19 Sep ‘सुपर एल नीनो’ से भारत पर संकट: 180+ वैज्ञानिकों की चेतावनी और तैयारी
✎ अल नीनो उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की एक आवधिक घटना है, जिसका भारतीय मानसून और वैश्विक मौसम पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जिससे अक्सर सूखे और अत्यधिक गर्मी जैसी…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भौतिक भूगोल, भारतीय भूगोल) | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी (जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन), कृषि (फसल पैटर्न, सिंचाई)
- Prelims: अल नीनो, ला नीना, ENSO, प्रशांत महासागर, वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन, भारतीय मानसून, सूखा, कोरल ब्लीचिंग, WMO
- Essay: जलवायु परिवर्तन के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव, भारत में कृषि पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास
त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने की एक आवधिक घटना है, जिसका भारतीय मानसून और वैश्विक मौसम पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, जिससे अक्सर सूखे और अत्यधिक गर्मी जैसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, 180 से अधिक भारतीय वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों ने आगामी ‘सुपर’ अल नीनो (El Nino) घटना से निपटने के लिए एक तत्काल अपील पर हस्ताक्षर किए हैं। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी चेतावनी दी है कि मौजूदा अल नीनो की स्थिति आने वाले महीनों में एक ‘बहुत मजबूत घटना’ में बदल सकती है और फरवरी 2027 तक बनी रह सकती है। वैज्ञानिकों ने इस घटना के भारत की प्राकृतिक प्रणालियों और सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था पर विनाशकारी प्रभावों के प्रति आगाह किया है।
पृष्ठभूमि
- अल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय दबाव में होने वाले बड़े पैमाने पर बदलाव को संदर्भित करता है।
- अल नीनो ENSO चक्र का गर्म चरण है, जबकि ला नीना (La Nina) इसका ठंडा चरण है।
- एक ‘सुपर’ अल नीनो तब होता है जब पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ जाता है, जैसा कि वर्तमान में अनुमान लगाया जा रहा है।
- ऐतिहासिक रूप से, अल नीनो की घटनाओं का भारतीय मानसून (Monsoon) पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, जिससे अक्सर सूखे की स्थिति और कृषि उत्पादन में कमी आती है।
- वैज्ञानिकों ने इस बार 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक की विसंगतियों की संभावना जताई है, जो पिछले 1,000 वर्षों में सबसे अधिक हो सकती है।
- भारत की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा कृषि पर निर्भर करता है, जो सीधे मानसून से प्रभावित होता है, इसलिए अल नीनो का प्रभाव व्यापक हो सकता है।
अल नीनो क्या है?
- अल नीनो प्रशांत महासागर में एक आवधिक जलवायु पैटर्न है, जिसकी विशेषता उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना है।
- यह घटना आमतौर पर हर 2 से 7 साल में होती है और लगभग 9 से 12 महीने तक चलती है, हालांकि कभी-कभी यह अधिक समय तक भी रह सकती है।
- अल नीनो के दौरान, पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में गर्म पानी पूर्व की ओर बढ़ता है, जिससे पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में सतह का तापमान बढ़ जाता है।
- यह वैश्विक मौसम पैटर्न को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करता है, जिससे कुछ क्षेत्रों में सूखा और अन्य में भारी वर्षा हो सकती है।
- भारत के संदर्भ में, अल नीनो अक्सर कमजोर मानसूनी वर्षा, सूखे की स्थिति और कृषि उत्पादन में कमी से जुड़ा होता है।
- इसके अन्य प्रभावों में कोरल ब्लीचिंग (Coral Bleaching), जंगल की आग में वृद्धि, वर्षावन के पेड़ों की मृत्यु, और अत्यधिक गर्मी की स्थिति शामिल हैं।
- वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि इसके सूक्ष्म प्रभाव जैसे फलों के उत्पादन में देरी या जानवरों के व्यवहार में बदलाव भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
- यह घटना वैश्विक खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों और पारिस्थितिक तंत्रों पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| अल नीनो घटना | यह उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतह के पानी के असामान्य रूप से गर्म होने से चिह्नित है, जिसका वैश्विक मौसम पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। |
| सुपर अल नीनो | यह अल नीनो का एक असाधारण रूप से तीव्र संस्करण है, जिसमें समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ जाता है (अगस्त में 2.6 डिग्री सेल्सियस से अधिक, 4 डिग्री सेल्सियस तक की संभावना)। |
| वैज्ञानिकों की अपील | 180 से अधिक भारतीय वैज्ञानिकों और पारिस्थितिकीविदों ने आगामी ‘सुपर’ अल नीनो के प्रभावों को समझने और उनसे निपटने के लिए अनुसंधान और निगरानी प्रयासों को मजबूत करने का आह्वान किया है। |
| विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की चेतावनी | WMO ने पुष्टि की है कि मौजूदा अल नीनो की स्थिति आने वाले महीनों में ‘एक बहुत मजबूत घटना’ में तेज होने और फरवरी 2027 तक बनी रहने की संभावना है। |
| तापमान विसंगतियाँ | प्रशांत महासागर में तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा से ऊपर उठ गया है, जो अगस्त में 2.6 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो गया है, और 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक की संभावित विसंगतियाँ पिछले 1,000 वर्षों में सबसे अधिक हैं। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर प्रभाव
- प्रवाल विरंजन (coral bleaching) और मृत्यु दर में व्यापक वृद्धि, जिससे समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों को अपरिवर्तनीय क्षति होगी।
- जंगल की आग में वृद्धि, जिससे जैव विविधता का नुकसान होगा और वायु गुणवत्ता प्रभावित होगी।
- बड़े वर्षावन वृक्षों की मृत्यु, जिससे कार्बन सिंक (carbon sinks) की क्षमता कम होगी और जलवायु परिवर्तन में तेजी आएगी।
कृषि और आजीविका पर प्रभाव
- सूखे और अत्यधिक गर्मी की स्थिति की उच्च संभावना, जिससे कृषि उत्पादन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा।
- किसानों, मछुआरों और चरवाहों की आजीविका पर गंभीर खतरा, जिससे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी।
- फलों के उत्पादन में देरी और पशु व्यवहार में बदलाव जैसे सूक्ष्म प्रभाव, जो दीर्घकालिक खाद्य श्रृंखला और पारिस्थितिक संतुलन को बाधित कर सकते हैं।
वैज्ञानिक अनुसंधान और नीति निर्माण पर प्रभाव
- चरम जलवायु घटनाओं के प्राकृतिक दुनिया और सामाजिक प्रणालियों पर पड़ने वाले प्रभावों को बेहतर ढंग से समझने के लिए अनुसंधान और निगरानी प्रयासों को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता।
- अल नीनो के दौरान प्राप्त ज्ञान और संरक्षित पारिस्थितिक तंत्र भारत को एक गर्म और अधिक अस्थिर भविष्य के लिए तैयार करने में मदद कर सकते हैं।
- नीति निर्माताओं के लिए प्रारंभिक चेतावनी संकेतों का उपयोग करने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और शमन रणनीतियों को विकसित करने का अवसर।
चुनौतियाँ
1. कृषि और खाद्य सुरक्षा
- सूखे और अत्यधिक गर्मी के कारण फसल उत्पादन में कमी, जिससे खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा उत्पन्न होगा।
- किसानों की आय में गिरावट और ग्रामीण संकट का बढ़ना।
यूपीएससी लिंक: कृषि, खाद्य सुरक्षा, आपदा प्रबंधन
2. जल संसाधन प्रबंधन
- वर्षा पैटर्न में बदलाव और भूजल स्तर में कमी, जिससे पेयजल और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी।
- जल-जनित रोगों में वृद्धि की संभावना।
यूपीएससी लिंक: जल संसाधन, पर्यावरण, आपदा प्रबंधन
3. जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र
- प्रवाल विरंजन, जंगल की आग और वर्षावन वृक्षों की मृत्यु से जैव विविधता का भारी नुकसान।
- पारिस्थितिक संतुलन में व्यवधान और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर नकारात्मक प्रभाव।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, आपदा प्रबंधन
4. सार्वजनिक स्वास्थ्य
- अत्यधिक गर्मी की लहरों से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं में वृद्धि।
- वेक्टर-जनित रोगों (vector-borne diseases) के प्रसार में संभावित वृद्धि।
यूपीएससी लिंक: स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन
5. आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया
- चरम मौसम की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता के लिए प्रभावी आपदा प्रबंधन योजनाओं की आवश्यकता।
- समुदायों को लचीला बनाने और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने की चुनौती।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन अनुकूलन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| कृषि उत्पादकता | सूखे और गर्मी के कारण फसल की पैदावार में भारी गिरावट, जिससे खाद्य आपूर्ति और किसानों की आय प्रभावित होगी। |
| जल उपलब्धता | वर्षा की कमी और वाष्पीकरण में वृद्धि से जल संसाधनों पर दबाव बढ़ेगा, जिससे पीने और सिंचाई के लिए पानी की कमी होगी। |
| समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र | समुद्र के गर्म होने से प्रवाल विरंजन और समुद्री जीवन की मृत्यु दर में वृद्धि, जिससे मछली पकड़ने वाले समुदायों की आजीविका प्रभावित होगी। |
| जंगल की आग | सूखी परिस्थितियों के कारण जंगल की आग का खतरा बढ़ जाएगा, जिससे वनस्पति, वन्यजीव और वायु गुणवत्ता को नुकसान होगा। |
| मानव स्वास्थ्य | गर्मी से संबंधित बीमारियों और जल-जनित रोगों के प्रसार में वृद्धि की संभावना, विशेषकर कमजोर आबादी के बीच। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
- राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन अनुकूलन निधि (National Adaptation Fund for Climate Change)
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana)
आगे की राह
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन करने और उनसे निपटने के लिए अनुसंधान और निगरानी प्रयासों को मजबूत करना।
- किसानों को सूखे प्रतिरोधी फसल किस्मों और कुशल सिंचाई तकनीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना।
- समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा के लिए तत्काल उपाय करना, जैसे कि प्रवाल भित्तियों का संरक्षण और समुद्री संरक्षित क्षेत्रों का विस्तार।
- जंगल की आग की रोकथाम और प्रबंधन के लिए प्रभावी रणनीतियाँ विकसित करना, जिसमें प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और सामुदायिक भागीदारी शामिल है।
- जल संरक्षण और जल संचयन (water harvesting) को बढ़ावा देना, और जल उपयोग दक्षता में सुधार करना।
- चरम मौसम की घटनाओं के लिए आपदा तैयारी और प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करना, जिसमें प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और निकासी योजनाएँ शामिल हैं।
- जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और शमन के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और ज्ञान साझाकरण को बढ़ावा देना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अल नीनो · जलवायु परिवर्तन · वैश्विक तापन · भारतीय मानसून · कृषि पर प्रभाव · पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव · आपदा प्रबंधन · सतत विकास · समुद्री पारिस्थितिकी · वन्यजीव संरक्षण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और सुधार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार’}
अवधारणा प्रवाह
उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतह के पानी का असामान्य रूप से गर्म होना (अल नीनो)। → समुद्र की सतह के तापमान में अत्यधिक वृद्धि (‘सुपर’ अल नीनो)। → वैश्विक मौसम पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव, विशेषकर भारत में। → सूखा, अत्यधिक गर्मी, जंगल की आग और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों को नुकसान। → कृषि, जल संसाधनों, जैव विविधता और मानव स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव। → खाद्य सुरक्षा, आजीविका और सतत विकास के लिए चुनौतियाँ।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. अल नीनो घटना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अल नीनो प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में सतही जल के असामान्य शीतलन से संबंधित है।
2. यह घटना भारत में सूखे और अत्यधिक गर्मी की स्थिति पैदा कर सकती है।
3. विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) अल नीनो की निगरानी और भविष्यवाणी करने वाली एक प्रमुख संस्था है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि अल नीनो सतही जल के असामान्य ‘उष्णन’ (warming) से संबंधित है, शीतलन से नहीं। कथन 2 सही है, अल नीनो भारत में सूखे और अत्यधिक गर्मी का कारण बन सकता है। कथन 3 भी सही है, WMO अल नीनो सहित वैश्विक मौसम और जलवायु घटनाओं की निगरानी करता है।
Q2. अभिकथन (A): अल नीनो घटना का भारतीय कृषि पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
कारण (R): अल नीनो के कारण भारत में सूखे और अत्यधिक गर्मी की स्थिति उत्पन्न होने की उच्च संभावना होती है, जिससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि अल नीनो भारतीय कृषि को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि अल नीनो से जुड़े सूखे और अत्यधिक गर्मी की स्थिति सीधे कृषि उत्पादन को प्रभावित करती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अल नीनो घटना क्या है और यह भारतीय जलवायु तथा पारिस्थितिकी तंत्र को किस प्रकार प्रभावित करती है? भारत को आगामी ‘सुपर’ अल नीनो घटना के प्रभावों से निपटने के लिए क्या कदम उठाने चाहिए? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अल नीनो की परिभाषा – प्रशांत महासागर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में सतही जल का असामान्य उष्णन। इसकी आवधिक प्रकृति और वैश्विक जलवायु पर प्रभाव का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **भारतीय जलवायु पर प्रभाव:**
* कमजोर मानसून या सूखे की स्थिति।
* अत्यधिक गर्मी की लहरें।
* कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव (फसलें, पशुधन)।
* जल संसाधनों पर दबाव।
3. **पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव:**
* प्रवाल विरंजन (coral bleaching) और मृत्यु।
* जंगल की आग में वृद्धि।
* वर्षावन के पेड़ों की मृत्यु।
* जानवरों के व्यवहार और फल उत्पादन में बदलाव।
* समुद्री जीवन पर प्रभाव (मछली पकड़ने वाले समुदायों के लिए चुनौतियां)।
4. **आगामी ‘सुपर’ अल नीनो से निपटने के लिए कदम:**
* **अनुसंधान और निगरानी:** चरम जलवायु घटनाओं के प्रभावों को समझने के लिए अनुसंधान और निगरानी प्रयासों को मजबूत करना।
* **प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली:** मौसम पूर्वानुमान और जलवायु मॉडल को बेहतर बनाना।
* **कृषि क्षेत्र में अनुकूलन:** सूखा प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना, सिंचाई के कुशल तरीकों का उपयोग, फसल विविधीकरण।
* **जल प्रबंधन:** जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, जल निकायों का पुनरुद्धार।
* **पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण:** वनों की कटाई रोकना, प्रवाल भित्तियों का संरक्षण, जैव विविधता हॉटस्पॉट की सुरक्षा।
* **आपदा प्रबंधन:** सूखा राहत योजनाएं, आपातकालीन खाद्य आपूर्ति, प्रभावित समुदायों के लिए सहायता।
* **जागरूकता और क्षमता निर्माण:** किसानों, मछुआरों और चरवाहों जैसे संवेदनशील समुदायों को शिक्षित करना और उनकी क्षमता बढ़ाना।
* **अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:** वैश्विक जलवायु परिवर्तन से निपटने और अल नीनो की भविष्यवाणी में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग।
5. **निष्कर्ष:** अल नीनो के दीर्घकालिक प्रभावों को कम करने के लिए समग्र और बहु-आयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल, जिसमें अनुकूलन और शमन दोनों शामिल हों।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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