31 Jul राज्य सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी: 26,850 करोड़ रुपये के सरकारी बॉण्ड जारी
✎ राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्यों के लिए बाज़ार से धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं, जिनकी नीलामी RBI द्वारा की जाती है और ये राज्यों के राजकोषीय प्रबंधन तथा वित्तीय बाज़ार की तरलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS पेपर III — अर्थव्यवस्था | GS पेपर III — सरकारी बजटिंग
- Prelims: राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS), राजकोषीय घाटा, खुला बाज़ार परिचालन (OMO), RBI E-Kuber प्रणाली, गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा, रिटेल डायरेक्ट पोर्टल, राज्य वित्त
- Essay: राज्यों का वित्तीय स्वास्थ्य और भारत के आर्थिक विकास पर इसका प्रभाव, भारत में राजकोषीय संघवाद: चुनौतियाँ और अवसर
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्यों के लिए बाज़ार से धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं, जिनकी नीलामी RBI द्वारा की जाती है और ये राज्यों के राजकोषीय प्रबंधन तथा वित्तीय बाज़ार की तरलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा कुल ₹26,850 करोड़ की राज्य सरकारी प्रतिभूतियों (State Government Securities – SGS) की नीलामी की घोषणा की है। यह नीलामी राज्यों के लिए बाज़ार से धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन है, जिसका उपयोग वे अपने विकासात्मक और राजकोषीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए करते हैं। यह घटना राज्यों के ऋण प्रबंधन, RBI की भूमिका और भारतीय वित्तीय बाज़ार की कार्यप्रणाली पर प्रकाश डालती है।
पृष्ठभूमि
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं, जिनके माध्यम से वे बाज़ार से धन उधार लेती हैं।
- इन प्रतिभूतियों को ‘राज्य विकास ऋण’ (State Development Loans – SDLs) भी कहा जाता है, और ये राज्य सरकारों के राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने में मदद करती हैं।
- RBI राज्य सरकारों के लिए एक बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है, और वह इन प्रतिभूतियों की नीलामी का संचालन करता है।
- ये प्रतिभूतियाँ आमतौर पर लंबी अवधि की होती हैं और एक निश्चित ब्याज दर (कूपन दर) वहन करती हैं, जिसका भुगतान नियमित अंतराल पर किया जाता है।
- नीलामी में संस्थागत निवेशक (जैसे बैंक, बीमा कंपनियाँ, म्यूचुअल फंड) और व्यक्तिगत निवेशक दोनों भाग ले सकते हैं।
- केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों की तुलना में SGS में आमतौर पर थोड़ी अधिक ब्याज दर होती है, जो राज्यों से जुड़े थोड़े अधिक क्रेडिट जोखिम को दर्शाती है।
- SGS की नीलामी भारतीय वित्तीय बाज़ार में तरलता (Liquidity) और ब्याज दर के माहौल को भी प्रभावित करती है।
राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) क्या हैं?
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) भारत में राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए दिनांकित प्रतिभूतियाँ (Dated Securities) हैं, जो उनके बाज़ार उधार का एक प्रमुख स्रोत हैं।
- ये भारत सरकार की प्रतिभूतियों की तरह ही ‘सांविधिक तरलता अनुपात’ (Statutory Liquidity Ratio – SLR) के लिए पात्र होती हैं, जिससे बैंकों के लिए इनमें निवेश करना आकर्षक हो जाता है।
- इनका उपयोग राज्यों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने, बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए धन जुटाने और अन्य विकासात्मक व्ययों को पूरा करने के लिए किया जाता है।
- RBI ‘भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934’ के तहत राज्य सरकारों के लिए एक बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।
- नीलामी RBI के ‘E-Kuber’ प्रणाली (RBI Core Banking Solution) के माध्यम से आयोजित की जाती है, जो एक इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म है।
- नीलामी दो प्रकार की होती है: प्रतिस्पर्धी बोली (Competitive Bidding) जहाँ निवेशक ब्याज दर या मूल्य के लिए बोली लगाते हैं, और गैर-प्रतिस्पर्धी बोली (Non-competitive Bidding) जहाँ छोटे निवेशकों को एक निश्चित मूल्य पर आवंटन सुनिश्चित किया जाता है।
- व्यक्तिगत निवेशक ‘रिटेल डायरेक्ट पोर्टल’ (Retail Direct Portal) के माध्यम से भी गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा का उपयोग करके SGS में निवेश कर सकते हैं, जिससे वित्तीय बाज़ार में उनकी भागीदारी बढ़ती है।
- इन प्रतिभूतियों का पुन: जारीकरण (Re-issue) तब होता है जब पहले से जारी की गई प्रतिभूति को उसी कूपन दर और परिपक्वता तिथि के साथ फिर से बेचा जाता है, जिससे बाज़ार में तरलता बढ़ती है और बेंचमार्क प्रतिभूतियाँ बनती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) | राज्य सरकारों द्वारा धन जुटाने का एक साधन। ये केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों की तरह ही ऋण साधन हैं, लेकिन राज्यों द्वारा जारी किए जाते हैं। |
| नीलामी प्रक्रिया | भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा ‘ई-कुबेर’ प्रणाली के माध्यम से आयोजित की जाती है, जो पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करती है। |
| गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा (Non-competitive Bidding Facility) | छोटे निवेशकों, जैसे व्यक्तियों और संस्थानों को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने का अवसर प्रदान करती है, जिससे वित्तीय समावेशन बढ़ता है। |
| पुनः-जारी (Re-issue) | पहले से जारी की गई प्रतिभूतियों को फिर से जारी करना, जिससे तरलता बढ़ती है और बाजार में एकरूपता बनी रहती है। |
| विभिन्न परिपक्वता अवधि (Tenor) | विभिन्न परिपक्वता अवधियों वाली प्रतिभूतियाँ जारी की जाती हैं, जो निवेशकों को उनकी निवेश रणनीति के अनुसार विकल्प प्रदान करती हैं। |
महत्व
राजकोषीय प्रबंधन
- राज्य सरकार प्रतिभूतियों की नीलामी राज्यों को अपनी विकासात्मक और व्यय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक धन जुटाने में मदद करती है।
- यह राज्यों के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के प्रबंधन और बजटीय लक्ष्यों को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
बाजार विकास
- यह नीलामी सरकारी प्रतिभूति बाजार (Government Securities Market) की गहराई और तरलता को बढ़ाती है, जिससे निवेशकों के लिए अधिक अवसर पैदा होते हैं।
- यह विभिन्न परिपक्वता अवधि और ब्याज दरों वाली प्रतिभूतियों की उपलब्धता सुनिश्चित करके पूंजी बाजार को मजबूत करती है।
वित्तीय समावेशन
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा और ‘रिटेल डायरेक्ट पोर्टल’ के माध्यम से व्यक्तिगत निवेशकों की भागीदारी को बढ़ावा मिलता है, जिससे आम जनता के लिए सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करना आसान हो जाता है।
- यह छोटे निवेशकों को सुरक्षित निवेश विकल्प प्रदान करता है और बचत को वित्तीय बाजारों में लाने में मदद करता है।
मौद्रिक नीति
- सरकारी प्रतिभूतियों की उपज (Yield) बाजार में प्रचलित ब्याज दरों को दर्शाती है, जो RBI की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के लिए एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
- यह RBI को खुले बाजार परिचालन (Open Market Operations) के माध्यम से तरलता को प्रबंधित करने में भी सहायता करती है।
चुनौतियाँ
1. राजकोषीय अनुशासन
- राज्य सरकारों द्वारा अत्यधिक उधार लेने से उनके राजकोषीय घाटे में वृद्धि हो सकती है, जिससे ऋण का बोझ बढ़ जाता है।
- उच्च ऋण-सेवा लागत (Debt-servicing Cost) राज्यों के विकासात्मक व्यय के लिए उपलब्ध संसाधनों को कम कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय अर्थव्यवस्था: सरकारी बजट, राजकोषीय नीति
2. बाजार जोखिम
- ब्याज दर में उतार-चढ़ाव SGS की मांग और उपज को प्रभावित कर सकता है, जिससे राज्यों के लिए धन जुटाना महंगा हो सकता है।
- वैश्विक और घरेलू आर्थिक कारक निवेशकों की धारणा को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे नीलामी में भाग लेने वाले निवेशकों की संख्या कम हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय अर्थव्यवस्था: पूंजी बाजार, मौद्रिक नीति
3. राज्यों के बीच असमानता
- कमजोर राजकोषीय स्थिति वाले राज्यों को अक्सर उच्च ब्याज दरों पर उधार लेना पड़ता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति और खराब हो जाती है।
- यह राज्यों के बीच विकास और वित्तीय स्थिरता में असमानता को बढ़ा सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय अर्थव्यवस्था: संघवाद, राजकोषीय संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| बढ़ता राज्य ऋण | राजकोषीय स्थिरता के लिए खतरा, भविष्य के विकासात्मक व्यय पर दबाव। |
| उच्च उधार लागत | कमजोर राजकोषीय स्थिति वाले राज्यों के लिए धन जुटाना महंगा, जिससे उनके बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। |
| बाजार में तरलता | कुछ SGS के लिए सीमित तरलता द्वितीयक बाजार में व्यापार को प्रभावित कर सकती है। |
| निवेशकों की भागीदारी | छोटे निवेशकों को आकर्षित करने और उन्हें शिक्षित करने की आवश्यकता ताकि उनकी भागीदारी बढ़ाई जा सके। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा योजना (Scheme for Non-competitive Bidding Facility)
- RBI रिटेल डायरेक्ट योजना (RBI Retail Direct Scheme)
आगे की राह
- राज्यों को राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने और अपने राजस्व आधार को मजबूत करने के लिए उपाय करने चाहिए।
- ऋण प्रबंधन रणनीतियों को मजबूत करना, जिसमें उधार लेने की लागत को कम करने और ऋण प्रोफाइल को अनुकूलित करने पर ध्यान केंद्रित करना शामिल है।
- सरकारी प्रतिभूति बाजार में खुदरा निवेशकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान और शैक्षिक कार्यक्रम आयोजित करना।
- राज्यों के बीच राजकोषीय अंतर को कम करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन प्रदान करना।
- बाजार में तरलता बढ़ाने और मूल्य खोज को बेहतर बनाने के लिए द्वितीयक बाजार के विकास को बढ़ावा देना।
- राज्यों को अपनी वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए संरचनात्मक सुधारों को लागू करने के लिए प्रोत्साहित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDLs) · राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) · राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) · राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) · भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India – RBI) · खुले बाज़ार परिचालन (Open Market Operations – OMO) · सार्वजनिक ऋण प्रबंधन (Public Debt Management) · गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा (Non-competitive Bidding Facility) · राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (Fiscal Responsibility and Budget Management Act – FRBMA) · राज्यों के वित्त (State Finances) · मुद्रा बाज़ार (Money Market) · पूंजी बाज़ार (Capital Market)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 293: राज्यों द्वारा उधार लेने की शक्ति
- अनुच्छेद 280: वित्त आयोग और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध
अवधारणा प्रवाह
राज्य सरकार को धन की आवश्यकता → राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ जारी करती है → RBI ‘ई-कुबेर’ पर नीलामी आयोजित करता है → निवेशक (बैंक, वित्तीय संस्थान, व्यक्ति) बोली लगाते हैं → राज्य सरकार को धन प्राप्त होता है → राज्य विकासात्मक और व्यय आवश्यकताओं को पूरा करता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDLs) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. SDLs राज्य सरकारों द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक के माध्यम से जारी की जाने वाली दिनांकित प्रतिभूतियाँ (dated securities) हैं।
2. ये भारत सरकार की प्रतिभूतियों की तुलना में कम जोखिम वाली मानी जाती हैं।
3. SDLs पर अर्जित ब्याज आय आयकर से पूरी तरह मुक्त होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। राज्य विकास ऋण राज्य सरकारों द्वारा भारतीय रिज़र्व बैंक के माध्यम से जारी किए जाते हैं ताकि वे अपने बजटीय घाटे को वित्तपोषित कर सकें। कथन 2 गलत है। SDLs को भारत सरकार की प्रतिभूतियों की तुलना में अधिक जोखिम वाली माना जाता है, क्योंकि राज्यों की साख केंद्र सरकार की तुलना में भिन्न हो सकती है। कथन 3 गलत है। SDLs पर अर्जित ब्याज आय आयकर के अधीन होती है, यह पूरी तरह से मुक्त नहीं होती है।
Q2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा राज्य सरकार प्रतिभूतियों (State Government Securities – SGS) की नीलामी आयोजित करने का प्राथमिक उद्देश्य क्या है?
- राज्य सरकारों के लिए राजस्व उत्पन्न करना।
- राज्यों को उनके राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए ऋण जुटाने में सुविधा प्रदान करना।
- देश में मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करना।
- निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देना।
उत्तर: राज्यों को उनके राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए ऋण जुटाने में सुविधा प्रदान करना। — RBI राज्य सरकारों के एजेंट के रूप में कार्य करता है और उनके लिए राज्य सरकार प्रतिभूतियों (SDLs) की नीलामी करता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य राज्यों को उनके बजटीय और राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए बाज़ार से ऋण जुटाने में सहायता करना है।
Q3. अभिकथन (A): भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) राज्य सरकारों के लिए एक बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।
कारण (R): RBI राज्य सरकारों को उनके राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A सही है, लेकिन R गलत है। — अभिकथन (A) सही है। RBI संविधान के अनुच्छेद 293 के तहत राज्य सरकारों के लिए बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है। कारण (R) गलत है। RBI राज्य सरकारों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान नहीं करता है; बल्कि, यह उनके लिए बाज़ार से ऋण जुटाने में सुविधा प्रदान करता है, जैसे कि राज्य विकास ऋण की नीलामी करके।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य विकास ऋण (State Development Loans – SDLs) क्या हैं और भारतीय राजकोषीय संघवाद (Fiscal Federalism) में उनकी क्या भूमिका है? हाल ही में राज्य सरकार प्रतिभूतियों की नीलामी के संदर्भ में, राज्यों द्वारा ऋण जुटाने के तंत्र और इससे जुड़े राजकोषीय निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: राज्य विकास ऋण (SDLs) को परिभाषित करें और बताएं कि वे राज्य सरकारों के लिए बाज़ार से धन जुटाने का एक साधन हैं, जिसकी नीलामी RBI द्वारा की जाती है।
मुख्य भाग:
1. SDLs की भूमिका: भारतीय राजकोषीय संघवाद में SDLs के महत्व पर प्रकाश डालें। बताएं कि ये राज्यों को स्वायत्त रूप से अपने विकास और कल्याणकारी योजनाओं को वित्तपोषित करने में सक्षम बनाते हैं, जिससे केंद्र पर उनकी निर्भरता कम होती है।
2. ऋण जुटाने का तंत्र: हालिया नीलामी के संदर्भ में, SDLs जारी करने की प्रक्रिया का वर्णन करें:
– RBI की भूमिका: राज्यों के एजेंट के रूप में RBI की भूमिका (अनुच्छेद 293)।
– नीलामी प्रक्रिया: प्रतिस्पर्धी और गैर-प्रतिस्पर्धी बोली (Non-competitive bidding) के माध्यम से नीलामी। E-Kuber प्रणाली का उल्लेख।
– पुन: जारी करना (Re-issue): पहले से जारी प्रतिभूतियों को फिर से जारी करने का महत्व।
– अवधि और ब्याज दरें: विभिन्न अवधियों (tenors) और ब्याज दरों (yields) का उल्लेख।
– निवेशक: बैंक, वित्तीय संस्थान, बीमा कंपनियाँ, भविष्य निधि और खुदरा निवेशक (Retail Direct portal के माध्यम से)।
3. राजकोषीय निहितार्थ:
– राजकोषीय घाटा: SDLs का उपयोग राज्यों के राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने के लिए किया जाता है।
– ऋण स्थिरता: राज्यों की बढ़ती ऋणग्रस्तता और उसकी स्थिरता पर चिंताएँ। राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (FRBMA) जैसे उपायों का उल्लेख।
– ब्याज भुगतान का बोझ: उच्च ब्याज दरों का राज्यों के बजट पर पड़ने वाला प्रभाव।
– बाज़ार अनुशासन: SDLs की नीलामी बाज़ार अनुशासन को बढ़ावा देती है, क्योंकि राज्यों को अपनी साख के आधार पर धन जुटाना होता है।
– केंद्र-राज्य संबंध: केंद्र सरकार द्वारा राज्यों की ऋण सीमा तय करने में भूमिका।
निष्कर्ष: SDLs के महत्व को दोहराएं और राज्यों के लिए एक स्थायी राजकोषीय नीति की आवश्यकता पर बल दें, जो विकास को बढ़ावा दे और ऋण स्थिरता बनाए रखे।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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