02 Aug भारत में व्यावसायिक कोयला खनन: आत्मनिर्भरता की ओर बड़ा कदम, जानिए पूरी योजना
✎ व्यावसायिक कोयला खनन भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार है, जो निजी क्षेत्र की भागीदारी और बाजार-आधारित आवंटन को बढ़ावा देता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — अर्थव्यवस्था | GS Paper III — आधारभूत संरचना: ऊर्जा | GS Paper III — निवेश मॉडल
- Prelims: कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015, आत्मनिर्भर भारत मिशन, राष्ट्रीय कोयला सूचकांक, राजस्व-साझाकरण मॉडल, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), कैप्टिव और वाणिज्यिक कोयला खनन
- Essay: ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक संवृद्धि में कोयले की भूमिका, भारत में प्राकृतिक संसाधनों का सतत प्रबंधन और आर्थिक विकास
त्वरित पुनरावृत्ति: व्यावसायिक कोयला खनन भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण नीतिगत सुधार है, जो निजी क्षेत्र की भागीदारी और बाजार-आधारित आवंटन को बढ़ावा देता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कोयला मंत्रालय के अनुसार, व्यावसायिक कोयला खनन (Commercial Coal Mining) ने भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने और आत्मनिर्भर भारत (Self-Reliant India) की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। घरेलू कोयला उत्पादन लगातार दो वर्षों से एक अरब टन के पार पहुँच गया है, जिसमें कैप्टिव और वाणिज्यिक ब्लॉकों की हिस्सेदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। जून 2020 से अब तक 141 कोयला खदानों की व्यावसायिक नीलामी की जा चुकी है, जिससे उत्पादन क्षमता में वृद्धि, राजस्व में वृद्धि और रोजगार सृजन की उम्मीद है।
पृष्ठभूमि
- भारत की प्राथमिक ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 55 प्रतिशत कोयले से पूरा होता है और 70 प्रतिशत से अधिक बिजली कोयले से बनाई जाती है।
- भारत के पास विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा कोयला भंडार (लगभग 4,00,715 मिलियन टन) है और यह कोयले का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है।
- सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने 2014 में, पारदर्शिता की कमी के कारण 1993 और 2012 के बीच आवंटित 218 में से 204 कोयला ब्लॉकों को रद्द कर दिया था।
- इसके प्रत्युत्तर में, कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015 (Coal Mines (Special Provisions) Act, 2015) लाया गया, जिसने कोयला ब्लॉकों के पुनर्आवंटन के लिए एक पारदर्शी, नीलामी-आधारित ढाँचा प्रदान किया।
- 2015 और 2020 के बीच, नीलामी और आवंटन के विभिन्न चरणों में 76 कोयला खानों को उत्पादक रूप में बहाल किया गया।
- प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत मिशन के तहत, 18 जून 2020 को व्यावसायिक कोयला खनन औपचारिक रूप से शुरू किया गया, जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी का विस्तार हुआ।
- वित्त वर्ष 2025-26 में कैप्टिव और कमर्शियल ब्लॉकों से लगभग 210.46 मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ, जो पहली बार 200 मिलियन टन के आंकड़े को पार कर गया।
व्यावसायिक कोयला खनन क्या है?
- व्यावसायिक कोयला खनन एक ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत निजी कंपनियाँ प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से कोयला खदानों का अधिग्रहण करती हैं।
- इसमें सफल बोली लगाने वाला बिना किसी उपयोग प्रतिबंध के किसी भी क्षेत्र के किसी भी उपभोक्ता को बाजार-निर्धारित कीमतों पर कोयला बेच सकता है।
- पहले, कोयला खदानों का आवंटन मुख्य रूप से कैप्टिव उपयोग (जैसे बिजली उत्पादन या इस्पात निर्माण के लिए) तक सीमित था, जहाँ उत्पादित कोयले का उपयोग केवल आवंटनकर्ता द्वारा ही किया जा सकता था।
- राजस्व-साझाकरण मॉडल (Revenue-Sharing Model) को अपनाया गया है, जहाँ बोली लगाने वाला सरकार को देय राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत बताता है, जो राष्ट्रीय कोयला सूचकांक (National Coal Index) से जुड़ा होता है।
- पात्रता मानदंडों का विस्तार किया गया है, जिसमें खनन के पूर्व अनुभव की आवश्यकता को समाप्त कर दिया गया है और संयुक्त उद्यमों (Joint Ventures) एवं संघों (Consortiums) को भाग लेने की अनुमति दी गई है।
- स्वचालित मार्ग (Automatic Route) के माध्यम से 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Foreign Direct Investment – FDI) की भी अनुमति है, जिससे विदेशी निवेश को प्रोत्साहन मिलता है।
- इस पहल का उद्देश्य कोयला क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना, उत्पादन में वृद्धि करना, आयात पर निर्भरता कम करना और रोजगार के अवसर सृजित करना है।
- अब तक नीलाम किए गए ब्लॉकों से लगभग 47,000 करोड़ रुपये का वार्षिक राजस्व, लगभग 48,756 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) और लगभग 4,75,000 रोजगार सृजित होने की उम्मीद है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राजस्व-साझाकरण मॉडल | निश्चित शुल्क के स्थान पर, बोली लगाने वाला सरकार को देय राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत बताता है, जो राष्ट्रीय कोयला सूचकांक से जुड़ा है। इससे सरकार को कोयले के वास्तविक मूल्य के अनुरूप लाभ मिलता है। |
| उपयोग प्रतिबंधों का उन्मूलन | सफल बोली लगाने वाला बिना किसी उपयोग प्रतिबंध के किसी भी क्षेत्र के किसी भी उपभोक्ता को बाजार-निर्धारित कीमतों पर कोयला बेच सकता है, जिससे बाजार में लचीलापन आता है। |
| विस्तारित पात्रता मानदंड | खनन का पूर्व अनुभव अब आवश्यक नहीं है, संयुक्त उद्यम और संघ भाग ले सकते हैं, और स्वचालित मार्ग के माध्यम से 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति है, जिससे प्रतिस्पर्धा बढ़ती है। |
| उत्पादन में वृद्धि | घरेलू कोयला उत्पादन लगातार दो वर्षों से एक अरब टन के पार पहुंच गया है, जिसमें कैप्टिव और वाणिज्यिक ब्लॉकों की हिस्सेदारी बढ़ी है, जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। |
| रोजगार सृजन और पूंजीगत व्यय | नीलाम किए गए ब्लॉकों से लगभग 4,75,000 रोजगार और लगभग 48,756 करोड़ रुपये का पूंजीगत व्यय सृजित होने की उम्मीद है, जिससे आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कोयला उत्पादन में वृद्धि से देश की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) सुनिश्चित होती है, क्योंकि भारत की प्राथमिक ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 55 प्रतिशत कोयले से पूरा होता है और 70 प्रतिशत से अधिक बिजली कोयले से बनाई जाती है।
- राजस्व-साझाकरण मॉडल और राष्ट्रीय कोयला सूचकांक से जुड़ाव से केंद्र और उत्पादक राज्यों के राजकोषीय राजस्व (Fiscal Revenue) में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे विकास परियोजनाओं के लिए अधिक धन उपलब्ध होता है।
- व्यावसायिक खनन से निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने और 100 प्रतिशत FDI की अनुमति से पूंजीगत व्यय में वृद्धि होती है, जिससे नई तकनीक और दक्षता आती है तथा आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को गति मिलती है।
- रोजगार सृजन के अवसर, विशेषकर खनन क्षेत्रों में, स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा देते हैं और आय के स्रोत प्रदान करते हैं, जिससे समावेशी विकास (Inclusive Growth) को समर्थन मिलता है।
रणनीतिक महत्व
- घरेलू कोयला उत्पादन में आत्मनिर्भरता (Self-Reliance) से आयात पर निर्भरता कम होती है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता के प्रति भारत की भेद्यता घटती है।
- कोयला क्षेत्र में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने से भ्रष्टाचार कम होता है और संसाधन आवंटन में दक्षता आती है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के फैसले के बाद आवश्यक था।
- व्यावसायिक खनन से कोयले की उपलब्धता बढ़ने से औद्योगिक विकास को समर्थन मिलता है, विशेषकर बिजली, इस्पात और सीमेंट जैसे प्रमुख क्षेत्रों में, जो अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं।
सामाजिक महत्व
- खनन क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का सृजन स्थानीय समुदायों के लिए आजीविका के साधन प्रदान करता है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सशक्तिकरण होता है।
- राजस्व में वृद्धि से राज्यों को सामाजिक कल्याण योजनाओं और बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश करने के लिए अधिक संसाधन मिलते हैं, जिससे जीवन स्तर में सुधार होता है।
चुनौतियाँ
1. पर्यावरणीय प्रभाव
- कोयला खनन से वनों की कटाई, जैव विविधता का नुकसान और जल प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
- खनन गतिविधियों से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, जो जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है और भारत के जलवायु लक्ष्यों के लिए चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, जलवायु परिवर्तन
2. भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास
- खनन परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण अक्सर स्थानीय समुदायों के विस्थापन और उनके पुनर्वास से संबंधित चुनौतियों का सामना करता है।
- भूमि मालिकों और विस्थापित व्यक्तियों के लिए उचित मुआवजे और पुनर्वास की कमी सामाजिक अशांति का कारण बन सकती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, भूमि सुधार
3. तकनीकी और परिचालन दक्षता
- कुछ निजी कंपनियों, विशेषकर जिनके पास खनन का पूर्व अनुभव नहीं है, को परिचालन दक्षता और सुरक्षा मानकों को बनाए रखने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
- आधुनिक खनन तकनीकों को अपनाने और पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं को लागू करने के लिए निवेश और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढांचा, औद्योगिक नीति
4. बाजार और मूल्य निर्धारण की अस्थिरता
- कोयले की मांग और आपूर्ति में उतार-चढ़ाव बाजार-निर्धारित कीमतों को प्रभावित कर सकता है, जिससे खनन कंपनियों की लाभप्रदता और निवेश पर असर पड़ सकता है।
- वैश्विक ऊर्जा संक्रमण और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर बदलाव कोयले की दीर्घकालिक मांग पर अनिश्चितता पैदा करता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था, ऊर्जा क्षेत्र
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पर्यावरणीय क्षरण | खनन से वायु और जल प्रदूषण, वनों की कटाई और जैव विविधता का नुकसान होता है, जिससे पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता है। |
| सामाजिक विस्थापन | खनन परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण से स्थानीय समुदायों का विस्थापन होता है और उनके पुनर्वास से संबंधित मुद्दे उत्पन्न होते हैं। |
| सुरक्षा मानक | खनन कार्यों में सुरक्षा मानकों का पालन न करने से दुर्घटनाओं का जोखिम बढ़ जाता है, जिससे श्रमिकों का जीवन खतरे में पड़ जाता है। |
| नवीकरणीय ऊर्जा से प्रतिस्पर्धा | सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों के बढ़ते उपयोग से कोयले की दीर्घकालिक मांग पर दबाव पड़ सकता है। |
| अवसंरचनात्मक बाधाएँ | खनन क्षेत्रों से कोयले के परिवहन और वितरण के लिए पर्याप्त रेल और सड़क अवसंरचना की कमी दक्षता को प्रभावित कर सकती है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- आत्मनिर्भर भारत मिशन
आगे की राह
- पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) को मजबूत करना और खनन के पर्यावरणीय पदचिह्न को कम करने के लिए कठोर नियमों को लागू करना।
- खनन प्रभावित क्षेत्रों में समुदायों के लिए प्रभावी पुनर्वास और पुनर्स्थापन नीतियों को सुनिश्चित करना, जिसमें आजीविका के वैकल्पिक स्रोत प्रदान करना शामिल है।
- स्वच्छ कोयला प्रौद्योगिकियों (Clean Coal Technologies) और कार्बन कैप्चर (Carbon Capture) जैसी तकनीकों में निवेश को बढ़ावा देना ताकि उत्सर्जन को कम किया जा सके।
- खनन सुरक्षा मानकों को कड़ाई से लागू करना और श्रमिकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों में निवेश करना ताकि दुर्घटनाओं को रोका जा सके।
- नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों के साथ कोयला आधारित बिजली उत्पादन का एक संतुलित मिश्रण विकसित करना ताकि ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता दोनों सुनिश्चित हो सकें।
- व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business) को और बेहतर बनाने के लिए नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाना और स्वीकृतियों के लिए एकल खिड़की प्रणाली (Single Window System) को मजबूत करना।
- कोयला क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना ताकि खनन दक्षता में सुधार हो और पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को अपनाया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
व्यावसायिक कोयला खनन · आत्मनिर्भर भारत · ऊर्जा सुरक्षा · कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015 · राजस्व-साझाकरण मॉडल · प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) · रोजगार सृजन · राजकोषीय लाभ · ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस · न्यायिक समीक्षा · नीलामी-आधारित आवंटन · राष्ट्रीय कोयला सूचकांक
अवधारणा प्रवाह
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कोयला ब्लॉक रद्द करना (2014) → कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015 का अधिनियमन → व्यावसायिक कोयला खनन का औपचारिक शुभारंभ (2020) → राजस्व-साझाकरण मॉडल और विस्तारित पात्रता मानदंड → घरेलू कोयला उत्पादन में वृद्धि और आयात पर निर्भरता में कमी → राजस्व सृजन, रोजगार सृजन और आर्थिक संवृद्धि
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा कोयला भंडार धारक है और कोयले का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक तथा उपभोक्ता है।
2. सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 में 1993 और 2012 के बीच आवंटित सभी 218 कोयला ब्लॉकों को रद्द कर दिया था।
3. व्यावसायिक कोयला खनन के तहत, सफल बोली लगाने वाला किसी भी क्षेत्र के किसी भी उपभोक्ता को बाजार-निर्धारित कीमतों पर कोयला बेच सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है। भारत के पास विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा कोयला भंडार है और यह कोयले का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता है। कथन 2 गलत है। सर्वोच्च न्यायालय ने 218 में से 204 ब्लॉकों को रद्द किया था, सभी को नहीं। कथन 3 सही है। व्यावसायिक कोयला खनन में उपयोग प्रतिबंध नहीं हैं और कोयला बाजार-निर्धारित कीमतों पर बेचा जा सकता है।
Q2. अभिकथन (A): व्यावसायिक कोयला खनन भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
कारण (R): व्यावसायिक कोयला खनन ने निजी क्षेत्र की भागीदारी का विस्तार किया है, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई है और राजस्व-साझाकरण मॉडल के माध्यम से सरकार को लाभ हुआ है।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि व्यावसायिक कोयला खनन ने घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता कम की है। कारण (R) भी सही है और A का सही स्पष्टीकरण है क्योंकि निजी भागीदारी और राजस्व-साझाकरण मॉडल ने उत्पादन वृद्धि और राजकोषीय लाभों के माध्यम से इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद की है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में व्यावसायिक कोयला खनन की शुरुआत के पीछे के कारणों और इसके प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास में किस प्रकार योगदान दे रहा है? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं में कोयले के महत्व और 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से करें। व्यावसायिक कोयला खनन की आवश्यकता के कारणों को स्पष्ट करें, जिसमें पारदर्शिता की कमी और एकाधिकार को समाप्त करना शामिल है। इसके प्रमुख प्रावधानों का विस्तार से वर्णन करें, जैसे कि राजस्व-साझाकरण मॉडल, उपयोग प्रतिबंधों का अभाव, पात्रता मानदंडों का विस्तार, और 100% FDI की अनुमति। फिर, ऊर्जा सुरक्षा (घरेलू उत्पादन में वृद्धि, आयात पर निर्भरता में कमी) और आर्थिक विकास (राजस्व सृजन, पूंजीगत व्यय, रोजगार सृजन, व्यापार सुगमता) में इसके योगदान पर प्रकाश डालें। प्रासंगिक आंकड़ों और अधिनियमों (कोयला खान (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 2015) का उल्लेख करें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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