यूपीएससी हेतु महत्वपूर्ण: भारत के अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत के अनुसंधान कार्यक्रम

यूपीएससी हेतु महत्वपूर्ण: भारत के अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत के अनुसंधान कार्यक्रम

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मानचित्र व माइंड-मैप: Underwater Cultural Heritage Sites in India

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भारतीय विरासत और संस्कृति  |  GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (समुद्री प्रौद्योगिकी)
  • Prelims: अंतर्जलीय पुरातत्व, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO), द्वारका, पूमपुहार, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण
  • Essay: सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: अतीत से सीख और भविष्य के लिए तैयारी, भारत की समुद्री विरासत और इसका आर्थिक-सांस्कृतिक महत्व

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत अपनी समृद्ध अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और अन्वेषण के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) जैसे संस्थानों के माध्यम से सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है, जिसमें द्वारका, महाबलीपुरम और पूमपुहार जैसे महत्वपूर्ण स्थल शामिल हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग द्वारका, बेट द्वारका (गुजरात), महाबलीपुरम (तमिलनाडु) और कराईकल (पुदुचेरी) में अनुसंधान और अन्वेषण गतिविधियां चला रहा है। इसके अतिरिक्त, भारत सरकार ने तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) को विभिन्न स्थलों पर पानी के नीचे खुदाई/अन्वेषण के लिए लाइसेंस प्रदान किए हैं, जिससे भारत की समृद्ध अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और अन्वेषण के प्रयासों पर प्रकाश डाला गया है।

पृष्ठभूमि

  • भारत एक विशाल तटरेखा और समृद्ध समुद्री इतिहास वाला देश है, जिसमें प्राचीन बंदरगाह, व्यापार मार्ग और जलमग्न शहर शामिल हैं।
  • अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत (Underwater Cultural Heritage) में वे सभी मानव निर्मित वस्तुएँ या स्थल शामिल हैं जो कम से कम 100 वर्षों से पानी के भीतर हैं, जैसे जहाज के मलबे, जलमग्न बस्तियाँ और कलाकृतियाँ।
  • इन विरासतों का अध्ययन समुद्री पुरातत्व (Marine Archaeology) के माध्यम से किया जाता है, जो पुरातात्विक तकनीकों को समुद्री विज्ञान के साथ जोड़ता है।
  • भारत में अंतर्जलीय पुरातत्व का कार्य मुख्य रूप से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India – ASI) और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (National Institute of Oceanography – NIO) द्वारा किया जाता है।
  • इन स्थलों का अन्वेषण न केवल ऐतिहासिक ज्ञान प्रदान करता है, बल्कि प्राचीन सभ्यताओं के समुद्री व्यापार, इंजीनियरिंग कौशल और सांस्कृतिक प्रथाओं को समझने में भी मदद करता है.
  • जलवायु परिवर्तन और समुद्र के स्तर में वृद्धि जैसी चुनौतियाँ इन जलमग्न विरासतों के संरक्षण को और भी महत्वपूर्ण बना देती हैं।

अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत और भारत में इसके प्रयास

  • अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत से तात्पर्य उन सभी पुरातात्विक स्थलों और कलाकृतियों से है जो समुद्र, झीलों या नदियों के पानी के नीचे स्थित हैं और जिनका ऐतिहासिक या सांस्कृतिक महत्व है। इसमें जलमग्न शहर, जहाज के मलबे, बंदरगाह संरचनाएँ और अन्य मानव निर्मित वस्तुएँ शामिल हैं।
  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग की स्थापना भारत की समुद्री विरासत की पहचान, अन्वेषण और संरक्षण के लिए की गई है। यह विभाग विभिन्न जलमग्न स्थलों पर अनुसंधान और अन्वेषण करता है।
  • राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) भी समुद्री पुरातत्व के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, विशेष रूप से बेट द्वारका जैसे स्थलों पर पानी के नीचे खुदाई और अन्वेषण में।
  • वर्तमान में, ASI द्वारका, बेट द्वारका (गुजरात), महाबलीपुरम (तमिलनाडु) और कराईकल (पुदुचेरी) में सक्रिय रूप से अनुसंधान कर रहा है।
  • भारत सरकार ने तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग को पूमपुहार (तमिलनाडु) में और NIO को बेट द्वारका, छारी तथा गंगाता बेट (गुजरात) में पानी के नीचे खुदाई के लिए लाइसेंस प्रदान किए हैं।
  • ASI का अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग पुरातत्वविदों को जलमग्न स्थलों का सर्वेक्षण करने और खुदाई करने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चला रहा है, जिससे इस क्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित की जा सके।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का एक विशेष प्रभाग, जो जलमग्न सांस्कृतिक विरासत की खोज और संरक्षण पर केंद्रित है।
प्रमुख अनुसंधान स्थल द्वारका, बेट द्वारका (गुजरात), महाबलीपुरम (तमिलनाडु), कराईकल (पुदुचेरी), पूमपुहार (तमिलनाडु), विजय दुर्ग (महाराष्ट्र), जंजीरा (महाराष्ट्र) जैसे ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के स्थल।
बहु-संस्थागत सहयोग भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग और राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) जैसे संस्थानों के बीच समन्वय।
बजट आवंटन केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा अंतर्जलीय पुरातात्विक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण वित्तीय सहायता, जो इस क्षेत्र में बढ़ती रुचि को दर्शाती है।
प्रशिक्षण कार्यक्रम पुरातत्वविदों को जलमग्न स्थलों के सर्वेक्षण और उत्खनन के लिए विशेष प्रशिक्षण प्रदान करना, जिससे विशेषज्ञ मानव संसाधन का विकास हो सके।

महत्व

सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक महत्व

  • भारत की समृद्ध समुद्री विरासत और प्राचीन सभ्यताओं के साक्ष्य उजागर होते हैं, जो देश के इतिहास की गहरी समझ प्रदान करते हैं।
  • पौराणिक स्थलों जैसे द्वारका की खोज से सांस्कृतिक आख्यानों और ऐतिहासिक तथ्यों के बीच संबंध स्थापित करने में मदद मिलती है।
  • यह भारत की समुद्री व्यापारिक परंपराओं और तटीय समुदायों के विकास पर प्रकाश डालता है।

पर्यटन क्षमता

  • जलमग्न स्थलों का विकास ‘पुरातत्व पर्यटन’ को बढ़ावा दे सकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होगा और रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
  • यह भारत को एक अद्वितीय सांस्कृतिक और विरासत पर्यटन स्थल के रूप में विश्व मानचित्र पर स्थापित कर सकता है।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रगति

  • अंतर्जलीय पुरातत्व में उपयोग की जाने वाली उन्नत तकनीकों (जैसे सोनार, रिमोट सेंसिंग, रोबोटिक्स) के विकास को प्रोत्साहन मिलता है।
  • यह समुद्री विज्ञान, भूविज्ञान और इंजीनियरिंग जैसे विभिन्न वैज्ञानिक क्षेत्रों के बीच अंतःविषय अनुसंधान को बढ़ावा देता है।

अंतर्राष्ट्रीय सहयोग

  • जलमग्न विरासत के संरक्षण में अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने और अन्य देशों के साथ सहयोग के अवसर खुलते हैं।

चुनौतियाँ

1. तकनीकी चुनौतियाँ

  • गहरे पानी में उत्खनन और अन्वेषण के लिए विशेष उपकरणों और उन्नत प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है, जो महंगी और जटिल होती है।
  • पानी के नीचे दृश्यता, मजबूत समुद्री धाराएँ और सीमित कार्य समय जैसी पर्यावरणीय बाधाएँ चुनौती प्रस्तुत करती हैं।

2. मानव संसाधन की कमी

  • अंतर्जलीय पुरातत्व में प्रशिक्षित गोताखोरों, पुरातत्वविदों और समुद्री इंजीनियरों की कमी एक बड़ी बाधा है।
  • विशेषज्ञता प्राप्त कर्मियों के प्रशिक्षण और विकास में समय और संसाधनों का निवेश आवश्यक है।

3. वित्तीय बाधाएँ

  • अंतर्जलीय अनुसंधान और संरक्षण परियोजनाएँ अत्यधिक पूंजी-गहन होती हैं, जिसके लिए पर्याप्त और निरंतर वित्तपोषण की आवश्यकता होती है।
  • बजट आवंटन और वास्तविक व्यय के बीच अंतर परियोजनाओं की प्रगति को प्रभावित कर सकता है।

4. संरक्षण और प्रलेखन

  • पानी के नीचे से प्राप्त कलाकृतियों का संरक्षण एक जटिल प्रक्रिया है, क्योंकि वे हवा के संपर्क में आने पर तेजी से खराब हो सकती हैं।
  • जलमग्न स्थलों के सटीक प्रलेखन और मानचित्रण के लिए विशेष तकनीकों की आवश्यकता होती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
तकनीकी सीमाएँ गहरे समुद्र में अन्वेषण और उत्खनन के लिए आवश्यक उन्नत उपकरणों और विशेषज्ञता की कमी।
पर्यावरणीय कारक समुद्री धाराएँ, कम दृश्यता, और पानी के नीचे के दबाव जैसी स्थितियाँ कार्य को जटिल बनाती हैं।
विशेषज्ञ कर्मियों का अभाव अंतर्जलीय पुरातत्व में प्रशिक्षित गोताखोरों और पुरातत्वविदों की सीमित संख्या।
उच्च लागत जलमग्न परियोजनाओं के लिए आवश्यक उपकरण, प्रशिक्षण और संचालन की अत्यधिक वित्तीय लागत।
संरक्षण की चुनौतियाँ पानी के नीचे से निकाली गई कलाकृतियों के क्षरण को रोकने के लिए विशेष संरक्षण तकनीकों की आवश्यकता।

आगे की राह

  • अंतर्जलीय पुरातत्व में अनुसंधान और विकास के लिए समर्पित राष्ट्रीय केंद्र स्थापित किए जाएँ, जो अत्याधुनिक तकनीक और विशेषज्ञता प्रदान करें।
  • पुरातत्वविदों, समुद्री वैज्ञानिकों और इंजीनियरों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जाएँ, ताकि कुशल मानव संसाधन विकसित हो सके।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल को बढ़ावा दिया जाए ताकि वित्तीय संसाधनों को जुटाया जा सके और तकनीकी विशेषज्ञता का लाभ उठाया जा सके।
  • अंतर्राष्ट्रीय संगठनों और देशों के साथ सहयोग बढ़ाया जाए, ताकि सर्वोत्तम प्रथाओं और उन्नत तकनीकों का आदान-प्रदान हो सके।
  • जलमग्न विरासत स्थलों को पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित करने के लिए एक व्यापक रणनीति बनाई जाए, जिससे स्थानीय समुदायों को लाभ हो।
  • प्राप्त कलाकृतियों के दीर्घकालिक संरक्षण के लिए विशेष प्रयोगशालाएँ और सुविधाएँ स्थापित की जाएँ।
  • समुद्री विरासत के महत्व के बारे में जन जागरूकता बढ़ाने के लिए शैक्षिक कार्यक्रम और प्रदर्शनियाँ आयोजित की जाएँ।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

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संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 49’, ‘note’: ‘राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों का संरक्षण’}

अवधारणा प्रवाह

समुद्री विरासत का पता लगाना  →  अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग की स्थापना  →  जलमग्न स्थलों का अन्वेषण एवं उत्खनन  →  प्राप्त कलाकृतियों का संरक्षण एवं अध्ययन  →  सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक ज्ञान में वृद्धि  →  पर्यटन और वैज्ञानिक प्रगति को बढ़ावा

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग वर्तमान में केवल गुजरात और तमिलनाडु में अनुसंधान गतिविधियाँ चला रहा है।
2. भारत सरकार ने पूमपुहार (तमिलनाडु) में पानी के नीचे खुदाई के लिए तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग को लाइसेंस प्रदान किया है।
3. राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान (NIO) को बेट द्वारका और छारी तथा गंगाता बेट (गुजरात) में अंतर्जलीय अन्वेषण के लिए लाइसेंस दिया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि ASI का अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग गुजरात और तमिलनाडु के साथ-साथ पुदुचेरी में भी अनुसंधान गतिविधियाँ चला रहा है। कथन 2 सही है। कथन 3 सही है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन से स्थल 2030 तक जलमग्न अन्वेषण/खुदाई के लिए चिन्हित किए गए हैं?
1. द्वारका
2. विजय दुर्ग
3. जंजीरा
4. महाबलीपुरम
सही विकल्प का चयन कीजिए:

  1. केवल 1, 2 और 3
  2. केवल 2, 3 और 4
  3. केवल 1, 3 और 4
  4. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — दिए गए समाचार के अनुसार, द्वारका और बेट द्वारका (गुजरात), विजय दुर्ग (महाराष्ट्र), जंजीरा (महाराष्ट्र), कराईकल (पुदुचेरी) और महाबलीपुरम (तमिलनाडु) को 2030 तक जलमग्न अन्वेषण/खुदाई के लिए चिन्हित किया गया है। अतः सभी चार विकल्प सही हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत की अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और संवर्धन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। इस क्षेत्र में आने वाली प्रमुख चुनौतियों और उनके समाधान हेतु सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत अंतर्जलीय सांस्कृतिक विरासत की परिभाषा और उसके महत्व से करें। ASI के अंतर्जलीय पुरातत्व विभाग की स्थापना, उसके उद्देश्यों और वर्तमान में चल रही अनुसंधान एवं अन्वेषण गतिविधियों (द्वारका, बेट द्वारका, महाबलीपुरम, कराईकल) का उल्लेख करें। संरक्षण और संवर्धन में ASI की विशिष्ट भूमिका को रेखांकित करें, जिसमें प्रशिक्षण कार्यक्रम और जलमग्न स्थलों की पहचान शामिल है। इसके बाद, अंतर्जलीय विरासत के संरक्षण में आने वाली चुनौतियों (जैसे तकनीकी बाधाएं, वित्तीय संसाधन, प्रशिक्षित कर्मियों की कमी, प्राकृतिक क्षरण) पर चर्चा करें। अंत में, सरकार द्वारा इन चुनौतियों का सामना करने के लिए उठाए जा रहे कदमों (जैसे विभिन्न संस्थानों को लाइसेंस देना, बजट आवंटन, प्रशिक्षण कार्यक्रम) का विवरण दें। निष्कर्ष में, भारत की समृद्ध समुद्री विरासत को सुरक्षित रखने के लिए भविष्य की रणनीति पर संक्षिप्त टिप्पणी करें।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


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