18 Sep हैदराबाद में दक्षिण क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन: टिकाऊ खेती पर केंद्रित चर्चा
✎ दक्षिण क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य टिकाऊ और लचीली कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना, डिजिटल कृषि को अपनाना और केंद्र-राज्य समन्वय के माध्यम से कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — कृषि और संबद्ध क्षेत्र; खाद्य प्रसंस्करण और संबंधित उद्योग; विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप तथा उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।
- Prelims: दक्षिण क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन, डिजिटल कृषि, प्राकृतिक खेती, एकीकृत कृषि प्रणालियाँ, उच्च-मूल्य वाली बागवानी, खाद्य तेलों और दालों में आत्मनिर्भरता, जलवायु-अनुकूल कृषि, केंद्र-राज्य समन्वय
- Essay: भारत में कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण और किसानों की आय दोगुनी करना, जलवायु परिवर्तन के दौर में खाद्य सुरक्षा और कृषि स्थिरता
त्वरित पुनरावृत्ति: दक्षिण क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य टिकाऊ और लचीली कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना, डिजिटल कृषि को अपनाना और केंद्र-राज्य समन्वय के माध्यम से कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय (Ministry of Agriculture & Farmers’ Welfare) ने टिकाऊ (Sustainable) और लचीली (Resilient) खेती पर विचार-विमर्श के लिए हैदराबाद में दक्षिण क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन में केंद्र सरकार, दक्षिण भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कृषि मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी, कृषि विशेषज्ञ, ICAR (भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद) संस्थानों के प्रतिनिधि और प्रगतिशील किसान शामिल हुए। इसका उद्देश्य कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, उच्च-मूल्य वाली बागवानी, डिजिटल और जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना तथा भंडारण, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और विपणन के लिए मजबूत बुनियादी ढाँचा विकसित करना है।
पृष्ठभूमि
- भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान है, जो देश की एक बड़ी आबादी को आजीविका प्रदान करता है।
- जलवायु परिवर्तन, मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट, जल संसाधनों पर दबाव और कीटों के बढ़ते प्रकोप जैसी चुनौतियाँ भारतीय कृषि के सामने हैं।
- किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को अधिक लाभदायक बनाने के लिए आधुनिक तकनीकों और टिकाऊ प्रथाओं को अपनाना आवश्यक है।
- खाद्य तेलों और दालों के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू उत्पादन में वृद्धि एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है।
- केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय कृषि नीतियों के प्रभावी कार्यान्वयन और सर्वोत्तम प्रथाओं को अपनाने के लिए महत्वपूर्ण है।
- डिजिटल कृषि समाधान, जैसे किसान रजिस्ट्री और सटीक कृषि (Precision Farming), कृषि उत्पादकता और दक्षता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।
टिकाऊ और लचीली कृषि
- टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) ऐसी कृषि पद्धतियों का समूह है जो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए और सामाजिक-आर्थिक रूप से न्यायसंगत तरीके से वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करती है।
- लचीली कृषि (Resilient Agriculture) से तात्पर्य ऐसी कृषि प्रणालियों से है जो जलवायु परिवर्तन, सूखे, बाढ़, कीटों के प्रकोप या बाजार के उतार-चढ़ाव जैसे बाहरी झटकों का सामना करने और उनसे उबरने में सक्षम होती हैं।
- प्राकृतिक खेती (Natural Farming) टिकाऊ कृषि का एक महत्वपूर्ण घटक है, जिसमें रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग कम या बिल्कुल नहीं किया जाता है, और प्राकृतिक प्रक्रियाओं पर जोर दिया जाता है।
- एकीकृत कृषि प्रणालियाँ (Integrated Farming Systems) फसल उत्पादन, पशुधन पालन, मत्स्य पालन और वानिकी जैसे विभिन्न कृषि घटकों को एक साथ जोड़ती हैं, जिससे संसाधनों का अधिकतम उपयोग होता है और किसानों की आय में विविधता आती है।
- डिजिटल कृषि (Digital Agriculture) में कृषि डेटा, सेंसर, IoT (इंटरनेट ऑफ थिंग्स) और AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) जैसी तकनीकों का उपयोग करके कृषि प्रक्रियाओं को अनुकूलित किया जाता है, जिससे निर्णय लेने में सुधार होता है और दक्षता बढ़ती है।
- उच्च-मूल्य वाली बागवानी (High-Value Horticulture) में फल, सब्जियाँ, फूल और औषधीय पौधों जैसी फसलों की खेती शामिल है, जो किसानों को बेहतर आय प्रदान करती हैं और निर्यात क्षमता रखती हैं।
- संतुलित उर्वरक प्रबंधन (Balanced Fertilizer Management) मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने और फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए सही मात्रा में और सही समय पर उर्वरकों का उपयोग करना है, जिससे पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव कम होता है।
- नकली कीटनाशकों और उर्वरकों की जाँच (Checking Fake Pesticides and Fertilizers) किसानों को गुणवत्तापूर्ण इनपुट सुनिश्चित करने और फसल के नुकसान को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा बनी रहती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन – दक्षिण क्षेत्र | केंद्र और दक्षिणी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के बीच कृषि क्षेत्र में समन्वय और सहयोग को मजबूत करना। |
| प्रमुख प्राथमिकताएँ | डिजिटल कृषि, उच्च-मूल्य वाली बागवानी, खाद्य तेलों और दालों में आत्मनिर्भरता, प्राकृतिक खेती, एकीकृत कृषि प्रणालियाँ, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और नकली कीटनाशकों/उर्वरकों पर नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श। |
| राज्यों की नवाचार प्रणालियाँ | तेलंगाना का रायथु नेस्थम, आंध्र प्रदेश का मौसम परिवर्तनशीलता से निपटने का दृष्टिकोण, कर्नाटक की बेहतर दलहन उत्पादन पद्धतियाँ, केरल की खरीद और बाजार पहल, तथा तमिलनाडु की प्रिसिजन फार्मिंग और हाई-टेक कृषि जैसी सफल पहलों का प्रदर्शन और साझाकरण। |
| हितधारकों की भागीदारी | केंद्र, राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों, कृषि विशेषज्ञों, ICAR संस्थानों, प्रगतिशील किसानों और अन्य हितधारकों को एक मंच पर लाना, जिससे समावेशी नीति निर्माण और कार्यान्वयन संभव हो। |
| लक्ष्य | कृषि में आत्मनिर्भरता, उच्च-मूल्य वाली बागवानी, डिजिटल और जलवायु-अनुकूल कृषि, तथा भंडारण, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और विपणन के लिए मजबूत बुनियादी ढांचे हेतु लक्षित रणनीतियाँ विकसित करना। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- खाद्य तेलों और दालों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के प्रयासों से आयात पर निर्भरता कम होगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों की आय में वृद्धि होगी।
- उच्च-मूल्य वाली बागवानी और मूल्यवर्धन पर ध्यान केंद्रित करने से किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिलेगा, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
- भंडारण, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन और विपणन के लिए मजबूत बुनियादी ढांचे के विकास से फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान (post-harvest losses) में कमी आएगी और कृषि उत्पादों का बेहतर बाजार मूल्य सुनिश्चित होगा।
सामाजिक महत्व
- किसानों की आय में वृद्धि से ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर में सुधार होगा और गरीबी कम होगी।
- प्राकृतिक खेती और संतुलित उर्वरक प्रबंधन जैसे टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने से मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होगा और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होगी, जिससे उपभोक्ताओं को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन उपलब्ध होगा।
शासन और नीतिगत महत्व
- केंद्र-राज्य समन्वय को मजबूत करने से कृषि नीतियों और कार्यक्रमों का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित होगा, जिससे किसानों को योजनाओं का अधिकतम लाभ मिल सकेगा।
- डिजिटल कृषि और किसान रजिस्ट्री जैसी पहलें कृषि क्षेत्र में पारदर्शिता और दक्षता लाएंगी, जिससे किसानों तक सरकारी सेवाओं की पहुँच बेहतर होगी।
- नकली कीटनाशकों और उर्वरकों की जाँच के उपाय किसानों को धोखाधड़ी से बचाएंगे और कृषि उत्पादकता को बनाए रखने में मदद करेंगे।
पर्यावरण महत्व
- जलवायु-अनुकूल कृषि (climate-resilient agriculture) पद्धतियों को अपनाने से जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभावों को कम करने में मदद मिलेगी और कृषि उत्पादन की स्थिरता सुनिश्चित होगी।
- प्राकृतिक खेती और एकीकृत कृषि प्रणालियाँ (integrated farming systems) जैव विविधता के संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक होंगी।
चुनौतियाँ
1. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
- बदलते मौसम पैटर्न, अनियमित वर्षा और चरम मौसमी घटनाएँ (extreme weather events) कृषि उत्पादन को सीधे प्रभावित करती हैं।
- सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएँ किसानों की आजीविका को गंभीर रूप से खतरे में डालती हैं और खाद्य सुरक्षा के लिए चुनौती पैदा करती हैं।
यूपीएससी लिंक: कृषि, जलवायु परिवर्तन
2. कृषि में प्रौद्योगिकी का अभाव
- छोटे और सीमांत किसानों तक आधुनिक कृषि तकनीकों, डिजिटल उपकरणों और उन्नत बीजों की पहुँच सीमित है।
- कृषि में नवाचार और अनुसंधान को जमीनी स्तर तक पहुँचाने में चुनौतियाँ मौजूद हैं।
यूपीएससी लिंक: कृषि प्रौद्योगिकी, ई-गवर्नेंस
3. बाजार और मूल्यवर्धन की कमी
- किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य न मिलना और बिचौलियों की भूमिका के कारण लाभ का एक बड़ा हिस्सा उनके पास न पहुँचना।
- प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचे का अभाव, जिससे फसल कटाई के बाद नुकसान होता है।
यूपीएससी लिंक: कृषि विपणन, मूल्य श्रृंखला
4. नकली कृषि आदानों की समस्या
- नकली कीटनाशकों, उर्वरकों और बीजों की उपलब्धता से फसल की गुणवत्ता और मात्रा प्रभावित होती है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान होता है।
- इन नकली उत्पादों का उपयोग मिट्टी और पर्यावरण के लिए भी हानिकारक होता है।
यूपीएससी लिंक: कृषि आदान, किसान कल्याण
5. जल संसाधनों का कुप्रबंधन
- सिंचाई के लिए पानी की कमी और जल संसाधनों के अत्यधिक दोहन से भूजल स्तर में गिरावट आ रही है।
- जल-कुशल सिंचाई पद्धतियों (water-efficient irrigation methods) को अपनाने में धीमी प्रगति एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: जल संसाधन, सिंचाई
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जलवायु परिवर्तन | अनियमित वर्षा, सूखे और बाढ़ से फसल उत्पादन में अस्थिरता। |
| तकनीकी पहुँच | छोटे किसानों तक आधुनिक कृषि तकनीकों और डिजिटल उपकरणों की सीमित पहुँच। |
| बाजार संपर्क | प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन बुनियादी ढांचे की कमी से किसानों को उचित मूल्य न मिलना। |
| कृषि आदानों की गुणवत्ता | नकली कीटनाशकों और उर्वरकों से फसल की गुणवत्ता और किसानों की आय पर नकारात्मक प्रभाव। |
| जल प्रबंधन | सिंचाई के लिए जल की कमी और भूजल स्तर में गिरावट। |
| किसानों की आय | कृषि में बढ़ती लागत और फसल के कम दाम के कारण किसानों की आय में स्थिरता का अभाव। |
आगे की राह
- डिजिटल कृषि को बढ़ावा देने के लिए किसान रजिस्ट्री का त्वरित और व्यापक कार्यान्वयन सुनिश्चित करना, जिससे किसानों को लक्षित सहायता मिल सके।
- उच्च-मूल्य वाली बागवानी और मूल्यवर्धन को प्रोत्साहन देने हेतु प्रसंस्करण इकाइयों और कोल्ड स्टोरेज (cold storage) सुविधाओं के विकास में निवेश बढ़ाना।
- खाद्य तेलों और दालों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना, साथ ही किसानों को उन्नत बीज और बेहतर कृषि पद्धतियाँ उपलब्ध कराना।
- प्राकृतिक खेती और एकीकृत कृषि प्रणालियों को अपनाने के लिए किसानों को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और बाजार संपर्क प्रदान करना।
- नकली कीटनाशकों और उर्वरकों की बिक्री पर प्रभावी नियंत्रण के लिए नियामक तंत्रों को मजबूत करना और गुणवत्ता नियंत्रण उपायों को लागू करना।
- केंद्र और राज्यों के बीच कृषि नीतियों और कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए नियमित संवाद और सहयोग तंत्र को सुदृढ़ करना।
- जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने हेतु आवश्यक जानकारी और संसाधन उपलब्ध कराना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
टिकाऊ कृषि · लचीली खेती · डिजिटल कृषि · प्राकृतिक खेती · एकीकृत कृषि प्रणालियाँ · उच्च-मूल्य बागवानी · खाद्य तेलों और दालों में आत्मनिर्भरता · केंद्र-राज्य समन्वय · जलवायु-अनुकूल कृषि · मूल्यवर्धन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘केंद्र-राज्य विधायी शक्तियों का वितरण’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘कृषि राज्य सूची का विषय’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 282’, ‘note’: ‘केंद्र और राज्यों द्वारा अनुदान’}
अवधारणा प्रवाह
क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का आयोजन → केंद्र-राज्य समन्वय और नीतिगत विचार-विमर्श → डिजिटल कृषि, टिकाऊ खेती पर ध्यान → किसानों की आय में वृद्धि और आत्मनिर्भरता → ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सशक्तिकरण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का आयोजन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा किया जाता है।
2. यह सम्मेलन केवल दक्षिणी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कृषि मंत्रियों और अधिकारियों को एक साथ लाता है।
3. डिजिटल कृषि और किसान रजिस्ट्री इस सम्मेलन के प्रमुख विचार-विमर्श विषयों में से एक है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीनों
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन का आयोजन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा किया जाता है। कथन 2 गलत है क्योंकि इसमें केंद्र, दक्षिणी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ कृषि विशेषज्ञ, ICAR संस्थान और प्रगतिशील किसान भी शामिल होते हैं। कथन 3 सही है क्योंकि डिजिटल कृषि और किसान रजिस्ट्री सम्मेलन के प्रमुख विचार-विमर्श विषयों में से एक है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से ‘टिकाऊ कृषि’ (Sustainable Agriculture) के प्रमुख सिद्धांतों में शामिल है/हैं?
1. रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग।
2. मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण और संवर्धन।
3. जल संसाधनों का कुशल उपयोग।
4. जैव विविधता का रखरखाव।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1, 2 और 3
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1 और 4
- उपरोक्त सभी
उत्तर: केवल 2, 3 और 4 — टिकाऊ कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से बचना शामिल है, इसलिए कथन 1 गलत है। मृदा स्वास्थ्य का संरक्षण, जल संसाधनों का कुशल उपयोग और जैव विविधता का रखरखाव टिकाऊ कृषि के महत्वपूर्ण सिद्धांत हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ टिकाऊ और लचीली कृषि (Sustainable and Resilient Agriculture) भारत की खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय सुनिश्चित करने के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? क्षेत्रीय कृषि सम्मेलनों के माध्यम से केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय इस दिशा में कैसे सहायक हो सकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में टिकाऊ और लचीली कृषि की अवधारणा, इसके महत्व और भारत के संदर्भ में इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालना होगा। इसमें जलवायु परिवर्तन, मृदा क्षरण, जल संकट और किसानों की आर्थिक स्थिरता जैसे पहलुओं को शामिल किया जाएगा। दूसरे भाग में, क्षेत्रीय कृषि सम्मेलनों की भूमिका को केंद्र-राज्य संबंधों, सर्वोत्तम प्रथाओं के आदान-प्रदान, नीतिगत तालमेल और विशिष्ट क्षेत्रीय चुनौतियों के समाधान के संदर्भ में समझाना होगा। इसमें डिजिटल कृषि, प्राकृतिक खेती, मूल्यवर्धन और आत्मनिर्भरता जैसे विषयों का उल्लेख किया जा सकता है।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Telangana PCS (TGPSC (TSPSC)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: हैदराबाद में आयोजित दक्षिण क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन 2023 का मुख्य उद्देश्य क्या था?
- टिकाऊ और लचीली खेती के तरीकों पर विचार-विमर्श करना
- राज्य में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए नई बीज तकनीकों का प्रदर्शन करना
- कृषि क्षेत्र में विदेशी निवेश आकर्षित करना
- राज्य की प्रमुख फसलों के निर्यात को बढ़ावा देना
उत्तर: टिकाऊ और लचीली खेती के तरीकों पर विचार-विमर्श करना — इस सम्मेलन का मुख्य फोकस टिकाऊ और लचीली खेती के तरीकों पर विचार-विमर्श करना था, ताकि जलवायु परिवर्तन और संसाधनों की कमी जैसी चुनौतियों का सामना किया जा सके।
Mains: टिकाऊ और लचीली खेती के संदर्भ में, हैदराबाद में आयोजित दक्षिण क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन 2023 के प्रमुख प्रस्तावों और उनके संभावित प्रभावों का वर्णन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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