केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग अध्यक्ष पद के लिए चयन समिति का गठन

केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग अध्यक्ष पद के लिए चयन समिति का गठन — केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष चयन प्रक्रिया

केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग अध्यक्ष पद के लिए चयन समिति का गठन

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ  |  GS Paper II — केंद्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ तथा इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय
  • Prelims: बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR), अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति, कार्यकाल, बाल अधिकारों का संरक्षण, संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन (UNCRC)
  • Essay: भारत में बाल अधिकारों का संरक्षण: चुनौतियाँ और आगे की राह, कल्याणकारी राज्य के रूप में भारत की भूमिका और बच्चों के भविष्य का निर्माण

त्वरित पुनरावृत्ति: बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत स्थापित राष्ट्रीय और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग, भारत में बच्चों के अधिकारों की रक्षा और संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण वैधानिक निकाय हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केरल सरकार ने केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (Kerala State Commission for Protection of Child Rights) के अध्यक्ष के चयन के लिए एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है। यह घटना बाल अधिकारों के संरक्षण में राज्य आयोगों की भूमिका और उनकी संरचना को रेखांकित करती है, जो UPSC सिविल सेवा परीक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए एक व्यापक कानूनी और संस्थागत ढाँचा मौजूद है।
  • बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 (Commissions for Protection of Child Rights Act, 2005) के तहत राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की स्थापना की गई है।
  • ये आयोग बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करने और उनके संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाने हेतु सशक्त हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार कन्वेंशन (UN Convention on the Rights of the Child – UNCRC) के सिद्धांतों को भारत में बाल अधिकारों से संबंधित कानूनों और नीतियों का आधार बनाया गया है।
  • केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का गठन 3 जून, 2013 को हुआ था, जो राज्य में बाल अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्यरत है।
  • आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होनी अनिवार्य हैं।

बाल अधिकार संरक्षण आयोग क्या हैं?

  • बाल अधिकार संरक्षण आयोग (Commissions for Protection of Child Rights – CPRC) भारत में बच्चों के अधिकारों की रक्षा और संवर्धन के लिए स्थापित वैधानिक निकाय हैं।
  • इनकी स्थापना बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत की गई है, जो बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन से संबंधित मामलों की जाँच करते हैं।
  • राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights – NCPCR) केंद्रीय स्तर पर कार्य करता है, जबकि राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (State Commission for Protection of Child Rights – SCPCR) राज्यों में कार्य करते हैं।
  • प्रत्येक आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होनी चाहिए। अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केंद्र या राज्य सरकार द्वारा की जाती है।
  • इन आयोगों का मुख्य कार्य बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की शिकायतों की जाँच करना, बच्चों से संबंधित कानूनों और नीतियों की समीक्षा करना और उनके प्रभावी कार्यान्वयन की सिफारिश करना है।
  • वे बच्चों के अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाने और सरकार को बच्चों के कल्याण से संबंधित मामलों पर सलाह देने का भी कार्य करते हैं।
  • आयोगों को सिविल न्यायालय की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं, जिससे वे साक्ष्य एकत्र कर सकते हैं और गवाहों को समन जारी कर सकते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग यह सुनिश्चित करता है कि बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो और उनके सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता मिले।
अध्यक्ष और सदस्य आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होनी चाहिए। यह लैंगिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है।
चयन समिति अध्यक्ष के चयन के लिए एक समिति का गठन किया जाता है, जिसमें महिला एवं बाल विकास मंत्री, विशेष सचिव और विधि सचिव शामिल होते हैं। यह चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और विशेषज्ञता लाती है।
कार्यकाल अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल निश्चित होता है, जिससे आयोग की स्वायत्तता और स्थिरता बनी रहती है।
बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2005 यह अधिनियम राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की स्थापना का आधार है, जो बाल अधिकारों के प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित करता है।

महत्व

सामाजिक महत्व

  • यह बाल अधिकारों के संरक्षण और संवर्धन के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • आयोग बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों और शोषण को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • यह बच्चों के लिए सुरक्षित और सहायक वातावरण सुनिश्चित करने में मदद करता है, जिससे उनके समग्र विकास को बढ़ावा मिलता है।

शासनिक महत्व

  • आयोग का गठन और उसके अध्यक्ष का चयन सुशासन (Good Governance) के सिद्धांतों के अनुरूप है, जहाँ विशिष्ट क्षेत्रों के लिए विशेष संस्थाएँ कार्य करती हैं।
  • यह राज्य सरकार को बाल अधिकारों से संबंधित नीतियों और कार्यक्रमों को बेहतर ढंग से लागू करने में सहायता करता है।
  • चयन समिति की संरचना प्रक्रिया में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करती है।

कानूनी महत्व

  • यह बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2005 (Commissions for Protection of Child Rights Act, 2005) के प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित करता है।
  • आयोग बच्चों से संबंधित कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन की निगरानी करता है और आवश्यक सिफारिशें करता है।
  • यह बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को सुगम बनाने में मदद करता है।

चुनौतियाँ

1. कार्यान्वयन में चुनौतियाँ

  • आयोग की सिफारिशों को लागू करने में अक्सर देरी या अनिच्छा देखी जाती है।
  • निर्णयों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए पर्याप्त कार्यकारी शक्तियों का अभाव।

2. संसाधनों का अभाव

  • आयोगों को अक्सर पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ता है।
  • कर्मचारियों की कमी और प्रशिक्षण का अभाव आयोग की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है।

3. जागरूकता की कमी

  • बच्चों और उनके अभिभावकों के बीच बाल अधिकारों और आयोग की भूमिका के बारे में जागरूकता का अभाव।
  • जनता की भागीदारी के बिना आयोग का कार्य सीमित हो जाता है।

4. राजनीतिक हस्तक्षेप

  • अध्यक्ष और सदस्यों के चयन या आयोग के कामकाज में राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना।
  • यह आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता को प्रभावित कर सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
अध्यक्ष का कार्यकाल कार्यकाल समाप्त होने से पहले नए अध्यक्ष का चयन न होने पर आयोग के कामकाज में व्यवधान आ सकता है।
सदस्यों का कार्यकाल कई सदस्यों का कार्यकाल एक साथ समाप्त होने से आयोग की निरंतरता और संस्थागत स्मृति प्रभावित हो सकती है।
चयन प्रक्रिया की गति चयन प्रक्रिया में देरी से महत्वपूर्ण पदों पर रिक्ति बनी रह सकती है, जिससे आयोग की प्रभावशीलता कम हो सकती है।
स्वतंत्रता और स्वायत्तता चयन समिति की संरचना और सरकार की भूमिका आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल उठा सकती है।

आगे की राह

  • चयन प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाया जाए ताकि पदों पर रिक्ति से बचा जा सके।
  • आयोग को पर्याप्त वित्तीय और मानव संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ ताकि वह प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।
  • बाल अधिकारों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक अभियान चलाए जाएँ।
  • आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित किया जाए और उनकी जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
  • आयोग को अधिक कार्यकारी शक्तियाँ प्रदान की जाएँ ताकि वह अपने निर्णयों को प्रभावी ढंग से लागू कर सके।
  • अध्यक्ष और सदस्यों के चयन में राजनीतिक हस्तक्षेप को कम करने के लिए मानदंड और प्रक्रिया को और अधिक मजबूत किया जाए।
  • आयोग के सदस्यों के कार्यकाल की समाप्ति को चरणबद्ध किया जाए ताकि संस्थागत निरंतरता बनी रहे।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

बाल अधिकार संरक्षण · राज्य आयोग · सांविधिक निकाय · बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम · संरचना और कार्य · नियुक्ति प्रक्रिया · महिला एवं बाल विकास मंत्रालय · संघवाद · सामाजिक न्याय · बाल कल्याण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21A’, ‘note’: ‘शिक्षा के अधिकार का संवैधानिक प्रावधान’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 24’, ‘note’: ‘बाल श्रम निषेध का संवैधानिक प्रावधान’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 39(f)’, ‘note’: ‘बच्चों के स्वस्थ विकास के अवसर’}

अवधारणा प्रवाह

राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (State Commission for Protection of Child Rights) का गठन।  →  आयोग के अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने वाला है।  →  नए अध्यक्ष के चयन हेतु तीन सदस्यीय समिति का गठन।  →  समिति द्वारा नए अध्यक्ष का चयन किया जाएगा।  →  नया अध्यक्ष आयोग के कार्यों का नेतृत्व करेगा।  →  यह बच्चों के अधिकारों के संरक्षण को सुनिश्चित करेगा।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह अधिनियम राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों (SCPCRs) की स्थापना का प्रावधान करता है।
2. राज्य आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होनी चाहिए।
3. अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है, जो भी पहले हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 और 2 सही हैं। बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बाल अधिकार संरक्षण आयोगों की स्थापना का प्रावधान करता है। राज्य आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं, जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होनी चाहिए। कथन 3 गलत है क्योंकि अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष या 65 वर्ष की आयु (अध्यक्ष के लिए) और 60 वर्ष की आयु (सदस्यों के लिए) तक होता है, जो भी पहले हो।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कार्य राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) के दायरे में आता/आते है/हैं?
1. बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करना।
2. बाल अधिकारों से संबंधित कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन की समीक्षा करना।
3. बाल अधिकारों के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देना।
4. बच्चों के अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय संधियों और उपकरणों की समीक्षा करना।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2, 3 और 4
  3. केवल 1, 2 और 3
  4. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: केवल 1, 2 और 3 — राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR) बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की जाँच करता है, बाल अधिकारों से संबंधित कानूनों के प्रभावी कार्यान्वयन की समीक्षा करता है और इस क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ावा देता है। अंतर्राष्ट्रीय संधियों और उपकरणों की समीक्षा मुख्य रूप से राष्ट्रीय आयोग (NCPCR) के दायरे में आती है, हालांकि राज्य आयोग भी राष्ट्रीय आयोग के साथ समन्वय में कार्य करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोगों (SCPCRs) की स्थापना के महत्व और उनकी कार्यप्रणाली पर चर्चा कीजिए। बाल अधिकारों के प्रभावी संरक्षण में इन आयोगों के समक्ष आने वाली चुनौतियों का भी विश्लेषण कीजिए।

रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में, बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत SCPCRs की स्थापना के महत्व को समझाएँ, जिसमें उनके सांविधिक दर्जे, बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा में उनकी भूमिका और उनकी संरचना का उल्लेख करें। दूसरे भाग में, उनकी कार्यप्रणाली का वर्णन करें, जिसमें उनके प्रमुख कार्यों जैसे शिकायतों की जाँच, कानूनों की समीक्षा और जागरूकता फैलाने पर प्रकाश डालें। अंत में, इन आयोगों के समक्ष आने वाली चुनौतियों का विश्लेषण करें, जैसे कि सीमित शक्तियाँ, संसाधनों की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप और जन जागरूकता का अभाव, और इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए संभावित उपायों का सुझाव दें।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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