11 Aug सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 19 राज्यों से पूछा- कब लागू होगी कैंसर रोगियों की अनिवार्य रिपोर्टिंग?
✎ सर्वोच्च न्यायालय ने कैंसर को 'नोटिफिएबल बीमारी' घोषित करने की दिशा में 19 राज्यों से उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन और डेटा-आधारित नीति निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय, केंद्र-राज्य संबंध | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (स्वास्थ्य क्षेत्र में नवाचार)
- Prelims: कैंसर, नोटिफिएबल बीमारी, जनहित याचिका (PIL), स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय, राष्ट्रीय कैंसर रजिस्ट्री कार्यक्रम, सर्वोच्च न्यायालय का क्षेत्राधिकार
- Essay: सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियाँ और शासन की भूमिका, भारत में स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच और समानता
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय ने कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने की दिशा में 19 राज्यों से उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन और डेटा-आधारित नीति निर्माण के लिए महत्वपूर्ण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ (Notifiable Disease) घोषित करने पर उचित निर्णय लेने को कहा है। न्यायालय ने यह निर्देश एक जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें कैंसर की अनिवार्य रिपोर्टिंग, शुरुआती पहचान और राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री की मांग की गई है ताकि मरीजों को बेहतर उपचार और देखभाल सुनिश्चित की जा सके।
पृष्ठभूमि
- कैंसर एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है, जिसके मामलों में भारत में लगातार वृद्धि हो रही है।
- ‘नोटिफिएबल बीमारी’ वह होती है जिसके मामलों की जानकारी संबंधित सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों को देना अनिवार्य होता है, ताकि बीमारी के प्रसार को ट्रैक किया जा सके और प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रियाएँ तैयार की जा सकें।
- संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट की सिफारिशों के आधार पर, देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 17 ने पहले ही कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित कर दिया है।
- डॉ. अनुराग श्रीवास्तव द्वारा दायर जनहित याचिका में पूरे भारत में कैंसर का जल्द पता लगाने और उचित उपचार सुनिश्चित करने के लिए इसे ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने का निर्देश देने की मांग की गई थी।
- याचिका में मौजूदा कैंसर रजिस्ट्री की सीमित कवरेज और अवैज्ञानिक वैकल्पिक उपचारों के दावों को लेकर भी चिंता जताई गई है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से भी पूछा है कि वह सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कुछ अनिवार्य दिशानिर्देश क्यों जारी नहीं कर रही है, ताकि इस मामले में एक समान नीति हो सके।
- केंद्र सरकार ने अदालत को बताया है कि स्वास्थ्य ‘राज्य सूची’ का विषय है, जिसका अर्थ है कि राज्यों को इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है।
नोटिफिएबल बीमारी और इसका महत्व
- एक ‘नोटिफिएबल बीमारी’ वह होती है जिसके मामलों की जानकारी संबंधित सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों को देना कानूनन या नियामक रूप से अनिवार्य होता है।
- इसका मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को विशिष्ट बीमारियों के प्रसार की निगरानी करने, प्रकोपों की पहचान करने और प्रभावी नियंत्रण उपायों को लागू करने में सक्षम बनाना है।
- अनिवार्य रिपोर्टिंग से बीमारी के बोझ (Disease Burden) का सटीक आकलन करने में मदद मिलती है, जिससे स्वास्थ्य नीतियों और संसाधनों का बेहतर आवंटन संभव होता है।
- यह डेटा-आधारित निर्णय लेने में सहायक होता है, जैसे कि स्क्रीनिंग कार्यक्रमों की योजना बनाना, टीकाकरण अभियान चलाना या विशिष्ट क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना।
- कैंसर जैसी गैर-संक्रामक बीमारियों के लिए भी नोटिफिएबल स्थिति महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह शुरुआती पहचान, उपचार तक पहुंच और रोगी के परिणामों में सुधार कर सकती है।
- भारत में, विभिन्न राज्यों ने अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के आधार पर अलग-अलग बीमारियों को नोटिफिएबल घोषित किया है।
- सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप केंद्र और राज्यों के बीच एक समान नीति और समन्वय की आवश्यकता पर बल देता है, विशेषकर जब सार्वजनिक स्वास्थ्य का मुद्दा राष्ट्रीय महत्व का हो।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करना | यह सुनिश्चित करता है कि कैंसर के मामलों की जानकारी सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों को अनिवार्य रूप से दी जाए, जिससे डेटा संग्रह और निगरानी में सुधार होता है। |
| अनिवार्य रिपोर्टिंग | कैंसर के मामलों की वास्तविक समय पर जानकारी उपलब्ध कराता है, जिससे बीमारी के प्रसार को समझने और प्रभावी नीतियों के निर्माण में मदद मिलती है। |
| जल्दी पहचान (Early Detection) | बीमारी का शुरुआती चरणों में पता लगाने से उपचार की सफलता दर बढ़ती है और मरीजों के लिए बेहतर परिणाम सुनिश्चित होते हैं। |
| राष्ट्रीय स्तर की रियल-टाइम डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री | पूरे देश में कैंसर के मामलों का एक केंद्रीकृत, अद्यतन डेटाबेस तैयार करता है, जो अनुसंधान, नीति निर्माण और संसाधन आवंटन के लिए महत्वपूर्ण है। |
| देशभर में स्क्रीनिंग व्यवस्था | नियमित जांच कार्यक्रमों के माध्यम से जोखिम वाले व्यक्तियों में कैंसर का पता लगाने में मदद करता है, जिससे बीमारी की रोकथाम और प्रबंधन में सुधार होता है। |
महत्व
सार्वजनिक स्वास्थ्य
- कैंसर को एक ‘नोटिफिएबल बीमारी’ (Notifiable Disease) घोषित करने से सरकार को कैंसर के मामलों की वास्तविक समय पर जानकारी मिलती है, जिससे बीमारी के प्रसार और पैटर्न को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
- यह कदम कैंसर की जल्दी पहचान और प्रभावी उपचार सुनिश्चित करने में मदद करेगा, जिससे मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार होगा और मृत्यु दर कम होगी।
- एक राष्ट्रीय डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री के माध्यम से एकत्रित डेटा सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों, अनुसंधान और संसाधन आवंटन के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेगा।
शासन और नीति निर्माण
- सुप्रीम कोर्ट का निर्देश केंद्र और राज्य सरकारों के बीच एक समान नीति (Uniform Policy) बनाने की आवश्यकता पर बल देता है, विशेषकर जब स्वास्थ्य ‘राज्य का विषय’ (State Subject) हो।
- अनिवार्य रिपोर्टिंग से प्राप्त सटीक डेटा साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण (Evidence-Based Policy Making) को बढ़ावा देगा, जिससे कैंसर नियंत्रण कार्यक्रमों को अधिक प्रभावी ढंग से डिजाइन किया जा सकेगा।
- यह न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) का एक उदाहरण है जहाँ न्यायपालिका सार्वजनिक स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकारों को जवाबदेह ठहरा रही है।
सामाजिक प्रभाव
- कैंसर की जल्दी पहचान और बेहतर उपचार तक पहुंच से समाज पर बीमारी का बोझ कम होगा, जिससे उत्पादकता बढ़ेगी और स्वास्थ्य देखभाल लागत में कमी आएगी।
- अवैज्ञानिक वैकल्पिक उपचारों (Unscientific Alternative Treatments) के दावों पर चिंता व्यक्त करने से जनता में जागरूकता बढ़ेगी और उन्हें विश्वसनीय चिकित्सा सलाह लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
- यह पहल स्वास्थ्य समानता (Health Equity) को बढ़ावा देगी, यह सुनिश्चित करते हुए कि देश के सभी हिस्सों में कैंसर के मरीजों को उचित देखभाल और उपचार मिल सके।
चुनौतियाँ
1. डेटा संग्रह और रिपोर्टिंग में एकरूपता का अभाव
- 19 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा कैंसर को अभी तक ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित न करना राष्ट्रीय स्तर पर डेटा संग्रह में असमानता पैदा करता है।
- विभिन्न राज्यों में रिपोर्टिंग तंत्र और डेटा गुणवत्ता में भिन्नता एक एकीकृत राष्ट्रीय रजिस्ट्री के निर्माण में बाधा उत्पन्न करती है।
यूपीएससी लिंक: शासन, स्वास्थ्य और मानव संसाधन
2. स्वास्थ्य ‘राज्य का विषय’ होने की चुनौती
- संविधान के तहत स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है, जिससे केंद्र सरकार के लिए सभी राज्यों पर एक समान नीति लागू करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
- राज्यों के बीच राजनीतिक इच्छाशक्ति और संसाधन आवंटन में भिन्नता अनिवार्य रिपोर्टिंग को लागू करने में देरी का कारण बन सकती है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
3. बुनियादी ढाँचा और मानव संसाधन की कमी
- विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में कैंसर की स्क्रीनिंग, निदान और उपचार के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे और प्रशिक्षित कर्मियों का अभाव है।
- डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री के लिए आवश्यक तकनीकी बुनियादी ढाँचे और डेटा प्रबंधन कौशल की कमी एक बड़ी बाधा है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं का विकास और प्रबंधन
4. जागरूकता और सामाजिक कलंक
- जनता में कैंसर के लक्षणों, जल्दी पहचान और उपचार के विकल्पों के बारे में जागरूकता की कमी है, जिससे अक्सर देरी से निदान होता है।
- कैंसर से जुड़ा सामाजिक कलंक (Social Stigma) मरीजों को अपनी स्थिति की रिपोर्ट करने या उपचार लेने से हतोत्साहित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक सशक्तिकरण, स्वास्थ्य
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अधिसूचित बीमारी की स्थिति का अभाव | 19 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित न करने से राष्ट्रीय स्तर पर कैंसर के मामलों का सटीक और व्यापक डेटा उपलब्ध नहीं है। |
| सीमित कवरेज वाली मौजूदा कैंसर रजिस्ट्री | वर्तमान कैंसर रजिस्ट्री की कवरेज सीमित है, जिससे बीमारी के वास्तविक प्रसार और पैटर्न की पूरी तस्वीर नहीं मिल पाती है। |
| अवैज्ञानिक वैकल्पिक उपचारों के दावे | अवैज्ञानिक और अप्रमाणित वैकल्पिक उपचारों के दावों से मरीजों को गुमराह किया जा सकता है, जिससे उनके स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है और प्रभावी उपचार में देरी हो सकती है। |
| एक समान नीति का अभाव | केंद्र सरकार द्वारा सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कैंसर की रिपोर्टिंग और प्रबंधन हेतु कोई अनिवार्य दिशानिर्देश या एक समान नीति जारी न करना। |
| राज्यों की अनिच्छा | कुछ राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों के बावजूद कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने में उचित निर्णय न लेना। |
आगे की राह
- केंद्र सरकार को सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करने और अनिवार्य रिपोर्टिंग के लिए एक समान राष्ट्रीय नीति और दिशानिर्देश तैयार करने चाहिए।
- राज्यों को स्वास्थ्य सेवा वितरण और डेटा संग्रह के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे और मानव संसाधन में निवेश करना चाहिए, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
- एक केंद्रीकृत, रियल-टाइम डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री विकसित की जानी चाहिए जो सभी राज्यों से डेटा को एकीकृत कर सके, जिससे निगरानी और अनुसंधान में सुधार हो।
- कैंसर की जल्दी पहचान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्क्रीनिंग कार्यक्रम शुरू किए जाने चाहिए, जिसमें जोखिम वाले समूहों पर विशेष ध्यान दिया जाए।
- जनता में कैंसर के लक्षणों, जल्दी पहचान के महत्व और विश्वसनीय उपचार विकल्पों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाने चाहिए।
- अवैज्ञानिक और अप्रमाणित वैकल्पिक उपचारों के दावों पर सख्त नियामक कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि मरीजों को गुमराह होने से बचाया जा सके।
- केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को मजबूत किया जाना चाहिए ताकि स्वास्थ्य ‘राज्य का विषय’ होने के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर कैंसर नियंत्रण के प्रयासों में एकरूपता लाई जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
कैंसर रिपोर्टिंग · अधिसूचित रोग · सार्वजनिक स्वास्थ्य · संघवाद · राज्य सूची · सुप्रीम कोर्ट · जनहित याचिका · राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति · स्वास्थ्य डेटा · प्रारंभिक पहचान
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 47’, ‘note’: ‘पोषण स्तर और जीवन स्तर में सुधार’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय’}
अवधारणा प्रवाह
सुप्रीम कोर्ट का निर्देश → कैंसर को ‘नोटिफिएबल बीमारी’ घोषित करना → अनिवार्य रिपोर्टिंग और डेटा संग्रह → राष्ट्रीय डिजिटल कैंसर रजिस्ट्री → जल्दी पहचान और बेहतर उपचार → सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. ‘अधिसूचित रोग’ (Notifiable Disease) ऐसे रोग होते हैं जिनके मामलों की जानकारी संबंधित सरकारी स्वास्थ्य अधिकारियों को देना अनिवार्य होता है।
2. भारत में स्वास्थ्य ‘राज्य सूची’ का विषय है।
3. कैंसर को अधिसूचित रोग घोषित करने के लिए केंद्र सरकार सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अनिवार्य दिशानिर्देश जारी कर सकती है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। ‘अधिसूचित रोग’ की परिभाषा सही है और भारत के संविधान के तहत स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय है। कथन 3 गलत है क्योंकि स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय होने के कारण केंद्र सरकार सीधे अनिवार्य दिशानिर्देश जारी नहीं कर सकती, बल्कि राज्यों को सिफारिशें या परामर्श दे सकती है।
Q2. भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनहित याचिका (PIL) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जनहित याचिका केवल पीड़ित व्यक्ति द्वारा ही दायर की जा सकती है।
2. जनहित याचिका का उद्देश्य सार्वजनिक महत्व के मामलों में न्याय सुनिश्चित करना है।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: केवल 2 — कथन 1 गलत है। जनहित याचिका किसी भी ऐसे व्यक्ति या संगठन द्वारा दायर की जा सकती है जो सार्वजनिक हित के मामले में न्याय चाहता हो, भले ही वह सीधे तौर पर पीड़ित न हो। कथन 2 सही है क्योंकि जनहित याचिका का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक महत्व के मामलों में न्याय सुनिश्चित करना है, खासकर जब कमजोर वर्गों के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में कैंसर जैसे रोगों की अनिवार्य रिपोर्टिंग और प्रारंभिक पहचान सुनिश्चित करने में राज्यों की भूमिका का परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, ‘स्वास्थ्य’ के ‘राज्य सूची’ का विषय होने के बावजूद केंद्र सरकार किस प्रकार एक समान नीति को बढ़ावा दे सकती है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: कैंसर की बढ़ती चुनौती और अनिवार्य रिपोर्टिंग के महत्व का संक्षिप्त उल्लेख।
2. राज्यों की भूमिका: कैंसर की अनिवार्य रिपोर्टिंग, प्रारंभिक पहचान, स्क्रीनिंग कार्यक्रम, उपचार और देखभाल उपलब्ध कराने में राज्यों की प्राथमिक जिम्मेदारी का विस्तार से वर्णन। इसमें राज्य-विशिष्ट स्वास्थ्य नीतियों और उनके कार्यान्वयन का उल्लेख।
3. ‘स्वास्थ्य’ का राज्य सूची का विषय होना: संविधान के तहत स्वास्थ्य के राज्य सूची में होने का अर्थ और इसके निहितार्थ। राज्यों की स्वायत्तता और केंद्र के सीमित हस्तक्षेप का उल्लेख।
4. केंद्र सरकार की भूमिका: स्वास्थ्य राज्य सूची का विषय होने के बावजूद केंद्र सरकार द्वारा एक समान नीति को बढ़ावा देने के तरीके:
क. दिशानिर्देश और परामर्श: राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (National Health Mission) जैसे कार्यक्रमों के तहत दिशानिर्देश जारी करना।
ख. वित्तीय सहायता: केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से राज्यों को वित्तीय सहायता प्रदान करना।
ग. तकनीकी सहायता: डेटा संग्रह, रजिस्ट्री और निगरानी प्रणालियों के लिए तकनीकी विशेषज्ञता प्रदान करना।
घ. सर्वोत्तम प्रथाओं का साझाकरण: सफल राज्य मॉडलों को अन्य राज्यों के साथ साझा करना।
ङ. विधायी पहल (समवर्ती सूची के विषयों पर): यदि आवश्यक हो, समवर्ती सूची के तहत कानून बनाने की संभावना पर विचार।
च. अंतर-राज्यीय समन्वय: अंतर-राज्यीय परिषदों (Inter-State Councils) या अन्य मंचों के माध्यम से समन्वय स्थापित करना।
5. सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: वर्तमान मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लेख और यह कैसे केंद्र व राज्यों को एक समान नीति की दिशा में प्रेरित कर रहा है।
6. निष्कर्ष: सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने और केंद्र-राज्य सहयोग के माध्यम से एक मजबूत राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण रणनीति की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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