09 Aug वायनाड भूस्खलन: जलवायु और भूविज्ञान का दुर्भाग्यपूर्ण मेल, जानें क्या हुआ था 2024 में
Extreme rainfallGeological weaknessesAnthropogenic pressuresGeomorphological factors✎ वायनाड भूस्खलन इस बात पर प्रकाश डालता है कि भूस्खलन की विनाशकारी क्षमता को समझने और कम करने के लिए अत्यधिक वर्षा के साथ-साथ अंतर्निहित भूवैज्ञानिक कमजोरियों और भू-आकृति विज्ञान संबंधी कारकों का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक भूगोल); आपदा एवं आपदा प्रबंधन | GS Paper III — आपदा प्रबंधन (भूस्खलन)
- Prelims: वायनाड भूस्खलन, पश्चिमी घाट, भूवैज्ञानिक कारक, जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन के प्रकार, मलबा प्रवाह, भू-विरासत स्थल, पुन्नापुझा नदी
- Essay: आपदा प्रबंधन में जलवायु परिवर्तन और भूवैज्ञानिक कारकों की भूमिका, सतत विकास और पर्यावरणीय संवेदनशीलता
त्वरित पुनरावृत्ति: वायनाड भूस्खलन इस बात पर प्रकाश डालता है कि भूस्खलन की विनाशकारी क्षमता को समझने और कम करने के लिए अत्यधिक वर्षा के साथ-साथ अंतर्निहित भूवैज्ञानिक कमजोरियों और भू-आकृति विज्ञान संबंधी कारकों का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में ‘लैंडस्लाइड्स’ नामक एक अंतरराष्ट्रीय सहकर्मी-समीक्षित पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, 2024 का वायनाड भूस्खलन (Wayanad landslide) केवल अत्यधिक वर्षा का परिणाम नहीं था, बल्कि भूवैज्ञानिक, भू-आकृति विज्ञान और संरचनात्मक कारकों के संयोजन से भी प्रभावित था। इस अध्ययन ने पश्चिमी घाट में दर्ज किए गए सबसे विनाशकारी भूस्खलनों में से एक के पैमाने, गति और विनाशकारी प्रभाव को निर्धारित करने में अंतर्निहित भूवैज्ञानिक कमजोरियों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला है।
पृष्ठभूमि
- 30 जुलाई, 2024 की रात को, पुन्नापुझा नदी (Punnapuzha river) के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में 48 घंटों के भीतर लगभग 573 मिमी की असाधारण रूप से भारी वर्षा ने एक बड़े ढलान विफलता (slope failure) को जन्म दिया।
- यह घटना तेजी से एक उच्च गति वाले मलबा प्रवाह (debris flow) में बदल गई, जो लगभग 8 किमी तक यात्रा करते हुए लगभग 768 मीटर नीचे उतर गया और पुंचिरीमट्टम, मुंडाक्काई और चूरलमाला जैसे क्षेत्रों में व्यापक विनाश का कारण बना।
- अध्ययन के अनुसार, प्रभावित क्षेत्र की पहाड़ियाँ प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानों (crystalline rocks) से बनी हैं, जिनमें लाखों वर्षों से बार-बार विरूपण (deformation) हुआ है, जिससे अपरूपण क्षेत्र (shear zones), फ्रैक्चर और पर्णन (foliations) जैसी प्राकृतिक कमजोरियाँ पैदा हुई हैं।
- समय के साथ, वर्षा जल इन फ्रैक्चर में घुस गया, जिससे व्यापक रासायनिक अपक्षय (chemical weathering) हुआ और सतह के नीचे की कठोर चट्टानें नरम, गहरी अपक्षयित सामग्री में बदल गईं।
- भूस्खलन एक अत्यधिक अपक्षयित अपरूपण क्षेत्र में उत्पन्न हुआ, जहाँ एक प्रथम-क्रम की धारा कमजोर चट्टान को पार करती थी, और अत्यधिक वर्षा के दौरान, पानी ने इन फ्रैक्चर में तेजी से घुसपैठ की, जिससे ढलान के भीतर पानी का दबाव बढ़ गया।
- एक बार जब चट्टान द्रव्यमान की ताकत पार हो गई, तो एक बड़ा खंड अलग हो गया, जिससे भूस्खलन शुरू हो गया।
- अध्ययन में वायनाड भूस्खलन स्थल को अनुसंधान और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए एक भू-विरासत स्थल (geo-heritage location) के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
भूस्खलन (Landslides) क्या हैं?
- भूस्खलन एक प्रकार की भू-गति (mass wasting) है, जिसमें चट्टान, मलबा या पृथ्वी का एक बड़ा द्रव्यमान ढलान से नीचे की ओर गति करता है।
- यह गुरुत्वाकर्षण के कारण होता है और अक्सर अत्यधिक वर्षा, भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट या मानव गतिविधियों जैसे कारकों से शुरू होता है।
- भूस्खलन को उनकी गति की प्रकृति और सामग्री के प्रकार के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है, जैसे कि चट्टान गिरना (rockfalls), मलबा प्रवाह (debris flows), कीचड़ प्रवाह (mudflows) और ढलान विफलता (slope failures)।
- भारत में, हिमालयी क्षेत्र और पश्चिमी घाट भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं, जहाँ भूवैज्ञानिक अस्थिरता और भारी वर्षा का संयोजन जोखिम को बढ़ाता है।
- भूस्खलन के विनाशकारी प्रभाव हो सकते हैं, जिसमें जान-माल का नुकसान, बुनियादी ढांचे का विनाश और पर्यावरणीय क्षति शामिल है।
- भूस्खलन के जोखिम को कम करने के लिए, भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, ढलान स्थिरीकरण उपाय और उचित भूमि उपयोग योजना जैसे उपाय आवश्यक हैं।
- जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव और चरम मौसमी घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि से भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि होने की संभावना है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अत्यधिक वर्षा | भूस्खलन का तात्कालिक कारण, 48 घंटों में लगभग 573 मिमी बारिश। |
| भूगर्भीय कमजोरियाँ | प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानों में कतरनी क्षेत्र (shear zones), दरारें और फोलिएशन (foliations) जैसी संरचनात्मक कमजोरियाँ। |
| रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering) | बारिश के पानी द्वारा दरारों में प्रवेश से कठोर चट्टानों का नरम, गहरे अपक्षयित पदार्थ में बदलना। |
| घाटी का स्वरूप | संकीर्ण घाटी खंडों ने भूस्खलन के वेग और विनाशकारी प्रभाव को बढ़ाया। |
| उच्च गति का मलबा प्रवाह (Debris Flow) | भूस्खलन का तेजी से 8 किमी तक फैलना, लगभग 768 मीटर नीचे उतरना। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन और भूगर्भीय कारकों के अंतर्संबंध को समझना महत्वपूर्ण है।
- यह अध्ययन भविष्य में ऐसी आपदाओं के जोखिम मूल्यांकन और शमन रणनीतियों के विकास में सहायक होगा।
आपदा प्रबंधन
- आपदाओं के बहु-कारणीय (multi-causal) स्वरूप को उजागर करता है, जिससे केवल एक कारक पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल मिलता है।
- यह आपदा प्रतिक्रिया और पुनर्वास प्रयासों के लिए बेहतर योजना बनाने में मदद करेगा।
वैज्ञानिक और अनुसंधान
- भूस्खलन की उत्पत्ति, गति और विनाशकारी क्षमता को समझने के लिए भूगर्भीय मानचित्रण, चट्टान विश्लेषण और LiDAR जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग किया गया।
- वायनाड भूस्खलन स्थल को भू-विरासत स्थल (geo-heritage location) के रूप में प्रस्तावित करना अनुसंधान और पर्यटन को बढ़ावा देगा।
चुनौतियाँ
1. जलवायु परिवर्तन और चरम मौसमी घटनाएँ
- अत्यधिक वर्षा की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता भूस्खलन के जोखिम को बढ़ा रही है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा पैटर्न में अप्रत्याशित बदलाव आपदा प्रबंधन को और जटिल बनाते हैं।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण और पारिस्थितिकी, आपदा प्रबंधन
2. भूगर्भीय संवेदनशीलता
- पश्चिमी घाट जैसे क्षेत्रों में अंतर्निहित भूगर्भीय कमजोरियाँ भूस्खलन के प्रति उनकी संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं।
- मानवीय गतिविधियों जैसे वनों की कटाई और अनियोजित निर्माण से इन कमजोरियों का प्रभाव बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भूगोल, आपदा प्रबंधन
3. पुनर्वास और पुनर्निर्माण
- भूस्खलन से विस्थापित लोगों का पुनर्वास और क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण एक बड़ी चुनौती है।
- केरल सरकार द्वारा केंद्र पर भेदभाव का आरोप लगाना, संघीय ढांचे में सहयोग की कमी को दर्शाता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, आपदा प्रबंधन
4. प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली का अभाव
- भूगर्भीय और जलवायु संबंधी कारकों के जटिल अंतर्संबंध के कारण सटीक भूस्खलन पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करना कठिन है।
- समुदाय-आधारित तैयारी और जागरूकता की कमी से जान-माल का नुकसान बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अत्यधिक वर्षा | जलवायु परिवर्तन के कारण चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता। |
| भूगर्भीय संरचना | प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानों में अंतर्निहित कमजोरियाँ भूस्खलन के जोखिम को बढ़ाती हैं। |
| रासायनिक अपक्षय | चट्टानों का नरम होना और जल दबाव में वृद्धि, ढलान की स्थिरता को कम करती है। |
| घाटी का स्वरूप | संकीर्ण घाटियाँ मलबा प्रवाह की गति और विनाशकारी क्षमता को बढ़ाती हैं। |
| पुनर्वास और सहायता | आपदा प्रभावितों का उचित पुनर्वास और केंद्र-राज्य सहयोग में संभावित कमी। |
आगे की राह
- भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों की पहचान के लिए विस्तृत भूगर्भीय और भू-आकृतिक मानचित्रण (geomorphological mapping) किया जाए।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने और चरम मौसमी घटनाओं के लिए अनुकूलन रणनीतियों को मजबूत किया जाए।
- भूस्खलन पूर्व चेतावनी प्रणालियों (early warning systems) को विकसित और स्थापित किया जाए, जिसमें स्थानीय समुदायों को शामिल किया जाए।
- वनों की कटाई को रोकने और वैज्ञानिक भूमि उपयोग नियोजन (land use planning) को बढ़ावा देने के लिए सख्त नियम लागू किए जाएं।
- आपदा-रोधी बुनियादी ढांचे (disaster-resilient infrastructure) के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच आपदा प्रबंधन और पुनर्वास प्रयासों में समन्वय और सहयोग को बढ़ाया जाए।
- भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा दिया जाए, जिसमें भू-विरासत स्थलों का संरक्षण भी शामिल हो।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
भूस्खलन · पश्चिमी घाट · जलवायु परिवर्तन · भूवैज्ञानिक कारक · अत्यधिक वर्षा · मलबे का प्रवाह · प्राकृतिक आपदाएँ · आपदा प्रबंधन · पर्यावरणीय भेद्यता · भू-आकृति विज्ञान · पुनर्वास · सतत विकास
अवधारणा प्रवाह
अत्यधिक मानसूनी वर्षा (लगभग 573 मिमी/48 घंटे) → पानी का चट्टानों की दरारों और कतरनी क्षेत्रों में प्रवेश → रासायनिक अपक्षय और जल दबाव में वृद्धि → ढलान की स्थिरता का कम होना और चट्टान का टूटना → उच्च गति का मलबा प्रवाह (debris flow) शुरू होना → संकीर्ण घाटियों से गुजरते हुए विनाशकारी प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के समानांतर चलने वाली एक पर्वत श्रृंखला है।
2. पश्चिमी घाट को UNESCO विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्राप्त है।
3. वायनाड, पश्चिमी घाट में स्थित एक क्षेत्र है, जो अपनी जैव विविधता और संवेदनशील पारिस्थितिकी के लिए जाना जाता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीनों
- कोई भी नहीं
उत्तर: सभी तीनों — कथन 1 सही है। पश्चिमी घाट भारत के पश्चिमी तट के समानांतर एक लंबी पर्वत श्रृंखला है। कथन 2 सही है। पश्चिमी घाट को अपनी अद्वितीय जैव विविधता के कारण UNESCO विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। कथन 3 सही है। वायनाड केरल में पश्चिमी घाट का एक हिस्सा है और अपनी समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिक संवेदनशीलता के लिए प्रसिद्ध है।
Q2. भूस्खलन के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कारक भूस्खलन की घटना और उसकी तीव्रता को प्रभावित कर सकता है?
1. अत्यधिक वर्षा
2. भूवैज्ञानिक कमजोरियाँ (जैसे भ्रंश और दरारें)
3. वनस्पति आवरण का अभाव
4. मानवीय गतिविधियाँ (जैसे ढलानों पर निर्माण)
सही विकल्प का चयन कीजिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 3 और 4
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — अत्यधिक वर्षा मिट्टी और चट्टानों को संतृप्त कर भूस्खलन को ट्रिगर कर सकती है। भूवैज्ञानिक कमजोरियाँ, जैसे भ्रंश और दरारें, चट्टानों की संरचनात्मक अखंडता को कम करती हैं। वनस्पति आवरण मिट्टी को बांधे रखता है, और इसके अभाव से मिट्टी का कटाव और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है। ढलानों पर मानवीय गतिविधियाँ, जैसे निर्माण और वनों की कटाई, ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वायनाड में हाल ही में हुए भूस्खलन को केवल अत्यधिक वर्षा का परिणाम नहीं माना जा सकता है, बल्कि यह भूवैज्ञानिक और भू-आकृतिक कारकों के संयोजन से भी प्रभावित था। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और भारत में भूस्खलन के बढ़ते खतरे को कम करने के लिए आवश्यक उपायों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना: परिचय में वायनाड भूस्खलन का संक्षिप्त उल्लेख करें और बताएं कि यह केवल वर्षा से संबंधित नहीं था। मुख्य भाग में, अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर भूवैज्ञानिक (जैसे प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानें, कतरनी क्षेत्र, दरारें, रासायनिक अपक्षय) और भू-आकृतिक (घाटी की संरचना) कारकों की भूमिका का विस्तार से वर्णन करें। इसके बाद, भारत में भूस्खलन के बढ़ते खतरे के कारणों (जलवायु परिवर्तन, मानवीय गतिविधियाँ, वनों की कटाई) पर चर्चा करें। अंत में, भूस्खलन को कम करने के लिए आवश्यक उपायों जैसे कि प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, वैज्ञानिक भू-मानचित्रण, ढलान स्थिरीकरण तकनीकें, वनस्पति आवरण बढ़ाना, निर्माण गतिविधियों का विनियमन, आपदा प्रबंधन योजनाओं को मजबूत करना और समुदाय-आधारित दृष्टिकोणों पर विस्तृत चर्चा करें। निष्कर्ष में सतत विकास और पारिस्थितिक संतुलन के महत्व पर जोर दें।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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