मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ग्राम रोजगार सहायकों को तबादले पर मिलेगा यात्रा भत्ता

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ग्राम रोजगार सहायकों को तबादले पर मिलेगा यात्रा भत्ता

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: ग्राम रोजगार सहायकों को तबादले पर मिलेगा यात्रा भत्ता

ग्राम रोजगार सहायक स्थानांतरण प्रक्रियास्थानांतरण आदेशप्रशासनिक आवश्यकतायात्रा भत्ताअनिवार्यनीति निर्माण6 माह में
ग्राम रोजगार सहायक स्थानांतरण प्रक्रिया

✎ उच्च न्यायालय ने स्थानांतरण पर रोक से इनकार करते हुए राज्य को स्थानांतरण पर यात्रा, स्थानांतरण और घरेलू भत्ते देने का अनिवार्य निर्देश तथा छह माह में नीति बनाने का आदेश दिया, जो प्रशासनिक विवेक और न्यायिक संयम के संतुलन का उदाहरण…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity) और शासन: उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता (Article 226), न्यायिक समीक्षा (Judicial Review), पंचायती राज संस्थाएँ  |  GS Paper II — शासन (Governance): ग्रामीण स्थानीय निकायों का प्रशासन और सेवा-शर्तों से जुड़े नीतिगत निर्देश  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था और रोजगार: ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) का क्रियान्वयन और मानव संसाधन प्रबंधन
  • Prelims: ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (MGNREGA), ग्राम रोजगार सहायक की भूमिका और नियुक्ति का स्तर (ग्राम पंचायत), राज्य रोजगार गारंटी परिषद (State Employment Guarantee Council) और उसकी संरचना, अनुच्छेद 226 — उच्च न्यायालय की रिट अधिकारिता, न्यायिक समीक्षा और प्रशासनिक विवेक (Administrative Discretion) की सीमाएँ, अनुच्छेद 243G — पंचायतों को शक्तियाँ और दायित्व सौंपना, अनुच्छेद 41 — काम, शिक्षा और लोक सहायता का अधिकार (राज्य नीति का निदेशक तत्व), रिट के प्रकार: परमादेश (Mandamus) और सामान्य निर्देश
  • Essay: प्रशासनिक आवश्यकता और कर्मचारी कल्याण के बीच संतुलन: क्या न्यायपालिका नीतिगत क्षेत्र में हस्तक्षेप करे?, ग्रामीण विकास की रीढ़ कहे जाने वाले मानदेय-आधारित कर्मियों की गरिमापूर्ण सेवा-शर्तें और सुशासन

त्वरित पुनरावृत्ति: उच्च न्यायालय ने स्थानांतरण पर रोक से इनकार करते हुए राज्य को स्थानांतरण पर यात्रा, स्थानांतरण और घरेलू भत्ते देने का अनिवार्य निर्देश तथा छह माह में नीति बनाने का आदेश दिया, जो प्रशासनिक विवेक और न्यायिक संयम के संतुलन का उदाहरण है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर पीठ ने प्रदेश की ग्राम पंचायतों में कार्यरत लगभग 23 हजार ग्राम रोजगार सहायकों से जुड़े एक मामले में अंतिम आदेश जारी किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार ऐसे कर्मियों का स्थानांतरण प्रशासनिक आवश्यकता के अनुसार कर सकती है, किंतु स्थानांतरण की स्थिति में उन्हें यात्रा भत्ता, स्थानांतरण भत्ता और घरेलू भत्ता देना अनिवार्य होगा। अदालत ने याचिकाकर्ताओं की उस मांग को अस्वीकार कर दिया जिसमें स्थानांतरण प्रक्रिया पर पूर्ण रोक लगाने की बात कही गई थी। साथ ही राज्य रोजगार गारंटी परिषद के आयुक्त को छह महीने के भीतर स्थानांतरण भत्ते और आवास भत्ते (House Rent Allowance) पर स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश दिया गया। यह आदेश उन पाँच ग्राम रोजगार सहायकों की याचिका पर आया, जिन्होंने पिछले वर्ष 18 जुलाई को याचिका दायर की थी। सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित रखे गए निर्णय पर यह अंतिम आदेश है। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता के अनुसार इन कर्मियों को लगभग 18 हजार रुपये मासिक मानदेय मिलता है, इसलिए दूरस्थ स्थानांतरण से उन पर आर्थिक भार पड़ता है।

पृष्ठभूमि

  • ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (MGNREGA) के अंतर्गत ग्रामीण परिवारों को सौ दिन के अकुशल श्रम के रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई है। इस योजना का क्रियान्वयन ग्राम पंचायत स्तर पर होता है और इसमें ग्राम रोजगार सहायक की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
  • ग्राम रोजगार सहायक ग्राम पंचायत स्तर पर कार्य-आवंटन, मस्टर रोल, रोजगार सूची और अभिलेखों के रखरखाव जैसे कार्यों में सहयोग करते हैं। इनकी सेवा-शर्तें मुख्यतः राज्य सरकार द्वारा जारी नियमों और दिशा-निर्देशों से तय होती हैं।
  • मानदेय आधारित कर्मियों के स्थानांतरण पर यात्रा और आवास व्यय का प्रश्न अक्सर उठता है। नियमित सरकारी सेवा में ऐसे भत्ते सामान्यतः राज्य के वेतन और भत्ता नियमों से तय होते हैं, जबकि अनुबंध या मानदेय पर कार्यरत कर्मियों के लिए स्पष्ट नीति का अभाव विवाद का कारण बनता है।
  • उच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और अन्य प्रयोजनों के लिए रिट जारी कर सकते हैं। प्रशासनिक निर्णयों की वैधता की जाँच न्यायिक समीक्षा के माध्यम से की जाती है, परंतु नीति-निर्माण का मूल दायित्व कार्यपालिका का है।
  • इस प्रकरण में न्यायालय ने स्थानांतरण पर रोक लगाने से इनकार किया, किंतु कार्यपालिका को समयबद्ध नीति बनाने का निर्देश दिया। यह न्यायिक संयम और दिशा-निर्देशात्मक हस्तक्षेप के संतुलन का उदाहरण है।

ग्राम रोजगार सहायक और स्थानांतरण भत्ते से जुड़ा संवैधानिक-प्रशासनिक ढाँचा क्या है?

  • ग्राम रोजगार सहायक ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के ग्राम स्तरीय कर्मी हैं, जो ग्राम पंचायत के माध्यम से काम करते हैं और योजना के दैनिक क्रियान्वयन में सहयोग देते हैं।
  • MGNREGA के अंतर्गत राज्य रोजगार गारंटी परिषद (State Employment Guarantee Council) राज्य स्तर पर योजना की नीतिगत निगरानी और सलाहकार भूमिका निभाती है। यह परिषद राज्य सरकार को योजना से जुड़े विषयों पर परामर्श देती है।
  • संविधान का अनुच्छेद 243G राज्य विधानमंडल को पंचायतों को शक्तियाँ और दायित्व सौंपने का अधिकार देता है। इसी ढाँचे में ग्राम पंचायतें और उनके अंतर्गत कर्मी कार्य करते हैं।
  • अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मौलिक अधिकार या अन्य विधिक अधिकारों के उल्लंघन की स्थिति में परमादेश जैसी रिट जारी कर सकता है। परंतु न्यायालय सामान्यतः नीति-निर्माण स्वयं नहीं करता, बल्कि कार्यपालिका को निर्देश देता है।
  • प्रशासनिक विवेक (Administrative Discretion) के अंतर्गत सरकार कर्मियों को आवश्यकता के अनुसार स्थानांतरित कर सकती है, किंतु यह विवेक मनमाना नहीं होना चाहिए और समानता (अनुच्छेद 14) की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए।
  • अनुच्छेद 41 राज्य को काम और लोक सहायता के अधिकार की सीमाओं के भीतर दिशा देता है, जबकि अनुच्छेद 43 में कर्मकारों के लिए जीवन-स्तर योग्य मजदूरी का लक्ष्य रखा गया है। ये निदेशक सिद्धांत नीति-निर्माण के मार्गदर्शक हैं।
  • स्थानांतरण भत्ता, यात्रा भत्ता और आवास भत्ता जैसे व्यय सेवा-शर्तों का हिस्सा हैं। मानदेय आधारित कर्मियों के लिए इन्हें स्पष्ट नीति द्वारा निर्धारित करना प्रशासनिक पारदर्शिता और कर्मचारी-हित दोनों के लिए आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
निर्णय का स्वरूप उच्च न्यायालय की एकलपीठ का अंतिम आदेश। याचिका 18 जुलाई को दायर हुई थी और सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया था।
लाभार्थी मध्य प्रदेश की ग्राम पंचायतों में कार्यरत लगभग 23 हजार ग्राम रोजगार सहायक
भत्तों का प्रावधान स्थानांतरण होने पर अनिवार्य यात्रा भत्ता, स्थानांतरण भत्ता (Transfer Allowance) और घरेलू भत्ता देना होगा।
नीति-निर्देश छह माह के भीतर स्थानांतरण और आवास भत्ते (House Rent Allowance) की स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश। इसकी जिम्मेदारी राज्य रोजगार गारंटी परिषद के आयुक्त को दी गई है।
स्थानांतरण पर रोक से इनकार अदालत ने स्थानांतरण प्रक्रिया पर पूर्ण रोक की मांग ठुकरा दी। प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर स्थानांतरण जारी रह सकेंगे, परंतु वित्तीय लाभ देना अनिवार्य होगा।
वेतन और आर्थिक संदर्भ याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता के अनुसार वेतन लगभग 18 हजार रुपये प्रतिमाह है। 100 किलोमीटर दूर स्थानांतरण से आर्थिक बोझ बढ़ने का तर्क दिया गया।

महत्व

प्रशासनिक और सेवा-शर्त संबंधी महत्व

  • स्थानांतरण के साथ भत्तों को नीति-आधारित बनाने से कर्मचारियों के साथ समान और पूर्वानुमेय व्यवहार सुनिश्चित होता है।
  • सेवा-शर्तों में अस्पष्टता घटने से मनमाने निर्णयों की संभावना कम होती है और प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ती है।
  • राज्य रोजगार गारंटी परिषद जैसे वैधानिक निकाय को नीति-निर्माण की स्पष्ट भूमिका मिलती है।

सामाजिक-आर्थिक महत्व

  • ग्रामीण रोजगार में लगे कर्मचारियों की वास्तविक आय पर स्थानांतरण का असर कम होता है, जिससे परिवार की आर्थिक सुरक्षा बनी रहती है।
  • कम वेतन पाने वाले कर्मचारियों के लिए यात्रा और आवास भत्ते मिलने से उनकी कार्य-स्थिरता बढ़ती है।
  • ग्राम स्तर पर सेवा-वितरण की निरंतरता में सुधार की संभावना बनती है।

न्यायिक महत्व

  • उच्च न्यायालय ने याचिका पर विचार कर कार्यपालिका को नीति बनाने का स्पष्ट समय-सीमा वाला निर्देश दिया। यह संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार का उदाहरण है।
  • अदालत ने स्थानांतरण पर पूर्ण रोक से इनकार कर यह संतुलन बनाया कि प्रशासनिक अधिकार सुरक्षित रहें और कर्मचारियों के वित्तीय हित भी संरक्षित हों।
  • न्यायिक समीक्षा का यह स्वरूप दर्शाता है कि नीति-निर्माण का अधिकार कार्यपालिका के पास रहता है, जबकि न्यायालय उसकी संवैधानिक और वैधानिक संगति की जाँच करता है।

राजकोषीय महत्व

  • भत्तों का भुगतान अब नियमित व्यय बन जाएगा, इसलिए राज्य के बजट में इसके लिए स्पष्ट प्रावधान आवश्यक होगा।
  • भत्तों की नीति बनने से व्यय का अनुमान लगाना और लेखांकन करना आसान होता है।

चुनौतियाँ

1. वित्तीय भार और बजट प्रावधान

  • लगभग 23 हजार कर्मचारियों पर स्थानांतरण भत्ते और आवास भत्ते का सामूहिक भार राज्य की बजटीय योजना पर पड़ता है।
  • स्थानांतरण की आवृत्ति अनिश्चित होने से व्यय का पूर्वानुमान कठिन रहता है।
  • बजट में प्रावधान किए बिना अनिवार्य भत्ते देने से अन्य विकास मदों पर दबाव बढ़ सकता है।

2. स्थानांतरण नीति में प्रशासनिक संतुलन

  • प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर स्थानांतरण करने का अधिकार बनाए रखना आवश्यक है, परंतु इसके साथ कर्मचारी-कल्याण का संतुलन भी जरूरी है।
  • बार-बार या दूर-दूर स्थानांतरण से कर्मचारियों का मनोबल और कार्य-निष्ठा प्रभावित हो सकती है।
  • स्थानांतरण के मानदंड स्पष्ट न हों तो मनमानी और असंतोष की स्थिति बनती है।

3. सेवा की प्रकृति और सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न

  • ग्राम रोजगार सहायक मुख्यतः महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत कार्य करते हैं, इसलिए उनकी सेवा-शर्तें नियमित सरकारी कर्मचारियों से भिन्न हो सकती हैं।
  • अनुबंध या अस्थायी स्वरूप के कारण भत्तों और सामाजिक सुरक्षा लाभों की कानूनी स्थिति अस्पष्ट रह जाती है।
  • सेवा-शर्तों का एकसमान ढाँचा न होने से राज्यों के बीच भी व्यवहार में अंतर दिखता है।

4. न्यायिक आदेशों के क्रियान्वयन की चुनौती

  • छह माह की समय-सीमा में नीति बनाना और उसे लागू करना, दोनों चरणों में प्रशासनिक विलंब की संभावना रहती है।
  • न्यायालय का निर्देश होने के बावजूद नीति का प्रारूप तैयार करने में विभिन्न विभागों के बीच समन्वय आवश्यक होता है।
  • आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए अवमानना या निगरानी की व्यवस्था पर निर्भरता बढ़ सकती है, जो न्यायालय पर अतिरिक्त भार डालती है।

5. ग्राम स्तरीय प्रशासनिक क्षमता

  • ग्राम पंचायत स्तर पर रोजगार गारंटी कार्यक्रम का प्रबंधन करने वाले कर्मचारियों की संख्या और प्रशिक्षण सीमित होने से सेवा-वितरण प्रभावित होता है।
  • स्थानांतरण से कार्य में निरंतरता टूटती है और अभिलेखों तथा कार्य-स्थल के ज्ञान पर असर पड़ता है।
  • कर्मचारियों की स्थिरता सुनिश्चित न हो तो योजना के लक्ष्य प्राप्त करने में कठिनाई आती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
भत्तों का वित्तीय भार लगभग 23 हजार कर्मचारियों के लिए नियमित व्यय का बजट में समायोजन कठिन हो सकता है।
स्थानांतरण और प्रशासनिक आवश्यकता अत्यधिक भत्ता-बाध्यता से प्रशासन स्थानांतरण में झिझक सकता है, जबकि बिना नीति के स्थानांतरण कर्मचारियों पर अन्यायपूर्ण बोझ डालते हैं।
सेवा का अस्थायी स्वरूप सेवा-शर्तों और भत्तों की कानूनी स्थिति स्पष्ट न होने से सामाजिक सुरक्षा के लाभ सीमित रहते हैं।
समय-सीमा में क्रियान्वयन छह माह में नीति बनाने का दायित्व एक निकाय पर है, जिसके लिए विभागीय समन्वय और अनुमोदन आवश्यक होंगे।
ग्राम स्तर पर निरंतरता बार-बार स्थानांतरण से योजना के कार्य और अभिलेखों की निरंतरता प्रभावित होती है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act, 2005) – ग्राम रोजगार सहायक इसी अधिनियम के तहत ग्राम पंचायतों में कार्यरत हैं।

आगे की राह

  • स्थानांतरण नीति में भत्तों की दरें, पात्रता और भुगतान की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से परिभाषित की जाए, ताकि मनमानी की गुंजाइश न रहे।
  • छह माह की समय-सीमा में नीति बनाने के लिए विभागों के बीच समन्वय तंत्र और नियमित प्रगति-समीक्षा की व्यवस्था हो।
  • भत्तों के वित्तीय भार का आकलन कर राज्य के वार्षिक बजट में इसके लिए अलग प्रावधान किया जाए।
  • ग्राम रोजगार सहायकों की सेवा-शर्तों पर एकसमान राज्य-स्तरीय दिशा-निर्देश बनाए जाएँ, जिससे उनकी सामाजिक सुरक्षा की स्थिति स्पष्ट हो।
  • स्थानांतरण के कारणों और मानदंडों को सार्वजनिक रूप से अभिलेखित किया जाए, ताकि प्रशासनिक आवश्यकता और कर्मचारी-हित के बीच संतुलन दिखे।
  • स्थानांतरण से पूर्व कार्य-हस्तांतरण की प्रक्रिया बने, जिससे ग्राम स्तर पर योजना के कार्य और अभिलेखों की निरंतरता बनी रहे।
  • प्रशिक्षण और क्षमता-वृद्धि कार्यक्रमों के माध्यम से ग्राम रोजगार सहायकों की कार्यकुशलता बढ़ाई जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

ग्राम रोजगार सहायक · महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act, 2005) · राज्य रोजगार गारंटी परिषद (State Employment Guarantee Council) · रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) · अनुच्छेद 226 (Article 226) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · सेवा शर्तें (Conditions of Service) · स्थानांतरण नीति (Transfer Policy) · अनुच्छेद 309 (Article 309) · पंचायती राज संस्थाएं (Panchayati Raj Institutions) · अनुच्छेद 43 (Article 43) · प्रशासनिक विवेक बनाम कर्मचारी कल्याण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 226 – उच्च न्यायालय का रिट क्षेत्राधिकार; याचिका पर आदेश
  • अनुच्छेद 309 – सेवा की शर्तों का विधि द्वारा विनियमन

अवधारणा प्रवाह

प्रदेश के पाँच ग्राम रोजगार सहायकों द्वारा स्थानांतरण प्रक्रिया पर रोक की याचिका उच्च न्यायालय में दायर (18 जुलाई)।  →  न्यायालय द्वारा सुनवाई पूर्ण कर फैसला सुरक्षित रखना।  →  अंतिम आदेश में स्थानांतरण पर पूर्ण रोक से इनकार, परंतु अनिवार्य यात्रा, स्थानांतरण और घरेलू भत्ते का निर्देश।  →  राज्य रोजगार गारंटी परिषद के आयुक्त को छह माह में स्थानांतरण और आवास भत्ते की नीति बनाने की जिम्मेदारी।  →  नीति के आधार पर बजट प्रावधान और भत्तों का नियमित भुगतान।  →  ग्राम रोजगार सहायकों की सेवा-स्थिरता और ग्राम स्तर पर योजना-क्रियान्वयन में सुधार।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो भारत में रिट अधिकारिता (Writ Jurisdiction) से संबंधित हैं:
1. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन हेतु ही रिट जारी कर सकता है।
2. अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ-साथ किसी अन्य उद्देश्य के लिए भी रिट जारी कर सकता है।
3. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय का उपचार का अधिकार स्वयं एक मूल अधिकार है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है, क्योंकि अनुच्छेद 226 का क्षेत्र अनुच्छेद 32 से व्यापक है; उच्च न्यायालय मूल अधिकारों के साथ-साथ विधिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु भी रिट जारी कर सकता है। कथन 2 सही है, जो अनुच्छेद 226 की व्यापकता को दर्शाता है। कथन 3 सही है, क्योंकि अनुच्छेद 32 का उपचार स्वयं मूल अधिकार है और इसके अंतर्गत उच्चतम न्यायालय केवल मूल अधिकारों के प्रवर्तन हेतु रिट जारी करता है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A और R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): संविधान का अनुच्छेद 43 राज्य को यह प्रयास करने का निर्देश देता है कि वह सभी कर्मकारों को निर्वाह मजदूरी (Living Wage) और शिष्ट जीवन-स्तर सुनिश्चित करने का प्रयास करे।
कारण (R): राज्य के नीति निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
(a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
(b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(c) (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
(d) (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

  1. (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (c) (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (d) (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है। — अनुच्छेद 43 नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत है और निर्वाह मजदूरी का लक्ष्य निर्धारित करता है, अतः (A) सही है। नीति निदेशक तत्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं (अनुच्छेद 37), अतः (R) भी सही है। किंतु गैर-प्रवर्तनीयता का तथ्य अनुच्छेद 43 के लक्ष्य की व्याख्या नहीं करता, इसलिए (R) (A) की सही व्याख्या नहीं है।

Q3. निम्नलिखित सूचियों को सुमेलित कीजिए:
सूची-I (अनुच्छेद):
A. अनुच्छेद 243G
B. अनुच्छेद 243I
C. अनुच्छेद 243K
D. अनुच्छेद 243O

सूची-II (विषय):
1. पंचायतों की शक्तियां, प्राधिकार और दायित्व
2. पंचायतों के वित्त की समीक्षा हेतु वित्त आयोग का गठन
3. पंचायत चुनावों हेतु राज्य निर्वाचन आयोग
4. पंचायत चुनाव संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-3, D-4
  3. A-1, B-3, C-2, D-4
  4. A-4, B-2, C-3, D-1

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — अनुच्छेद 243G पंचायतों की शक्तियों और दायित्वों से संबंधित है। अनुच्छेद 243I के अंतर्गत राज्य वित्त आयोग गठित होता है। अनुच्छेद 243K पंचायत चुनावों हेतु राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था करता है। अनुच्छेद 243O पंचायत चुनाव संबंधी मामलों में न्यायालयों के हस्तक्षेप पर रोक लगाता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ ग्रामीण विकास कार्यक्रमों में संविदा पर नियुक्त कर्मचारियों के स्थानांतरण और भत्तों से जुड़े विवाद यह प्रश्न उठाते हैं कि क्या उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अंतर्गत कार्यपालिका को सेवा-शर्तों से संबंधित नीति बनाने का निर्देश दे सकता है। इस संदर्भ में कार्यपालिका के प्रशासनिक विवेक, कर्मचारी-कल्याण और न्यायिक समीक्षा की सीमाओं के बीच संतुलन का परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि यदि राज्य सरकार ऐसे निर्देशों के बावजूद नीति निर्धारण में विलंब करे, तो पीड़ित कर्मचारियों के पास कौन-से संवैधानिक और प्रशासनिक उपाय उपलब्ध हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (संकेत-बिंदु):
1. प्रस्तावना: ग्राम रोजगार सहायक महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 के अंतर्गत ग्राम पंचायत स्तर पर कार्यरत हैं। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने लगभग 23 हजार सहायकों की याचिका पर स्थानांतरण पर यात्रा एवं अन्य भत्ते देने का आदेश दिया और राज्य सरकार को छह माह में नीति बनाने का निर्देश दिया, किंतु स्थानांतरण पर रोक लगाने की मांग अस्वीकार की।
2. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 162 के अंतर्गत राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार; अनुच्छेद 309 के अंतर्गत राज्य विधानमंडल द्वारा सेवा-शर्तों का विनियमन, और इसके अभाव में कार्यपालिका द्वारा नियम बनाने की स्थिति; अनुच्छेद 243G के अंतर्गत पंचायतों के कार्य और अनुच्छेद 243 (भाग IX) के अंतर्गत पंचायती राज संस्थाओं का ढांचा।
3. रिट अधिकारिता: अनुच्छेद 226 का क्षेत्र अनुच्छेद 32 से व्यापक है; उच्च न्यायालय विधिक अधिकारों के प्रवर्तन हेतु भी रिट जारी कर सकता है। परमादेश (Mandamus) के सिद्धांत और न्यायालय की सीमा कि वह नीति-निर्माण स्वयं न करे, बल्कि संवैधानिक दायित्व के पालन का निर्देश दे।
4. न्यायिक संयम बनाम न्यायिक सक्रियता: State of U.P. v. Gobardhan Lal (2004) में न्यायालय ने स्थानांतरण आदेशों में हस्तक्षेप को दुर्भावना या वैधानिक उल्लंघन तक सीमित माना; Shilpi Bose v. State of Bihar (1991) में प्रशासनिक आवश्यकता को प्राथमिकता दी गई। इन निर्णयों के आधार पर स्थानांतरण पर रोक से इनकार और भत्तों के अनिवार्य भुगतान के निर्देश का विश्लेषण कीजिए।
5. समानता का सिद्धांत: अनुच्छेद 14 के अंतर्गत मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण (E.P. Royappa v. State of Tamil Nadu, 1974); समान स्थिति वाले कर्मचारियों के लिए एकसमान नीति का औचित्य।
6. नीति निदेशक तत्व: अनुच्छेद 43 (निर्वाह मजदूरी और शिष्ट जीवन-स्तर) का संदर्भ; ये प्रवर्तनीय नहीं, किंतु नीति-निर्माण और न्यायिक व्याख्या में मार्गदर्शक हैं।
7. तर्क-संतुलन: पक्ष में तर्क—कम वेतन (याचिकाकर्ता के अनुसार लगभग 18 हजार रुपये प्रतिमाह) वाले कर्मचारियों पर लंबी दूरी के स्थानांतरण का आर्थिक भार; विपक्ष में तर्क—प्रशासनिक आवश्यकता, कार्यपालिका के विवेक और शक्ति-पृथक्करण का सिद्धांत।
8. दूसरा भाग (परिणाम): निर्देश के बावजूद विलंब होने पर अवमानना कार्यवाही, पुनः याचिका, राज्य वित्त आयोग और प्रशासनिक शिकायत निवारण तंत्र के विकल्प; विधिक नीति बनाने हेतु विधायी उपायों की आवश्यकता।
9. निष्कर्ष: न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा को बनाए रखते हुए सेवा-शर्तों में पारदर्शी, पूर्वानुमेय और निष्पक्ष नीति की आवश्यकता पर संतुलित और तर्कपूर्ण निष्कर्ष।
नोट: परीक्षा से पहले ग्रामीण रोजगार से संबंधित नवीनतम विधिक ढांचे में हुए परिवर्तनों की पुष्टि अवश्य कर लें।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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