जनजातीय मामलों के मंत्रालय और सीएसआईआर-एनबीआरआई ने जैव संसाधनों के संरक्षण के लिए किया समझौता

जनजातीय मामलों के मंत्रालय और सीएसआईआर-एनबीआरआई ने जैव संसाधनों के संरक्षण के लिए किया समझौता

Map of Uttar Pradesh, Lucknow highlighted on the map of India — Tribal medicinal plants conservation CSIR-NBRI MoUMind map of Tribal Medicinal Plants Conservation concept mind map — Tribal medicinal plants conservation CSIR-NBRI MoU

मानचित्र व माइंड-मैप: MoTA-CSIR-NBRI partnership for tribal medicinal plants

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — सामाजिक न्याय, कमजोर वर्गों का कल्याण  |  GS Paper III — पर्यावरण और जैव-विविधता, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
  • Prelims: जनजातीय कार्य मंत्रालय, सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NBRI), दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त (RET) औषधीय पौधे, पारंपरिक ज्ञान, जैव विविधता अधिनियम, 2002, पूर्व-सूचित सहमति (PIC), बौद्धिक संपदा अधिकार, जैव-संसाधन संरक्षण
  • Essay: भारत में जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण: पारंपरिक ज्ञान और सतत विकास, जैव-विविधता संरक्षण में स्थानीय समुदायों की भूमिका और चुनौतियाँ

त्वरित पुनरावृत्ति: जनजातीय मामलों के मंत्रालय और CSIR-NBRI के बीच समझौता ज्ञापन दुर्लभ औषधीय पौधों के संरक्षण और जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा के माध्यम से उनके सशक्तिकरण पर केंद्रित है, जिसमें जैव विविधता अधिनियम, 2002 का पालन और लाभ साझाकरण सुनिश्चित किया गया है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

जनजातीय मामलों के मंत्रालय (MoTA) ने दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त (RET) औषधीय पौधों की प्रजातियों के संरक्षण तथा जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान की रक्षा के लिए सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NBRI), लखनऊ के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह तीन वर्षीय साझेदारी जनजातीय कल्याण को बढ़ावा देने, स्थायी आजीविका को प्रोत्साहित करने और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में जनजातीय समुदाय सदियों से वनों और जैव-विविधता के साथ सहजीवी संबंध साझा करते रहे हैं, जिससे उन्हें औषधीय पौधों और उनके उपयोग का गहरा पारंपरिक ज्ञान प्राप्त है।
  • कई औषधीय पौधों की प्रजातियाँ, विशेषकर जनजातीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली, अत्यधिक दोहन, पर्यावास विनाश और जलवायु परिवर्तन के कारण दुर्लभ, लुप्तप्राय या संकटग्रस्त श्रेणी में आ गई हैं।
  • पारंपरिक ज्ञान का अनधिकृत व्यावसायीकरण (बायोपायरेसी) और इसके लाभों का जनजातीय समुदायों के साथ उचित साझाकरण न होना एक प्रमुख चिंता का विषय रहा है।
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002, भारत में जैव-विविधता के संरक्षण, इसके घटकों के सतत उपयोग और जैविक संसाधनों के उपयोग से होने वाले लाभों के उचित एवं न्यायसंगत साझाकरण का प्रावधान करता है।
  • जनजातीय मामलों का मंत्रालय जनजातीय समुदायों के समग्र विकास और कल्याण के लिए विभिन्न नीतियों और कार्यक्रमों को लागू करता है, जिसमें उनकी सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण भी शामिल है।
  • सीएसआईआर-राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (CSIR-NBRI) पादप विज्ञान के क्षेत्र में एक प्रमुख अनुसंधान संस्थान है, जिसके पास पौधों के संरक्षण और नृजातीय वनस्पति विज्ञान (Ethnobotany) में विशेषज्ञता है।

समझौता ज्ञापन (MoU) के मुख्य बिंदु

  • यह समझौता ज्ञापन जनजातीय जैव-संसाधनों के संरक्षण और नृजातीय वनस्पति विज्ञान संबंधी मूल्यांकन के लिए अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देगा।
  • दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त (RET) औषधीय पौधों की प्रजातियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिसमें ऊतक संवर्धन सुविधाओं और विशेष बीज बैंकों का विकास शामिल है।
  • स्थानीय जनजातीय युवाओं को इन प्रसार और संरक्षण तकनीकों में व्यावहारिक क्षमता निर्माण और तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, जिससे समुदाय-प्रबंधित स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
  • सभी क्षेत्र मूल्यांकन और अनुसंधान गतिविधियों के लिए स्थानीय ग्राम सभाओं और जनजातीय समुदायों की पूर्व-सूचित सहमति (PIC) अनिवार्य होगी, जो जैव विविधता अधिनियम, 2002 का पूर्ण अनुपालन है।
  • प्रत्येक संयुक्त परियोजना प्रस्ताव में जमीनी स्तर पर सामुदायिक विकास, स्थानीय मूल्यवर्धन और क्षमता निर्माण के लिए एक समर्पित बजट मद शामिल होगा।
  • उत्पन्न किसी भी बौद्धिक संपदा का स्वामित्व संयुक्त रूप से MoTA और CSIR-NBRI के पास होगा, जिसे योगदान देने वाले जनजातीय समुदायों के लिए न्यास में रखा जाएगा या उनके साथ समान रूप से साझा किया जाएगा।
  • वित्तीय लाभ राष्ट्रीय या राज्य जैव विविधता कोष और MoTA की समर्पित कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से वापस दिया जाएगा।
  • यह समझौता पारंपरिक ज्ञान को जनजातीय लोगों की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता देता है और अनधिकृत व्यावसायीकरण को रोकने के लिए राष्ट्रीय पहुंच और लाभ साझाकरण तंत्रों का कड़ाई से अनुपालन अनिवार्य करता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त (RET) औषधीय पौधों का संरक्षण जैव विविधता (Biodiversity) के संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण।
जनजातीय पारंपरिक ज्ञान का संरक्षण यह ज्ञान औषधीय पौधों की पहचान, उपयोग और संरक्षण के लिए अमूल्य है, जो जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है।
स्थानीय जनजातीय युवाओं का क्षमता निर्माण प्रसार और संरक्षण तकनीकों में प्रशिक्षण से जनजातीय समुदायों को आत्मनिर्भर बनाने और स्थायी आजीविका के अवसर प्रदान करने में मदद मिलेगी।
ग्राम सभाओं की पूर्व-सूचित सहमति (PIC) अनिवार्य यह जैव विविधता अधिनियम, 2002 का अनुपालन सुनिश्चित करता है और जनजातीय समुदायों के अधिकारों एवं संप्रभुता का सम्मान करता है।
बौद्धिक संपदा (Intellectual Property) का संयुक्त स्वामित्व जनजातीय समुदायों के हितों की रक्षा करता है और उनके पारंपरिक ज्ञान के अनुचित व्यावसायीकरण को रोकता है।
वित्तीय लाभों का समान वितरण राष्ट्रीय या राज्य जैव विविधता कोष और जनजातीय मामलों के मंत्रालय की कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से लाभों को वापस समुदायों तक पहुंचाना, जिससे उनका सशक्तिकरण हो।

महत्व

सामाजिक महत्व

  • यह समझौता जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को मान्यता देता है और उसका सम्मान करता है, जो उनकी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
  • स्थानीय जनजातीय युवाओं को प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के माध्यम से सशक्त बनाना, जिससे उन्हें अपनी आजीविका में सुधार करने और अपने समुदायों के भीतर नेतृत्व की भूमिका निभाने में मदद मिलेगी।
  • जनजातीय समुदायों की पूर्व-सूचित सहमति (PIC) को अनिवार्य करके उनके अधिकारों और संप्रभुता को सुनिश्चित करना, जिससे विकास प्रक्रियाओं में उनकी भागीदारी बढ़ती है।

पर्यावरण और जैव विविधता महत्व

  • दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त (RET) औषधीय पौधों की प्रजातियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान केंद्रित करना, जो भारत की समृद्ध जैव विविधता को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • ऊतक संवर्धन सुविधाओं और विशेष बीज बैंकों का विकास करके इन पौधों की प्रजातियों के दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करना।
  • पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के संयोजन से जैव संसाधनों के स्थायी उपयोग और प्रबंधन को बढ़ावा देना।

आर्थिक महत्व

  • जनजातीय समुदायों को औषधीय पौधों के संरक्षण और प्रसार में शामिल करके स्थायी आजीविका के अवसर प्रदान करना।
  • उत्पन्न बौद्धिक संपदा का संयुक्त स्वामित्व और वित्तीय लाभों का समान वितरण सुनिश्चित करना, जिससे जनजातीय समुदायों को उनके ज्ञान और प्रयासों के लिए उचित प्रतिफल मिल सके।
  • स्थानीय मूल्यवर्धन और क्षमता निर्माण के लिए समर्पित बजट मदों के माध्यम से जमीनी स्तर पर सामुदायिक विकास को बढ़ावा देना।

चुनौतियाँ

1. पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण और सत्यापन

  • पारंपरिक ज्ञान मौखिक रूप से हस्तांतरित होता है, जिसका दस्तावेजीकरण करना और वैज्ञानिक रूप से सत्यापित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
  • ज्ञान की सटीकता और प्रामाणिकता सुनिश्चित करने के लिए उचित प्रोटोकॉल और पद्धतियों की आवश्यकता होती है।

2. बौद्धिक संपदा अधिकारों का प्रबंधन

  • जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान से उत्पन्न बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा और प्रबंधन एक जटिल कार्य है।
  • अनधिकृत व्यावसायीकरण और जैव-पायरेसी (Bio-piracy) को रोकने के लिए मजबूत कानूनी और संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता है।

3. क्षमता निर्माण और जागरूकता

  • जनजातीय समुदायों, विशेषकर युवाओं को आधुनिक संरक्षण तकनीकों और वैज्ञानिक पद्धतियों में प्रशिक्षित करना एक सतत प्रक्रिया है।
  • परियोजना के उद्देश्यों और लाभों के बारे में समुदायों के बीच जागरूकता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

4. संसाधनों का स्थायी उपयोग और संरक्षण

  • दुर्लभ औषधीय पौधों के अत्यधिक दोहन को रोकना और उनके स्थायी उपयोग को सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
  • संरक्षण प्रयासों को स्थानीय समुदायों की आजीविका आवश्यकताओं के साथ संतुलित करना आवश्यक है।

5. अंतर-एजेंसी समन्वय

  • जनजातीय मामलों के मंत्रालय और CSIR-NBRI जैसे विभिन्न संगठनों के बीच प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करना।
  • परियोजना के सफल कार्यान्वयन के लिए विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोग और तालमेल बनाए रखना।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पारंपरिक ज्ञान का क्षरण आधुनिकीकरण और शहरीकरण के कारण जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान का धीरे-धीरे लुप्त होना।
जैव-पायरेसी और अनधिकृत व्यावसायीकरण जनजातीय पारंपरिक ज्ञान का बिना अनुमति या उचित लाभ-साझाकरण के व्यावसायिक उपयोग।
संसाधन प्रबंधन में स्थानीय भागीदारी की कमी संरक्षण और विकास परियोजनाओं में जनजातीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित न हो पाना।
पर्याप्त वित्तीय और तकनीकी सहायता का अभाव संरक्षण और क्षमता निर्माण गतिविधियों के लिए पर्याप्त धन और विशेषज्ञता की कमी।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जलवायु परिवर्तन के कारण औषधीय पौधों की प्रजातियों के आवास और उपलब्धता पर नकारात्मक प्रभाव।

आगे की राह

  • जनजातीय समुदायों के साथ परामर्श और उनकी सक्रिय भागीदारी के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण और सत्यापन के लिए एक मानकीकृत प्रोटोकॉल विकसित करना।
  • बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कानूनी ढाँचा स्थापित करना और यह सुनिश्चित करना कि जनजातीय समुदायों को उनके ज्ञान के लिए उचित लाभ-साझाकरण प्राप्त हो।
  • जनजातीय युवाओं के लिए व्यापक क्षमता निर्माण कार्यक्रम शुरू करना, जिसमें औषधीय पौधों के संरक्षण, प्रसार और स्थायी कटाई की आधुनिक तकनीकें शामिल हों।
  • पारंपरिक चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के बीच नियमित संवाद और संयुक्त अनुसंधान कार्यक्रमों को बढ़ावा देना ताकि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच एक मजबूत सेतु बन सके।
  • जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करना, विशेष रूप से पूर्व-सूचित सहमति (PIC) और लाभ-साझाकरण तंत्रों के संबंध में।
  • परियोजना के कार्यान्वयन की निगरानी और मूल्यांकन के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करना, जिसमें जनजातीय प्रतिनिधियों को शामिल किया जाए ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
  • जनजातीय क्षेत्रों में औषधीय पौधों के संरक्षण और मूल्यवर्धन के लिए स्थानीय स्तर पर छोटे उद्यमों और सहकारिताओं को बढ़ावा देना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जनजातीय पारंपरिक ज्ञान · औषधीय पौधों का संरक्षण · जैव विविधता अधिनियम 2002 · पहुंच और लाभ साझाकरण · सामुदायिक संप्रभुता · नृजातीय वनस्पति विज्ञान · बौद्धिक संपदा अधिकार · सतत सामुदायिक विकास · राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन · ग्राम सभा की पूर्व-सूचित सहमति

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 46: अनुसूचित जातियों और जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की अभिवृद्धि।
  • अनुच्छेद 244: अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित प्रावधान।
  • पांचवीं अनुसूची: कुछ राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित प्रावधान।
  • छठी अनुसूची: असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित प्रावधान।

अवधारणा प्रवाह

जनजातीय मामलों के मंत्रालय और CSIR-NBRI के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर।  →  दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त (RET) औषधीय पौधों की प्रजातियों का संरक्षण।  →  जनजातीय पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण और संरक्षण।  →  स्थानीय जनजातीय युवाओं का क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण।  →  बौद्धिक संपदा का संयुक्त स्वामित्व और लाभ-साझाकरण।  →  जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण और स्थायी आजीविका का संवर्धन।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. जनजातीय मामलों के मंत्रालय और CSIR-NBRI के बीच हुए हालिया समझौता ज्ञापन (MOU) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. इस साझेदारी का मुख्य उद्देश्य भारत भर में जनजातीय जैव संसाधनों के संरक्षण और नृजातीय वनस्पति विज्ञान संबंधी मूल्यांकन के लिए अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना है।
2. इस समझौते के तहत, सभी क्षेत्र मूल्यांकन और अनुसंधान गतिविधियों के लिए स्थानीय ग्राम सभाओं और जनजातीय समुदायों की पूर्व-सूचित सहमति (PIC) अनिवार्य नहीं होगी।
3. उत्पन्न किसी भी बौद्धिक संपदा का स्वामित्व संयुक्त रूप से MoTA और CSIR-NBRI के पास होगा, जिसे योगदान देने वाले जनजातीय समुदायों के लिए न्यास में रखा जाएगा या उनके साथ समान रूप से साझा किया जाएगा।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि यह समझौता ज्ञापन का प्राथमिक उद्देश्य है। कथन 2 गलत है क्योंकि जैव विविधता अधिनियम, 2002 के पूर्ण अनुपालन के लिए पूर्व-सूचित सहमति अनिवार्य है। कथन 3 सही है क्योंकि यह बौद्धिक संपदा के स्वामित्व और लाभ साझाकरण की व्यवस्था को सही ढंग से बताता है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से जनजातीय मामलों के मंत्रालय और CSIR-NBRI के बीच समझौता ज्ञापन का एक प्रमुख उद्देश्य है/हैं?
1. दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त (RET) औषधीय पौधों की प्रजातियों का संरक्षण।
2. जनजातीय युवाओं को प्रसार और संरक्षण तकनीकों में व्यावहारिक क्षमता निर्माण और तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान करना।
3. पारंपरिक ज्ञान को जनजातीय लोगों की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता देना और अनधिकृत व्यावसायीकरण को रोकना।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: 1, 2 और 3 — सभी तीनों उद्देश्य समझौता ज्ञापन के प्रमुख घटक हैं। यह दुर्लभ पौधों के संरक्षण, जनजातीय युवाओं के सशक्तिकरण और पारंपरिक ज्ञान की सुरक्षा पर केंद्रित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और जैव विविधता के सतत उपयोग में ‘पहुंच और लाभ साझाकरण’ (Access and Benefit Sharing – ABS) तंत्र की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। हाल ही में जनजातीय मामलों के मंत्रालय और CSIR-NBRI के बीच हुए समझौता ज्ञापन के संदर्भ में इसके महत्व पर भी प्रकाश डालिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: पारंपरिक ज्ञान और जैव विविधता के बीच संबंध को संक्षेप में परिभाषित करें।
मुख्य भाग:
1. पहुंच और लाभ साझाकरण (ABS) तंत्र: इसकी अवधारणा, उद्देश्य और जैव विविधता अधिनियम, 2002 के तहत इसके प्रावधानों की व्याख्या करें।
2. ABS की भूमिका: जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, उनके अधिकारों की सुरक्षा, संसाधनों के सतत उपयोग को बढ़ावा देने और अनधिकृत व्यावसायीकरण को रोकने में इसकी भूमिका का विश्लेषण करें।
3. समालोचनात्मक परीक्षण: ABS तंत्र की चुनौतियों, जैसे कार्यान्वयन में बाधाएं, लाभ साझाकरण की असमानता, और पारंपरिक ज्ञान के दस्तावेजीकरण से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करें।
4. MoTA-CSIR-NBRI समझौता ज्ञापन का महत्व: इस समझौता ज्ञापन के विशिष्ट प्रावधानों (जैसे पूर्व-सूचित सहमति, संयुक्त बौद्धिक संपदा स्वामित्व, सामुदायिक विकास के लिए समर्पित बजट) का उल्लेख करें और बताएं कि यह ABS सिद्धांतों को कैसे मजबूत करता है।
5. जनजातीय सशक्तिकरण और सांस्कृतिक संरक्षण: बताएं कि यह समझौता ज्ञापन कैसे जनजातीय युवाओं के क्षमता निर्माण और उनके सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में योगदान देगा।
निष्कर्ष: एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जो पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और सतत विकास के लिए ABS तंत्र और ऐसे समझौता ज्ञापनों के महत्व को रेखांकित करे, साथ ही भविष्य की चुनौतियों के समाधान पर भी प्रकाश डाले।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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