24 Sep भारत सेमीकंडक्टर उद्योग में ‘सकारात्मक चक्र’ की ओर: अशोक चंदक
✎ भारत का सेमीकंडक्टर उद्योग नीतिगत समर्थन और बढ़ते निवेश के साथ एक 'सकारात्मक सर्पिल' में प्रवेश कर रहा है, जो विनिर्माण, स्थानीयकरण और कौशल विकास के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — अर्थव्यवस्था | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
- Prelims: सेमीकंडक्टर, सेमीकॉन इंडिया, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (PLI) योजना, मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत
- Essay: आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में प्रौद्योगिकी की भूमिका, भारत में विनिर्माण क्षेत्र का विकास और चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत का सेमीकंडक्टर उद्योग नीतिगत समर्थन और बढ़ते निवेश के साथ एक ‘सकारात्मक सर्पिल’ में प्रवेश कर रहा है, जो विनिर्माण, स्थानीयकरण और कौशल विकास के माध्यम से आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में संपन्न हुए SEMICON India 2026 के बाद, उद्योग विशेषज्ञों ने भारत के सेमीकंडक्टर (Semiconductor) उद्योग के ‘सकारात्मक सर्पिल’ (positive spiral) में प्रवेश करने की बात कही है। यह दर्शाता है कि भारत नीतिगत घोषणाओं से आगे बढ़कर वाणिज्यिक उत्पादन और एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) के निर्माण की दिशा में बढ़ रहा है, जहाँ निवेश, विनिर्माण और स्थानीयकरण (localisation) एक-दूसरे को बढ़ावा दे रहे हैं।
पृष्ठभूमि
- भारत सरकार ने देश में सेमीकंडक्टर विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं, जिनमें ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) और ‘आत्मनिर्भर भारत’ (Atmanirbhar Bharat) अभियान शामिल हैं।
- सेमीकंडक्टर चिप्स आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स का आधार हैं और इनका उपयोग स्मार्टफोन, कंप्यूटर, ऑटोमोबाइल तथा रक्षा उपकरणों सहित विभिन्न क्षेत्रों में होता है।
- वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला (supply chain) में व्यवधानों ने भारत को इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया है।
- सरकार ने सेमीकंडक्टर और डिस्प्ले विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र के विकास के लिए ₹76,000 करोड़ की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी है।
- SEMICON India जैसे कार्यक्रम उद्योग जगत के नेताओं, नीति निर्माताओं और निवेशकों को एक मंच पर लाते हैं ताकि इस क्षेत्र के विकास पर चर्चा की जा सके और सहयोग को बढ़ावा दिया जा सके।
- EY-IESA की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2035 तक 200 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है।
सेमीकंडक्टर उद्योग और भारत का दृष्टिकोण
- सेमीकंडक्टर ऐसे पदार्थ होते हैं जिनकी चालकता (conductivity) धातु और कुचालक (insulator) के बीच होती है। इनका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में स्विच और एम्पलीफायर (amplifier) के रूप में किया जाता है।
- भारत का सेमीकंडक्टर कार्यक्रम एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र बनाने पर केंद्रित है, जिसमें चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन (fabs), उन्नत पैकेजिंग, उपकरण, सामग्री, रसद (logistics) और प्रतिभा विकास शामिल है।
- सरकार की उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (Production-Linked Incentive – PLI) योजना सेमीकंडक्टर विनिर्माण इकाइयों की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करती है।
- यह पहल ‘क्रेडिबिलिटी से कैपेबिलिटी’ (credibility to capability) की ओर बढ़ने पर जोर देती है, जिसका अर्थ है कि भारत अब केवल विश्वसनीय भागीदार नहीं बल्कि एक सक्षम विनिर्माण केंद्र भी बन रहा है।
- सेमीकॉन इंडिया (SEMICON India) जैसे आयोजनों में निवेश प्रतिबद्धताएँ (investment commitments) और समझौता ज्ञापन (MoUs) भारत में सेमीकंडक्टर क्षेत्र के प्रति बढ़ती वैश्विक रुचि को दर्शाते हैं।
- उद्योग का मानना है कि निवेश से विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा, जिससे आपूर्तिकर्ता (supplier) की मांग बढ़ेगी, स्थानीयकरण होगा, और अंततः कौशल व प्रौद्योगिकी का विकास होगा, जो आगे और निवेश आकर्षित करेगा।
- यह ‘सकारात्मक सर्पिल’ भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनाने में मदद करेगा, जिससे देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ेगी।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| नीति से वाणिज्यिक उत्पादन की ओर | यह दर्शाता है कि भारत की सेमीकंडक्टर रणनीति अब केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक विनिर्माण और पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रही है। |
| सेमीकॉन इंडिया 2026 | इस आयोजन ने निवेश प्रतिबद्धताओं, समझौता ज्ञापनों (MoUs) और व्यावसायिक चर्चाओं के लिए एक मंच प्रदान किया, जिससे उद्योग में विश्वास और सहयोग बढ़ा। |
| निवेश और विनिर्माण में वृद्धि | सेमीकंडक्टर क्षेत्र में $7 बिलियन के निवेश की प्रतिबद्धता से भारत में चिप उत्पादन क्षमता बढ़ने और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में देश की भूमिका मजबूत होने की उम्मीद है। |
| सकारात्मक चक्र (Positive Spiral) | यह अवधारणा बताती है कि निवेश से विनिर्माण, विनिर्माण से आपूर्तिकर्ता की मांग, मांग से स्थानीयकरण और स्थानीयकरण से कौशल विकास होता है, जो आगे निवेश को आकर्षित करता है। |
| बाजार का विस्तार | EY-IESA रिपोर्ट के अनुसार, भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2035 तक $200 बिलियन तक पहुंच सकता है, जो इस क्षेत्र में भारी वृद्धि की संभावना को दर्शाता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- सेमीकंडक्टर उद्योग में आत्मनिर्भरता से भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, आयात पर निर्भरता कम होगी और निर्यात क्षमता बढ़ेगी।
- यह क्षेत्र उच्च-कुशल रोजगार के अवसर पैदा करेगा, जिससे तकनीकी कार्यबल का विकास होगा और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।
- घरेलू विनिर्माण से इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की लागत कम हो सकती है, जिससे उपभोक्ताओं को लाभ होगा और डिजिटल इंडिया पहल को गति मिलेगी।
रणनीतिक महत्व
- सेमीकंडक्टर चिप्स आधुनिक प्रौद्योगिकी और रक्षा प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण हैं; घरेलू उत्पादन से राष्ट्रीय सुरक्षा और तकनीकी संप्रभुता सुनिश्चित होगी।
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की स्थिति मजबूत होगी, जिससे भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण होने वाले व्यवधानों का सामना करने की क्षमता बढ़ेगी।
- यह भारत को वैश्विक प्रौद्योगिकी केंद्र के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा, जिससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और निवेश आकर्षित होगा।
सामाजिक महत्व
- सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र के विकास से अनुसंधान और विकास (R&D) को बढ़ावा मिलेगा, जिससे नवाचार और तकनीकी प्रगति होगी।
- कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों में प्रशिक्षित किया जाएगा, जिससे उनकी रोजगार क्षमता बढ़ेगी।
- डिजिटल समावेशन को बढ़ावा मिलेगा क्योंकि स्वदेशी चिप्स के साथ इलेक्ट्रॉनिक्स अधिक सुलभ और किफायती हो सकते हैं।
चुनौतियाँ
1. उच्च पूंजीगत व्यय और लंबी परिपक्वता अवधि
- सेमीकंडक्टर विनिर्माण इकाइयों (फैब्स) की स्थापना के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है, जिसकी वापसी में कई वर्ष लग सकते हैं।
- यह निजी निवेशकों के लिए एक महत्वपूर्ण बाधा है, जिससे सरकारी सहायता और प्रोत्साहन आवश्यक हो जाते हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: औद्योगिक नीति, निवेश मॉडल
2. तकनीकी विशेषज्ञता और कुशल कार्यबल की कमी
- सेमीकंडक्टर डिजाइन, विनिर्माण और पैकेजिंग के लिए अत्यधिक विशिष्ट कौशल और अनुभव की आवश्यकता होती है, जिसकी भारत में अभी कमी है।
- इस अंतर को पाटने के लिए व्यापक शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
यूपीएससी लिंक: मानव संसाधन: कौशल विकास, शिक्षा
3. वैश्विक प्रतिस्पर्धा और आपूर्ति श्रृंखला के मुद्दे
- सेमीकंडक्टर उद्योग अत्यधिक प्रतिस्पर्धी है, जिसमें कुछ प्रमुख वैश्विक खिलाड़ी हावी हैं। भारत को अपनी जगह बनाने के लिए नवाचार और दक्षता पर ध्यान देना होगा।
- कच्चे माल और विशेष उपकरणों के लिए वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता बनी हुई है, जो भू-राजनीतिक जोखिमों के प्रति संवेदनशील है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध: वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं, व्यापार
4. बुनियादी ढांचा और पारिस्थितिकी तंत्र का विकास
- सेमीकंडक्टर फैब्स को स्थिर बिजली आपूर्ति, स्वच्छ जल और विशेष रसायनों जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की आवश्यकता होती है।
- एक मजबूत सहायक पारिस्थितिकी तंत्र, जिसमें अनुसंधान संस्थान, डिजाइन हाउस और उपकरण आपूर्तिकर्ता शामिल हैं, का विकास अभी भी प्रारंभिक अवस्था में है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: बुनियादी ढांचा, औद्योगिक विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| उच्च निवेश की आवश्यकता | सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करने में अरबों डॉलर का निवेश लगता है, जो निजी क्षेत्र के लिए एक बड़ी बाधा है। |
| विशेषज्ञ कार्यबल की कमी | चिप डिजाइन, विनिर्माण और परीक्षण के लिए आवश्यक उच्च-कुशल इंजीनियरों और तकनीशियनों की उपलब्धता सीमित है। |
| तकनीकी निर्भरता | महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों, उपकरणों और सामग्रियों के लिए अभी भी विदेशी स्रोतों पर निर्भरता बनी हुई है। |
| वैश्विक प्रतिस्पर्धा | स्थापित वैश्विक खिलाड़ियों और देशों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। |
| बुनियादी ढांचागत चुनौतियाँ | स्थिर बिजली, जल और लॉजिस्टिक्स जैसे आवश्यक बुनियादी ढांचे की उपलब्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना। |
| अनुसंधान एवं विकास का अभाव | सेमीकंडक्टर क्षेत्र में पर्याप्त घरेलू अनुसंधान और विकास क्षमताओं की कमी है। |
आगे की राह
- सेमीकंडक्टर डिजाइन, विनिर्माण और पैकेजिंग में विशेषज्ञता विकसित करने के लिए शिक्षा और कौशल विकास कार्यक्रमों में भारी निवेश करना।
- घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों को आकर्षित करने के लिए आकर्षक प्रोत्साहन, कर लाभ और वित्तीय सहायता प्रदान करना।
- अनुसंधान और विकास (R&D) को बढ़ावा देने के लिए अकादमिक संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग को मजबूत करना।
- सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र के लिए आवश्यक बुनियादी ढांचे, जैसे कि विश्वसनीय बिजली, जल आपूर्ति और लॉजिस्टिक्स का विकास करना।
- वैश्विक सेमीकंडक्टर कंपनियों के साथ रणनीतिक साझेदारी और संयुक्त उद्यमों को बढ़ावा देना ताकि प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और ज्ञान साझाकरण हो सके।
- एक स्थिर और अनुमानित नियामक ढांचा स्थापित करना जो निवेश को प्रोत्साहित करे और व्यापार करने में आसानी सुनिश्चित करे।
- सेमीकंडक्टर विनिर्माण के लिए आवश्यक कच्चे माल और घटकों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना ताकि आपूर्ति श्रृंखला की लचीलापन बढ़े।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सेमीकंडक्टर उद्योग · भारत सेमीकंडक्टर मिशन · इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण · आत्मनिर्भर भारत · उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना · वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला · तकनीकी आत्मनिर्भरता · उच्च प्रौद्योगिकी क्षेत्र · रोजगार सृजन · आर्थिक संवृद्धि
अवधारणा प्रवाह
नीति घोषणाएँ और प्रोत्साहन → निवेश प्रतिबद्धताएँ → विनिर्माण और उत्पादन → आपूर्तिकर्ता की मांग और स्थानीयकरण → कौशल विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण → आगे निवेश और पारिस्थितिकी तंत्र का गहरा होना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2035 तक 200 बिलियन डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
2. सेमीकंडक्टर विनिर्माण में केवल चिप डिजाइन और उत्पादन शामिल है, पैकेजिंग और सामग्री नहीं।
3. SEMICON India जैसे कार्यक्रम सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि EY-IESA रिपोर्ट के अनुसार, भारत का सेमीकंडक्टर बाजार 2035 तक 200 बिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। कथन 2 गलत है क्योंकि सेमीकंडक्टर उद्योग में चिप विनिर्माण, पैकेजिंग, सामग्री, उपकरण, डिजाइन और इलेक्ट्रॉनिक्स सहित एक व्यापक पारिस्थितिकी तंत्र शामिल है। कथन 3 सही है क्योंकि SEMICON India जैसे कार्यक्रम निवेश, साझेदारी और व्यावसायीकरण को बढ़ावा देकर सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण हैं।
Q2. भारत में सेमीकंडक्टर उद्योग के विकास को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा कौन सी पहल की गई है?
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
- उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना
- प्रधानमंत्री जन धन योजना
- स्वच्छ भारत अभियान
उत्तर: उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना — उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना भारत में विनिर्माण को बढ़ावा देने और सेमीकंडक्टर उद्योग सहित विभिन्न क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने के लिए एक प्रमुख सरकारी पहल है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत सेमीकंडक्टर उद्योग के विकास के लिए एक ‘सकारात्मक चक्र’ में प्रवेश कर रहा है। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और देश के आर्थिक विकास तथा तकनीकी आत्मनिर्भरता में इस क्षेत्र की क्षमता पर प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: सेमीकंडक्टर उद्योग के महत्व और भारत के वर्तमान परिदृश्य का संक्षिप्त परिचय।
‘सकारात्मक चक्र’ की व्याख्या: निवेश, विनिर्माण, आपूर्तिकर्ता मांग, स्थानीयकरण, कौशल विकास और प्रौद्योगिकी के बीच संबंध को समझाना। SEMICON India जैसे आयोजनों और सरकारी नीतियों (जैसे भारत सेमीकंडक्टर मिशन, PLI योजना) की भूमिका का उल्लेख।
आर्थिक विकास में क्षमता: 2035 तक 200 बिलियन डॉलर के बाजार अनुमान, रोजगार सृजन, निर्यात क्षमता, अन्य उद्योगों पर गुणक प्रभाव (जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण) और विदेशी मुद्रा आय पर चर्चा।
तकनीकी आत्मनिर्भरता में क्षमता: महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों तक पहुंच, आयात पर निर्भरता कम करना, रणनीतिक क्षेत्रों में सुरक्षा, अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना, और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति को मजबूत करना।
चुनौतियाँ और आगे की राह: उच्च पूंजी निवेश, कुशल कार्यबल की कमी, अनुसंधान एवं विकास में निवेश की आवश्यकता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और भू-राजनीतिक कारकों जैसी चुनौतियों का उल्लेख। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए नीतिगत उपायों और दीर्घकालिक रणनीतियों पर संक्षिप्त चर्चा।
निष्कर्ष: भारत के सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षाओं के लिए एक संतुलित और आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करना।
स्रोत: orissapost.com
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