खनन विधेयक 2026: ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता पर हमला, बीजेडी ने की मुख्यमंत्री से मुलाकात की मांग

‘Mining Bill a blow to Odisha’s fiscal autonomy’: BJD chief asks Majhi to convene all-party meet — concept mind map

खनन विधेयक 2026: ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता पर हमला, बीजेडी ने की मुख्यमंत्री से मुलाकात की मांग

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Mines Bill 2026

✎ खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 केंद्र सरकार को खनिजों पर नियम बनाने का एकमात्र अधिकार देता है और राज्यों की उन पर कर लगाने की शक्ति को प्रतिबंधित करता है, जिससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर प्रभाव पड़ता है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: संघ एवं राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघवाद से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ।  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।
  • Prelims: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026, संघवाद, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता, खनिज राजस्व, संसद की विधायी शक्तियाँ
  • Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ, राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता और आर्थिक विकास: एक संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 केंद्र सरकार को खनिजों पर नियम बनाने का एकमात्र अधिकार देता है और राज्यों की उन पर कर लगाने की शक्ति को प्रतिबंधित करता है, जिससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर प्रभाव पड़ता है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजू जनता दल (BJD) के अध्यक्ष नवीन पटनायक ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026) पर अपनी असहमति व्यक्त की है, जिसे हाल ही में संसद द्वारा पारित किया गया है। उन्होंने इस विधेयक को ओडिशा की वित्तीय स्वायत्तता पर आघात बताया है और कहा है कि यह राज्य के संवैधानिक अधिकारों के लिए खतरा है। उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी से इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने का आग्रह किया है।

पृष्ठभूमि

  • भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत, खनन से संबंधित विषयों को संघ सूची और राज्य सूची दोनों में शामिल किया गया है, जिससे केंद्र और राज्यों दोनों को इस पर कानून बनाने की शक्ति मिलती है।
  • खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957) भारत में खनन क्षेत्र को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कानून है, जो खनिजों के विकास और विनियमन के लिए एक व्यापक ढाँचा प्रदान करता है।
  • इस अधिनियम के तहत, राज्यों को अपने क्षेत्र में खनिजों पर रॉयल्टी (Royalty) और उपकर (Cess) लगाने की शक्ति प्राप्त थी, जो उनके राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत था।
  • खनिज-समृद्ध राज्य जैसे ओडिशा और झारखंड अपने राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खनन गतिविधियों से प्राप्त करते हैं, जिसका उपयोग स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए किया जाता है।
  • केंद्र सरकार ने समय-समय पर खनन क्षेत्र में सुधारों को आगे बढ़ाया है, जिसका उद्देश्य पारदर्शिता बढ़ाना, निवेश आकर्षित करना और खनिजों के कुशल दोहन को सुनिश्चित करना है।
  • राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता भारतीय संघवाद का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जो राज्यों को अपने विकास एजेंडा को वित्तपोषित करने के लिए पर्याप्त संसाधन जुटाने की अनुमति देती है।

खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 क्या है?

  • यह विधेयक खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 में संशोधन करता है।
  • विधेयक के प्रावधानों के अनुसार, केंद्र सरकार को नियमों को तैयार करने का एकमात्र अधिकार प्रदान किया गया है।
  • यह विधेयक राज्यों की खनिजों पर कर (Taxes) और उपकर (Cesses) लगाने की शक्ति को प्रतिबंधित करता है।
  • इसका उद्देश्य खनन क्षेत्र में एकरूपता लाना और केंद्र सरकार को खनिज संसाधनों के प्रबंधन में अधिक नियंत्रण प्रदान करना है।
  • विधेयक का तर्क है कि यह खनन क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देगा और राष्ट्रीय स्तर पर खनिज संसाधनों के कुशल दोहन को सुनिश्चित करेगा।
  • हालांकि, आलोचकों का मानना है कि यह संशोधन खनिज-समृद्ध राज्यों के राजस्व को कम करेगा और उनकी विकासात्मक योजनाओं को बाधित करेगा।
  • यह विधेयक संघवाद के सिद्धांत और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
खनिज संसाधनों पर राज्यों का अधिकार राज्यों को अपने प्राकृतिक संसाधनों से राजस्व अर्जित करने और विकास परियोजनाओं को वित्तपोषित करने में सक्षम बनाता है।
राज्यों की कराधान शक्तियाँ राज्यों को खनिजों पर कर और उपकर (Cesses) लगाने की शक्ति प्रदान करती है, जो उनकी राजकोषीय स्वायत्तता का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
केंद्र सरकार की नियम बनाने की शक्ति केंद्र सरकार को खनन और खनिज विकास से संबंधित नियमों को बनाने में व्यापक अधिकार देती है।
राजकोषीय संघवाद केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों और जिम्मेदारियों का वितरण, जो भारत के संघीय ढांचे का एक मूलभूत सिद्धांत है।
राजस्व हानि का प्रभाव खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए संभावित राजस्व हानि, जो उनके विकास एजेंडा और कल्याणकारी योजनाओं को प्रभावित कर सकती है।

महत्व

राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव

  • यह विधेयक केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय शक्ति संतुलन को प्रभावित करता है, विशेषकर खनिज राजस्व के संबंध में।
  • राज्यों की अपने प्राकृतिक संसाधनों पर कर लगाने की शक्ति को सीमित करने से उनकी राजकोषीय स्वायत्तता (Fiscal Autonomy) कम हो सकती है।

राज्यों के राजस्व पर प्रभाव

  • खनिज-समृद्ध राज्यों जैसे ओडिशा और झारखंड के लिए राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खनन से आता है। इस विधेयक के प्रावधानों से इन राज्यों को ‘भारी राजस्व हानि’ हो सकती है।
  • राजस्व हानि से राज्यों की स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचा विकास जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं के वित्तपोषण की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

संवैधानिक अधिकार और संसाधन नियंत्रण

  • यह मुद्दा राज्यों के अपने संसाधनों पर संवैधानिक अधिकारों और नियंत्रण से संबंधित है।
  • विधेयक के माध्यम से केंद्र को नियम बनाने की एकमात्र शक्ति देना राज्यों की विधायी और कार्यकारी शक्तियों पर अतिक्रमण के रूप में देखा जा सकता है।

चुनौतियाँ

1. राजकोषीय स्वायत्तता का क्षरण

  • राज्यों की खनिजों पर कर और उपकर लगाने की शक्ति को सीमित करने से उनकी राजकोषीय स्वायत्तता कम होती है।
  • यह राज्यों को अपने स्वयं के राजस्व स्रोतों पर कम नियंत्रण देता है, जिससे वे केंद्र पर अधिक निर्भर हो सकते हैं।

2. राजस्व हानि और विकास पर प्रभाव

  • खनिज-समृद्ध राज्यों को भारी राजस्व हानि का सामना करना पड़ सकता है, जिससे उनके विकास एजेंडा और कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन की कमी हो सकती है।
  • यह राज्यों की अपने नागरिकों की जरूरतों को पूरा करने की क्षमता को बाधित कर सकता है।

3. संघीय ढांचे पर तनाव

  • यह विधेयक केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है, विशेषकर जब राज्य अपने संवैधानिक अधिकारों पर अतिक्रमण महसूस करते हैं।
  • यह सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की भावना के विरुद्ध जा सकता है, जहां केंद्र और राज्य मिलकर काम करते हैं।

4. नियम बनाने की शक्ति का केंद्रीकरण

  • केंद्र को नियमों के निर्माण पर एकमात्र अधिकार देने से राज्यों की स्थानीय आवश्यकताओं और विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार नीतियों को अनुकूलित करने की क्षमता कम हो सकती है।
  • यह राज्यों की विधायी शक्तियों को प्रभावित करता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
खनिज और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता और खनिज संसाधनों पर संवैधानिक अधिकारों का कथित अतिक्रमण।
राज्यों की कराधान शक्तियाँ विधेयक द्वारा खनिजों पर कर और उपकर लगाने की राज्यों की शक्ति को सीमित करना, जिससे राजस्व हानि की आशंका।
केंद्र सरकार की नियम बनाने की एकमात्र शक्ति राज्यों की विधायी शक्तियों का क्षरण और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार नियम बनाने की क्षमता में कमी।
राजकोषीय संघवाद केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय शक्ति संतुलन में बदलाव, जिससे संघीय ढांचे पर तनाव।
राजस्व हानि खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए विकास परियोजनाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं के वित्तपोषण में बाधा।

आगे की राह

  • केंद्र और राज्यों के बीच खनिज राजस्व साझाकरण के लिए एक पारदर्शी और न्यायसंगत तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
  • राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता का सम्मान करते हुए, उनके संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप नीतियां बनाई जानी चाहिए।
  • केंद्र सरकार को विधेयक के प्रावधानों के संभावित प्रभावों पर राज्यों के साथ व्यापक परामर्श करना चाहिए।
  • राज्यों को अपने संसाधनों पर कर लगाने और उपकर लगाने की शक्ति बनाए रखने की अनुमति दी जानी चाहिए, ताकि वे अपनी विकास आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।
  • सहकारी संघवाद की भावना को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और सहयोग को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • विधेयक के प्रावधानों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से संवैधानिक वैधता का परीक्षण किया जा सकता है।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 · राजकोषीय संघवाद · राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता · खनिज राजस्व · संविधान की सातवीं अनुसूची · संघ सूची · राज्य सूची · समवर्ती सूची · संघवाद · राजकोषीय घाटा · अंतर-सरकारी संबंध · संविधान का अनुच्छेद 246

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘संघ और राज्य सूचियों में विधायी शक्तियाँ’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 265’, ‘note’: ‘कानून के अधिकार के बिना कोई कर नहीं’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 282’, ‘note’: ‘संघ या राज्य द्वारा विवेकाधीन अनुदान’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ’}
  • {‘article’: ‘सूची II (राज्य सूची), प्रविष्टि 50’, ‘note’: ‘खनिजों पर कर लगाने की शक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

केंद्र सरकार द्वारा खनन विधेयक पारित  →  विधेयक के प्रावधानों से राज्यों की कराधान शक्ति सीमित  →  खनिज-समृद्ध राज्यों को राजस्व हानि की आशंका  →  राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता पर प्रभाव  →  राज्यों के विकास एजेंडा और कल्याणकारी योजनाओं पर नकारात्मक असर  →  संघीय ढांचे और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची शामिल हैं।
2. खनिज संसाधनों पर कर लगाने की शक्ति केवल केंद्र सरकार के पास है।
3. खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, भारत में खनन क्षेत्र को नियंत्रित करता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि सातवीं अनुसूची में संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ शामिल हैं जो केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण करती हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि खनिज संसाधनों पर कर लगाने की शक्ति राज्यों के पास भी होती है, हालांकि केंद्र भी कुछ मामलों में नियम बना सकता है। कथन 3 सही है क्योंकि खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, भारत में खनन क्षेत्र का प्रमुख नियामक कानून है।

Q2. अभिकथन (A): खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026, खनिज-समृद्ध राज्यों की राजस्व स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है।
कारण (R): यह विधेयक केंद्र सरकार को खनिजों पर नियम बनाने और कर लगाने की एकमात्र शक्ति प्रदान करता है, जिससे राज्यों की शक्ति सीमित हो जाती है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि विधेयक के प्रावधानों से राज्यों की राजस्व स्वायत्तता पर प्रभाव पड़ने की आशंका है। कारण (R) भी सही है और A की सही व्याख्या करता है, क्योंकि विधेयक केंद्र को नियमों और करों पर अधिक अधिकार देता है, जिससे राज्यों की शक्तियां कम हो जाती हैं और उनके राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026, के संदर्भ में, भारत में राजकोषीय संघवाद पर इसके संभावित प्रभावों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का संक्षिप्त परिचय और इसके मुख्य प्रावधान (केंद्र को नियम बनाने और कर लगाने की अधिक शक्ति)।
2. **राजकोषीय संघवाद:** भारत में राजकोषीय संघवाद की अवधारणा और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों पर प्रकाश डालना (संविधान की सातवीं अनुसूची, अनुच्छेद 246, 268, 269, 270)।
3. **विधेयक का राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव:**
* **राज्यों की राजस्व स्वायत्तता में कमी:** खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए राजस्व हानि की आशंका, विशेषकर ओडिशा जैसे राज्यों के लिए।
* **विकास कार्यक्रमों पर प्रभाव:** राज्यों के स्वास्थ्य, शिक्षा, कल्याणकारी योजनाओं और बुनियादी ढांचा विकास के लिए राजस्व की कमी।
* **केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव:** राज्यों द्वारा ‘संघवाद पर प्रहार’ और ‘संवैधानिक अधिकारों का हनन’ जैसे आरोपों का उल्लेख।
* **संविधान की भावना के विरुद्ध:** राज्यों को उनके प्राकृतिक संसाधनों पर कर लगाने की शक्ति से वंचित करना।
4. **समालोचनात्मक विश्लेषण:**
* **केंद्र का दृष्टिकोण:** राष्ट्रीय हित में एकरूपता, बड़े पैमाने पर खनन परियोजनाओं का विनियमन, और राजस्व का अधिक न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करने की आवश्यकता।
* **राज्यों का दृष्टिकोण:** स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार संसाधन प्रबंधन और राजस्व जुटाने का अधिकार।
* **संतुलन की आवश्यकता:** केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगात्मक संघवाद (Cooperative Federalism) के महत्व पर जोर।
5. **निष्कर्ष:** एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करना, जिसमें खनिज संसाधनों के कुशल प्रबंधन और राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया जाए।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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