आईसीएआर-आईआईओआर बैठक: तिलहन तकनीकों के व्यावसायीकरण से आत्मनिर्भरता बढ़ेगी

आईसीएआर-आईआईओआर हैदराबाद में तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाने के लिए राष्ट्रीय परामर्श और उद्योग संवा — diagram

आईसीएआर-आईआईओआर बैठक: तिलहन तकनीकों के व्यावसायीकरण से आत्मनिर्भरता बढ़ेगी

तिलहन तकनीक व्यावसायीकरणनवाचारउन्नत किस्मेंविकासजैव-पॉलिमर बीजप्रदर्शनतकनीक प्रदर्शनहस्तांतरणPPP/लाइसेंसअंगीकरणकिसानों तक पहुंचउत्पादनआत्मनिर्भरता
तिलहन तकनीक व्यावसायीकरण

✎ तिलहन प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण भारत को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाने और सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था, कृषि, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी  |  GS Paper II — सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप
  • Prelims: तिलहन उत्पादन, खाद्य तेल, आत्मनिर्भरता, आईसीएआर-आईआईओआर, जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज लेपन, जैव-कीटनाशी, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), कृषि-व्यवसाय
  • Essay: भारत में कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण और किसानों की आय दोगुनी करना, खाद्य सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए प्रौद्योगिकी की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: तिलहन प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण भारत को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाने और सतत कृषि को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIOR), हैदराबाद, 10 सितंबर, 2026 को ‘सतत कृषि के लिए किस्मों/संकरों, जैविक उत्पादों और जैव-पॉलिमर-सक्षम बहु-परतीय बीज लेपन प्रौद्योगिकियों में नवाचार: प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण और विस्तार के लिए उद्योग साझेदारी’ विषय पर एक राष्ट्रीय परामर्श और उद्योग संवाद बैठक का आयोजन करेगा। इस बैठक का उद्देश्य तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाना और भारत को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाना है।

पृष्ठभूमि

  • भारत विश्व की प्रमुख वनस्पति तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन खाद्य तेलों की बढ़ती मांग के कारण घरेलू उत्पादन में वृद्धि की आवश्यकता है।
  • आत्मनिर्भरता (Self-reliance) प्राप्त करने के लिए प्रौद्योगिकी के विकास, व्यावसायीकरण और अपनाने की प्रक्रिया को तेज करना महत्वपूर्ण है।
  • आईसीएआर-आईआईओआर ने उन्नत तिलहन किस्में और संकर, जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियां तथा सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन जैसी कई आशाजनक प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं।
  • यह बैठक बीज उद्योग, जैव-कीटनाशी और जैव-इनपुट कंपनियों, प्रौद्योगिकी लाइसेंसधारकों, कृषि-व्यवसाय कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और उद्यमियों के प्रतिनिधियों को एक साथ लाएगी।
  • संस्थान अपनी प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन करेगा और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, लाइसेंसिंग, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) तथा बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन के अवसरों का पता लगाएगा।
  • यह पहल अनुसंधान-उद्योग संबंधों को मजबूत करेगी और किसानों के लाभ तथा तिलहन क्षेत्र के सतत विकास के लिए नवीन प्रौद्योगिकियों के सत्यापन, व्यावसायीकरण और अंगीकरण को सुगम बनाएगी।

भारत में तिलहन क्षेत्र और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता

  • भारत में तिलहन क्षेत्र कृषि अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक है, जो लाखों किसानों को आजीविका प्रदान करता है।
  • खाद्य तेलों की बढ़ती घरेलू मांग के कारण भारत अपनी आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव पड़ता है।
  • सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने पर विशेष जोर दे रही है।
  • तिलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए उच्च उपज वाली किस्मों, बेहतर कृषि पद्धतियों और कीट व रोग प्रबंधन के लिए नवीन प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता है।
  • जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज लेपन (Bio-polymer-enabled seed coating) जैसी प्रौद्योगिकियां बीजों की अंकुरण क्षमता और प्रारंभिक वृद्धि को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं।
  • सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन (Microbial bio-pesticide formulations) रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके पर्यावरण-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देते हैं।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership – PPP) मॉडल अनुसंधान और विकास (R&D) से प्राप्त प्रौद्योगिकियों को किसानों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology transfer) और लाइसेंसिंग (Licensing) के माध्यम से कृषि-व्यवसाय कंपनियों को नई तकनीकों को बड़े पैमाने पर अपनाने और वितरित करने में सक्षम बनाया जाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राष्ट्रीय परामर्श एवं उद्योग संवाद बैठक तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण और विस्तार के लिए उद्योग साझेदारी को बढ़ावा देना।
आईसीएआर-आईआईओआर द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियां उन्नत तिलहन किस्में, संकर, जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियां और सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन शामिल हैं, जो घरेलू उत्पादन बढ़ाने में सहायक हैं।
विभिन्न हितधारकों की भागीदारी बीज उद्योग, जैव-कीटनाशी और जैव-इनपुट कंपनियों, प्रौद्योगिकी लाइसेंसधारकों, कृषि-व्यवसाय कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और उद्यमियों को एक मंच पर लाना।
प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और लाइसेंसिंग अनुसंधान से प्राप्त नवीन प्रौद्योगिकियों को किसानों तक पहुंचाने और बड़े पैमाने पर अपनाने में मदद करना।
सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) अनुसंधान और उद्योग के बीच सहयोग को मजबूत करना, जिससे तिलहन क्षेत्र का सतत विकास सुनिश्चित हो सके।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • भारत विश्व की प्रमुख वनस्पति तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। घरेलू तिलहन उत्पादन में वृद्धि से खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम होगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
  • किसानों को उन्नत किस्मों और प्रौद्योगिकियों तक पहुंच मिलने से उनकी आय में वृद्धि होगी तथा कृषि क्षेत्र में आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।
  • प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण से नए कृषि-व्यवसायों और स्टार्ट-अप्स को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे रोजगार के अवसर सृजित होंगे।

सामरिक महत्व

  • खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता (Self-reliance) भारत की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए महत्वपूर्ण है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता कम होगी।
  • नवीन प्रौद्योगिकियों का विकास और अंगीकरण भारत को कृषि अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में एक अग्रणी देश के रूप में स्थापित करेगा।

पर्यावरणीय महत्व

  • जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियां और सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके सतत कृषि (Sustainable Agriculture) पद्धतियों को बढ़ावा देंगे।
  • ये प्रौद्योगिकियां मृदा स्वास्थ्य (Soil Health) और जैव विविधता (Biodiversity) के संरक्षण में मदद करेंगी, जिससे पर्यावरणीय संतुलन बना रहेगा।

सामाजिक महत्व

  • किसानों को बेहतर बीज और कृषि इनपुट उपलब्ध होने से उनकी उत्पादकता बढ़ेगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर में सुधार होगा।
  • खाद्य तेलों की उपलब्धता और सामर्थ्य में सुधार से आम जनता को लाभ होगा, विशेषकर निम्न आय वर्ग के परिवारों को।

चुनौतियाँ

1. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में बाधाएँ

  • अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों को प्रयोगशाला से खेत तक ले जाने में अक्सर चुनौतियाँ आती हैं।
  • किसानों के बीच नई प्रौद्योगिकियों के बारे में जागरूकता की कमी और उनके अंगीकरण में हिचकिचाहट एक बड़ी बाधा है।

2. वित्तपोषण और निवेश की कमी

  • तिलहन क्षेत्र में अनुसंधान और विकास के लिए पर्याप्त निजी और सार्वजनिक निवेश की कमी है।
  • प्रौद्योगिकियों के बड़े पैमाने पर व्यावसायीकरण के लिए आवश्यक पूंजी तक पहुंच एक चुनौती है।

3. बाजार संपर्क और मूल्य श्रृंखला

  • किसानों को अपनी उपज के लिए उचित मूल्य प्राप्त करने में कठिनाई होती है, जिससे उन्हें नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन नहीं मिलता।
  • प्रभावी मूल्य श्रृंखला (Value Chain) और बाजार संपर्क की कमी तिलहन उत्पादन को प्रभावित करती है।

4. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

  • बदलते जलवायु पैटर्न, जैसे अनियमित वर्षा और तापमान में वृद्धि, तिलहन फसलों की पैदावार को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।
  • जलवायु-लचीली (Climate-resilient) किस्मों का विकास और उनका व्यापक अंगीकरण एक सतत चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
घरेलू उत्पादन और मांग में अंतर भारत में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग के बावजूद, घरेलू तिलहन उत्पादन अपर्याप्त है, जिससे आयात पर निर्भरता बनी हुई है।
अनुसंधान-उद्योग संबंध कृषि अनुसंधान संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग का अभाव, जिससे नवीन प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण धीमा हो जाता है।
किसानों तक पहुंच उन्नत किस्मों और कृषि पद्धतियों की जानकारी तथा पहुंच का अभाव, जिससे किसानों की उत्पादकता प्रभावित होती है।
गुणवत्तापूर्ण बीज और इनपुट किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज, जैव-कीटनाशक और अन्य कृषि इनपुट की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
नीतिगत समर्थन और प्रोत्साहन तिलहन किसानों को उत्पादन बढ़ाने और नई प्रौद्योगिकियों को अपनाने के लिए पर्याप्त नीतिगत समर्थन और वित्तीय प्रोत्साहन की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • अनुसंधान एवं विकास में निवेश बढ़ाना: तिलहन क्षेत्र में नवीन किस्मों, संकरों और सतत कृषि प्रौद्योगिकियों के विकास के लिए सार्वजनिक और निजी निवेश को प्रोत्साहित करना।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तंत्र को मजबूत करना: कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), विस्तार कार्यकर्ताओं और डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से किसानों तक नई प्रौद्योगिकियों की पहुंच सुनिश्चित करना।
  • सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को बढ़ावा देना: अनुसंधान संस्थानों और कृषि-व्यवसाय कंपनियों के बीच सहयोग को मजबूत करना ताकि प्रौद्योगिकियों का तेजी से व्यावसायीकरण हो सके।
  • किसानों को वित्तीय सहायता और प्रोत्साहन: तिलहन उत्पादन बढ़ाने और उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए किसानों को सब्सिडी, ऋण और अन्य वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करना।
  • बाजार संपर्क और मूल्य श्रृंखला का विकास: तिलहन किसानों को उनकी उपज के लिए उचित मूल्य सुनिश्चित करने हेतु प्रभावी बाजार संपर्क और सुदृढ़ मूल्य श्रृंखला विकसित करना।
  • क्षमता निर्माण और जागरूकता कार्यक्रम: किसानों, उद्यमियों और अन्य हितधारकों के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करना ताकि वे नई प्रौद्योगिकियों का प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकें।
  • जलवायु-लचीली तिलहन किस्मों का विकास: जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का सामना करने में सक्षम तिलहन किस्मों पर अनुसंधान को प्राथमिकता देना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

तिलहन उत्पादन · खाद्य तेल आत्मनिर्भरता · कृषि प्रौद्योगिकी · प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण · सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) · सतत कृषि · अनुसंधान-उद्योग संबंध · किसानों की आय · कृषि-व्यवसाय · बीज संवर्धन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48’, ‘note’: ‘कृषि और पशुपालन का संगठन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}

अवधारणा प्रवाह

घरेलू तिलहन उत्पादन अपर्याप्त  →  खाद्य तेलों की बढ़ती मांग और आयात पर निर्भरता  →  आईसीएआर-आईआईओआर द्वारा नवीन प्रौद्योगिकियों का विकास  →  राष्ट्रीय परामर्श एवं उद्योग संवाद बैठक का आयोजन  →  प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और व्यावसायीकरण को बढ़ावा  →  घरेलू तिलहन उत्पादन में वृद्धि और आत्मनिर्भरता  →  किसानों की आय में वृद्धि और सतत कृषि

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIOR) हैदराबाद में स्थित है।
2. भारत विश्व की प्रमुख वनस्पति तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।
3. ICAR-IIOR ने उन्नत तिलहन किस्में और संकर विकसित किए हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि ICAR-IIOR हैदराबाद में स्थित है। कथन 2 सही है क्योंकि भारत वास्तव में विश्व की प्रमुख वनस्पति तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। कथन 3 भी सही है, जैसा कि प्रेस विज्ञप्ति में उल्लेख किया गया है कि ICAR-IIOR ने उन्नत तिलहन किस्में और संकर विकसित किए हैं।

Q2. अभिकथन (A): भारत को खाद्य तेलों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन में तेजी लाने की आवश्यकता है।
कारण (R): तिलहन प्रौद्योगिकियों के विकास, व्यावसायीकरण और अपनाने से आत्मनिर्भरता मजबूत होती है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि भारत में खाद्य तेलों की मांग बढ़ रही है, जिससे घरेलू उत्पादन बढ़ाना आवश्यक हो गया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि प्रौद्योगिकी के विकास और व्यावसायीकरण से तिलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ती है, जो अभिकथन का एक महत्वपूर्ण कारण है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में तिलहन क्षेत्र की चुनौतियों पर चर्चा कीजिए और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण तथा सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर में निम्नलिखित बिंदु शामिल होने चाहिए:
1. **तिलहन क्षेत्र की चुनौतियाँ:** भारत में तिलहन उत्पादन से संबंधित प्रमुख चुनौतियों का उल्लेख करें, जैसे कम उत्पादकता, वर्षा पर निर्भरता, गुणवत्ता वाले बीजों की कमी, कीट और रोग का प्रकोप, प्रसंस्करण और भंडारण सुविधाओं का अभाव, आयात पर निर्भरता, किसानों के लिए मूल्य अस्थिरता आदि।
2. **प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण की भूमिका:** उन्नत तिलहन किस्मों, संकरों, जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियों और सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन जैसी प्रौद्योगिकियों के विकास और उनके व्यावसायीकरण के महत्व पर प्रकाश डालें। यह कैसे उत्पादन बढ़ाने, लागत कम करने और किसानों की आय में सुधार करने में मदद कर सकता है। ICAR-IIOR जैसी संस्थाओं के प्रयासों का उल्लेख करें।
3. **सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) की भूमिका:** प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, लाइसेंसिंग, बड़े पैमाने पर कार्यान्वयन और अनुसंधान-उद्योग संबंधों को मजबूत करने में PPP मॉडल की प्रभावशीलता का विश्लेषण करें। बीज उद्योग, जैव-कीटनाशी कंपनियों, कृषि-व्यवसाय कंपनियों और स्टार्ट-अप्स की भागीदारी कैसे नवाचार को बढ़ावा दे सकती है और प्रौद्योगिकियों को किसानों तक पहुँचा सकती है।
4. **आत्मनिर्भरता पर प्रभाव:** यह समझाएँ कि कैसे ये उपाय भारत को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाने और आयात पर निर्भरता कम करने में सहायक होंगे।
5. **निष्कर्ष:** सतत कृषि और किसानों के लाभ के लिए इन पहलों के समग्र महत्व को रेखांकित करें।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

Telangana PCS (TGPSC (TSPSC)) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: आईसीएआर-आईआईओआर हैदराबाद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परामर्श और उद्योग संवाद बैठक का मुख्य उद्देश्य क्या है?

  1. तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाना
  2. धान की खेती में नवीन तकनीकों का विकास करना
  3. कृषि ऋण प्रणाली में सुधार करना
  4. कृषि निर्यात को बढ़ावा देना

उत्तर: तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाना — आईसीएआर-आईआईओआर हैदराबाद द्वारा आयोजित बैठक का मुख्य उद्देश्य तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण को गति प्रदान करना है।

Mains: तिलहन उत्पादन में नवीन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण से तेलंगाना राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की चर्चा कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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