महिला आरक्षण बिल को सीमांकन से जोड़ने के विरोध में सीपीआई(एम) का केंद्र को आग्रह

CPI(M) asks Centre not to link women’s reservation with delimitation — diagram

महिला आरक्षण बिल को सीमांकन से जोड़ने के विरोध में सीपीआई(एम) का केंद्र को आग्रह

महिला आरक्षण बनाम परिसीमनमहिला आरक्षण विधेयकपरिसीमन प्रक्रियाउद्देश्यमहिला प्रतिनिधित्व बढ़ानानिर्वाचन क्षेत्र सीमाएं तय करनाविधायी निकायलोकसभा/विधानसभासंसद/राज्य विधानसभासंविधान संशोधनआवश्यकअनुच्छेद 82/170प्रभावलैंगिक समानताजनसंख्या आधारित पुनर्वितरणवर्तमान स्थितिविपक्ष समर्थनमतभेद/असहमतिप्रक्रियाविधेयक प्रस्तावआयोग द्वारा कार्यान्वयन
महिला आरक्षण बनाम परिसीमन

✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, और महिला आरक्षण को इससे जोड़ने पर राजनीतिक सहमति का अभाव है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका, केंद्र-राज्य संबंध, विभिन्न क्षेत्रों के विकास के लिए सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप  |  GS Paper I — भारतीय समाज, महिलाओं की भूमिका
  • Prelims: महिला आरक्षण विधेयक, परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, संवैधानिक संशोधन, लोकसभा, राज्य विधानसभाएँ
  • Essay: भारत में लैंगिक समानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की चुनौतियाँ, संघवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आम सहमति का महत्व

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण की एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, और महिला आरक्षण को इससे जोड़ने पर राजनीतिक सहमति का अभाव है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] ने केंद्र सरकार से महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया से न जोड़ने का आग्रह किया है। पार्टी का कहना है कि विपक्ष महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करने के लिए तैयार है, बशर्ते इसे परिसीमन से अलग रखा जाए। CPI(M) के अनुसार, परिसीमन के मुद्दे पर कोई आम सहमति नहीं है और केंद्र ने विपक्षी दलों के साथ पर्याप्त परामर्श नहीं किया है।

पृष्ठभूमि

  • महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य लोकसभा (Lok Sabha) और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक निश्चित प्रतिशत सीटें आरक्षित करना है, जिससे उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ सके।
  • परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए चुनाव के उद्देश्य से क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
  • भारत में परिसीमन का कार्य एक उच्च-शक्ति वाले निकाय, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) द्वारा किया जाता है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • संविधान के अनुच्छेद 82 (संसद के लिए) और अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाओं के लिए) के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान है।
  • हालांकि, जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को प्रोत्साहित करने के लिए, 84वें संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा यह निर्धारित किया गया कि अगला परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर किया जाएगा।
  • विभिन्न राजनीतिक दलों और राज्यों के बीच परिसीमन के मुद्दे पर अक्सर मतभेद रहे हैं, खासकर जनसंख्या वृद्धि में अंतर के कारण सीटों के पुनर्वितरण को लेकर।

परिसीमन क्या है?

  • परिसीमन का अर्थ किसी देश में विधायी निकाय के लिए चुनाव के उद्देश्य से निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर सभी निर्वाचन क्षेत्रों में लगभग समान जनसंख्या सुनिश्चित करना है, ताकि प्रत्येक नागरिक के वोट का मूल्य समान हो।
  • भारत में, परिसीमन आयोग का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया जाता है। इस आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner) और संबंधित राज्यों के राज्य चुनाव आयुक्त (State Election Commissioners) शामिल होते हैं।
  • परिसीमन आयोग के आदेश अंतिम होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, जिससे इस प्रक्रिया की निष्पक्षता और वैधता सुनिश्चित होती है।
  • भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है – 1952, 1963, 1973 और 2002 में।
  • परिसीमन की प्रक्रिया में अनुसूचित जाति (Scheduled Castes) और अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण भी शामिल होता है, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात में होता है।
  • वर्तमान में, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर की गई है, और यह 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक अपरिवर्तित रहेगी।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
महिला आरक्षण विधेयक महिलाओं को विधायी निकायों में प्रतिनिधित्व प्रदान करने का प्रस्ताव।
परिसीमन (Delimitation) विधायी निकायों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण।
विपक्षी दलों से परामर्श का अभाव सरकार पर आरोप है कि उसने परिसीमन के मुद्दे पर विपक्षी दलों से पर्याप्त चर्चा नहीं की।
सर्वसम्मति का अभाव परिसीमन के मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच आम सहमति का अभाव।
पृथक विधेयक की मांग विपक्षी दल महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से अलग करके पेश करने का समर्थन करते हैं।

महत्व

राजनीतिक महत्व

  • महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य विधायी निकायों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना है, जिससे लैंगिक समानता और समावेशी प्रतिनिधित्व को बढ़ावा मिलेगा।
  • परिसीमन के साथ महिला आरक्षण को जोड़ने से राजनीतिक दलों के बीच असहमति पैदा हो सकती है, जिससे विधेयक पारित होने में देरी हो सकती है।
  • विपक्षी दलों द्वारा परामर्श की कमी का आरोप केंद्र-राज्य संबंधों और संघीय ढांचे पर दबाव डाल सकता है।

संवैधानिक महत्व

  • परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है जो जनसंख्या परिवर्तन के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों को समायोजित करती है, जिससे ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखा जा सके।
  • महिला आरक्षण का मुद्दा संविधान में संशोधन की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है ताकि महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जा सकें, जिससे प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को प्रभावित किया जा सके।
  • परिसीमन और आरक्षण के बीच संबंध न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आ सकता है, यदि प्रक्रिया या परिणाम संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं।

सामाजिक महत्व

  • विधायी निकायों में महिलाओं का बढ़ा हुआ प्रतिनिधित्व महिलाओं से संबंधित मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने और नीतियों को प्रभावित करने में मदद कर सकता है।
  • परिसीमन प्रक्रिया का सामाजिक-जनसांख्यिकीय समूहों के प्रतिनिधित्व पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है, जिससे हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए चिंताएं बढ़ सकती हैं।
  • जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने की मांग सामाजिक समानता और न्याय के व्यापक लक्ष्य को दर्शाती है, जो समावेशी शासन के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ

1. परिसीमन पर आम सहमति का अभाव

  • विपक्षी दलों का तर्क है कि परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र ने पर्याप्त परामर्श नहीं किया है।
  • परिसीमन प्रक्रिया के राजनीतिक निहितार्थों के कारण विभिन्न राज्यों और दलों के बीच असहमति है।

2. महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना

  • विपक्षी दल महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से अलग करने की मांग कर रहे हैं, ताकि विधेयक को शीघ्र पारित किया जा सके।
  • इस जुड़ाव को एक राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है जो विधेयक के पारित होने में बाधा डाल सकता है।

3. परामर्श और लोकतांत्रिक प्रक्रिया

  • सरकार पर आरोप है कि उसने महत्वपूर्ण विधायी मुद्दों पर विपक्षी दलों और अन्य हितधारकों से पर्याप्त परामर्श नहीं किया है।
  • लोकतांत्रिक शासन में सर्वसम्मति और परामर्श का अभाव विधायी प्रक्रियाओं की वैधता को कमजोर कर सकता है।

4. रोजगार सृजन और आर्थिक मुद्दे

  • राज्य सरकारों द्वारा रोजगार सृजन के दावों पर सवाल उठाया जा रहा है और श्वेत पत्र जारी करने की मांग की जा रही है।
  • विभिन्न क्षेत्रों में हजारों नौकरियों के नुकसान और किसानों के लिए लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने में विफलता की शिकायतें हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
महिला आरक्षण और परिसीमन का जुड़ाव विधेयक पारित होने में देरी और राजनीतिक गतिरोध की संभावना।
परिसीमन पर परामर्श का अभाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और सर्वसम्मति की कमी।
रोजगार सृजन के दावे वास्तविक रोजगार के अवसरों की कमी और आर्थिक आंकड़ों की सत्यता पर सवाल।
कृषि क्षेत्र की समस्याएं किसानों को लाभकारी मूल्य न मिलना और फसल सुरक्षा के लिए पानी की कमी।
जाति-आधारित भेदभाव सामाजिक असमानता और समावेशी विकास में बाधाएं।

आगे की राह

  • महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन से अलग करके एक स्वतंत्र विधेयक के रूप में पेश किया जाना चाहिए ताकि इसके पारित होने में तेजी लाई जा सके।
  • सरकार को परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सभी राजनीतिक दलों और हितधारकों के साथ व्यापक और सार्थक परामर्श करना चाहिए।
  • विधायी निकायों में महिलाओं के लिए पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु एक स्पष्ट और समयबद्ध कार्ययोजना विकसित की जानी चाहिए।
  • सरकार को रोजगार सृजन के दावों पर एक श्वेत पत्र (White Paper) जारी करना चाहिए और वास्तविक रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
  • कृषि क्षेत्र की समस्याओं, जैसे लाभकारी मूल्य और जल प्रबंधन, को प्राथमिकता से संबोधित किया जाना चाहिए ताकि किसानों की आजीविका सुनिश्चित हो सके।
  • सामाजिक असमानताओं को दूर करने और जाति-आधारित भेदभाव को समाप्त करने के लिए व्यापक सामाजिक सुधारों और नीतियों को लागू किया जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

महिला आरक्षण · परिसीमन · संविधान संशोधन · संघवाद · लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व · समानता का अधिकार · राजनीतिक सहमति · विधायी प्रक्रिया · चुनाव सुधार · पंचायती राज

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 82: प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान।
  • अनुच्छेद 330/332: अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण।
  • अनुच्छेद 243D/243T: पंचायती राज/नगर पालिकाओं में महिला आरक्षण।
  • अनुच्छेद 368: संविधान संशोधन की शक्ति।

अवधारणा प्रवाह

महिला आरक्षण विधेयक प्रस्तावित  →  विधेयक को परिसीमन से जोड़ने का प्रस्ताव  →  विपक्षी दलों द्वारा विरोध और परामर्श की कमी का आरोप  →  विधेयक पारित होने में संभावित देरी और राजनीतिक गतिरोध  →  लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय पर प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है।
2. परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या परिवर्तन के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः समायोजित करना है।
3. महिला आरक्षण विधेयक, यदि अधिनियमित होता है, तो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करेगा।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीनों
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीनों — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। परिसीमन का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या में परिवर्तन के कारण निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः समायोजित करना है ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या का समान प्रतिनिधित्व हो सके। कथन 3 सही है। प्रस्तावित महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% सीटें आरक्षित करना है।

Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?

  1. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  2. परिसीमन आयोग के आदेश लोकसभा और संबंधित राज्य विधानसभाओं के समक्ष रखे जाते हैं।
  3. परिसीमन आयोग का अध्यक्ष भारत का मुख्य चुनाव आयुक्त होता है।
  4. परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है।

उत्तर: परिसीमन आयोग का अध्यक्ष भारत का मुख्य चुनाव आयुक्त होता है। — परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त। मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य चुनाव आयुक्त इसके पदेन सदस्य होते हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ महिला आरक्षण विधेयक को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने के औचित्य और निहितार्थों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या यह कदम भारत में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संघवाद की भावना को प्रभावित कर सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन का संक्षिप्त परिचय। (महिला आरक्षण का उद्देश्य, परिसीमन का उद्देश्य)
2. औचित्य: सरकार द्वारा महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने के संभावित तर्क (जैसे, जनसंख्या आधारित सीटों का समायोजन, भविष्य की जनगणना के बाद ही सीटों का निर्धारण)।
3. निहितार्थों का समालोचनात्मक परीक्षण:
a. सकारात्मक निहितार्थ: यदि कोई हों (जैसे, अधिक तर्कसंगत और अद्यतन प्रतिनिधित्व)।
b. नकारात्मक निहितार्थ: विधेयक के कार्यान्वयन में देरी, राजनीतिक सहमति का अभाव, संघवाद पर प्रभाव (राज्यों की चिंताएं), वर्तमान प्रतिनिधित्व पर संभावित प्रभाव।
4. लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर प्रभाव: महिलाओं के प्रतिनिधित्व में वृद्धि बनाम परिसीमन के कारण राज्यों के बीच सीटों के अनुपात में बदलाव की आशंका।
5. संघवाद पर प्रभाव: दक्षिणी राज्यों की चिंताएं (जनसंख्या नियंत्रण के लिए पुरस्कृत होने के बजाय दंडित महसूस करना), राज्यों की स्वायत्तता और केंद्र-राज्य संबंधों पर संभावित तनाव।
6. आगे की राह/निष्कर्ष: राजनीतिक सहमति की आवश्यकता, विधेयक को अलग से पारित करने की मांग, लोकतांत्रिक मूल्यों और संघीय सिद्धांतों का सम्मान करते हुए समाधान।

स्रोत: The Hindu


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