05 Nov श्रम संहिताओं पर क्षेत्रीय क्षमता निर्माण एवं जागरूकता कार्यक्रम
✎ चार श्रम संहिताएँ (वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा व स्वास्थ्य एवं कार्य दशा) 29 केंद्रीय श्रम कानूनों के समेकन से बनीं, और श्रम समवर्ती सूची का विषय होने के कारण इनके क्रियान्वयन में केंद्र-राज्य समन्वय…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — राजव्यवस्था एवं शासन (संघवाद, समवर्ती सूची, केंद्र-राज्य समन्वय, श्रम कानूनों का संहिताकरण) | GS Paper II — सामाजिक न्याय (सामाजिक सुरक्षा, असंगठित और गिग श्रमिकों के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा संहिता) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (रोजगार, श्रम सुधार, औपचारिकीकरण, व्यापार सुगमता)
- Prelims: चार श्रम संहिताएँ: वेतन संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020; व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020, समवर्ती सूची (Concurrent List) की प्रविष्टि 22, 23 और 24 — श्रम, सामाजिक सुरक्षा और श्रमिक कल्याण, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) की भूमिका, प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (PM-SYM) योजना: स्वैच्छिक अंशदायी पेंशन योजना, प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PM-VBRY): रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन योजना, न्यूनतम वेतन और न्यूनतम मजदूरी (फ्लोर वेज) की अवधारणा, गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों का सामाजिक सुरक्षा संहिता में समावेश
- Essay: श्रम संहिताएँ: सुधार, औपचारिकीकरण और सामाजिक सुरक्षा का संतुलन, सहकारी संघवाद में नीति-क्रियान्वयन: केंद्र और राज्य की साझा भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: चार श्रम संहिताएँ (वेतन, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा व स्वास्थ्य एवं कार्य दशा) 29 केंद्रीय श्रम कानूनों के समेकन से बनीं, और श्रम समवर्ती सूची का विषय होने के कारण इनके क्रियान्वयन में केंद्र-राज्य समन्वय अनिवार्य है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने मध्य प्रदेश के इंदौर में 3 नवंबर 2026 को जिला स्तरीय क्षमता निर्माण एवं जागरूकता कार्यक्रम ‘श्रम संवाद’ आयोजित किया। यह कार्यक्रम मध्य प्रदेश के श्रम विभाग, एसोसिएशन ऑफ इंडस्ट्रीज मध्य प्रदेश और पीथमपुर औद्योगिक संगठन के सहयोग से हुआ, जिसमें नियोक्ताओं, मानव संसाधन, विधिक और वित्तीय क्षेत्र के 150 से अधिक पेशेवरों ने भाग लिया। सत्रों में चारों श्रम संहिताओं और उनके अंतर्गत अधिसूचित केंद्रीय नियमों के अनुपालन दायित्वों पर चर्चा हुई। ईपीएफओ और श्रम कल्याण महानिदेशालय (DGLW) के सत्रों में क्रमशः प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना और प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन योजना की जानकारी दी गई। ‘नियोक्ताओं के लिए अनुपालन पुस्तिका’ और ‘अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों का संकलन’ भी साझा किए गए। यह पहल नई श्रम संहिताओं के प्रभावी क्रियान्वयन और केंद्र-राज्य समन्वय की दृष्टि से प्रशासनिक महत्व रखती है।
पृष्ठभूमि
- भारत में श्रम कानून पहले कई अलग-अलग केंद्रीय अधिनियमों में बिखरे थे। सरकार ने इन्हें चार श्रम संहिताओं में समेकित किया, जिससे कानूनी ढाँचा सरल और एकीकृत हुआ।
- संविधान की सातवीं अनुसूची में श्रम संबंधी विषय समवर्ती सूची में आते हैं, इसलिए केंद्र और राज्य दोनों श्रम कानून बना सकते हैं। इसी कारण केंद्र और राज्य के बीच समन्वय आवश्यक होता है।
- असंगठित और गिग श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना नीति का एक प्रमुख लक्ष्य रहा है, जिसके लिए सामाजिक सुरक्षा संहिता में प्रावधान किए गए हैं।
- श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद नियोक्ताओं के लिए अनुपालन, पंजीकरण और रिपोर्टिंग दायित्व स्पष्ट किए गए हैं, जिनकी जानकारी देना जागरूकता कार्यक्रमों का मुख्य उद्देश्य है।
- ईपीएफओ और ईएसआईसी जैसी संस्थाएँ क्रमशः भविष्य निधि और कर्मचारी राज्य बीमा से जुड़ी सामाजिक सुरक्षा का प्रशासन करती हैं।
श्रम संहिताएँ क्या हैं?
- श्रम संहिताएँ केंद्र सरकार द्वारा 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेकित करने का परिणाम हैं।
- वेतन संहिता, 2019 मजदूरी, न्यूनतम वेतन और समय पर भुगतान से संबंधित है। इसमें न्यूनतम वेतन की अवधारणा को सभी श्रमिकों तक विस्तारित करने का प्रावधान है।
- औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 ट्रेड यूनियन, औद्योगिक विवाद समाधान और छंटनी से जुड़े नियम तय करती है।
- सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 भविष्य निधि, बीमा, मातृत्व लाभ और गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों जैसे असंगठित वर्गों की सामाजिक सुरक्षा से संबंधित है।
- व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020 कार्यस्थल की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य परिस्थितियों के मानक निर्धारित करती है।
- संहिताओं के अंतर्गत केंद्रीय नियम अधिसूचित किए गए हैं, और राज्य सरकारें अपने स्तर पर नियम बनाकर उन्हें लागू करती हैं।
- श्रम संवाद जैसे कार्यक्रम नियोक्ताओं और पेशेवरों के बीच जागरूकता बढ़ाकर अनुपालन को सरल बनाने का माध्यम हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| चार श्रम संहिताएँ | वेतन संहिता (Code on Wages), औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code), सामाजिक सुरक्षा संहिता (Code on Social Security) और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य स्थिति संहिता (OSH Code) मिलकर पूर्व के 29 केंद्रीय श्रम कानूनों का स्थान लेती हैं। |
| संहिताओं के अंतर्गत केंद्रीय नियम | संहिताओं के प्रावधानों को व्यवहार में लाने के लिए केंद्रीय नियम अधिसूचित किए गए हैं। नियोक्ताओं के लिए प्रमुख अनुपालन दायित्व इन्हीं नियमों में स्पष्ट होते हैं। |
| अनुपालन पुस्तिका और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | श्रम एवं रोजगार मंत्रालय द्वारा तैयार ये दस्तावेज़ नियोक्ताओं और अनुपालन पेशेवरों को व्यावहारिक मार्गदर्शन देते हैं और प्रशासनिक भ्रम कम करते हैं। |
| सामाजिक सुरक्षा संस्थाओं की भागीदारी | कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) जैसी संस्थाओं के प्रतिनिधियों का सत्र में होना यह दर्शाता है कि संहिताओं के क्रियान्वयन में सामाजिक सुरक्षा का ढाँचा केंद्रीय है। |
| केंद्र-राज्य समन्वय | श्रम समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए केंद्र के नियमों और राज्य के श्रम विभाग की भूमिका में समन्वय आवश्यक है। मध्य प्रदेश में आयोजित कार्यक्रम इसी समन्वय का उदाहरण है। |
| जिला स्तरीय प्रसार | इंदौर और धार क्षेत्र जैसे औद्योगिक केंद्रों में कार्यक्रम आयोजित कर नीति को उन हितधारकों तक पहुँचाया गया जो सीधे अनुपालन करते हैं। |
महत्व
प्रशासनिक एवं विधिक
- अनेक पुराने श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेकित करने से विधिक ढाँचा सरल होता है और कानूनों के बीच की असंगतियाँ कम होती हैं।
- एक ही विषय पर बिखरे प्रावधानों की जगह एक व्यवस्थित संहिता होने से नियोक्ताओं और प्रशासन दोनों के लिए अनुपालन की स्पष्टता बढ़ती है।
आर्थिक
- अनुपालन की स्पष्टता से नियोक्ताओं की अनिश्चितता घटती है, जो औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन के लिए सहायक मानी जाती है।
- औद्योगिक संबंध संहिता के प्रावधान नियोक्ता और श्रमिकों के बीच विवाद निपटान की प्रक्रिया को व्यवस्थित करते हैं, जिससे उत्पादन में बाधा कम होती है।
सामाजिक
- सामाजिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत भविष्य निधि, बीमा और पेंशन जैसे लाभों की पहुँच का विस्तार अनौपचारिक एवं असंगठित क्षेत्र तक करने का लक्ष्य है।
- श्रमिक कल्याण और सामाजिक सुरक्षा पर जागरूकता बढ़ने से योजनाओं के लाभ पात्र श्रमिकों तक पहुँचने की संभावना बढ़ती है।
शासन एवं संस्थागत
- केंद्र, राज्य सरकार, सामाजिक सुरक्षा संस्थाओं और उद्योग संगठनों को एक मंच पर लाने से संस्थागत क्षमता और हितधारक भागीदारी दोनों सुदृढ़ होती हैं।
- नीति निर्माण के बाद का क्रियान्वयन चरण, जिसमें क्षमता निर्माण और प्रसार शामिल है, प्रशासनिक सफलता का निर्णायक तत्व है।
चुनौतियाँ
1. नियोक्ताओं और छोटे उद्यमों में जागरूकता की कमी
- बड़े उद्योगों के पास विधिक और मानव संसाधन विभाग होते हैं, जबकि सूक्ष्म और लघु उद्यमों के पास यह क्षमता सीमित रहती है।
- नए प्रावधानों की जानकारी न होने से अनजाने में अनुपालन चूक हो सकती है, जिसका भार अंततः श्रमिकों और उद्यम दोनों पर पड़ता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय; शासन में नागरिक-केंद्रित प्रशासन और जन-जागरूकता
2. केंद्र और राज्य के नियमों में समन्वय
- श्रम समवर्ती सूची का विषय होने के कारण केंद्र और राज्य दोनों नियम बनाते हैं, और इनमें एकरूपता बनाए रखना चुनौतीपूर्ण है।
- राज्यों के बीच नियमों के अलग-अलग स्वरूप से बहु-राज्य प्रतिष्ठानों के लिए अनुपालन जटिल हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद; केंद्र-राज्य विधायी और प्रशासनिक संबंध
3. अनौपचारिक एवं असंगठित श्रमिकों तक पहुँच
- असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों का पंजीकरण और डेटा संकलन कठिन है, इसलिए सामाजिक सुरक्षा लाभों तक उनकी पहुँच सीमित रह सकती है।
- गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों जैसे नए रोजगार रूपों में नियोक्ता-श्रमिक संबंध अस्पष्ट होने से दायित्व तय करना कठिन होता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक सुरक्षा; असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए योजनाएँ
4. प्रशासनिक क्षमता और डिजिटल अनुपालन
- अनुपालन की बढ़ती प्रक्रियाओं के लिए निरीक्षण और प्रवर्तन तंत्र को पर्याप्त मानव संसाधन और तकनीकी सहायता की आवश्यकता होती है।
- निरीक्षण में मनमानी से बचने और नियोक्ताओं के लिए सरल प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए पारदर्शी व्यवस्था आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: ई-शासन; प्रशासनिक सुधार और सार्वजनिक सेवा वितरण
5. श्रम विवाद निपटान और औद्योगिक शांति
- औद्योगिक संबंध संहिता में विवाद समाधान के लिए विभिन्न स्तरों की व्यवस्था है, परंतु उसकी प्रभावशीलता व्यावहारिक क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
- विवादों के लंबित रहने से उत्पादन और श्रमिक हित दोनों प्रभावित होते हैं, इसलिए समयबद्ध निपटान आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: शासन; विवाद निपटान तंत्र और न्याय-वितरण व्यवस्था
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अनुपालन जागरूकता | सूक्ष्म और लघु उद्यमों में नए प्रावधानों की जानकारी सीमित है, जिससे अनजाने उल्लंघन की आशंका रहती है। |
| केंद्र-राज्य एकरूपता | समवर्ती विषय होने से राज्य नियमों में भिन्नता बहु-राज्य नियोक्ताओं के लिए अनुपालन को जटिल बना सकती है। |
| असंगठित श्रमिकों का पंजीकरण | डेटा की कमी के कारण सामाजिक सुरक्षा लाभों तक पहुँच अधूरी रह सकती है। |
| नए रोजगार रूप | गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों के लिए नियोक्ता दायित्व की स्पष्ट परिभाषा अभी व्यवहार में चुनौती है। |
| प्रवर्तन क्षमता | निरीक्षण तंत्र पर बढ़ते कार्यभार के कारण समान और पारदर्शी प्रवर्तन सुनिश्चित करना कठिन है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना (PMVBRY)
- प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (PM-SYM) योजना
आगे की राह
- सूक्ष्म और लघु उद्यमों के लिए जिला और क्लस्टर स्तर पर नियमित क्षमता निर्माण कार्यक्रम चलाए जाएँ, ताकि अनुपालन की जानकारी उन तक सीधे पहुँचे।
- केंद्र और राज्यों के बीच नियमों के समन्वय के लिए साझा मानक प्रारूप और नियमित परामर्श तंत्र विकसित किया जाए।
- असंगठित और गिग श्रमिकों के पंजीकरण के लिए एकीकृत डेटाबेस को विभिन्न सामाजिक सुरक्षा संस्थाओं से जोड़ा जाए।
- अनुपालन पुस्तिकाओं और अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों को क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध कराया जाए, ताकि स्थानीय नियोक्ता उन्हें सरलता से समझ सकें।
- निरीक्षण प्रक्रिया में तकनीक आधारित जोखिम-आधारित चयन अपनाया जाए, जिससे प्रवर्तन पारदर्शी और सहयोगात्मक बने।
- श्रम विवाद निपटान तंत्र में समयसीमा का कड़ाई से पालन और डिजिटल निगरानी सुनिश्चित की जाए।
- श्रमिकों को अपने अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा लाभों की जानकारी देने के लिए नियोक्ताओं और श्रमिक संगठनों की भागीदारी बढ़ाई जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
श्रम संहिता (Labour Codes) · सामाजिक सुरक्षा (Social Security) · अनुपालन सरलीकरण (Ease of Compliance) · समवर्ती सूची (Concurrent List) · नीति निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy) · गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिक (Gig and Platform Workers) · कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) · प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (PM-SYM) · औपचारिकीकरण (Formalisation of Labour) · केंद्र-राज्य समन्वय (Centre-State Coordination) · सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Code on Social Security, 2020) · सुशासन (Good Governance)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 43: श्रमिकों के लिए निर्वाह मजदूरी और सभ्य जीवन स्तर
- अनुच्छेद 42: कार्य की न्यायोचित और मानवीय दशाएँ
- अनुच्छेद 43A: उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी
- सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची: श्रम, कल्याण और सामाजिक सुरक्षा विषय
अवधारणा प्रवाह
पूर्व के 29 केंद्रीय श्रम कानूनों का चार श्रम संहिताओं में समेकन → संहिताओं के अंतर्गत केंद्रीय नियमों और अनुपालन पुस्तिका का अधिसूचित होना → केंद्र, राज्य सरकार और सामाजिक सुरक्षा संस्थाओं द्वारा जिला स्तरीय क्षमता निर्माण और जागरूकता कार्यक्रम → नियोक्ताओं और पेशेवरों की समझ बढ़ने पर अनुपालन में सुधार → प्रभावी अनुपालन से श्रमिक कल्याण, सामाजिक सुरक्षा लाभ और औद्योगिक शांति को सहायता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. चारों श्रम संहिताओं के अंतर्गत लगभग 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित किया गया है।
2. श्रम कल्याण से संबंधित विषय संविधान की समवर्ती सूची (Concurrent List) में आते हैं, जिससे केंद्र और राज्य दोनों इस पर विधि बना सकते हैं।
3. संविधान का अनुच्छेद 43A श्रमिकों को ‘निर्वाह मजदूरी’ (living wage) सुनिश्चित करने से संबंधित है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- उपर्युक्त सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समेकित किया गया। कथन 2 सही है: श्रम कल्याण संविधान की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 24 में आता है। कथन 3 गलत है: निर्वाह मजदूरी का उल्लेख अनुच्छेद 43 में है, जबकि अनुच्छेद 43A उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी से संबंधित है। अतः उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): प्रधानमंत्री श्रम योगी मान-धन (PM-SYM) असंगठित श्रमिकों के लिए एक स्वैच्छिक अंशदायी पेंशन योजना है।
कारण (R): इस योजना में अंशदाता के अंशदान के समतुल्य राशि केंद्र सरकार द्वारा भी जमा की जाती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — PM-SYM असंगठित श्रमिकों के लिए स्वैच्छिक और अंशदायी पेंशन योजना है, जिसमें एक निश्चित आयु के बाद पेंशन मिलती है। इसमें केंद्र सरकार अंशदाता के अंशदान के बराबर राशि (मैचिंग अंशदान) जमा करती है। इसलिए कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।
Q3. निम्नलिखित संस्थाओं को उनके संबंधित विधानों से सुमेलित कीजिए:
सूची-I (संस्था)
A. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO)
B. कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC)
सूची-II (विधि)
1. कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948
2. कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही सुमेलन चुनिए:
- A-2, B-1
- A-1, B-2
- A-2, B-2
- A-1, B-1
उत्तर: A-2, B-1 — EPFO की स्थापना और संचालन कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952 के अंतर्गत होता है। ESIC का आधार कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948 है। अतः A-2 और B-1 सही सुमेलन है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं में समेकित करने का उद्देश्य अनुपालन को सरल बनाना और सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना बताया गया है। इस नीति का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि यदि नियोक्ता अनुपालन को केवल औपचारिक प्रक्रिया मानें, तो गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना (Model-Answer Skeleton):
1. संवैधानिक आधार: समवर्ती सूची की प्रविष्टि 22 (औद्योगिक विवाद, व्यापार संघ), प्रविष्टि 23 (सामाजिक सुरक्षा एवं रोजगार), प्रविष्टि 24 (श्रम कल्याण); नीति निदेशक तत्वों में अनुच्छेद 39(भाग (ड) एवं (च)), 42 (मानवोचित कार्य दशाएँ), 43 (निर्वाह मजदूरी) और 43A (उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी); मौलिक अधिकारों में अनुच्छेद 19(1)(ग) (संघ बनाने का अधिकार), अनुच्छेद 23 और 24।
2. पृष्ठभूमि: द्वितीय राष्ट्रीय श्रम आयोग (2002) की सिफारिशें; पुराने केंद्रीय श्रम कानूनों की जटिलता और बहुल पंजीकरण व रिटर्न की समस्या।
3. चार संहिताएँ: मजदूरी संहिता, 2019; औद्योगिक संबंध संहिता, 2020; सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों की परिभाषा तथा एग्रीगेटर अंशदान का प्रावधान); व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020।
4. संस्थागत ढाँचा: EPFO (कर्मचारी भविष्य निधि एवं प्रकीर्ण उपबंध अधिनियम, 1952), ESIC (कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम, 1948), मुख्य श्रम आयुक्त (केंद्रीय), श्रम कल्याण महानिदेशालय (DGLW); योजनाएँ: प्रधानमंत्री विकसित भारत रोजगार योजना, PM-SYM; ई-श्रम पोर्टल।
5. तर्क-पक्ष (अनुपालन सरलीकरण): एक ही पंजीकरण व रिटर्न, निश्चित समय-सीमा, व्यापार सुगमता और औपचारिकीकरण को प्रोत्साहन; नियोक्ताओं के लिए अनुपालन पुस्तिका और FAQ जैसे उपकरण।
6. आलोचनात्मक पक्ष: हड़ताल व छंटनी से संबंधित प्रावधानों पर श्रमिक संगठनों की आपत्तियाँ; राज्यों के नियम-निर्माण में विलंब; केंद्र-राज्य समन्वय की चुनौती; गिग श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा निधि के वित्तपोषण का प्रश्न।
7. सैद्धांतिक संदर्भ: गाय स्टैंडिंग (Guy Standing) की ‘प्रीकेरिएट’ (Precariat) अवधारणा; ILO की ‘डिसेंट वर्क’ (Decent Work) की अवधारणा (जुआन सोमाविया, 1999)।
8. दूसरा प्रश्न (अनुपालन बनाम वास्तविक संरक्षण): यदि अनुपालन केवल कागज़ी औपचारिकता बने, तो अनौपचारिक एवं गिग श्रमिकों का पंजीकरण (ई-श्रम) होने पर भी वास्तविक लाभ (पेंशन, बीमा, भविष्य निधि) से वंचना; लागू करने वाली संस्थाओं की क्षमता और निरीक्षण व्यवस्था की भूमिका।
9. निष्कर्ष: संतुलित दृष्टिकोण—सरलीकरण और संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बशर्ते प्रवर्तन (enforcement), डेटा-आधारित निगरानी और सामाजिक संवाद (त्रिपक्षीय परामर्श) सुनिश्चित हों। इंदौर का ‘श्रम संवाद’ जैसा क्षमता-निर्माण इस दिशा में एक व्यावहारिक कदम है।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Madhya Pradesh PCS (MPPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: हाल ही में ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम के तहत श्रम संहिताओं पर क्षेत्रीय क्षमता निर्माण एवं जागरूकता कार्यक्रम मध्य प्रदेश के किन जिलों में आयोजित किया गया?
- A. भोपाल एवं जबलपुर
- B. इंदौर एवं धार
- C. ग्वालियर एवं उज्जैन
- D. रीवा एवं सतना
उत्तर: B. इंदौर एवं धार — श्रम संवाद कार्यक्रम इंदौर एवं धार क्षेत्र में श्रम संहिताओं पर क्षेत्रीय क्षमता निर्माण एवं जागरूकता के लिए आयोजित किया गया।
Mains: मध्य प्रदेश के इंदौर एवं धार क्षेत्र में आयोजित ‘श्रम संवाद’ कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्या था? संक्षेप में समझाइए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
- केरल उच्च न्यायालय ने मॉर्फ्ड तस्वीरों के प्रसार के आरोपी छात्र की जमानत याचिका खारिज की - November 5, 2026
- Maharashtra Ordinance: Impact on Cooperative Governance & Politics - November 5, 2026
- श्रम संहिताओं पर क्षेत्रीय क्षमता निर्माण एवं जागरूकता कार्यक्रम - November 5, 2026

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