‘खेत बचाओ अभियान’: केंद्र सरकार का किसानों के लिए बड़ा कदम, जानिए पूरा प्लान

‘खेत बचाओ अभियान’: केंद्र सरकार का किसानों के लिए बड़ा कदम, जानिए पूरा प्लान

‘खेत बचाओ अभियान’: केंद्र सरकार का किसानों के लिए बड़ा कदम, जानिए पूरा प्लान

‘खेत बचाओ अभियान’: केंद्र सरकार का किसानों के लिए बड़ा कदम, जानिए पूरा प्लान — खेत बचाओ अभियान की कार्यप्रणाली
आरेख: खेत बचाओ अभियान की कार्यप्रणाली

✎ कृषि राज्य का विषय है (राज्य सूची, प्रविष्टि 14), अतः खेत बचाओ अभियान जैसी केंद्रीय पहलों की सफलता राज्य-जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों और जनभागीदारी के प्रभावी समन्वय पर निर्भर करती है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन और संघवाद: कृषि राज्य विषय होने के कारण केंद्र-राज्य समन्वय की भूमिका, नोडल अधिकारी व्यवस्था और जिला प्रशासन की भागीदारी  |  GS Paper III — कृषि और खाद्य सुरक्षा: टिकाऊ कृषि, मृदा स्वास्थ्य, फसल विविधीकरण, प्राकृतिक खेती और जलवायु-अनुकूल कृषि  |  GS Paper III — पर्यावरण: फसल अवशेष प्रबंधन से वायु प्रदूषण और मृदा क्षरण में कमी
  • Prelims: कृषि: राज्य सूची (State List) की प्रविष्टि 14 और अनुच्छेद 246 के अंतर्गत विषय, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की स्थापना 1929 में; यह स्वायत्त निकाय है और कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के अधीन कार्य करता है, मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) योजना: वर्ष 2015 में आरंभ, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY): वर्ष 2016 में आरंभ, राष्ट्रीय नवाचार जलवायु अनुकूल कृषि परियोजना (NICRA): वर्ष 2011 में आरंभ, प्रधानमंत्री प्रणाम (PM-PRANAM) योजना: वैकल्पिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा, वर्ष 2023, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) अधिनियम, 2021: दिल्ली-एनसीआर और आसपास के क्षेत्रों में फसल अवशेष दहन पर नियंत्रण से संबंधित, हैप्पी सीडर (Happy Seeder): फसल अवशेष के बिना सीधी बुवाई में उपयोग होने वाली कृषि यंत्र तकनीक
  • Essay: कृषि उत्पादकता और पर्यावरणीय स्थिरता: क्या हरित क्रांति की उपलब्धियों को टिकाऊ बनाया जा सकता है?, जनभागीदारी आधारित अभियान बनाम परिणामोन्मुखी शासन: जमीनी क्रियान्वयन की चुनौती

त्वरित पुनरावृत्ति: कृषि राज्य का विषय है (राज्य सूची, प्रविष्टि 14), अतः खेत बचाओ अभियान जैसी केंद्रीय पहलों की सफलता राज्य-जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों और जनभागीदारी के प्रभावी समन्वय पर निर्भर करती है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने 17 अक्टूबर 2026 को विभिन्न राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक में ‘खेत बचाओ अभियान’ की तैयारियों की समीक्षा की। यह अभियान 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक चलेगा। बैठक में अभियान के उद्देश्य, प्रमुख गतिविधियों, कार्यान्वयन की रणनीति और जनभागीदारी के लक्ष्यों पर चर्चा हुई। मंत्री ने राज्यों से किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और जिला प्रशासन की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने, जिला कलेक्टरों को आवश्यक निर्देश देने तथा राज्य और जिला स्तर पर नोडल अधिकारी नियुक्त करने का आग्रह किया। राज्य अपनी सुविधा और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार गतिविधियों की तिथियां तय कर सकते हैं, किंतु अभियान की प्रभावी शुरुआत पर बल दिया गया। अभियान का उद्देश्य किसानों में उन्नत कृषि पद्धतियों, संसाधनों के कुशल उपयोग, टिकाऊ खेती और केंद्र की किसान-केंद्रित योजनाओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

पृष्ठभूमि

  • कृषि संविधान के अंतर्गत राज्य का विषय है, इसलिए नीतियों के जमीनी क्रियान्वयन में राज्य सरकारों और जिला प्रशासन की केंद्रीय भूमिका होती है, जबकि केंद्र नीतिगत दिशा, वित्तीय सहायता और तकनीकी समन्वय प्रदान करता है।
  • हरित क्रांति के बाद धान-गेहूं फसल चक्र के विस्तार से भूजल दोहन, मृदा में पोषक तत्वों का असंतुलन और उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग जैसी समस्याएं उभरीं, जिनके समाधान हेतु टिकाऊ पद्धतियों पर बल बढ़ा है।
  • उत्तर-पश्चिमी भारत में धान की कटाई के बाद फसल अवशेष प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। इसी कारण वायु प्रदूषण नियंत्रण हेतु CAQM अधिनियम, 2021 के अंतर्गत आयोग गठित किया गया, जो फसल अवशेष दहन की निगरानी करता है।
  • भारत में मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण और जैविक तथा प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक नीतिगत पहलें की गई हैं, जिनमें मृदा स्वास्थ्य कार्ड, राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन और PM-PRANAM उल्लेखनीय हैं।
  • कृषि क्षेत्र में डिजिटल पहचान और लाभार्थी पंजीकरण के लिए किसान पहचान पत्र (फार्मर आईडी) की अवधारणा महत्वपूर्ण होती जा रही है, जिससे योजनाओं का लक्ष्य-निर्धारण और वितरण अधिक सटीक हो सके।

खेत बचाओ अभियान क्या है?

  • यह एक समयबद्ध राष्ट्रव्यापी जागरूकता-सह-क्रियान्वयन अभियान है, जो 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक चलेगा। इसका उद्देश्य टिकाऊ कृषि पद्धतियों और सरकारी योजनाओं के लाभ को किसानों तक पहुंचाना है।
  • इसके प्रमुख विषयों में फसल अवशेष प्रबंधन, एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management), मृदा स्वास्थ्य में सुधार, जलवायु-अनुकूल कृषि तथा तिलहन और दलहन फसलों को बढ़ावा देना शामिल हैं।
  • प्राकृतिक खेती, एकीकृत कृषि प्रणाली, कृषि यंत्रीकरण और पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) को भी प्रोत्साहित करने का लक्ष्य है।
  • उर्वरकों का संतुलित उपयोग, ग्रीन अमोनिया और जैविक आदानों का प्रयोग, जल संरक्षण, फसल विविधीकरण, अंतरफसली खेती तथा उपयुक्त फसल किस्मों को अपनाने पर जागरूकता फैलाई जाएगी।
  • धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों के प्रभावी उपयोग से भूमि उपयोग और फसल सघनता बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
  • अभियान का संचालन राज्य और जिला स्तर पर नियुक्त नोडल अधिकारियों के माध्यम से होगा, जो गतिविधियों की निगरानी और समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करेंगे।
  • प्रत्यक्ष रूप से भाग न ले सकने वाले किसानों तक पहुंचने के लिए प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया का उपयोग करने का सुझाव दिया गया है।
  • यह एक जागरूकता-केंद्रित पहल है; इसके लिए अलग से किसी नए वैधानिक ढांचे या विशिष्ट वित्तीय आवंटन की घोषणा समाचार विज्ञप्ति में नहीं की गई है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
अभियान की अवधि 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक चलने वाला अभियान। राज्य स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार गतिविधियों की तिथियां तय कर सकते हैं, परंतु अभियान की प्रभावी शुरुआत अनिवार्य है।
संस्थागत ढांचा राज्य और जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति, जिला कलेक्टरों को निर्देश, और केंद्र-राज्य समन्वय के माध्यम से निगरानी व समयबद्ध क्रियान्वयन।
तकनीकी विषय फसल अवशेष प्रबंधन, एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management), मृदा स्वास्थ्य में सुधार, जलवायु-अनुकूल कृषि तथा तिलहन और दलहन फसलों को बढ़ावा।
वैकल्पिक कृषि पद्धतियां प्राकृतिक खेती, एकीकृत कृषि प्रणाली (Integrated Farming System), कृषि यंत्रीकरण तथा पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture)।
पोषक तत्व और आदान प्रबंधन उर्वरकों का संतुलित उपयोग, ग्रीन अमोनिया तथा जैविक आदानों का प्रयोग, और जल संरक्षण।
भूमि उपयोग और फसल सघनता धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों का उपयोग, फसल विविधीकरण और अंतरफसली खेती से फसल सघनता बढ़ाना।

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • फसल अवशेष प्रबंधन और मृदा स्वास्थ्य सुधार से मृदा में जैविक कार्बन बढ़ाने की संभावना बनती है, जिससे भूमि की उर्वरता और जल धारण क्षमता सुधरती है।
  • जैविक आदानों और संतुलित उर्वरक उपयोग से रासायनिक प्रदूषण घटाने में सहायता मिलती है।
  • जलवायु-अनुकूल कृषि और जल संरक्षण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से फसल-तंत्र की सहनशीलता बढ़ाते हैं।

आर्थिक महत्व

  • तिलहन और दलहन को बढ़ावा देने से खाद्य तेलों और दालों के आयात पर निर्भरता घटाने की दिशा में नीति-समर्थन मिलता है।
  • फसल विविधीकरण और अंतरफसली खेती से किसानों की आय के स्रोत बढ़ सकते हैं और एक ही फसल पर जोखिम घटता है।
  • ग्रीन अमोनिया जैसे विकल्पों की चर्चा उर्वरक क्षेत्र में ऊर्जा-कुशल और कम-कार्बन तकनीकों की ओर संकेत करती है।

प्रशासनिक और संघीय महत्व

  • कृषि राज्य सूची का विषय होने के कारण यह अभियान केंद्र और राज्यों के सहयोगी संघवाद (Cooperative Federalism) का व्यावहारिक उदाहरण है।
  • नोडल अधिकारियों और जिला स्तर की निगरानी से योजनाओं के क्रियान्वयन में जवाबदेही और परिणामोन्मुखी प्रशासन (Result-oriented Governance) को बल मिलता है।

किसान कल्याण और सूचना-प्रसार

  • किसान पहचान पत्र (फार्मर आईडी) के निर्माण से किसानों के डेटा-आधारित लक्षित लाभ-वितरण की प्रक्रिया मजबूत हो सकती है।
  • प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के उपयोग से कृषि-ज्ञान का प्रसार दूरस्थ क्षेत्रों तक हो सकता है।

चुनौतियाँ

1. औपचारिकता बनाम परिणाम

  • अभियान के उद्देश्यों को जमीनी स्तर पर परिणाम में बदलने के लिए गतिविधियों की वास्तविक निगरानी आवश्यक है।
  • जागरूकता कार्यक्रमों की संख्या को लक्ष्य मान लेने से प्रभाव का सही आकलन नहीं हो पाता।

2. राज्यों में तिथियों और कार्यान्वयन की एकरूपता

  • राज्यों को तिथियां तय करने की छूट होने से अभियान की राष्ट्रीय एकरूपता और तुलनात्मक मूल्यांकन कठिन हो सकता है।
  • राज्यों की प्रशासनिक क्षमता और संसाधनों में अंतर से क्रियान्वयन की गुणवत्ता असमान रह सकती है।

3. फसल अवशेष प्रबंधन की आर्थिक बाधाएं

  • पराली के इन-सीटू (In-situ) प्रबंधन के लिए मशीनरी की लागत और उपलब्धता छोटे किसानों के लिए बाधा बनती है।
  • पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है, इसलिए विकल्पों का व्यावहारिक और सस्ता होना आवश्यक है।

4. जागरूकता से अपनाने तक का अंतर

  • केवल सूचना देने से किसान नई पद्धतियां नहीं अपनाते; प्रदर्शन-खेत, प्रत्यक्ष प्रशिक्षण और प्रोत्साहन आवश्यक हैं।
  • कृषि विस्तार सेवाओं की कमी और कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK) की सीमित पहुंच इस अंतर को बढ़ाती है।

5. प्राकृतिक खेती और रासायनिक आदानों का संतुलन

  • प्राकृतिक खेती के प्रसार के साथ उत्पादकता पर पड़ने वाले प्रभाव का वैज्ञानिक और क्षेत्रवार मूल्यांकन जरूरी है।
  • उर्वरकों के संतुलित उपयोग की सिफारिश को किसानों के स्थानीय मृदा-परीक्षण से जोड़ना होगा।

6. किसान डेटा और डिजिटल पहुंच

  • किसान पहचान पत्र के लिए एकत्र डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • डिजिटल माध्यमों पर निर्भरता से डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट की कमी वाले क्षेत्रों के किसान पीछे छूट सकते हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
समयसीमा और राज्य-स्वायत्तता तिथियों में अंतर से राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ प्रभाव और तुलनात्मक मूल्यांकन कठिन होता है।
पराली प्रबंधन की लागत मशीनरी और उपकरणों की लागत तथा किराये की उपलब्धता छोटे किसानों की पहुंच से बाहर हो सकती है।
विस्तार सेवाओं की कमी कृषि विस्तार अधिकारियों और प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी से जमीनी स्तर पर प्रभाव सीमित रह सकता है।
परिणामों का मापन जागरूकता गतिविधियों की संख्या के आधार पर सफलता आंकी जाए तो वास्तविक अपनाने की दर का पता नहीं चलता।
डिजिटल पहुंच और समावेशन फार्मर आईडी और मीडिया-आधारित प्रचार से वंचित किसानों तक पहुंच सुनिश्चित करना चुनौती है।
डेटा सुरक्षा किसानों के व्यक्तिगत और भूमि संबंधी डेटा के दुरुपयोग का जोखिम बना रहता है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana)
  • राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (National Mission on Natural Farming)

आगे की राह

  • अभियान के लिए राज्य और जिला स्तर के नोडल अधिकारियों की स्पष्ट जिम्मेदारियां तय हों और उनकी नियमित समीक्षा हो।
  • गतिविधियों की सफलता को केवल आयोजनों की संख्या से नहीं, बल्कि अपनाई गई पद्धतियों और क्षेत्रवार परिणामों से मापा जाए।
  • फसल अवशेष प्रबंधन के लिए किराये पर मशीनरी उपलब्ध कराने वाले कस्टम हायरिंग केंद्रों को बढ़ावा दिया जाए।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड और स्थानीय मृदा-परीक्षण के आधार पर उर्वरकों के संतुलित उपयोग की सिफारिशें किसानों तक पहुंचाई जाएं।
  • कृषि विज्ञान केंद्रों (KVK), राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और प्रसार कर्मियों को प्रदर्शन-खेतों के माध्यम से व्यावहारिक प्रशिक्षण में लगाया जाए।
  • फार्मर आईडी से जुड़े डेटा के लिए स्पष्ट गोपनीयता नियम और सुरक्षा-मानक लागू किए जाएं।
  • डिजिटल माध्यमों के साथ ग्राम पंचायत, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय नेतृत्व के माध्यम से ऑफलाइन पहुंच भी सुनिश्चित की जाए।
  • तिलहन और दलहन की खेती के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और खरीद की स्पष्टता से किसानों का विश्वास बढ़ाया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

कृषि राज्य विषय (Agriculture as a State Subject) · सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · फसल अवशेष प्रबंधन (Crop Residue Management) · मृदा स्वास्थ्य (Soil Health) · प्राकृतिक खेती (Natural Farming) · एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management) · फसल विविधीकरण (Crop Diversification) · जलवायु-अनुकूल कृषि (Climate-Resilient Agriculture) · भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) · किसान पहचान पत्र (Farmer ID) · जनभागीदारी आधारित अभियान (Campaign-Mode Governance) · परिणामोन्मुखी शासन (Outcome-Oriented Governance)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची: कृषि राज्य सूची का विषय
  • सातवीं अनुसूची, राज्य सूची प्रविष्टि 14: कृषि और कृषि शिक्षा
  • अनुच्छेद 48: आधुनिक और वैज्ञानिक ढंग से कृषि
  • ग्यारहवीं अनुसूची, विषय 3: कृषि और कृषि विस्तार

अवधारणा प्रवाह

जलवायु परिवर्तन, मृदा क्षरण और रासायनिक उर्वरकों के असंतुलित उपयोग से कृषि उत्पादकता और पर्यावरण पर दबाव बढ़ा।  →  केंद्र सरकार ने अभियान के लक्ष्य तय किए और राज्यों के कृषि मंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक में रणनीति पर चर्चा हुई।  →  राज्य और जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति और जिला कलेक्टरों के निर्देशों से क्रियान्वयन का ढांचा तैयार होगा।  →  फसल अवशेष प्रबंधन, मृदा स्वास्थ्य, प्राकृतिक खेती और फसल विविधीकरण पर किसानों के बीच जागरूकता और प्रदर्शन गतिविधियां चलेंगी।  →  मीडिया और फार्मर आईडी जैसे माध्यमों से व्यापक पहुंच बनाकर किसानों को योजनाओं (जैसे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना) से जोड़ा जाएगा।  →  अपनाई गई पद्धतियों और निगरानी के आधार पर उत्पादकता, पर्यावरणीय सुधार और किसान आय पर प्रभाव का मूल्यांकन होगा।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कृषि भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची (State List) का विषय है।
2. हैप्पी सीडर (Happy Seeder) एक ऐसी मशीन है जो फसल अवशेष को हटाए बिना सीधी बुवाई करने में सहायक है।
3. तिलहन और दलहन फसलें केवल खरीफ मौसम में ही उगाई जा सकती हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: कृषि राज्य सूची की प्रविष्टि 14 में आती है, इसलिए राज्य इस पर मुख्य विधिक क्षमता रखते हैं। कथन 2 सही है: हैप्पी सीडर पिछली फसल के अवशेष के बीच सीधी बुवाई करती है, जिससे धान अवशेष जलाने की प्रवृत्ति घटती है। कथन 3 गलत है, क्योंकि तिलहन और दलहन की कई फसलें रबी और जायद मौसम में भी उगाई जाती हैं।

Q2. निम्नलिखित पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): धान अवशेष को खुले में जलाने से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता में गिरावट आती है।
कारण (R): अवशेष दहन से सूक्ष्म कण पदार्थ (PM2.5) और धुएं जैसे प्रदूषक बड़ी मात्रा में वायुमंडल में छोड़े जाते हैं।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (b) (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (c) (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (d) (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (a) (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अभिकथन और कारण दोनों सही हैं। वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) अधिनियम, 2021 के अंतर्गत पराली दहन पर नियंत्रण राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की प्रमुख नीति चुनौती रहा है। कारण सीधे अभिकथन की व्याख्या करता है, क्योंकि प्रदूषक उत्सर्जन ही गिरावट का कारण है।

Q3. सूची-I (योजना/संस्था) को सूची-II (विशेषता) से सुमेलित कीजिए:

सूची-I
A. मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme)
B. प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana)
C. राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission)
D. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research)

सूची-II
1. किसानों को मिट्टी के पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी देना
2. फसल हानि की स्थिति में बीमा सुरक्षा प्रदान करना
3. हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा देना
4. कृषि अनुसंधान और शिक्षा के लिए सर्वोच्च राष्ट्रीय निकाय के रूप में कार्य करना

सही कूट चुनिए:

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-4, D-3
  3. A-3, B-4, C-1, D-2
  4. A-1, B-3, C-2, D-4

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — मृदा स्वास्थ्य कार्ड पोषक तत्वों की स्थिति बताता है (A-1)। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना फसल हानि पर बीमा सुरक्षा देती है (B-2)। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन हरित हाइड्रोजन से संबंधित है (C-3)। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद कृषि अनुसंधान का सर्वोच्च निकाय है (D-4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ कृषि राज्य सूची का विषय होने के बावजूद केंद्र द्वारा समयबद्ध राष्ट्रव्यापी अभियानों का सहारा लिया जाता है। ऐसे अभियानों की प्रभावशीलता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि राज्य और जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों की नियुक्ति जैसे प्रशासनिक उपाय सहकारी संघवाद की भावना को किस सीमा तक सुदृढ़ करते हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
1. भूमिका: खेत बचाओ अभियान (22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026) का उल्लेख करें, जिसकी तैयारियों की समीक्षा केंद्रीय कृषि मंत्री ने राज्य कृषि मंत्रियों के साथ वर्चुअल बैठक में की। उद्देश्य: उन्नत पद्धतियों, संसाधन-कुशल उपयोग, टिकाऊ खेती और योजनाओं के बारे में जागरूकता।
2. संवैधानिक ढांचा: अनुच्छेद 246 के अंतर्गत संघ और राज्यों की विधायी शक्तियों का वितरण; सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 14 (कृषि); समवर्ती सूची की प्रविष्टि 33 (खाद्य पदार्थों, जिनमें तिलहन और तेल शामिल हैं, के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण पर नियंत्रण) से संघ की भूमिका का आधार।
3. वित्तीय और संस्थागत माध्यम: अनुच्छेद 282 के अंतर्गत केंद्र प्रायोजित योजनाएं; अनुच्छेद 280 के अंतर्गत वित्त आयोग द्वारा संसाधन वितरण; अनुच्छेद 263 के अंतर्गत अंतरराज्यीय परिषद; नीति आयोग (2015) के माध्यम से सहकारी संघवाद।
4. समर्थक तर्क: राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ जागरूकता, समन्वित संदेश, राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तिथियां तय करने की छूट; मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना तथा प्राकृतिक खेती (राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन) जैसी पहलों के प्रसार में सहायता।
5. आलोचनात्मक पक्ष: अभियान का केवल औपचारिकता बन जाने का जोखिम (राज्य-स्तरीय क्षमता और निगरानी में असमानता); प्रत्येक राज्य के लिए एक जैसा ढांचा, जबकि कृषि जलवायु क्षेत्र भिन्न हैं; परिणाम मापने के लिए स्पष्ट संकेतकों का अभाव।
6. संतुलित दृष्टिकोण: स्वामीनाथन आयोग (राष्ट्रीय किसान आयोग, 2004-06) की उत्पादकता, मृदा स्वास्थ्य और आय-सुरक्षा संबंधी सिफारिशों से तुलना; शांता कुमार समिति (2015) द्वारा खाद्य भंडारण और खरीद व्यवस्था पर टिप्पणी का संदर्भ।
7. उदाहरण: पराली प्रबंधन में केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय तथा वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) अधिनियम, 2021 के अंतर्गत बहु-राज्यीय नियामक ढांचा।
8. निष्कर्ष: अभियानात्मक शासन तभी प्रभावी है जब वह सहकारी संघवाद के अंतर्गत स्थानीय स्वामित्व, स्पष्ट निगरानी संकेतकों और निरंतर वित्तीय समर्थन के साथ जुड़े।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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