछ हद तक कराधान का अधिकार है। कथन 2 सही है, MMDR अधिनियम केंद्र को खनिजों के विकास और विनियमन का अधिकार देता है। कथन 3 सही है, सर्वोच्च न्यायालय ने जुलाई 2024 में राज्यों के खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को बरकरार रखा था, जो रॉयल्टी से अलग है।
Q2. अभिकथन (A): केंद्र सरकार ने खनिज अधिकारों पर राज्य करों को प्रतिबंधित करने के लिए एक विधेयक पेश किया है।
कारण (R): अत्यधिक और अप्रत्याशित कराधान से खनिज क्षेत्र व्यावसायिक रूप से अव्यवहार्य हो जाएगा।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, सरकार ने वास्तव में ऐसा एक विधेयक पेश किया है। कारण (R) भी सही है और यह विधेयक पेश करने के पीछे सरकार द्वारा दिया गया मुख्य तर्क है, कि अत्यधिक कराधान से क्षेत्र की व्यवहार्यता प्रभावित होगी। इसलिए, R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ हाल ही में संसद में पेश किए गए खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के आलोक में, खनिज अधिकारों पर राज्य सरकारों द्वारा कर लगाने की शक्ति से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और केंद्र-राज्य संबंधों पर इसके संभावित प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का संक्षिप्त परिचय और इसका मुख्य उद्देश्य (राज्य करों पर प्रतिबंध)।
2. संवैधानिक प्रावधान: संविधान की सातवीं अनुसूची (संघ सूची की प्रविष्टि 54, राज्य सूची की प्रविष्टि 50) के तहत खनिजों और कराधान से संबंधित शक्तियों का उल्लेख। MMDR अधिनियम, 1957 की भूमिका।
3. सर्वोच्च न्यायालय का जुलाई 2024 का निर्णय: इस निर्णय का विवरण जिसमें राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को बरकरार रखा गया था (रॉयल्टी से अलग)। निर्णय के निहितार्थ (राज्यों के लिए राजस्व लाभ, खनन कंपनियों के लिए चुनौतियां)।
4. विधेयक के तर्क: केंद्र सरकार द्वारा विधेयक पेश करने के पीछे के कारण (अत्यधिक कराधान से अव्यवहार्यता, सार्वजनिक हित में सतत विकास)।
5. केंद्र-राज्य संबंधों पर संभावित प्रभाव: संघवाद पर प्रभाव (राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता का क्षरण), राजकोषीय संघवाद पर बहस, राज्यों की राजस्व क्षमता पर असर, केंद्र के नियामक नियंत्रण में वृद्धि।
6. समालोचनात्मक विश्लेषण: विधेयक के पक्ष और विपक्ष में तर्क, राज्यों की चिंताओं का उल्लेख (राजस्व हानि, संघीय ढांचे का उल्लंघन) और केंद्र के तर्क (एकसमान विकास, निवेश प्रोत्साहन)।
7. निष्कर्ष: एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना जो खनिज क्षेत्र के सतत विकास और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दे।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
- अफगानिस्तान: तालिबान से सुरक्षा बलों की ज्यादतियों पर जवाब मांगता संयुक्त राष्ट्र - August 11, 2026
- UN Urges Taliban to Address Security Forces Abuses in Afghanistan - August 11, 2026
- झारखंड में छात्र आंदोलन: रांची लाठीचार्ज, ईडी जांच और सरकार-विपक्ष रणनीति - August 11, 2026

No Comments