26 Sep मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में मिहिर भोज की जाति पर सीलबंद रिपोर्ट सौंपी, जानें पूरा मामला
✎ सम्राट मिहिर भोज की जातीय पहचान का विवाद न्यायपालिका की भूमिका और सार्वजनिक प्रतीकों के संवैधानिक उपयोग से संबंधित है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय इतिहास, समाज | GS Paper II — शासन, न्यायपालिका, संवैधानिक मूल्य
- Prelims: सम्राट मिहिर भोज, गुर्जर प्रतिहार राजवंश, जनहित याचिका, उच्च न्यायालय, संवैधानिक नैतिकता, सामाजिक न्याय
- Essay: सामाजिक पहचान और राष्ट्रीय एकता, न्यायपालिका की भूमिका: सामाजिक सद्भाव, इतिहास की व्याख्या और समकालीन समाज
त्वरित पुनरावृत्ति: सम्राट मिहिर भोज की जातीय पहचान का विवाद न्यायपालिका की भूमिका और सार्वजनिक प्रतीकों के संवैधानिक उपयोग से संबंधित है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (High Court) की ग्वालियर खंडपीठ में सम्राट मिहिर भोज की जातीय पहचान से संबंधित विवाद पर गठित जांच समिति ने अपनी सीलबंद रिपोर्ट प्रस्तुत की है। यह विवाद वर्ष 2021 में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के नामपट्ट पर ‘गुर्जर’ शब्द लिखे जाने के बाद उत्पन्न हुआ था, जिसके बाद गुर्जर और क्षत्रिय समाज के बीच तीखा मतभेद सामने आया था। अब उच्च न्यायालय इस रिपोर्ट के निष्कर्षों पर विचार करेगा।
पृष्ठभूमि
- सम्राट मिहिर भोज एक शक्तिशाली शासक थे जो गुर्जर प्रतिहार राजवंश (Gurjara-Pratihara dynasty) से संबंधित थे और नौवीं शताब्दी में शासन किया था।
- उनकी पहचान को लेकर गुर्जर और क्षत्रिय समाजों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है, दोनों समाज उन्हें अपना वंशज बताते हैं।
- वर्ष 2021 में ग्वालियर में सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा के अनावरण के दौरान नामपट्ट पर ‘गुर्जर’ शब्द लिखे जाने के बाद यह विवाद और गहरा गया।
- इस घटना के बाद राहुल साहू द्वारा उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका (Public Interest Litigation – PIL) दायर की गई थी।
- उच्च न्यायालय ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए 24 सितंबर, 2021 को ग्वालियर के संभागीय आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय जांच समिति का गठन किया था।
- समिति को ऐतिहासिक अभिलेखों, साहित्य और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर दावों का अध्ययन करना था, साथ ही यह भी जांचना था कि सार्वजनिक धन से स्थापित राष्ट्रीय नायक की प्रतिमा के साथ किसी विशिष्ट जाति का उल्लेख संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है या नहीं।
भारत में सामाजिक पहचान और न्यायिक हस्तक्षेप
- भारत में विभिन्न समुदायों के बीच ऐतिहासिक हस्तियों की पहचान को लेकर विवाद असामान्य नहीं हैं, जो अक्सर सामाजिक और राजनीतिक तनाव का कारण बनते हैं।
- न्यायपालिका ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकती है ताकि ऐतिहासिक साक्ष्यों की जांच की जा सके और सामाजिक सद्भाव बनाए रखा जा सके।
- जनहित याचिका (PIL) एक महत्वपूर्ण न्यायिक उपकरण है जो किसी भी व्यक्ति या समूह को सार्वजनिक हित से संबंधित मामलों में न्यायालय का दरवाजा खटखटाने की अनुमति देता है।
- संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि सार्वजनिक स्थानों और प्रतीकों का उपयोग समावेशी तरीके से हो और किसी एक समुदाय के पक्ष में न हो।
- जांच समितियाँ, जिनमें विशेषज्ञ और समुदाय के प्रतिनिधि शामिल होते हैं, ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर निष्पक्ष निष्कर्ष तक पहुँचने में मदद करती हैं।
- सार्वजनिक धन से स्थापित राष्ट्रीय नायकों की प्रतिमाओं या स्मारकों पर किसी विशिष्ट जातीय पहचान का उल्लेख करना संवैधानिक मूल्यों, विशेषकर धर्मनिरपेक्षता और समानता के सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकता है।
- न्यायालय का निर्णय ऐसे मामलों में न केवल ऐतिहासिक व्याख्या को प्रभावित करता है, बल्कि भविष्य में सार्वजनिक प्रतीकों के उपयोग के लिए भी एक मिसाल कायम करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सम्राट मिहिर भोज की जातीय पहचान का विवाद | यह विवाद गुर्जर और क्षत्रिय समाजों के बीच 2021 में ग्वालियर में प्रतिमा के नामपट्ट पर ‘गुर्जर’ शब्द लिखे जाने के बाद शुरू हुआ। |
| उच्च न्यायालय द्वारा गठित जांच समिति | विवाद की संवेदनशीलता को देखते हुए, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने 24 सितंबर 2021 को एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया। |
| समिति की संरचना | समिति में ग्वालियर के संभाग आयुक्त (अध्यक्ष), पुलिस महानिरीक्षक (उपाध्यक्ष) और गुर्जर व क्षत्रिय समाज के एक-एक प्रतिनिधि शामिल थे। |
| समिति का कार्यक्षेत्र | समिति को ऐतिहासिक अभिलेखों, साहित्य और पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर दावों का अध्ययन करना था, साथ ही यह जांचना था कि सार्वजनिक धन से स्थापित प्रतिमा पर जाति का उल्लेख संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप है या नहीं। |
| सीलबंद रिपोर्ट | समिति ने गहन पड़ताल के बाद अपनी सीलबंद रिपोर्ट उच्च न्यायालय में प्रस्तुत कर दी है, जिस पर अगली सुनवाई में विचार किया जाएगा। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह मामला भारत में जातीय पहचान और ऐतिहासिक शख्सियतों से जुड़े दावों की संवेदनशीलता को दर्शाता है, जहाँ विभिन्न समुदाय अपने इतिहास को स्थापित करने का प्रयास करते हैं।
- उच्च न्यायालय का निर्णय भविष्य में सार्वजनिक स्मारकों और ऐतिहासिक शख्सियतों के नामकरण से संबंधित दिशानिर्देशों को प्रभावित कर सकता है, जिससे सामाजिक सद्भाव बनाए रखने में मदद मिलेगी।
कानूनी और संवैधानिक महत्व
- यह मामला न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के महत्व को रेखांकित करता है, जहाँ न्यायपालिका सामाजिक विवादों को सुलझाने और संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- समिति द्वारा ‘सार्वजनिक धन से स्थापित किसी राष्ट्रीय नायक की प्रतिमा के साथ किसी विशिष्ट जाति का उल्लेख करना सांविधानिक मूल्यों और भावना के अनुरूप है या नहीं’ की जांच, धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और समानता (Equality) जैसे संवैधानिक सिद्धांतों की प्रासंगिकता को दर्शाती है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
- यह विवाद ऐतिहासिक साक्ष्यों के वस्तुनिष्ठ विश्लेषण और व्याख्या की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है, विशेषकर जब वे समकालीन सामाजिक-राजनीतिक दावों से जुड़ते हैं।
- यह मामला इस बात पर भी विचार करने को प्रेरित करता है कि कैसे ऐतिहासिक शख्सियतों को राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि विभाजक पहचान के रूप में।
चुनौतियाँ
1. ऐतिहासिक साक्ष्यों की व्याख्या
- विभिन्न समुदायों द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक अभिलेखों, साहित्य और पुरातात्विक साक्ष्यों की वस्तुनिष्ठ और अकादमिक रूप से स्वीकार्य व्याख्या करना एक चुनौती है, क्योंकि अक्सर इन पर भावनात्मक और पहचान-आधारित दावे हावी हो जाते हैं।
- प्राचीन इतिहास में जातीय पहचानों का निर्धारण आधुनिक जाति व्यवस्था के संदर्भ में करना जटिल हो सकता है, क्योंकि उस समय की सामाजिक संरचनाएं भिन्न थीं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय इतिहास और संस्कृति
2. सामाजिक सद्भाव बनाए रखना
- ऐतिहासिक शख्सियतों की जातीय पहचान को लेकर विवाद अक्सर समुदायों के बीच तनाव और संघर्ष को जन्म देते हैं, जिससे सामाजिक सद्भाव और कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है।
- न्यायालय के निर्णय के बाद भी, यदि किसी एक पक्ष को लगता है कि उनके दावों को पर्याप्त मान्यता नहीं मिली है, तो असंतोष और विरोध की संभावना बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय समाज, सामाजिक न्याय
3. संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण
- सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित राष्ट्रीय नायकों की प्रतिमाओं के साथ किसी विशिष्ट जाति का उल्लेख करना संवैधानिक मूल्यों, विशेषकर समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप है या नहीं, यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न है।
- राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि सार्वजनिक संपत्ति और प्रतीक किसी एक समुदाय की पहचान को बढ़ावा देने के बजाय सभी नागरिकों के लिए समावेशी हों।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, राजव्यवस्था
4. राजनीतिकरण का जोखिम
- ऐसे संवेदनशील मुद्दों का अक्सर राजनीतिकरण किया जाता है, जहाँ विभिन्न राजनीतिक दल सामुदायिक भावनाओं का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं, जिससे समस्या का समाधान और भी जटिल हो जाता है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है, जिससे जनता का न्यायपालिका पर विश्वास कम हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था, शासन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| ऐतिहासिक पहचान पर विवाद | विभिन्न समुदायों द्वारा ऐतिहासिक शख्सियतों पर दावे से सामाजिक तनाव और ध्रुवीकरण का खतरा। |
| सार्वजनिक स्मारकों का उपयोग | सार्वजनिक धन से स्थापित राष्ट्रीय नायकों की प्रतिमाओं का किसी विशिष्ट जातीय पहचान से जोड़ना संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध हो सकता है। |
| न्यायिक प्रक्रिया की संवेदनशीलता | न्यायालय को ऐतिहासिक साक्ष्यों और संवैधानिक सिद्धांतों के बीच संतुलन बनाना होगा, जिससे सभी पक्षों को न्याय मिले और सामाजिक शांति बनी रहे। |
| अकादमिक बनाम सामुदायिक दावे | इतिहासकारों के शोध और पुरातात्विक साक्ष्यों को सामुदायिक भावनाओं और पहचान-आधारित दावों से अलग रखना एक चुनौती है। |
आगे की राह
- ऐतिहासिक साक्ष्यों का वस्तुनिष्ठ और अकादमिक विश्लेषण सुनिश्चित करने के लिए इतिहासकारों और पुरातत्वविदों की एक निष्पक्ष समिति का गठन किया जाना चाहिए, जो राजनीतिक और सामुदायिक दबावों से मुक्त हो।
- सार्वजनिक स्मारकों और राष्ट्रीय नायकों के नामकरण से संबंधित एक स्पष्ट राष्ट्रीय नीति या दिशानिर्देश तैयार किए जाने चाहिए, जो संवैधानिक मूल्यों, विशेषकर धर्मनिरपेक्षता और समानता को प्राथमिकता दें।
- समुदायों के बीच संवाद और समझ को बढ़ावा देने के लिए मंच स्थापित किए जाने चाहिए, ताकि वे अपने दावों को शांतिपूर्ण और रचनात्मक तरीके से प्रस्तुत कर सकें।
- न्यायिक प्रक्रिया को पूरी पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ संचालित किया जाना चाहिए, ताकि सभी पक्षों को न्याय मिलने का विश्वास हो और न्यायालय के निर्णय को व्यापक स्वीकृति मिले।
- राज्य सरकारों को ऐसे संवेदनशील मुद्दों के राजनीतिकरण को रोकने के लिए सक्रिय कदम उठाने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कानून-व्यवस्था बनी रहे।
- शैक्षणिक संस्थानों को भारतीय इतिहास की बहुआयामी प्रकृति पर जोर देना चाहिए और छात्रों को विभिन्न दृष्टिकोणों से परिचित कराना चाहिए, ताकि वे ऐतिहासिक विवादों को बेहतर ढंग से समझ सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
जनहित याचिका · न्यायिक सक्रियता · संवैधानिक मूल्य · सामाजिक समरसता · ऐतिहासिक साक्ष्य · जातीय पहचान · सांस्कृतिक विरासत · न्यायिक समीक्षा · संघवाद · राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘कानून के समक्ष समानता’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 29’, ‘note’: ‘अल्पसंख्यकों के हितों का संरक्षण’}
अवधारणा प्रवाह
सम्राट मिहिर भोज की प्रतिमा पर ‘गुर्जर’ शब्द का उल्लेख → गुर्जर और क्षत्रिय समाजों के बीच जातीय पहचान को लेकर विवाद → उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर → उच्च न्यायालय द्वारा जांच समिति का गठन → समिति द्वारा ऐतिहासिक साक्ष्यों का अध्ययन और रिपोर्ट प्रस्तुत → उच्च न्यायालय द्वारा रिपोर्ट पर विचार और अंतिम निर्णय
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जनहित याचिका (PIL) की अवधारणा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत विकसित हुई है।
2. जनहित याचिका केवल सर्वोच्च न्यायालय में ही दायर की जा सकती है, उच्च न्यायालयों में नहीं।
3. जनहित याचिका का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को न्याय दिलाना है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 गलत है क्योंकि जनहित याचिका की अवधारणा न्यायिक सक्रियता के माध्यम से विकसित हुई है और यह अनुच्छेद 32 (सर्वोच्च न्यायालय) और अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय) दोनों के तहत दायर की जा सकती है। कथन 2 गलत है क्योंकि जनहित याचिका उच्च न्यायालयों में भी दायर की जा सकती है। कथन 3 सही है, जनहित याचिका का मुख्य उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना और उन्हें न्याय दिलाना है।
Q2. भारत में न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सबसे उपयुक्त रूप से इसकी प्रकृति का वर्णन करता है?
- यह विधायिका द्वारा बनाए गए कानूनों को रद्द करने की न्यायपालिका की शक्ति है।
- यह न्यायपालिका द्वारा सरकार के अन्य अंगों के कार्यों में हस्तक्षेप किए बिना केवल कानूनी विवादों का समाधान करना है।
- यह न्यायपालिका द्वारा संविधान के प्रावधानों की व्याख्या करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी शक्तियों का विस्तार करना है, विशेषकर जब कार्यपालिका और विधायिका अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहती हैं।
- यह न्यायपालिका द्वारा केवल संवैधानिक संशोधन विधेयकों की समीक्षा करना है।
- यह न्यायपालिका द्वारा केवल संवैधानिक संशोधन विधेयकों की समीक्षा करना है।
उत्तर: यह न्यायपालिका द्वारा संविधान के प्रावधानों की व्याख्या करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी शक्तियों का विस्तार करना है, विशेषकर जब कार्यपालिका और विधायिका अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहती हैं। — न्यायिक सक्रियता का अर्थ है कि न्यायपालिका संविधान की व्याख्या करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपनी शक्तियों का विस्तार करती है, खासकर जब कार्यपालिका और विधायिका अपने कर्तव्यों का पालन करने में विफल रहती हैं। यह केवल कानूनों को रद्द करने या केवल कानूनी विवादों को सुलझाने से अधिक व्यापक है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सार्वजनिक स्थलों पर राष्ट्रीय नायकों की प्रतिमाओं के साथ किसी विशिष्ट जातीय पहचान का उल्लेख करने से उत्पन्न होने वाले संवैधानिक और सामाजिक निहितार्थों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ऐसे विवादों के समाधान में न्यायपालिका की भूमिका न्यायिक सक्रियता के दायरे में आती है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** सम्राट मिहिर भोज जैसे राष्ट्रीय नायकों की प्रतिमाओं से जुड़े जातीय पहचान के विवाद का संक्षिप्त संदर्भ दें और ऐसे विवादों के संवैधानिक तथा सामाजिक निहितार्थों पर प्रकाश डालें।
2. **संवैधानिक निहितार्थ:**
* **समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14):** सार्वजनिक धन से स्थापित प्रतिमाओं पर किसी एक जाति का उल्लेख अन्य जातियों के साथ भेदभावपूर्ण हो सकता है।
* **धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता:** राष्ट्रीय नायकों को किसी एक जाति से जोड़ना धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और राष्ट्रीय एकता की भावना के विपरीत हो सकता है।
* **राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत (DPSP):** अनुच्छेद 38 (सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय) तथा अनुच्छेद 51A (मौलिक कर्तव्य – भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण) का उल्लंघन।
* **सार्वजनिक धन का उपयोग:** सार्वजनिक धन का उपयोग किसी विशिष्ट जातीय पहचान को बढ़ावा देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
3. **सामाजिक निहितार्थ:**
* **सामाजिक विभाजन:** जातीय पहचान पर जोर देने से समाज में विभाजन और तनाव बढ़ सकता है।
* **ऐतिहासिक विकृति:** इतिहास को जातीय चश्मे से देखने की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है, जिससे ऐतिहासिक तथ्यों की निष्पक्ष व्याख्या बाधित होती है।
* **सांस्कृतिक विरासत का क्षरण:** राष्ट्रीय नायकों की व्यापक सांस्कृतिक विरासत को संकीर्ण जातीय पहचान तक सीमित करना।
* **कानून और व्यवस्था की समस्या:** ऐसे विवाद अक्सर सार्वजनिक अशांति और कानून-व्यवस्था की चुनौतियों को जन्म देते हैं।
4. **न्यायपालिका की भूमिका और न्यायिक सक्रियता:**
* **जनहित याचिका (PIL):** ऐसे मामलों में जनहित याचिकाएं दायर की जाती हैं, जो न्यायपालिका को हस्तक्षेप करने का अवसर देती हैं।
* **न्यायिक समीक्षा:** न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि कार्यपालिका के निर्णय संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हों।
* **न्यायिक सक्रियता का दायरा:** जब कार्यपालिका या विधायिका ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर समाधान प्रदान करने में विफल रहती है, तो न्यायपालिका द्वारा समिति गठित करना या निर्देश जारी करना न्यायिक सक्रियता के दायरे में आ सकता है। इसका उद्देश्य संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करना और सामाजिक समरसता बनाए रखना है।
* **संतुलन:** न्यायपालिका को संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाना होता है, जबकि सरकार के अन्य अंगों के कार्यक्षेत्र का सम्मान भी करना होता है।
5. **निष्कर्ष:** ऐसे विवादों के समाधान के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों का सम्मान किया जाए, संवैधानिक मूल्यों का पालन किया जाए और सामाजिक समरसता को बढ़ावा दिया जाए। न्यायपालिका की भूमिका संवैधानिक संरक्षक के रूप में महत्वपूर्ण है, जो यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक प्रतीक राष्ट्रीय एकता और समावेशिता को दर्शाएं।
स्रोत: amarujala.com
Madhya Pradesh PCS (MPPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित समिति ने सम्राट मिहिर भोज की जाति संबंधी रिपोर्ट को किस न्यायालय में सीलबंद रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत किया है?
- A. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय
- B. सर्वोच्च न्यायालय
- C. इंदौर की सत्र न्यायालय
- D. ग्वालियर की विशेष न्यायालय
उत्तर: A. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय — मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित समिति ने सम्राट मिहिर भोज की जाति संबंधी रिपोर्ट को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में सीलबंद रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत किया है।
Mains: मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गठित समिति द्वारा प्रस्तुत सम्राट मिहिर भोज की जाति संबंधी रिपोर्ट के निष्कर्षों का राज्य की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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