08 Sep उत्तर-पूर्वी मानसून: तमिलनाडु सरकार की तैयारी एवं सावधानियाँ
✎ पूर्वोत्तर मानसून की तैयारी आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राज्य सरकारों की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, जिसमें प्रभावी शासन और अंतर-विभागीय समन्वय के माध्यम से बाढ़ शमन और सामुदायिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत का भूगोल) | GS Paper II — शासन, आपदा प्रबंधन | GS Paper III — आपदा प्रबंधन
- Prelims: पूर्वोत्तर मानसून, आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005, राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF), राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA), जलकुंभी, तूफानी जल निकासी (Stormwater drains)
- Essay: आपदा प्रबंधन में शासन की भूमिका, जलवायु परिवर्तन और भारत की मानसून प्रणाली
त्वरित पुनरावृत्ति: पूर्वोत्तर मानसून की तैयारी आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत राज्य सरकारों की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, जिसमें प्रभावी शासन और अंतर-विभागीय समन्वय के माध्यम से बाढ़ शमन और सामुदायिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने आगामी पूर्वोत्तर मानसून (Northeast Monsoon) के मद्देनजर तैयारियों और एहतियाती उपायों की समीक्षा के लिए एक बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में जल निकायों से जलकुंभी (water hyacinth) हटाने, नहरों और तूफानी जल निकासी (stormwater drains) को गाद मुक्त करने तथा अन्य आवश्यक उपायों पर अधिकारियों को निर्देश दिए गए, ताकि वर्षा जल के त्वरित निकास और संभावित बाढ़ से बचाव सुनिश्चित किया जा सके।
पृष्ठभूमि
- भारत में दो प्रमुख मानसून प्रणालियाँ हैं: दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) और पूर्वोत्तर मानसून।
- पूर्वोत्तर मानसून, जिसे शीतकालीन मानसून भी कहा जाता है, मुख्य रूप से अक्टूबर से दिसंबर तक सक्रिय रहता है और तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों, केरल तथा पुडुचेरी में वर्षा लाता है।
- यह मानसून तमिलनाडु की वार्षिक वर्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो अक्सर तीव्र वर्षा और बाढ़ का कारण बनता है।
- आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) भारत में आपदाओं के कुशल प्रबंधन के लिए एक व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय आपदा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिसमें तैयारियों, प्रतिक्रिया और पुनर्वास के उपाय शामिल हैं।
- शहरी बाढ़ (urban flooding) भारत के कई शहरों के लिए एक गंभीर समस्या है, जो अपर्याप्त जल निकासी प्रणालियों, अतिक्रमण और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की कमी के कारण exacerbated होती है।
पूर्वोत्तर मानसून और आपदा प्रबंधन
- पूर्वोत्तर मानसून मुख्य रूप से बंगाल की खाड़ी से नमी प्राप्त करता है और कोरोमंडल तट (Coromandel Coast) पर भारी वर्षा करता है।
- इस मानसून के दौरान होने वाली अत्यधिक वर्षा अक्सर तटीय और निचले इलाकों में बाढ़ का कारण बनती है, जिससे जान-माल का भारी नुकसान होता है।
- आपदा प्रबंधन (Disaster Management) में तीन मुख्य चरण होते हैं: तैयारी (Preparedness), प्रतिक्रिया (Response) और पुनर्वास (Rehabilitation)।
- तैयारी के उपायों में जल निकासी प्रणालियों की सफाई, कमजोर बुनियादी ढांचे की मरम्मत, राहत शिविरों की पहचान और आपातकालीन सेवाओं का समन्वय शामिल है।
- राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (State Disaster Response Fund – SDRF) और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (National Disaster Response Fund – NDRF) आपदाओं से निपटने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।
- स्थानीय निकायों, जैसे नगर निगमों, की भूमिका जल निकायों से अवरोधों को हटाने, तूफानी जल निकासी को बनाए रखने और शहरी बाढ़ को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है।
- आपदा प्रबंधन में विभिन्न सरकारी विभागों (पुलिस, अग्निशमन, स्वास्थ्य, बिजली) और नागरिक समाज संगठनों के बीच प्रभावी समन्वय आवश्यक है।
- जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून पैटर्न में बदलाव आ रहा है, जिससे अत्यधिक वर्षा की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है, जो आपदा प्रबंधन के लिए नई चुनौतियाँ पेश कर रहा है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| जल निकायों से जलकुंभी हटाना | जल निकासी में सुधार और बाढ़ के जोखिम को कम करना। |
| नहरों और तूफानी नालों की गाद निकालना | बारिश के पानी के त्वरित निकास को सुगम बनाना। |
| मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों की टीमों द्वारा निरीक्षण | बाढ़ प्रभावित और संवेदनशील क्षेत्रों की तैयारियों का नियमित मूल्यांकन। |
| सभी विभागों के अधिकारियों की समन्वय बैठकें | आपदा प्रबंधन के लिए अंतर-विभागीय सहयोग सुनिश्चित करना। |
| पेयजल, सीवेज और सड़क कार्यों को पूरा करना | मानसून से पहले आवश्यक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना। |
| बिजली के तारों और खंभों की मरम्मत | बिजली आपूर्ति में व्यवधान और दुर्घटनाओं को रोकना। |
महत्व
आपदा प्रबंधन
- पूर्वोत्तर मानसून (Northeast Monsoon) से पहले तैयारियों की समीक्षा करना आपदा प्रबंधन चक्र का एक महत्वपूर्ण चरण है। यह संभावित आपदाओं के प्रभाव को कम करने में मदद करता है।
- विभिन्न विभागों और जिला प्रशासनों के बीच समन्वय सुनिश्चित करना आपदा प्रतिक्रिया की प्रभावशीलता के लिए महत्वपूर्ण है।
शासन और प्रशासन
- मुख्यमंत्री द्वारा सीधे बैठक की अध्यक्षता करना दर्शाता है कि राज्य सरकार आपदा तैयारियों को उच्च प्राथमिकता दे रही है।
- अधिकारियों को विशिष्ट निर्देश देना और नियमित निरीक्षण का आदेश देना जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
सार्वजनिक सुरक्षा और कल्याण
- बाढ़ से बचाव, सुरक्षित निकासी और राहत शिविरों की तैयारी नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
- सामुदायिक रसोई और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करना आपदा के दौरान प्रभावित आबादी के कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है।
चुनौतियाँ
1. शहरी बाढ़
- शहरी क्षेत्रों में अनियोजित विकास, अतिक्रमण और अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली के कारण बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
- ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की कमी से जल निकासी अवरुद्ध हो जाती है, जिससे जलभराव की स्थिति और बिगड़ जाती है।
यूपीएससी लिंक: आपदा और आपदा प्रबंधन
2. बुनियादी ढाँचागत कमियाँ
- पुराने और कमजोर बिजली के खंभे तथा तार मानसून के दौरान बड़े पैमाने पर बिजली कटौती का कारण बनते हैं।
- पेयजल और सीवेज प्रणालियों का अधूरा काम मानसून के दौरान स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को बढ़ा सकता है।
यूपीएससी लिंक: बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा, सड़कें
3. संसाधन और क्षमता
- आपदा प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक उपकरणों (जैसे पंप, इलेक्ट्रिक आरी, नावें) की पर्याप्त उपलब्धता और उनका रखरखाव एक चुनौती हो सकता है।
- स्थानीय निकायों और विभागों के बीच प्रभावी समन्वय और क्षमता निर्माण की आवश्यकता होती है।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन में संस्थागत क्षमता
4. जलवायु परिवर्तन के प्रभाव
- जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव आया है, जिससे अत्यधिक वर्षा की घटनाएँ अधिक बार हो रही हैं, जो तैयारियों को और जटिल बनाती हैं।
- समुद्र के स्तर में वृद्धि तटीय क्षेत्रों में जलभराव और बाढ़ के जोखिम को बढ़ाती है।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन और भारत पर प्रभाव
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जल निकायों में जलकुंभी | जल प्रवाह को बाधित करती है और जलभराव को बढ़ाती है। |
| नहरों और नालों में गाद | जल निकासी क्षमता को कम करती है, जिससे बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। |
| अधूरे बुनियादी ढाँचागत कार्य | मानसून के दौरान पेयजल, सीवेज और सड़क संबंधी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। |
| कमजोर बिजली के तार और खंभे | बिजली आपूर्ति में व्यवधान और जान-माल के नुकसान का कारण बन सकते हैं। |
| निचले इलाकों में रहने वाले लोग | बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं और उन्हें सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित करने की आवश्यकता होती है। |
| अंतर-विभागीय समन्वय की कमी | आपदा प्रतिक्रिया प्रयासों की प्रभावशीलता को कम कर सकती है। |
आगे की राह
- जल निकायों और जल निकासी प्रणालियों का नियमित रखरखाव और सफाई सुनिश्चित की जाए, जिसमें जलकुंभी हटाना और गाद निकालना शामिल हो।
- शहरी नियोजन में जल निकासी प्रणालियों को प्राथमिकता दी जाए और अतिक्रमणों को सख्ती से हटाया जाए।
- आपदा प्रतिक्रिया के लिए आवश्यक उपकरणों और संसाधनों की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित की जाए और उनका नियमित रखरखाव किया जाए।
- राज्य और जिला स्तर पर सभी संबंधित विभागों के बीच प्रभावी समन्वय और संचार तंत्र स्थापित किया जाए।
- समुदायों को आपदा तैयारियों और प्रतिक्रिया के लिए प्रशिक्षित और जागरूक किया जाए, विशेष रूप से निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को।
- जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन रणनीतियों को विकसित और कार्यान्वित किया जाए।
- आपदा प्रबंधन योजनाओं की नियमित समीक्षा और अद्यतन किया जाए ताकि वे उभरती चुनौतियों का सामना कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पूर्वोत्तर मानसून · आपदा प्रबंधन · राज्य आपदा मोचन बल · राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण · जलवायु परिवर्तन · शहरी बाढ़ · जल निकासी प्रणाली · तटीय भेद्यता · सामुदायिक तैयारी · अंतर-विभागीय समन्वय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243W’, ‘note’: ‘नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 256’, ‘note’: ‘राज्यों और संघ की बाध्यता’}
अवधारणा प्रवाह
पूर्वोत्तर मानसून का आगमन → मुख्यमंत्री द्वारा तैयारियों की समीक्षा बैठक → अधिकारियों को जल निकासी और बुनियादी ढाँचे के रखरखाव के निर्देश → बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का नियमित निरीक्षण और समन्वय → राहत शिविरों और सामुदायिक रसोई की तैयारी → आपदा के प्रभाव को कम करना और सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. पूर्वोत्तर मानसून मुख्य रूप से अक्टूबर से दिसंबर के महीनों के दौरान तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश के तटीय क्षेत्रों और केरल को प्रभावित करता है।
2. भारत में अधिकांश वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है, जबकि पूर्वोत्तर मानसून अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण है।
3. अल नीनो की घटना पूर्वोत्तर मानसून को मजबूत कर सकती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। पूर्वोत्तर मानसून मुख्य रूप से दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत को प्रभावित करता है। कथन 2 सही है। भारत की लगभग 75% वर्षा दक्षिण-पश्चिम मानसून से होती है। कथन 3 गलत है। अल नीनो की घटना आमतौर पर पूर्वोत्तर मानसून को कमजोर करती है, जिससे वर्षा में कमी आती है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कदम पूर्वोत्तर मानसून से पहले बाढ़ की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण है/हैं?
1. जल निकायों से जलकुंभी हटाना।
2. नहरों और तूफानी जल निकासी (stormwater drains) की गाद निकालना।
3. कमजोर बिजली के खंभों और ढीले तारों की मरम्मत करना।
4. निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए सामुदायिक हॉल और स्कूलों को आश्रय स्थलों के रूप में तैयार रखना।
सही विकल्प चुनें:
- केवल 1 और 2
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 3 और 4
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — दिए गए सभी कदम पूर्वोत्तर मानसून से पहले बाढ़ की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण हैं। जलकुंभी हटाने और गाद निकालने से पानी का बहाव सुगम होता है, बिजली के खंभों की मरम्मत से दुर्घटनाएं टलती हैं, और आश्रय स्थल तैयार रखने से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पूर्वोत्तर मानसून से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करें और इन चुनौतियों से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करें। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** पूर्वोत्तर मानसून का संक्षिप्त परिचय (क्षेत्र, समय अवधि) और इससे जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ (बाढ़, जलभराव, बुनियादी ढांचे को नुकसान)।
2. **चुनौतियाँ:**
* **भौगोलिक भेद्यता:** तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और केरल जैसे तटीय राज्यों की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति।
* **शहरी बाढ़:** तेजी से शहरीकरण, अपर्याप्त जल निकासी प्रणाली और अतिक्रमण के कारण शहरी क्षेत्रों में जलभराव।
* **बुनियादी ढाँचा:** बिजली, सड़क और संचार नेटवर्क को नुकसान।
* **कृषि और आजीविका:** फसलों को नुकसान और मछुआरों की आजीविका पर प्रभाव।
* **स्वास्थ्य जोखिम:** जलजनित रोगों का प्रसार।
* **जलवायु परिवर्तन:** वर्षा पैटर्न में अनिश्चितता और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति।
3. **आपदा प्रबंधन के पहलू (चुनौतियों से निपटने हेतु):**
* **पूर्व-मानसून तैयारी:**
* जल निकायों की सफाई (जलकुंभी हटाना)।
* नहरों और तूफानी जल निकासी प्रणालियों की गाद निकालना और मरम्मत।
* कमजोर बुनियादी ढांचे (बिजली के खंभे, तार) की पहचान और मरम्मत।
* अधूरे कार्यों (पेयजल, सीवेज, सड़क) को समय पर पूरा करना।
* **तत्काल प्रतिक्रिया और राहत:**
* बाढ़ के पानी को निकालने के लिए पंपों की उपलब्धता।
* गिरे हुए पेड़ों को हटाने के लिए उपकरण।
* जलभराव वाले क्षेत्रों से लोगों को निकालने के लिए नावें।
* सामुदायिक हॉल और स्कूलों को राहत शिविरों के रूप में तैयार रखना।
* सामुदायिक रसोई और सुरक्षित पेयजल की व्यवस्था।
* **संस्थागत समन्वय:**
* राज्य और जिला स्तर पर अंतर-विभागीय समन्वय बैठकें (पुलिस, अग्निशमन, स्वास्थ्य, बिजली, जल आपूर्ति)।
* राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) और राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF) की तैनाती।
* स्थानीय निकायों (जैसे ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन) और अन्य एजेंसियों के बीच समन्वय।
* **दीर्घकालिक उपाय:**
* शहरी नियोजन और जल निकासी मास्टर प्लान का प्रभावी कार्यान्वयन।
* मैंग्रोव और तटीय वनस्पतियों का संरक्षण।
* जलवायु परिवर्तन अनुकूलन रणनीतियाँ।
* समुदाय आधारित आपदा तैयारी और जागरूकता कार्यक्रम।
4. **निष्कर्ष:** आपदा प्रबंधन में ‘तैयारी, प्रतिक्रिया और पुनर्प्राप्ति’ के समग्र दृष्टिकोण का महत्व और सतत विकास के लिए लचीले बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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