18 Sep एल नीनो की मार: आंध्र के फूलों का बगीचा सूखा, उत्पादन 40% घटा
✎ एल नीनो पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के गर्म होने से जुड़ा एक जलवायु पैटर्न है, जो अक्सर भारत में कमजोर मानसून और सूखे का कारण बनता है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित होता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कृषि, जलवायु परिवर्तन)
- Prelims: एल नीनो, ला नीना, भारतीय मानसून, कृषि उत्पादन, सूखा, जलवायु परिवर्तन, पुष्प कृषि, आंध्र प्रदेश
- Essay: जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि: चुनौतियाँ एवं समाधान, भारत में कृषि संकट: कारण, प्रभाव और आगे की राह
त्वरित पुनरावृत्ति: एल नीनो पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के गर्म होने से जुड़ा एक जलवायु पैटर्न है, जो अक्सर भारत में कमजोर मानसून और सूखे का कारण बनता है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित होता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
आंध्र प्रदेश के कुप्पम क्षेत्र में, जिसे ‘फूलों की टोकरी’ कहा जाता है, एल नीनो (El Niño) के कारण असामान्य गर्मी और कम बारिश से फूलों का उत्पादन 40% तक घट गया है। आमतौर पर सुबह 11 बजे तक ताज़े रहने वाले फूल अब सुबह 8 बजे तक मुरझा रहे हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान हो रहा है। यह स्थिति भारतीय कृषि पर एल नीनो के बढ़ते प्रभावों को उजागर करती है।
पृष्ठभूमि
- कुप्पम क्षेत्र आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के त्रि-जंक्शन पर स्थित है, जो अपनी पुष्प कृषि के लिए प्रसिद्ध है।
- यह क्षेत्र हर साल चार राज्यों के चार शहरों में फूलों की आपूर्ति करता है, लेकिन इस वर्ष उत्पादन में भारी गिरावट आई है।
- जून से सितंबर के बीच कुप्पम मंडल में सामान्य 400.1 मिमी वर्षा के मुकाबले केवल 100.8 मिमी वर्षा हुई, जो 75% की कमी दर्शाती है।
- केंद्र सरकार द्वारा चिन्हांकित 315 एल नीनो-संवेदनशील जिलों में चित्तूर भी शामिल है, जिसमें रायलसीमा के चार जिले उच्च जोखिम वाले हैं।
एल नीनो क्या है?
- एल नीनो एक जलवायु पैटर्न है जो पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ा है।
- यह ‘एल नीनो-दक्षिणी दोलन’ (ENSO) चक्र का गर्म चरण है, जिसका वैश्विक मौसम पैटर्न पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
- एल नीनो की घटनाएँ अनियमित रूप से हर 2 से 7 साल में होती हैं और आमतौर पर 9 से 12 महीने तक चलती हैं।
- भारत में, एल नीनो अक्सर कमजोर मानसूनी वर्षा और सूखे की स्थिति से जुड़ा होता है, जिससे कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- यह प्रशांत महासागर में व्यापारिक पवनों (trade winds) के कमजोर पड़ने और गर्म पानी के पूर्व की ओर बढ़ने के कारण होता है।
- इसके विपरीत, ला नीना (La Niña) ENSO चक्र का ठंडा चरण है, जिसमें पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है और आमतौर पर भारत में अच्छी मानसूनी वर्षा से जुड़ा होता है।
- एल नीनो के कारण वैश्विक स्तर पर तापमान में वृद्धि, चरम मौसमी घटनाएँ जैसे बाढ़, सूखा और तूफान अधिक तीव्र हो सकते हैं।
- यह समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भी प्रभावित करता है, जिससे मछली पकड़ने के पैटर्न और समुद्री जीवन पर असर पड़ता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| एल नीनो प्रभाव | वैश्विक जलवायु घटना जो भारत में मानसून को प्रभावित करती है, जिससे वर्षा में कमी और तापमान में वृद्धि होती है। |
| कुप्पम का पुष्प उत्पादन | आंध्र प्रदेश का एक प्रमुख फूल उत्पादक क्षेत्र, जो कई राज्यों में फूलों की आपूर्ति करता है। यह क्षेत्र हजारों छोटे और सीमांत किसानों की आजीविका का आधार है। |
| कनकम्बरा फूल (Crossandra infundibuliformis) | कुप्पम क्षेत्र में उगाया जाने वाला एक नाजुक फूल, जो उच्च तापमान और कम वर्षा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। |
| मानसून वर्षा में कमी | कुप्पम और आसपास के क्षेत्रों में सामान्य से 50-75% कम वर्षा दर्ज की गई, जिससे कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। |
| उच्च तापमान और आर्द्रता | मार्च से सितंबर तक लगातार उच्च तापमान और 63-68% आर्द्रता ने फूलों के मुरझाने और फंगल रोट (fungal rot) के प्रसार को बढ़ावा दिया। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- कुप्पम क्षेत्र से फूलों का उत्पादन 40% तक घटने से किसानों की आय में भारी गिरावट आई है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति प्रभावित हुई है।
- फूलों के व्यापार से जुड़े व्यापारियों और श्रमिकों की आजीविका पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर हुई है।
सामाजिक महत्व
- छोटे और सीमांत किसानों की आय में कमी से ग्रामीण गरीबी और खाद्य असुरक्षा बढ़ सकती है।
- कृषि संकट के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन बढ़ सकता है, जिससे सामाजिक ताने-बाने पर दबाव पड़ेगा।
पर्यावरणीय महत्व
- एल नीनो जैसी जलवायु घटनाओं का कृषि पर सीधा प्रभाव जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरों को उजागर करता है।
- फंगल रोट जैसी बीमारियों का प्रसार कृषि पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करता है।
चुनौतियाँ
1. जलवायु परिवर्तन और कृषि
- एल नीनो जैसी चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति और तीव्रता कृषि उत्पादन को अस्थिर कर रही है।
- तापमान वृद्धि और वर्षा पैटर्न में बदलाव से फसलों की संवेदनशीलता बढ़ रही है, जिससे फसल विफलता का जोखिम बढ़ रहा है।
यूपीएससी लिंक: कृषि पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव
2. जल प्रबंधन
- मानसून की अनिश्चितता और वर्षा में कमी से सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कम हो रही है।
- भूजल के अत्यधिक दोहन से जल स्तर में गिरावट आ रही है, जिससे भविष्य में जल संकट गहरा सकता है।
यूपीएससी लिंक: जल संसाधन प्रबंधन और चुनौतियाँ
3. किसानों की आजीविका
- फसल विफलता और कम कीमतों के कारण छोटे और सीमांत किसानों की आय में भारी कमी आ रही है।
- कृषि क्षेत्र में जोखिम प्रबंधन और बीमा योजनाओं की अपर्याप्तता किसानों को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने में विफल है।
यूपीएससी लिंक: किसानों की आय दोगुनी करना
4. कृषि अनुसंधान और विकास
- जलवायु-लचीली फसल किस्मों और कृषि पद्धतियों के विकास और प्रसार की धीमी गति।
- किसानों तक मौसम संबंधी सटीक जानकारी और कृषि सलाह की प्रभावी पहुंच का अभाव।
यूपीएससी लिंक: कृषि में प्रौद्योगिकी का उपयोग
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| एल नीनो का प्रभाव | भारत में मानसून की कमी और सूखे की स्थिति, जिससे कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। |
| पुष्प उत्पादन में गिरावट | कुप्पम क्षेत्र में फूलों की पैदावार में 40% की कमी, जिससे किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। |
| मानसून वर्षा की कमी | कुप्पम और आसपास के क्षेत्रों में 50-75% तक वर्षा की कमी, जिससे जल संकट और सिंचाई की समस्या उत्पन्न हुई है। |
| उच्च तापमान और आर्द्रता | मार्च से सितंबर तक लगातार उच्च तापमान और आर्द्रता, जिससे फूलों का मुरझाना और फंगल रोट का प्रसार बढ़ा है। |
| किसानों की आय में कमी | फसल विफलता और कम कीमतों के कारण छोटे और सीमांत किसानों की आय में भारी गिरावट, जिससे उनकी आजीविका पर संकट आया है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana)
- परंपरागत कृषि विकास योजना (Paramparagat Krishi Vikas Yojana)
- राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (Rashtriya Krishi Vikas Yojana)
आगे की राह
- जलवायु-लचीली फसल किस्मों (climate-resilient crop varieties) और शुष्क-भूमि कृषि पद्धतियों (dryland farming practices) को बढ़ावा देना।
- सूक्ष्म सिंचाई (micro-irrigation) जैसे ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम को अपनाकर जल उपयोग दक्षता में सुधार करना।
- किसानों को मौसम संबंधी सटीक पूर्वानुमान और कृषि सलाह समय पर उपलब्ध कराना।
- फसल बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी और सुलभ बनाना, विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए।
- कृषि विविधीकरण (agricultural diversification) को प्रोत्साहित करना, ताकि किसान केवल एक फसल पर निर्भर न रहें।
- फसल कटाई के बाद के नुकसान को कम करने के लिए कोल्ड स्टोरेज (cold storage) और बेहतर परिवहन सुविधाओं का विकास करना।
- किसानों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण प्रदान करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अल नीनो · जलवायु परिवर्तन · कृषि क्षेत्र · सूखा · फसल विफलता · किसानों की आय · जल संसाधन प्रबंधन · जलवायु अनुकूल कृषि · आपदा प्रबंधन · खाद्य सुरक्षा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48’, ‘note’: ‘कृषि और पशुपालन का संगठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियां, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
अवधारणा प्रवाह
एल नीनो घटना → भारत में मानसून की कमी → कुप्पम में कम वर्षा और उच्च तापमान → फूलों के उत्पादन में 40% गिरावट → किसानों की आय में कमी → ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अल नीनो प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की घटना है।
2. भारत में अल नीनो आमतौर पर मानसूनी वर्षा को कमजोर करता है, जिससे सूखे की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
3. ला नीना अल नीनो के विपरीत एक घटना है, जो भारत में मानसूनी वर्षा को मजबूत करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अल नीनो एक जलवायु पैटर्न है जो पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने की विशेषता है। कथन 2 सही है। भारत में, अल नीनो अक्सर कमजोर मानसून और सूखे से जुड़ा होता है, जिससे कृषि उत्पादन प्रभावित होता है। कथन 3 सही है। ला नीना अल नीनो के विपरीत है, जिसमें पूर्वी प्रशांत महासागर में सतही जल असामान्य रूप से ठंडा हो जाता है, और यह आमतौर पर भारत में मजबूत मानसून से जुड़ा होता है।
Q2. कथन (A): आंध्र प्रदेश के कुप्पम क्षेत्र में फूलों की खेती अल नीनो के कारण गंभीर रूप से प्रभावित हुई है।
कारण (R): अल नीनो के कारण इस क्षेत्र में अत्यधिक गर्मी और कम वर्षा हुई है।
- A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सही है, लेकिन R गलत है।
- A गलत है, लेकिन R सही है।
उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — कथन (A) सही है, जैसा कि समाचार रिपोर्ट में बताया गया है कि कुप्पम में फूलों की खेती अल नीनो के कारण प्रभावित हुई है। कारण (R) भी सही है, क्योंकि अल नीनो के कारण इस क्षेत्र में मार्च से ही अत्यधिक गर्मी और जून से सितंबर तक सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई है। कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या करता है, क्योंकि ये जलवायु परिस्थितियाँ ही फूलों की फसल को नुकसान पहुँचा रही हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अल नीनो जैसी जलवायु घटनाएँ भारतीय कृषि पर किस प्रकार प्रभाव डालती हैं? इन प्रभावों को कम करने के लिए सरकार द्वारा क्या उपाय किए जा सकते हैं, चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय (20-30 शब्द):** अल नीनो की संक्षिप्त परिभाषा और भारतीय कृषि के लिए इसके महत्व का उल्लेख।
2. **भारतीय कृषि पर अल नीनो के प्रभाव (80-100 शब्द):**
* **वर्षा पैटर्न में बदलाव:** मानसूनी वर्षा में कमी, सूखे की स्थिति।
* **तापमान वृद्धि:** फसलों पर सीधा नकारात्मक प्रभाव, फूल और फल बनने में बाधा।
* **फसल उत्पादन में गिरावट:** विशेष रूप से वर्षा आधारित फसलों पर असर, फूलों और बागवानी फसलों का उदाहरण।
* **किसानों की आय पर प्रभाव:** उत्पादन में कमी से आय में गिरावट, ऋणग्रस्तता।
* **जल संसाधनों पर दबाव:** भूजल स्तर में कमी, सिंचाई की समस्या।
* **खाद्य सुरक्षा पर संभावित खतरा:** उत्पादन में कमी से कीमतों में वृद्धि।
3. **प्रभावों को कम करने के लिए सरकारी उपाय (100-120 शब्द):**
* **जल प्रबंधन:** सूक्ष्म सिंचाई (ड्रिप, स्प्रिंकलर), वर्षा जल संचयन, जल निकायों का पुनरुद्धार।
* **जलवायु अनुकूल कृषि:** सूखा प्रतिरोधी बीजों का विकास और वितरण, फसल विविधीकरण।
* **कृषि बीमा योजनाएँ:** प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) का प्रभावी कार्यान्वयन।
* **मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली:** किसानों तक सटीक और समय पर जानकारी पहुँचाना।
* **अनुसंधान और विकास:** जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का अध्ययन और अनुकूलन रणनीतियों का विकास।
* **किसानों को वित्तीय सहायता:** संकटग्रस्त किसानों के लिए ऋण राहत और अन्य सहायता।
* **फसल पैटर्न में बदलाव:** कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना।
4. **निष्कर्ष (20-30 शब्द):** दीर्घकालिक रणनीतियों और सतत कृषि पद्धतियों के महत्व पर जोर देते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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