04 Aug संसद में आज: सीतारमण करेंगे कराधान विधेयक पेश, कांग्रेस ने मांगी दलबदल कानून पर चर्चा
✎ दल-बदल कानून राजनीतिक अस्थिरता को रोकने और विधायकों को अवसरवादी दल-बदल से रोकने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जबकि कराधान विधेयक देश की वित्तीय और कर नीतियों को संशोधित करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका – संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियां एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय। | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोजगार से संबंधित विषय।
- Prelims: दल-बदल कानून, संविधान की दसवीं अनुसूची, अयोग्यता, कराधान विधेयक, लोकसभा, राज्यसभा, अध्यादेश, प्रश्नकाल, शून्यकाल
- Essay: भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक नैतिकता और अवसरवाद का प्रभाव, संसदीय कार्यवाही और विधायी प्रक्रिया: चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: दल-बदल कानून राजनीतिक अस्थिरता को रोकने और विधायकों को अवसरवादी दल-बदल से रोकने के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जबकि कराधान विधेयक देश की वित्तीय और कर नीतियों को संशोधित करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, संसद के मानसून सत्र के दौरान, कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने ‘अवसरवाद से प्रेरित सामूहिक राजनीतिक दल-बदल’ पर अंकुश लगाने के लिए एक नए दल-बदल विरोधी कानून की आवश्यकता पर चर्चा करने हेतु प्रश्नकाल (Question Hour), शून्यकाल (Zero Hour) और दिन के अन्य सभी सूचीबद्ध कार्यों को निलंबित करने की मांग की। इसी बीच, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 को लोकसभा में पेश किया, जिसका उद्देश्य भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन करना है। इन दोनों घटनाओं ने संसदीय कार्यवाही और विधायी प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पहलुओं को उजागर किया है।
पृष्ठभूमि
- दल-बदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) में शामिल है, जिसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था।
- इस कानून का मुख्य उद्देश्य विधायकों को एक राजनीतिक दल से दूसरे राजनीतिक दल में दल-बदल करने से रोकना है, ताकि राजनीतिक अस्थिरता को कम किया जा सके।
- कानून के तहत, यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, या पार्टी के निर्देशों के विपरीत मतदान करता है या अनुपस्थित रहता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- अयोग्यता का अंतिम निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) द्वारा किया जाता है।
- कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 का उद्देश्य विभिन्न वित्तीय कानूनों में संशोधन करना है, जो देश की कर नीति को प्रभावित करेगा।
दल-बदल कानून क्या है?
- दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में उल्लिखित एक प्रावधान है, जिसे 1985 में 52वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया था।
- इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल को हतोत्साहित करना और निर्वाचित प्रतिनिधियों को एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने से रोकना है, जिससे सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
- यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं दोनों के सदस्यों पर लागू होता है।
- एक सदस्य को अयोग्य घोषित किया जा सकता है यदि वह स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है।
- यदि कोई सदस्य अपनी राजनीतिक पार्टी द्वारा जारी किसी निर्देश के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है, बशर्ते पार्टी ने 15 दिनों के भीतर उसकी ऐसी कार्रवाई को माफ न किया हो।
- निर्दलीय सदस्य यदि किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाते हैं, तो उन्हें भी अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- मनोनीत सदस्य यदि सदन में अपनी सीट लेने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होते हैं, तो उन्हें अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
- अयोग्यता के संबंध में अंतिम निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति) द्वारा लिया जाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 | यह विधेयक भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007, आयकर अधिनियम, 2025 और वित्त अधिनियम, 2026 में संशोधन का प्रस्ताव करता है, जो देश की वित्तीय और कराधान नीतियों को अद्यतन करने के लिए महत्वपूर्ण है। |
| आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026 | यह अध्यादेश तत्काल विधायी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए लाया गया था, जिसके कारणों को वित्त मंत्री द्वारा स्पष्टीकरण विवरण में प्रस्तुत किया जाएगा। यह सरकार की त्वरित नीतिगत प्रतिक्रिया क्षमता को दर्शाता है। |
| दल-बदल विरोधी कानून पर चर्चा | कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी द्वारा ‘अवसरवाद से प्रेरित सामूहिक राजनीतिक दल-बदल’ पर अंकुश लगाने के लिए एक नए दल-बदल विरोधी कानून की आवश्यकता पर चर्चा की मांग की गई है। यह भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक नैतिकता और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। |
| प्रश्नकाल और शून्यकाल का स्थगन प्रस्ताव | दल-बदल विरोधी कानून पर चर्चा के लिए प्रश्नकाल और शून्यकाल को स्थगित करने का प्रस्ताव सदन के नियमों के तहत एक महत्वपूर्ण संसदीय प्रक्रिया है, जो किसी अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व के मामले पर तत्काल ध्यान आकर्षित करने के लिए उपयोग की जाती है। |
| ईमानदार असंतोष के लिए स्थान | प्रस्तावित चर्चा का उद्देश्य एक ऐसा दल-बदल विरोधी कानून तैयार करना है जो अवसरवादी दल-बदल को हतोत्साहित करे, साथ ही संसद और राज्य विधानसभाओं के भीतर सैद्धांतिक असंतोष के लिए जगह सुरक्षित रखे। यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- दल-बदल विरोधी कानून पर चर्चा भारतीय राजनीति में बढ़ती अवसरवादी दल-बदल की प्रवृत्ति को संबोधित करने का प्रयास है, जो राजनीतिक स्थिरता और मतदाताओं के विश्वास को प्रभावित करती है।
- यह चर्चा राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र और असंतोष के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है, जो स्वस्थ संसदीय प्रथाओं के लिए महत्वपूर्ण है।
विधायी महत्व
- कराधान और अन्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 का परिचय देश की कराधान प्रणाली और वित्तीय विनियमन को अद्यतन करने के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे आर्थिक गतिविधियों और राजस्व संग्रह पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।
- अध्यादेश के माध्यम से तत्काल कानून बनाने और फिर उसे विधेयक के रूप में संसद में प्रस्तुत करने की प्रक्रिया सरकार को अप्रत्याशित या तत्काल नीतिगत आवश्यकताओं पर प्रतिक्रिया देने में सक्षम बनाती है।
संसदीय महत्व
- प्रश्नकाल और शून्यकाल को स्थगित करने का प्रस्ताव संसदीय प्रक्रियाओं और नियमों के महत्व को दर्शाता है, जिसके तहत सदस्य अत्यावश्यक सार्वजनिक महत्व के मुद्दों को उठाने के लिए विभिन्न साधनों का उपयोग कर सकते हैं।
- संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों का परिचय और उन पर चर्चा विधायी प्रक्रिया का मूल है, जो कानून बनाने और सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. दल-बदल विरोधी कानून का क्रियान्वयन
- वर्तमान दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) की व्याख्या और क्रियान्वयन में अक्सर अस्पष्टताएँ और देरी देखी जाती हैं, जिससे इसके उद्देश्य कमजोर पड़ जाते हैं।
- अध्यक्ष/सभापति की भूमिका की निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि वे अक्सर सत्तारूढ़ दल के सदस्य होते हैं, जिससे निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधानमंडल
2. राजनीतिक अवसरवाद और नैतिकता
- दल-बदल का मुख्य कारण अक्सर वैचारिक मतभेदों के बजाय व्यक्तिगत लाभ या सत्ता की लालसा होती है, जो राजनीतिक नैतिकता को कमजोर करता है।
- सामूहिक दल-बदल की घटनाएँ मतदाताओं के जनादेश का अनादर करती हैं और राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा देती हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजनीति में नैतिकता, शासन
3. आंतरिक असंतोष और पार्टी अनुशासन
- एक नया दल-बदल विरोधी कानून तैयार करते समय पार्टी अनुशासन और विधायकों के ‘ईमानदार और आलोचनात्मक असंतोष’ के अधिकार के बीच संतुलन बनाना एक चुनौती है।
- बहुत कठोर कानून विधायकों को महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय व्यक्त करने से रोक सकता है, जिससे पार्टी के भीतर आंतरिक लोकतंत्र कमजोर हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, राजनीतिक दल
4. कराधान कानूनों का जटिल स्वरूप
- कराधान कानूनों में लगातार संशोधन और उनका जटिल स्वरूप करदाताओं और प्रशासकों दोनों के लिए चुनौती पैदा करता है।
- विभिन्न अधिनियमों में संशोधन से सामंजस्य बनाए रखना और संभावित विसंगतियों से बचना महत्वपूर्ण है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय अर्थव्यवस्था, कराधान
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अवसरवादी दल-बदल | राजनीतिक अस्थिरता और मतदाताओं के जनादेश का अनादर। |
| दल-बदल विरोधी कानून का क्रियान्वयन | अध्यक्ष/सभापति की भूमिका की निष्पक्षता और न्यायिक समीक्षा की सीमाएँ। |
| विधायकों का असंतोष | पार्टी अनुशासन और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता। |
| कराधान कानूनों में संशोधन | कानूनी जटिलताएँ, अनुपालन बोझ और आर्थिक प्रभाव। |
| अध्यादेश का उपयोग | संसदीय बहस से बचने और कार्यपालिका द्वारा विधायी शक्ति के संभावित दुरुपयोग की चिंता। |
आगे की राह
- दल-बदल विरोधी कानून में संशोधन कर अध्यक्ष/सभापति की भूमिका को अधिक तटस्थ बनाने के लिए एक स्वतंत्र तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए, जैसे कि किसी न्यायिक निकाय या चुनाव आयोग की सिफारिशों को शामिल करना।
- कानून में ‘दल-बदल’ और ‘ईमानदार असंतोष’ के बीच स्पष्ट अंतर परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि विधायकों को सैद्धांतिक आधार पर अपनी राय व्यक्त करने की स्वतंत्रता मिल सके।
- कराधान कानूनों को सरल और तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए ताकि करदाताओं के लिए अनुपालन आसान हो और कर प्रशासन अधिक कुशल बन सके।
- अध्यादेशों के माध्यम से कानून बनाने की प्रथा को केवल असाधारण परिस्थितियों तक सीमित किया जाना चाहिए और संसद में विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।
- राजनीतिक दलों को आंतरिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना चाहिए ताकि विधायकों को पार्टी के भीतर अपनी चिंताओं को उठाने के लिए मंच मिल सके, जिससे दल-बदल की आवश्यकता कम हो।
- चुनाव आयोग को दल-बदल के मामलों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने और त्वरित निर्णय सुनिश्चित करने के लिए सशक्त किया जाना चाहिए।
- जनता में राजनीतिक नैतिकता और दल-बदल के नकारात्मक प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए ताकि वे अपने प्रतिनिधियों से अधिक जवाबदेही की मांग कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
दल-बदल कानून · दसवीं अनुसूची · संवैधानिक नैतिकता · राजनीतिक अवसरवाद · संसदीय कार्यवाही · अविश्वास प्रस्ताव · विधायी प्रक्रिया · कराधान विधेयक · लोकसभा · राज्यसभा · अध्यादेश · संसदीय विशेषाधिकार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 102(2) और 191(2)’, ‘note’: ‘दल-बदल के आधार पर अयोग्यता’}
- {‘article’: ‘दसवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘दल-बदल विरोधी कानून का प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 123’, ‘note’: ‘राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 213’, ‘note’: ‘राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने की शक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 105’, ‘note’: ‘संसद सदस्यों के विशेषाधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 194’, ‘note’: ‘राज्य विधानमंडल सदस्यों के विशेषाधिकार’}
अवधारणा प्रवाह
अवसरवादी दल-बदल की बढ़ती घटनाएँ। → राजनीतिक अस्थिरता और मतदाताओं के जनादेश का अनादर। → वर्तमान दल-बदल विरोधी कानून की सीमाओं पर चर्चा की मांग। → संसद में नए/संशोधित दल-बदल विरोधी कानून पर बहस। → कराधान और अन्य कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव। → देश की वित्तीय और राजनीतिक स्थिरता पर प्रभाव। → लोकतंत्र में जवाबदेही और नैतिकता का सुदृढ़ीकरण।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दल-बदल विरोधी कानून को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था।
2. यह कानून केवल संसद सदस्यों पर लागू होता है, राज्य विधानमंडलों के सदस्यों पर नहीं।
3. दल-बदल के मामलों में अयोग्यता संबंधी अंतिम निर्णय भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिया जाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़कर दल-बदल विरोधी कानून लाया गया था। कथन 2 गलत है। यह कानून संसद सदस्यों के साथ-साथ राज्य विधानमंडलों के सदस्यों पर भी लागू होता है। कथन 3 गलत है। दल-बदल के मामलों में अयोग्यता संबंधी अंतिम निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति) द्वारा लिया जाता है, हालाँकि उनके निर्णय की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 के संबंध में सही है?
- यह केवल आयकर अधिनियम, 2025 में संशोधन करना चाहता है।
- यह भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन करना चाहता है।
- यह वित्त अधिनियम, 2026 में संशोधन करना चाहता है।
- विकल्प B और C दोनों।
उत्तर: विकल्प B और C दोनों। — समाचार के अनुसार, कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007, आयकर अधिनियम, 2025 और वित्त अधिनियम, 2026 में संशोधन करना चाहता है। इसलिए, विकल्प B और C दोनों सही हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों पर चर्चा कीजिए। क्या आपको लगता है कि यह कानून राजनीतिक अवसरवाद को रोकने और आंतरिक दलगत असहमति को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बनाने में सफल रहा है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) का संक्षिप्त परिचय, इसके उद्देश्य और 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा दसवीं अनुसूची में शामिल किए जाने का उल्लेख।
2. **दल-बदल विरोधी कानून के प्रमुख प्रावधान:**
* स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ना।
* दल के निर्देशों के विरुद्ध मतदान करना या मतदान से अनुपस्थित रहना।
* निर्दलीय सदस्य का किसी राजनीतिक दल में शामिल होना।
* मनोनीत सदस्य का शपथ लेने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होना।
* अपवाद: विलय (दो-तिहाई सदस्यों का विलय)।
* अयोग्यता का निर्णय: पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) द्वारा।
* न्यायिक समीक्षा: किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू (Kihoto Hollohan v. Zachillhu) मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय।
3. **कानून की सफलता और विफलता का समालोचनात्मक परीक्षण (संतुलन बनाने में):**
* **सफलता (राजनीतिक अवसरवाद रोकने में):**
* ‘आया राम गया राम’ की राजनीति पर अंकुश।
* सरकारों में स्थिरता लाने में मदद।
* खरीद-फरोख्त पर कुछ हद तक नियंत्रण।
* **विफलता/सीमाएँ (आंतरिक दलगत असहमति और अन्य मुद्दे):**
* आंतरिक दलगत लोकतंत्र को कमजोर करना: सदस्यों को दल के निर्देशों का आँख बंद करके पालन करना पड़ता है।
* असहमति (dissent) के लिए बहुत कम जगह।
* सामूहिक दल-बदल (mass defections) को प्रोत्साहन (दो-तिहाई नियम का दुरुपयोग)।
* पीठासीन अधिकारी की भूमिका पर प्रश्नचिह्न (राजनीतिक पूर्वाग्रह का आरोप)।
* निर्णय में देरी।
* विधायकों को दल के प्रति अधिक जवाबदेह बनाना, मतदाताओं के प्रति कम।
4. **सुधार हेतु सुझाव (संक्षेप में):** दिनेश गोस्वामी समिति, विधि आयोग की रिपोर्ट, चुनाव आयोग के सुझावों का उल्लेख (जैसे निर्णय राष्ट्रपति/राज्यपाल या चुनाव आयोग की सलाह पर लिया जाए)।
5. **निष्कर्ष:** कानून की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए, राजनीतिक अवसरवाद पर अंकुश लगाने और आंतरिक दलगत लोकतंत्र को बढ़ावा देने के बीच बेहतर संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: Hindustan Times
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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