नीति आयोग का ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’: राज्यों में सुधारों का मूल्यांकन

नीति आयोग का ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’: राज्यों में सुधारों का मूल्यांकन — Investment Readiness Index Development

नीति आयोग का ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’: राज्यों में सुधारों का मूल्यांकन

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था, आर्थिक विकास, निवेश मॉडल, अवसंरचना
  • Prelims: निवेश अनुकूलता सूचकांक, नीति आयोग, प्रतिस्पर्धी संघवाद, सहकारी संघवाद, विकसित भारत @2047, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), घरेलू निवेश, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस
  • Essay: राज्यों की भूमिका: भारत की आर्थिक विकास गाथा के केंद्र में, प्रतिस्पर्धी और सहकारी संघवाद: विकसित भारत के निर्माण का दोहरा इंजन

त्वरित पुनरावृत्ति: नीति आयोग का ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’ राज्यों के निवेश वातावरण का मूल्यांकन कर, प्रतिस्पर्धी व सहकारी संघवाद को बढ़ावा देकर और सुधारों को उत्प्रेरित कर ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

नीति आयोग ने हाल ही में ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक (IFI)’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है। यह सूचकांक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निवेश के अनुकूल वातावरण बनाने, उसे सक्षम करने और बनाए रखने की प्रभावशीलता का आकलन करने के लिए एक संरचित और आंकड़ा-आधारित रूपरेखा प्रस्तुत करता है। इसका उद्देश्य राज्यों में सुधारों को प्रोत्साहित करना और प्रतिस्पर्धी तथा सहकारी संघवाद की भावना को सुदृढ़ करना है, जैसा कि केंद्रीय बजट 2025-26 में घोषित किया गया था।

पृष्ठभूमि

  • जुलाई 2024 में नीति आयोग की नौवीं गवर्निंग काउंसिल की बैठक में प्रधानमंत्री ने नीति आयोग को निवेश आकर्षित करने हेतु एक निवेश-अनुकूल चार्टर तैयार करने का दायित्व सौंपा था।
  • केंद्रीय बजट 2025-26 में राज्यों में सुधारों को प्रोत्साहित करने और अनुकूल निवेश पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए निवेश अनुकूलता सूचकांक विकसित करने की घोषणा की गई थी।
  • भारत विकसित भारत @2047 के विज़न के तहत एक विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में अग्रसर है, जिसके लिए निवेश दरों में उल्लेखनीय वृद्धि आवश्यक है।
  • यद्यपि केंद्र सरकार समग्र नीतिगत ढाँचा स्थापित करती है, निवेश संबंधी निर्णय अंततः राज्य स्तर पर उपलब्ध कारोबारी वातावरण की गुणवत्ता से प्रभावित होते हैं।
  • औद्योगिक भूमि की उपलब्धता, भौतिक एवं डिजिटल अवसंरचना, नियामक दक्षता, संस्थागत क्षमता और नीतिगत पूर्वानुमेयता जैसे कारक निवेश आकर्षण के महत्वपूर्ण निर्धारक हैं।
  • यह सूचकांक सभी 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल करता है तथा आठ स्तंभों के आधार पर मूल्यांकन करता है।
  • यह रिपोर्ट 17 जुलाई 2026 को जारी की गई है, जो भारत के निवेश पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ बनाने के लक्ष्य को रेखांकित करती है।

निवेश अनुकूलता सूचकांक (IFI) क्या है?

  • निवेश अनुकूलता सूचकांक नीति आयोग द्वारा विकसित एक संरचित और आंकड़ा-आधारित रूपरेखा है।
  • इसका उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निवेश के अनुकूल वातावरण बनाने, उसे सक्षम करने और बनाए रखने की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करना है।
  • यह सूचकांक निवेश संबंधी निर्णयों को प्रभावित करने वाले प्रमुख नीतिगत, संस्थागत, नियामकीय और अवसंरचना संबंधी मानकों का मूल्यांकन करता है।
  • यह राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के निवेश पारिस्थितिकी तंत्र का तुलनात्मक आकलन प्रस्तुत करता है।
  • IFI का लक्ष्य राज्यों को सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनाने और विकसित भारत @2047 के विज़न की प्राप्ति के लिए निरंतर सुधार करने हेतु प्रोत्साहित करना है।
  • यह प्रतिस्पर्धी और सहकारी संघवाद को बढ़ावा देता है, जिससे राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और सीखने को प्रोत्साहन मिलता है।
  • सूचकांक प्रदर्शन की रैंकिंग से परे, सुधारों के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य करता है, राज्यों की मजबूतियों और सुधार की आवश्यकता वाले क्षेत्रों की पहचान करता है।
  • यह भारत को निवेश के लिए एक पसंदीदा गंतव्य के रूप में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने का लक्ष्य रखता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
आंकड़ा-आधारित मूल्यांकन निवेश वातावरण का वस्तुनिष्ठ और साक्ष्य-आधारित विश्लेषण प्रदान करता है, जिससे नीति निर्माण में सहायता मिलती है।
समग्र रूपरेखा नीतिगत, संस्थागत, नियामकीय और अवसंरचनात्मक सहित निवेश के कई आयामों को कवर करता है।
राज्य-स्तरीय फोकस राज्यों की केंद्रीय भूमिका को मान्यता देता है और उन्हें अपनी विशिष्ट चुनौतियों और अवसरों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है।
तुलनात्मक आकलन राज्यों को एक-दूसरे से सीखने और सर्वोत्तम पद्धतियों को अपनाने के लिए एक बेंचमार्क प्रदान करता है।
सुधारों का उत्प्रेरक राज्यों को अपनी कमजोरियों को दूर करने और निवेश आकर्षित करने के लिए निरंतर सुधार करने हेतु प्रोत्साहित करता है।
प्रतिस्पर्धी और सहकारी संघवाद राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और सहयोग को बढ़ावा देकर समग्र राष्ट्रीय विकास में योगदान देता है।

महत्व

आर्थिक विकास और निवेश संवर्धन

  • यह सूचकांक घरेलू और विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए राज्यों में एक अनुकूल वातावरण बनाने में मदद करेगा, जो उच्च आर्थिक विकास दर को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
  • निजी निवेश औद्योगिकीकरण, नवाचार, रोजगार सृजन और दीर्घकालिक आर्थिक विकास को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • यह भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाएगा और इसे वैश्विक निवेश मानचित्र पर एक पसंदीदा गंतव्य के रूप में स्थापित करेगा।

शासन और नीतिगत प्रभावशीलता

  • यह राज्यों को अपनी नीतियों, नियामक ढाँचों और संस्थागत क्षमताओं का मूल्यांकन करने के लिए एक उपकरण प्रदान करता है, जिससे शासन में सुधार होता है।
  • आंकड़ा-आधारित दृष्टिकोण नीतिगत निर्णयों को अधिक प्रभावी और लक्षित बनाता है, जिससे निवेश के लिए बाधाओं को दूर किया जा सके।
  • यह नीतिगत पूर्वानुमेयता और स्थिरता को बढ़ावा देता है, जो निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं।

संघवाद को सुदृढ़ करना

  • यह प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा देता है, जहाँ राज्य निवेश आकर्षित करने के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे समग्र सुधार होता है।
  • यह सहकारी संघवाद को भी प्रोत्साहित करता है, जहाँ राज्य सर्वोत्तम पद्धतियों को साझा करते हैं और एक-दूसरे से सीखते हैं।
  • राज्यों को सशक्त करके, यह सूचकांक ‘विकसित भारत @2047’ के राष्ट्रीय विज़न को प्राप्त करने में उनकी भूमिका को मजबूत करता है।

रोजगार सृजन और समावेशी विकास

  • बढ़ा हुआ निवेश नए उद्योगों और व्यवसायों को जन्म देगा, जिससे रोजगार के अवसर पैदा होंगे और बेरोजगारी कम होगी।
  • यह क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने और अधिक समावेशी विकास को बढ़ावा देने में मदद करेगा, क्योंकि सभी राज्यों को निवेश आकर्षित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • बेहतर अवसंरचना और नियामक वातावरण से छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को भी लाभ होगा, जो रोजगार सृजन के प्रमुख स्रोत हैं।

चुनौतियाँ

1. डेटा की उपलब्धता और गुणवत्ता

  • राज्यों से विश्वसनीय और अद्यतन डेटा एकत्र करना एक चुनौती हो सकती है, खासकर यदि डेटा संग्रह तंत्र मजबूत न हों।
  • डेटा की गुणवत्ता में भिन्नता सूचकांक की सटीकता और तुलनात्मकता को प्रभावित कर सकती है।

2. राज्यों के बीच असमानताएँ

  • राज्यों के बीच आर्थिक विकास, अवसंरचना और संस्थागत क्षमताओं में महत्वपूर्ण असमानताएँ हैं, जिससे सभी के लिए एक समान मानदंड लागू करना मुश्किल हो सकता है।
  • कम विकसित राज्यों को निवेश आकर्षित करने के लिए अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे रैंकिंग में लगातार निचले स्थान पर रहने का जोखिम हो सकता है।

3. नीतिगत निरंतरता और कार्यान्वयन

  • राज्यों में राजनीतिक परिवर्तनों के साथ नीतिगत प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है, जिससे निवेश के अनुकूल वातावरण बनाने के प्रयासों में निरंतरता बाधित हो सकती है।
  • घोषित सुधारों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि अक्सर जमीनी स्तर पर बाधाएँ उत्पन्न होती हैं।

4. स्थानीय प्रतिरोध और भूमि अधिग्रहण

  • विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण अक्सर स्थानीय समुदायों के प्रतिरोध का सामना करता है, जिससे परियोजनाओं में देरी होती है और निवेश लागत बढ़ती है।
  • पर्यावरण संबंधी चिंताएँ और नियामक अनुपालन भी निवेश परियोजनाओं के लिए बाधाएँ उत्पन्न कर सकते हैं।

5. मानव पूंजी और कौशल की कमी

  • कुछ राज्यों में कुशल श्रमबल की कमी निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण बाधा हो सकती है, खासकर उच्च-तकनीकी उद्योगों में।
  • शिक्षा और कौशल विकास में निवेश की कमी दीर्घकालिक निवेश अनुकूलता को प्रभावित कर सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
नियामक जटिलता अत्यधिक और विरोधाभासी नियम निवेशकों के लिए अनुपालन बोझ बढ़ाते हैं।
अनुबंधों का प्रवर्तन अनुबंधों के प्रवर्तन में देरी और न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति निवेशकों के विश्वास को कम करती है।
अवसंरचनात्मक अंतराल भौतिक (सड़क, बिजली) और डिजिटल अवसंरचना में कमी निवेश को बाधित करती है।
भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार और लालफीताशाही निवेश प्रक्रियाओं को जटिल बनाती है और लागत बढ़ाती है।
राजनीतिक अस्थिरता अस्थिर राजनीतिक वातावरण नीतिगत अनिश्चितता पैदा करता है, जिससे निवेशक हिचकिचाते हैं।
कौशल अंतर उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप कुशल श्रमबल की अनुपलब्धता।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • मेक इन इंडिया (Make in India)
  • उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना
  • गति शक्ति राष्ट्रीय मास्टर प्लान (Gati Shakti National Master Plan)
  • ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (Ease of Doing Business) पहल
  • स्टार्टअप इंडिया (Startup India)
  • डिजिटल इंडिया (Digital India)
  • राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन (National Infrastructure Pipeline)
  • प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (PMEGP)
  • अटल इनोवेशन मिशन (Atal Innovation Mission)
  • राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन (National Skill Development Mission)

आगे की राह

  • राज्यों को अपनी विशिष्ट शक्तियों और कमजोरियों के आधार पर लक्षित सुधार एजेंडा विकसित करना चाहिए।
  • डेटा संग्रह और रिपोर्टिंग तंत्र को मजबूत करना चाहिए ताकि सूचकांक की सटीकता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हो सके।
  • राज्यों के बीच सर्वोत्तम पद्धतियों को साझा करने और सीखने के लिए एक संस्थागत तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।
  • नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाना और एकल खिड़की मंजूरी प्रणाली को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिए।
  • भौतिक और डिजिटल अवसंरचना में निवेश को प्राथमिकता देनी चाहिए, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ अंतराल अधिक हैं।
  • न्यायिक प्रणाली को मजबूत करना और अनुबंधों के प्रवर्तन को तेज करना चाहिए ताकि निवेशकों का विश्वास बढ़े।
  • कौशल विकास कार्यक्रमों को उद्योग की आवश्यकताओं के साथ संरेखित करना और मानव पूंजी में निवेश बढ़ाना चाहिए।
  • भूमि अधिग्रहण प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना और स्थानीय समुदायों के साथ प्रभावी ढंग से जुड़ना चाहिए ताकि प्रतिरोध कम हो।
  • भ्रष्टाचार को कम करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 246: संघ और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण
  • अनुच्छेद 282: संघ या राज्य द्वारा अपने राजस्व से व्यय
  • सातवीं अनुसूची: संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ
  • नीति आयोग: संवैधानिक निकाय नहीं, कार्यकारी संकल्प द्वारा स्थापित
  • केंद्रीय बजट: अनुच्छेद 112 के तहत वार्षिक वित्तीय विवरण
  • प्रतिस्पर्धी संघवाद: भारत के संघीय ढांचे का एक सिद्धांत

अवधारणा प्रवाह

नीति आयोग द्वारा IFI जारी -> राज्यों में निवेश वातावरण का मूल्यांकन  →  राज्यों की शक्तियों/कमजोरियों की पहचान -> सुधारों के लिए प्रोत्साहन  →  प्रतिस्पर्धी/सहकारी संघवाद को बढ़ावा -> सर्वोत्तम पद्धतियों का आदान-प्रदान  →  निवेश अनुकूलता में सुधार -> घरेलू/विदेशी निवेश में वृद्धि  →  आर्थिक विकास, रोजगार सृजन -> विकसित भारत @2047 के लक्ष्य की प्राप्ति

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निवेश अनुकूलता सूचकांक (IFI) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह सूचकांक वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किया गया है।
2. इसका उद्देश्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में निवेश के अनुकूल वातावरण का मूल्यांकन करना है।
3. यह प्रतिस्पर्धी और सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 2 और 3 — कथन 1 गलत है क्योंकि IFI नीति आयोग द्वारा जारी किया गया है। कथन 2 और 3 सही हैं, IFI का उद्देश्य राज्यों में निवेश अनुकूलता का मूल्यांकन करना और प्रतिस्पर्धी व सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना है।

Q2. निवेश अनुकूलता सूचकांक (IFI) के महत्व के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
1. यह निजी निवेश को गति देकर रोजगार सृजन में सहायक होगा।
2. यह राज्यों के बीच नियामक दक्षता और संस्थागत क्षमता में सुधार को प्रोत्साहित करेगा।
3. यह केवल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को आकर्षित करने पर केंद्रित है, न कि घरेलू निवेश पर।

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. केवल 1 और 2
  4. केवल 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 और 2 सही हैं, क्योंकि IFI निजी निवेश और नियामक सुधारों को बढ़ावा देता है। कथन 3 गलत है, क्योंकि IFI घरेलू और विदेशी दोनों तरह के निवेश को आकर्षित करने पर केंद्रित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ नीति आयोग द्वारा जारी ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’ भारत में आर्थिक विकास और संघवाद को सुदृढ़ करने में किस प्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है? उन प्रमुख चुनौतियों का भी विश्लेषण कीजिए जो इसके प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा बन सकती हैं। (250 शब्द)

रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में, ‘निवेश अनुकूलता सूचकांक’ की अवधारणा को संक्षेप में समझाते हुए, इसके महत्व को आर्थिक विकास (निवेश, रोजगार, प्रतिस्पर्धात्मकता) और संघवाद (प्रतिस्पर्धी व सहकारी संघवाद, राज्य सशक्तिकरण) के संदर्भ में विस्तार से बताएं। दूसरे भाग में, डेटा गुणवत्ता, राज्यों के बीच असमानता, नीतिगत निरंतरता, भूमि अधिग्रहण और नियामक जटिलता जैसी प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण करें। अंत में, एक संतुलित निष्कर्ष दें जो सूचकांक की क्षमता और चुनौतियों को स्वीकार करता हो।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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