वानियाम्पुझा आदिवासी परिवारों के 7 साल प्लास्टिक टेंट में रहने पर मानवाधिकार आयोग ने पुनर्वास का आदेश दिया

The Hindu impact | rights panel orders rehabilitation after Vaniyampuzha tribal families spend 7 years in plastic tents — labelled illustration

वानियाम्पुझा आदिवासी परिवारों के 7 साल प्लास्टिक टेंट में रहने पर मानवाधिकार आयोग ने पुनर्वास का आदेश दिया

✎ राज्य मानव अधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है, जो राज्य में मानव अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करता है और उनके संरक्षण को सुनिश्चित करता है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, शासन प्रणाली, सामाजिक न्याय  |  GS Paper I — भारतीय समाज, भूगोल (आपदाएँ)
  • Prelims: राज्य मानव अधिकार आयोग, जनजातीय अधिकार, पुनर्वास नीति, आपदा प्रबंधन, Paniya जनजाति, अनुच्छेद 21
  • Essay: मानव गरिमा और राज्य की भूमिका, आपदाएँ और हाशिए पर स्थित समुदायों पर उनका प्रभाव

त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य मानव अधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है, जो राज्य में मानव अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करता है और उनके संरक्षण को सुनिश्चित करता है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

केरल राज्य मानव अधिकार आयोग (Kerala State Human Rights Commission) ने मलप्पुरम जिले के वानियमपुझा में पनियां (Paniya) जनजाति के 26 परिवारों के पुनर्वास का आदेश दिया है, जो अगस्त 2019 की बाढ़ में अपने घर गंवाने के बाद से प्लास्टिक के अस्थायी तंबुओं में रह रहे थे। आयोग ने इस मामले का स्वतः संज्ञान (suo motu) लिया है और संबंधित अधिकारियों को एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है, जिसमें पुनर्वास उपायों की वर्तमान स्थिति और एक निश्चित समय-सीमा के भीतर प्रक्रिया को पूरा करने की योजना शामिल हो।

पृष्ठभूमि

  • अगस्त 2019 में आई बाढ़ ने वानियमपुझा के जनजातीय परिवारों के घरों को नष्ट कर दिया था, जिसके बाद से वे अस्थायी प्लास्टिक के तंबुओं में रहने को मजबूर थे।
  • सात वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इन परिवारों को स्थायी आवास और बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराई गई थीं।
  • मानव अधिकार आयोग ने इस स्थिति को ‘गरिमा के साथ जीवन जीने के अधिकार’ (Right to live with dignity) और सुरक्षित आवास तक पहुँच के अधिकार का उल्लंघन माना है।
  • आयोग ने मलप्पुरम कलेक्टर और अनुसूचित जनजाति विकास विभाग के परियोजना अधिकारी को पुनर्वास के संबंध में रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
  • यह घटना जनजातीय समुदायों के अधिकारों और आपदा के बाद उनके पुनर्वास में देरी से संबंधित मुद्दों को उजागर करती है।

राज्य मानव अधिकार आयोग (State Human Rights Commission) क्या है?

  • राज्य मानव अधिकार आयोग एक वैधानिक निकाय (statutory body) है, जिसका गठन मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (Protection of Human Rights Act, 1993) के तहत किया गया है।
  • इसका मुख्य कार्य राज्य के भीतर मानव अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करना और उनके संरक्षण को सुनिश्चित करना है।
  • आयोग में एक अध्यक्ष और कुछ सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति राज्यपाल (Governor) द्वारा की जाती है।
  • अध्यक्ष उच्च न्यायालय (High Court) का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश या न्यायाधीश होना चाहिए, और सदस्यों में मानव अधिकारों का ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति शामिल होते हैं।
  • आयोग के पास सिविल न्यायालय (Civil Court) की शक्तियाँ होती हैं और यह मानव अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच कर सकता है।
  • यह स्वतः संज्ञान (suo motu) लेकर या किसी शिकायत के आधार पर मामलों की सुनवाई कर सकता है।
  • आयोग की सिफारिशें आमतौर पर सलाहकार प्रकृति की होती हैं, लेकिन सरकार से उन पर विचार करने की अपेक्षा की जाती है।
  • इसका उद्देश्य मानव अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और उनके प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
मानवाधिकार आयोग का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि संवैधानिक संस्थाएँ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं, विशेषकर कमजोर वर्गों के लिए।
सुओ मोटो (Suo Motu) कार्रवाई आयोग ने मीडिया रिपोर्ट के आधार पर स्वतः संज्ञान लिया, जो उसकी स्वायत्तता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता को उजागर करता है।
पुनर्वास का आदेश आयोग ने विस्थापित आदिवासी परिवारों को सुरक्षित और स्थायी आवास प्रदान करने का निर्देश दिया है, जो उनके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के लिए महत्वपूर्ण है।
सात वर्षों से अस्थायी आवास यह स्थिति आपदा प्रबंधन और पुनर्वास तंत्र में गंभीर कमियों को दर्शाती है, जिससे नागरिकों को लंबे समय तक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
पनिया आदिवासी समुदाय यह मामला भारत में जनजातीय समुदायों के सामने आने वाली विशिष्ट चुनौतियों, जैसे विस्थापन और बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच की कमी, को उजागर करता है।

महत्व

सामाजिक महत्व

  • यह घटना समाज के सबसे कमजोर वर्गों, विशेषकर आदिवासी समुदायों, के मानवाधिकारों की सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करती है।
  • यह आपदाओं के बाद विस्थापित हुए लोगों के लिए समयबद्ध और प्रभावी पुनर्वास की आवश्यकता पर बल देती है, ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।
  • यह दर्शाता है कि मीडिया, विशेषकर क्षेत्रीय मीडिया, सामाजिक न्याय के मुद्दों को उजागर करने और अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

शासन और प्रशासन

  • राज्य मानवाधिकार आयोग का हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि संवैधानिक और वैधानिक निकाय शासन में जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • यह आपदा प्रबंधन तंत्र में सुधार की आवश्यकता को उजागर करता है, विशेषकर दीर्घकालिक पुनर्वास और प्रभावित समुदायों तक पहुँच के संदर्भ में।
  • यह स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की संवेदनशीलता और दक्षता पर सवाल उठाता है, जो इतने लंबे समय तक समस्या का समाधान नहीं कर पाए।

मानवाधिकार

  • यह मामला गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार (Right to Live with Dignity) और सुरक्षित आवास के अधिकार (Right to Safe Housing) के उल्लंघन का एक स्पष्ट उदाहरण है।
  • यह दर्शाता है कि प्राकृतिक आपदाएँ किस प्रकार हाशिए पर पड़े समुदायों के मानवाधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं, और राज्य की जिम्मेदारी है कि वह इन अधिकारों की रक्षा करे।

चुनौतियाँ

1. आपदा प्रबंधन में कमियाँ

  • प्राकृतिक आपदाओं के बाद दीर्घकालिक पुनर्वास योजनाओं का अभाव या उनके क्रियान्वयन में देरी।
  • आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे की बहाली में अक्षमता, जैसे पुलों का पुनर्निर्माण।

2. जनजातीय अधिकारों का उल्लंघन

  • आदिवासी समुदायों के लिए सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं तक पहुँच का अभाव।
  • विस्थापन के बाद उनके पारंपरिक जीवन शैली और आजीविका पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव।

3. प्रशासनिक जवाबदेही और संवेदनशीलता

  • स्थानीय प्रशासन और संबंधित सरकारी विभागों द्वारा नागरिकों की समस्याओं के प्रति उदासीनता।
  • मानवाधिकारों के उल्लंघन के मामलों में त्वरित और प्रभावी कार्रवाई की कमी।

4. न्यायिक/अर्ध-न्यायिक निकायों के आदेशों का पालन

  • मानवाधिकार आयोग जैसे निकायों द्वारा दिए गए निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन में देरी या बाधाएँ।
  • इन आदेशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र का अभाव।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
दीर्घकालिक विस्थापन बाढ़ के सात साल बाद भी परिवारों का अस्थायी प्लास्टिक टेंटों में रहना, जो गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
बुनियादी सुविधाओं का अभाव अस्थायी शिविरों में रहने वाले परिवारों को सुरक्षित आवास, स्वच्छता और अन्य आवश्यक सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है।
पुलों का पुनर्निर्माण दो पुलों में से एक का पुनर्निर्माण अभी भी उद्घाटन की प्रतीक्षा में है, जिससे आदिवासी बस्तियों तक पहुँच प्रभावित होती है।
प्रशासनिक उदासीनता स्थानीय प्रशासन और अनुसूचित जनजाति विकास विभाग द्वारा इतने लंबे समय तक समस्या का समाधान न कर पाना।
मानवाधिकारों का उल्लंघन मानवाधिकार आयोग ने माना कि अस्थायी आश्रयों में रहना गरिमापूर्ण जीवन और सुरक्षित आवास के अधिकार को प्रभावित करता है।

आगे की राह

  • आपदा प्रबंधन नीतियों में दीर्घकालिक पुनर्वास और पुनर्निर्माण को प्राथमिकता देना।
  • जनजातीय समुदायों के लिए विशेष पुनर्वास पैकेज और योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना।
  • स्थानीय प्रशासन और संबंधित विभागों की जवाबदेही तय करना और उनके प्रदर्शन की नियमित निगरानी करना।
  • मानवाधिकार आयोग जैसे निकायों के आदेशों का त्वरित और प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित करना।
  • आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे के पुनर्निर्माण में तेजी लाना, विशेषकर दूरस्थ और कमजोर समुदायों के लिए।
  • जनजातीय समुदायों को उनकी समस्याओं के समाधान में शामिल करना और उनकी आवश्यकताओं के अनुसार नीतियाँ बनाना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मानव अधिकार आयोग · जनजातीय पुनर्वास · आपदा प्रबंधन · गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार · आवास का अधिकार · राज्य मानवाधिकार आयोग · अनुसूचित जनजाति विकास विभाग · न्यायिक सक्रियता · सामाजिक न्याय · सुओ मोटो

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 38’, ‘note’: ‘सामाजिक व्यवस्था सुरक्षित करना’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 46’, ‘note’: ‘अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा’}

अवधारणा प्रवाह

अगस्त 2019 की बाढ़ से आदिवासी परिवारों के घर नष्ट हुए।  →  26 परिवार सात साल से प्लास्टिक टेंटों में रह रहे हैं।  →  मीडिया रिपोर्ट ने परिवारों की दयनीय स्थिति को उजागर किया।  →  केरल राज्य मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया।  →  आयोग ने तत्काल पुनर्वास का आदेश दिया।  →  जिला कलेक्टर और अनुसूचित जनजाति विकास विभाग को रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार निहित है।
2. राज्य मानवाधिकार आयोग एक सांविधिक निकाय है।
3. राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है। कथन 2 सही है क्योंकि राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत किया गया है, जो इसे एक सांविधिक निकाय बनाता है। कथन 3 गलत है क्योंकि राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक समिति की सिफारिश पर की जाती है, जिसमें मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होते हैं।

Q2. भारत में जनजातीय समुदायों के पुनर्वास से संबंधित निम्नलिखित में से कौन सा/से प्रावधान सही है/हैं?
1. अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 विस्थापन की स्थिति में पुनर्वास का प्रावधान करता है।
2. जनजातीय उप-योजना (TSP) का उद्देश्य जनजातीय क्षेत्रों में विकास को बढ़ावा देना है।
सही विकल्प चुनें:

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2

उत्तर: 1 और 2 दोनों — कथन 1 सही है। वन अधिकार अधिनियम, 2006, वन भूमि पर रहने वाले जनजातीय समुदायों के अधिकारों को मान्यता देता है और उनके विस्थापन की स्थिति में पुनर्वास और मुआवजे का प्रावधान करता है। कथन 2 भी सही है। जनजातीय उप-योजना (TSP), जिसे अब जनजातीय घटक योजना (TCP) कहा जाता है, का उद्देश्य जनजातीय आबादी के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए राज्यों को विशेष केंद्रीय सहायता प्रदान करना है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ आपदाओं के कारण विस्थापित हुए जनजातीय समुदायों के पुनर्वास में राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, भारत में जनजातीय अधिकारों के संरक्षण हेतु संवैधानिक और वैधानिक प्रावधानों पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: आपदाओं के कारण जनजातीय विस्थापन की संक्षिप्त पृष्ठभूमि और मानवाधिकार आयोगों की भूमिका का उल्लेख।
2. राज्य मानवाधिकार आयोगों की भूमिका:
– सुओ मोटो (suo motu) कार्रवाई करने की शक्ति (वर्तमान मामले का संदर्भ)।
– जांच, सिफारिशें और रिपोर्ट प्रस्तुत करना।
– सरकार को नीतिगत परिवर्तनों का सुझाव देना।
– मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने और राहत प्रदान करने में भूमिका।
– न्यायिक सक्रियता और जवाबदेही सुनिश्चित करना।
3. जनजातीय अधिकारों के संरक्षण हेतु संवैधानिक प्रावधान:
– अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 16 (अवसर की समानता)।
– अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें गरिमापूर्ण जीवन, आवास का अधिकार शामिल)।
– अनुच्छेद 46 (राज्य का दायित्व कि वह अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा दे)।
– पाँचवीं अनुसूची और छठी अनुसूची (जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित)।
4. जनजातीय अधिकारों के संरक्षण हेतु वैधानिक प्रावधान:
– अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989।
– पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA), 1996।
– अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006।
– भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, 2013।
5. चुनौतियाँ और सीमाएँ: मानवाधिकार आयोगों की सिफारिशों का गैर-बाध्यकारी स्वरूप, कार्यान्वयन में देरी, फंड की कमी, राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव।
6. निष्कर्ष: जनजातीय समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा और गरिमापूर्ण पुनर्वास सुनिश्चित करने के लिए मानवाधिकार आयोगों और सरकारी तंत्र के बीच समन्वय की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment