31 Aug आईसीएआर-आईआईओआर हैदराबाद में तिलहन प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण पर राष्ट्रीय परामर्श बैठक 10 सितंबर को
✎ ICAR-IIOR द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परामर्श बैठक का उद्देश्य उन्नत तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण को गति देकर भारत को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाना और सतत कृषि को बढ़ावा देना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था और कृषि | GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; स्वदेशीकरण | GS Paper III — पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- Prelims: तिलहन उत्पादन, खाद्य तेल, आत्मनिर्भर भारत, ICAR-IIOR, जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज लेपन, सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी, सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP), कृषि-व्यवसाय
- Essay: भारत में कृषि क्षेत्र का आधुनिकीकरण और किसानों की आय दोगुनी करना, आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: ICAR-IIOR द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परामर्श बैठक का उद्देश्य उन्नत तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण को गति देकर भारत को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर बनाना और सतत कृषि को बढ़ावा देना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIOR) हैदराबाद में 10 सितंबर, 2026 को ‘सतत कृषि के लिए किस्मों/संकरों, जैविक उत्पादों और जैव-पॉलिमर-सक्षम बहु-परतीय बीज लेपन प्रौद्योगिकियों में नवाचार: प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण और विस्तार के लिए उद्योग साझेदारी’ विषय पर एक राष्ट्रीय परामर्श और उद्योग संवाद बैठक का आयोजन करेगा। इस बैठक का उद्देश्य तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाना और खाद्य तेलों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता को मजबूत करना है।
पृष्ठभूमि
- भारत विश्व की प्रमुख वनस्पति तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहाँ खाद्य तेलों की खपत लगातार बढ़ रही है।
- घरेलू तिलहन उत्पादन में वृद्धि खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने के लिए महत्वपूर्ण है।
- ICAR-IIOR ने उन्नत तिलहन किस्मों और संकरों, जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियों तथा सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन जैसी कई आशाजनक प्रौद्योगिकियाँ विकसित की हैं।
- इन प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण (Commercialization) और किसानों तक पहुँच सुनिश्चित करना भारत के तिलहन क्षेत्र के सतत विकास (Sustainable Development) के लिए आवश्यक है।
- यह बैठक अनुसंधान-उद्योग संबंधों को मजबूत करने, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (Technology Transfer), लाइसेंसिंग और सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) के अवसरों का पता लगाने का एक मंच प्रदान करेगी।
तिलहन उत्पादन और भारत की आत्मनिर्भरता
- तिलहन (Oilseeds) वे फसलें हैं जिनसे वनस्पति तेल प्राप्त होता है, जैसे सोयाबीन, सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी, तिल आदि।
- भारत में खाद्य तेलों की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन घरेलू उत्पादन इस मांग को पूरा करने में अक्सर अपर्याप्त रहता है, जिससे आयात पर निर्भरता बढ़ती है।
- आत्मनिर्भरता (Self-reliance) प्राप्त करने के लिए, तिलहन उत्पादन में वृद्धि, उत्पादकता में सुधार और नई प्रौद्योगिकियों को अपनाना महत्वपूर्ण है।
- ICAR-IIOR जैसी अनुसंधान संस्थाएँ उन्नत बीज किस्मों, कीट नियंत्रण के लिए जैव-कीटनाशकों और बीज कोटिंग प्रौद्योगिकियों के माध्यम से उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज लेपन (Bio-polymer-enabled seed coating) बीज के अंकुरण, पौधों के विकास और रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार कर सकता है।
- सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी (Microbial bio-pesticides) रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके पर्यावरण के अनुकूल कृषि को बढ़ावा देते हैं।
- प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण में अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकों को उद्योगों और किसानों तक पहुँचाना शामिल है, ताकि उनका बड़े पैमाने पर उपयोग हो सके।
- सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) अनुसंधान और विकास से लेकर व्यावसायीकरण तक की प्रक्रिया को गति देने में सहायक होती है, जिससे किसानों को नवीनतम तकनीकों का लाभ मिल पाता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राष्ट्रीय परामर्श एवं उद्योग संवाद बैठक | तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण और विस्तार के लिए उद्योग साझेदारी को बढ़ावा देना। |
| आईसीएआर-आईआईओआर द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियां | उन्नत तिलहन किस्में और संकर, जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियां, तथा सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन शामिल हैं, जो कृषि उत्पादकता बढ़ा सकती हैं। |
| हितधारकों की भागीदारी | बीज उद्योग, जैव-कीटनाशी और जैव-इनपुट कंपनियों, प्रौद्योगिकी लाइसेंसधारकों, कृषि-व्यवसाय कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और उद्यमियों को एक मंच पर लाना। |
| प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और लाइसेंसिंग | अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों को किसानों तक पहुँचाने और बड़े पैमाने पर अपनाने में सहायता करना। |
| सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) | अनुसंधान और विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना तथा प्रौद्योगिकियों के सफल कार्यान्वयन के लिए संसाधनों को एकीकृत करना। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- भारत विश्व की प्रमुख वनस्पति तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। घरेलू तिलहन उत्पादन में वृद्धि से खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम होगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
- नवीन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण से किसानों की आय में वृद्धि होगी, क्योंकि उन्हें बेहतर उपज और गुणवत्ता वाले उत्पाद प्राप्त होंगे।
- कृषि-व्यवसाय कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और उद्यमियों के लिए नए व्यावसायिक अवसर पैदा होंगे, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा।
रणनीतिक महत्व
- खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता (Self-reliance) भारत की खाद्य सुरक्षा (Food Security) के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे वैश्विक बाजार की अस्थिरता का प्रभाव कम होगा।
- अनुसंधान-उद्योग संबंधों को मजबूत करने से कृषि क्षेत्र में नवाचार (Innovation) को बढ़ावा मिलेगा, जो दीर्घकालिक कृषि विकास के लिए आवश्यक है।
कृषि एवं किसान कल्याण
- उन्नत तिलहन किस्में और संकर, तथा जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियां किसानों को अधिक उपज और कीटों/रोगों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करेंगी।
- जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देंगे, जिससे किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के स्वास्थ्य को लाभ होगा।
सतत विकास
- यह पहल भारत के तिलहन क्षेत्र के सतत विकास (Sustainable Development) को सुनिश्चित करेगी, जिससे भविष्य की पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण होगा।
- पर्यावरण के अनुकूल प्रौद्योगिकियों का उपयोग मृदा स्वास्थ्य (Soil Health) और जैव विविधता (Biodiversity) के संरक्षण में सहायक होगा।
चुनौतियाँ
1. प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में अंतराल
- अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों को प्रयोगशाला से खेत तक पहुँचाने में अक्सर समय और संसाधनों की कमी होती है।
- किसानों को नई प्रौद्योगिकियों के लाभों और उपयोग के बारे में शिक्षित करने में चुनौतियाँ आती हैं।
यूपीएससी लिंक: कृषि प्रौद्योगिकी, किसानों का कल्याण
2. वित्तपोषण और निवेश की कमी
- कृषि क्षेत्र में अनुसंधान और विकास के लिए पर्याप्त निजी निवेश आकर्षित करना एक चुनौती है।
- स्टार्ट-अप्स और छोटे उद्यमियों के लिए नई प्रौद्योगिकियों को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए पूंजी जुटाना कठिन हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: कृषि वित्त, सार्वजनिक-निजी भागीदारी
3. बाजार पहुंच और मूल्य निर्धारण
- किसानों द्वारा उत्पादित तिलहन के लिए उचित बाजार मूल्य सुनिश्चित करना, खासकर जब उत्पादन बढ़ता है, एक चुनौती है।
- प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण के बाद उत्पादों को व्यापक बाजार तक पहुँचाने में लॉजिस्टिक्स की समस्याएँ आ सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: कृषि विपणन, मूल्य श्रृंखला प्रबंधन
4. नीतिगत समर्थन और नियामक ढाँचा
- नई कृषि प्रौद्योगिकियों के लिए एक स्पष्ट और सहायक नियामक ढाँचे की आवश्यकता है।
- प्रौद्योगिकी लाइसेंसिंग और सार्वजनिक-निजी भागीदारी के लिए सुव्यवस्थित नीतियों का अभाव चुनौतियों का कारण बन सकता है।
यूपीएससी लिंक: कृषि नीतियाँ, नियामक सुधार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| घरेलू तिलहन उत्पादन में कमी | भारत की खाद्य तेलों की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भरता। |
| प्रौद्योगिकी अपनाने की धीमी गति | किसानों तक नवीन प्रौद्योगिकियों के लाभों और उपयोग की जानकारी का अभाव। |
| अनुसंधान-उद्योग संबंध में कमजोरी | कृषि अनुसंधान संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच समन्वय और सहयोग की कमी। |
| पर्यावरण संबंधी चिंताएँ | रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से मृदा और जल प्रदूषण। |
| किसानों की आय में अस्थिरता | कम उपज, कीटों/रोगों और बाजार की अस्थिरता के कारण किसानों की आय पर नकारात्मक प्रभाव। |
आगे की राह
- अनुसंधान संस्थानों और निजी क्षेत्र के बीच मजबूत सार्वजनिक-निजी भागीदारी (Public-Private Partnership – PPP) मॉडल विकसित करना ताकि प्रौद्योगिकियों का तेजी से व्यावसायीकरण हो सके।
- किसानों को उन्नत तिलहन किस्मों, जैव-उत्पादों और बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियों के बारे में शिक्षित करने के लिए व्यापक जागरूकता कार्यक्रम और प्रदर्शन आयोजित करना।
- कृषि क्षेत्र में स्टार्ट-अप्स और उद्यमियों को वित्तीय सहायता, ऊष्मायन (Incubation) सुविधाएँ और परामर्श प्रदान करना ताकि वे नवीन प्रौद्योगिकियों को अपना सकें।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं को सरल और पारदर्शी बनाना ताकि अधिक से अधिक कंपनियाँ इन प्रौद्योगिकियों को अपना सकें।
- खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीतियों और प्रोत्साहन योजनाओं को लागू करना।
- पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों, जैसे जैव-कीटनाशकों और जैव-उर्वरकों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
तिलहन उत्पादन · खाद्य तेल आत्मनिर्भरता · कृषि प्रौद्योगिकी · प्रौद्योगिकी व्यावसायीकरण · सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) · सतत कृषि · बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियां · जैव-कीटनाशक · अनुसंधान-उद्योग संबंध · किसानों की आय
अवधारणा प्रवाह
खाद्य तेलों की बढ़ती मांग और आयात पर निर्भरता → घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता → आईसीएआर-आईआईओआर द्वारा नवीन प्रौद्योगिकियों का विकास → राष्ट्रीय परामर्श एवं उद्योग संवाद बैठक का आयोजन → प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, व्यावसायीकरण और उद्योग साझेदारी → तिलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और किसानों को लाभ
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – भारतीय तिलहन अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIOR) हैदराबाद में स्थित है।
2. भारत विश्व की प्रमुख वनस्पति तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है।
3. ICAR-IIOR ने उन्नत तिलहन किस्मों और संकरों के साथ-साथ सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन भी विकसित किए हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि ICAR-IIOR हैदराबाद में स्थित है। कथन 2 सही है क्योंकि भारत विश्व की प्रमुख वनस्पति तेल अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। कथन 3 भी सही है क्योंकि ICAR-IIOR ने उन्नत तिलहन किस्मों, संकरों और जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन जैसी प्रौद्योगिकियां विकसित की हैं।
Q2. कथन (A): भारत में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग को पूरा करने और आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए घरेलू तिलहन उत्पादन में तेजी लाना आवश्यक है।
कारण (R): ICAR-IIOR जैसी संस्थाएँ प्रौद्योगिकी के विकास, व्यावसायीकरण और अपनाने की प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए उद्योग भागीदारों के साथ सहयोग कर रही हैं।
- A और R दोनों सही हैं, तथा R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, तथा R, A का सही स्पष्टीकरण है। — कथन (A) सही है क्योंकि खाद्य तेलों की बढ़ती मांग के कारण तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता आवश्यक है। कारण (R) भी सही है और यह कथन (A) का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग ही प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण और उत्पादन में वृद्धि का मार्ग है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण और उद्योग साझेदारी की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल की क्षमता पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** भारत में खाद्य तेलों की बढ़ती मांग और तिलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **प्रौद्योगिकी के व्यावसायीकरण की भूमिका:** उन्नत तिलहन किस्मों, संकरों, जैव-पॉलिमर-सक्षम बीज संवर्धन प्रौद्योगिकियों और सूक्ष्मजीवी जैव-कीटनाशी फॉर्मुलेशन जैसी ICAR-IIOR द्वारा विकसित प्रौद्योगिकियों का उल्लेख। इन प्रौद्योगिकियों को किसानों तक पहुँचाने और बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए व्यावसायीकरण के महत्व पर चर्चा।
3. **उद्योग साझेदारी का महत्व:** बीज उद्योग, जैव-कीटनाशी कंपनियों, कृषि-व्यवसाय कंपनियों और स्टार्ट-अप्स के साथ सहयोग की आवश्यकता। अनुसंधान-उद्योग संबंधों को मजबूत करने और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, लाइसेंसिंग के माध्यम से किसानों तक पहुँच सुनिश्चित करने में इसकी भूमिका।
4. **सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) मॉडल की क्षमता:** PPP मॉडल के माध्यम से अनुसंधान, विकास, व्यावसायीकरण और विस्तार गतिविधियों में तेजी लाने की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा। इसके लाभ जैसे पूंजी निवेश, विशेषज्ञता साझाकरण, जोखिम न्यूनीकरण और व्यापक पहुंच।
5. **चुनौतियाँ और समाधान:** व्यावसायीकरण और साझेदारी में आने वाली संभावित चुनौतियों (जैसे वित्तपोषण, नियामक बाधाएं, किसानों तक पहुंच) और उनके संभावित समाधानों पर संक्षिप्त चर्चा।
6. **निष्कर्ष:** सतत कृषि और किसानों के लाभ के लिए नवीन प्रौद्योगिकियों के सत्यापन, व्यावसायीकरण और अंगीकरण में उद्योग साझेदारी और PPP की महत्वपूर्ण भूमिका पर बल देते हुए निष्कर्ष।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Telangana PCS (TGPSC (TSPSC)) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: तेलंगाना राज्य में तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए आईसीएआर-आईआईओआर हैदराबाद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परामर्श और उद्योग संवाद बैठक का मुख्य उद्देश्य क्या है?
- A. तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाना
- B. राज्य में कृषि ऋण वितरण प्रणाली को मजबूत करना
- C. किसानों को मुफ्त बीज और उर्वरक वितरित करना
- D. राज्य में जैविक खेती को पूर्णतः प्रतिबंधित करना
उत्तर: A. तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाना — आईसीएआर-आईआईओआर हैदराबाद द्वारा आयोजित बैठक का मुख्य उद्देश्य तिलहन प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाना है, जिससे किसानों को नवीन तकनीकों का लाभ मिल सके।
Mains: तेलंगाना राज्य में तिलहन उत्पादन एवं प्रसंस्करण को बढ़ावा देने के लिए आईसीएआर-आईआईओआर हैदराबाद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परामर्श और उद्योग संवाद बैठक के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, राज्य में तिलहन क्षेत्र के विकास के लिए आवश्यक नीतिगत एवं तकनीकी सुझाव प्रस्तुत कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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