डीएमके ने परिसीमन बिल का समर्थन करने के लिए रखे तीन प्रमुख शर्तें

DMK lays down conditions to support delimitation Bill — diagram

डीएमके ने परिसीमन बिल का समर्थन करने के लिए रखे तीन प्रमुख शर्तें

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Delimitation Process

✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, और भारत में यह प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद की जाती है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना  |  GS Paper II — संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचा, शक्तियों का पृथक्करण, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ
  • Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950, जनगणना, संवैधानिक संशोधन
  • Essay: भारत में संघवाद: चुनौतियाँ और भविष्य का मार्ग, प्रतिनिधित्व का लोकतंत्र और उसकी बदलती गतिशीलता

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, और भारत में यह प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद की जाती है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्र सरकार द्वारा नए परिसीमन (Delimitation) अभ्यास के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने की संभावनाओं के बीच, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने विधेयक को समर्थन देने के लिए कुछ शर्तें रखी हैं। यह घटनाक्रम सरकार द्वारा विपक्ष तक पहुँचने के प्रयासों के बीच आया है ताकि विधेयक के लिए आवश्यक संख्या बल जुटाया जा सके।

पृष्ठभूमि

  • भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों का परिसीमन प्रत्येक जनगणना के बाद किया जाता है, जिसका उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है।
  • संविधान के अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 के तहत, संसद प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाती है।
  • पहला परिसीमन अभ्यास 1952 में हुआ था। इसके बाद 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोगों का गठन किया गया।
  • बाद में, 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया गया, जिसमें कहा गया कि अगला परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर होगा।
  • वर्तमान में, लोकसभा की सीटें 1971 की जनगणना के आधार पर निर्धारित हैं, जबकि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का समायोजन 2001 की जनगणना के आधार पर किया गया था।

परिसीमन क्या है?

  • परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण या पुनःनिर्धारण करना।
  • इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के समान खंडों को समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना और एक व्यक्ति-एक वोट के सिद्धांत को बनाए रखना है।
  • परिसीमन आयोग एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय है जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  • आयोग में एक सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य के निर्वाचन आयुक्त पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
  • परिसीमन आयोग का कार्य निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या और सीमाओं का निर्धारण करना, आरक्षित सीटों (अनुसूचित जाति/जनजाति) की पहचान करना और जनसंख्या के आंकड़ों के आधार पर सीटों का आवंटन करना है।
  • भारत में, परिसीमन अधिनियम संसद द्वारा पारित किया जाता है, जिसके बाद परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है।
  • दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि यदि 2026 के बाद नई जनगणना के आधार पर परिसीमन होता है, तो उनकी लोकसभा सीटों की संख्या घट सकती है क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि उत्तरी राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
  • DMK की मांग है कि सीटों में 50% की वृद्धि सभी राज्यों के लिए एक समान रूप से की जाए, जिससे दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व में कमी न आए।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
परिसीमन (Delimitation) का आधार लोकसभा और विधानसभा सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है, जो राज्यों के प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है।
सीटों का स्थगन (Freeze) वर्तमान में 1971 की जनगणना के आधार पर सीटों का स्थगन है, जो 2027 में समाप्त हो रहा है। यह दक्षिणी राज्यों के हितों की रक्षा करता है।
50% सीटों में वृद्धि DMK की मांग है कि सभी राज्यों के लिए लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि की जाए, ताकि प्रतिनिधित्व में असंतुलन न हो।
राज्यों के लिए सीटों की अनुसूची DMK चाहता है कि विधायी पैकेज में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या की अनुसूची शामिल हो, जिससे पारदर्शिता और निश्चितता आए।
संवैधानिक संशोधन विधेयक परिसीमन के लिए संविधान संशोधन विधेयक की आवश्यकता है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
संघवाद पर प्रभाव परिसीमन से राज्यों के प्रतिनिधित्व पर सीधा असर पड़ता है, जिससे संघवाद (Federalism) और क्षेत्रीय संतुलन प्रभावित होता है।

महत्व

राजनीतिक महत्व

  • परिसीमन विधेयक केंद्र सरकार और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक खींचतान का विषय बन गया है।
  • DMK जैसी क्षेत्रीय पार्टियों की शर्तें केंद्र सरकार के लिए विधेयक पारित कराने में चुनौती पैदा कर रही हैं।
  • यह विधेयक राज्यों के प्रतिनिधित्व और संसद में उनकी शक्ति को सीधे प्रभावित करेगा।

संवैधानिक महत्व

  • यह संविधान संशोधन विधेयक है, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत (दो-तिहाई) की आवश्यकता होगी।
  • परिसीमन का आधार (जनगणना वर्ष) संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 से संबंधित है।
  • दक्षिणी राज्यों को डर है कि नए परिसीमन से संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, जिससे संघवाद पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

सामाजिक-आर्थिक महत्व

  • जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों को नए परिसीमन से नुकसान होने की आशंका है।
  • सीटों में 50% की वृद्धि की मांग का उद्देश्य सभी राज्यों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाना और क्षेत्रीय असंतुलन को कम करना है।
  • यह विधेयक भारत की विविधता और विभिन्न क्षेत्रों की आकांक्षाओं को समायोजित करने की चुनौती को दर्शाता है।

चुनौतियाँ

1. जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व

  • जिन दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, उन्हें डर है कि नए परिसीमन से लोकसभा में उनकी सीटों की संख्या कम हो सकती है।
  • यह जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को हतोत्साहित कर सकता है।

2. संघवाद पर प्रभाव

  • परिसीमन से राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव संघवाद की भावना को कमजोर कर सकता है, खासकर यदि दक्षिणी राज्यों को नुकसान होता है।
  • यह केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ा सकता है।

3. राजनीतिक सहमति का अभाव

  • विधेयक को पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता है, लेकिन विपक्षी दलों के बीच सहमति का अभाव है।
  • DMK जैसी पार्टियां अपनी शर्तों पर अड़ी हैं, जिससे विधेयक का पारित होना मुश्किल हो सकता है।

4. सीटों की संख्या में वृद्धि का औचित्य

  • लोकसभा सीटों में 50% की वृद्धि से संसद का आकार बहुत बड़ा हो जाएगा, जिससे उसकी कार्यप्रणाली और दक्षता प्रभावित हो सकती है।
  • इसके लिए संसद भवन में पर्याप्त स्थान और अन्य संसाधनों की आवश्यकता होगी।

5. पारदर्शिता और निष्पक्षता

  • परिसीमन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है, ताकि किसी भी राज्य को अनुचित लाभ या हानि न हो।
  • DMK द्वारा सीटों की अनुसूची की मांग इसी चिंता को दर्शाती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जनसंख्या नियंत्रण में सफलता दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने का डर
संघवाद की भावना केंद्र-राज्य संबंधों में संभावित तनाव
संवैधानिक संशोधन के लिए बहुमत विपक्षी दलों से सहमति प्राप्त करने में चुनौती
संसद का आकार सीटों में वृद्धि से संसद की कार्यप्रणाली पर प्रभाव
क्षेत्रीय असंतुलन विभिन्न राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में असमानता

आगे की राह

  • केंद्र सरकार को सभी राजनीतिक दलों, विशेषकर दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधियों के साथ व्यापक विचार-विमर्श करना चाहिए।
  • जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के हितों की रक्षा के लिए एक संतुलित फार्मूला विकसित किया जाना चाहिए।
  • परिसीमन प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और मानदंड स्थापित किए जाने चाहिए।
  • लोकसभा सीटों में वृद्धि के प्रभावों का गहन अध्ययन किया जाना चाहिए, जिसमें संसद की कार्यप्रणाली और संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव शामिल हों।
  • संघवाद की भावना को बनाए रखने और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए एक सर्वसम्मत समाधान खोजने का प्रयास किया जाना चाहिए।
  • विधेयक में प्रत्येक राज्य के लिए सीटों की संख्या की एक अनुसूची शामिल करने पर विचार किया जाना चाहिए, जैसा कि DMK द्वारा प्रस्तावित है।
  • परिसीमन आयोग को एक स्वतंत्र और निष्पक्ष निकाय के रूप में कार्य करने की स्वायत्तता दी जानी चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परिसीमन · लोकसभा सीटें · संवैधानिक संशोधन · जनसंख्या अनुपात · संघवाद · राज्यों का प्रतिनिधित्व · समानुपातिक प्रतिनिधित्व · संवैधानिक स्थगन · लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व · दक्षिण भारतीय राज्य

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘संसद द्वारा परिसीमन अधिनियम’}
  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘राज्यों में विधानसभा सीटों का परिसीमन’}
  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 330’, ‘note’: ‘लोकसभा में SC/ST सीटों का आरक्षण’}
  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 332’, ‘note’: ‘विधानसभाओं में SC/ST सीटों का आरक्षण’}
  • {‘Article’: ‘संविधान का 42वां संशोधन’, ‘note’: ‘1976 में सीटों का स्थगन’}
  • {‘Article’: ‘संविधान का 84वां संशोधन’, ‘note’: ‘2001 में सीटों का स्थगन विस्तार’}

अवधारणा प्रवाह

जनगणना के आंकड़े जारी  →  परिसीमन आयोग का गठन  →  लोकसभा/विधानसभा सीटों का पुनर्गठन  →  राज्यों के प्रतिनिधित्व में बदलाव  →  संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता  →  राजनीतिक सहमति की चुनौती  →  संघवाद पर संभावित प्रभाव

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. परिसीमन (Delimitation) का उद्देश्य विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है ताकि जनसंख्या के आधार पर सीटों का समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सके।
2. भारत में परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
3. वर्तमान में लोकसभा सीटों का परिसीमन 1971 की जनगणना के आधार पर किया गया है और यह स्थगन 2026 तक प्रभावी है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है। परिसीमन का मुख्य उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है।
कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है (अनुच्छेद 82 और 170 के तहत गठित) और इसके आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है तथा उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
कथन 3 सही है। लोकसभा सीटों का वर्तमान परिसीमन 1971 की जनगणना पर आधारित है और यह स्थगन 84वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया था।

Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. परिसीमन आयोग के अध्यक्ष भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त होते हैं।
2. आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश भी शामिल होते हैं।
3. आयोग के आदेशों को संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता।
उपरोक्त कथनों में से कौन सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 2 और 3 — कथन 1 गलत है। परिसीमन आयोग के अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य चुनाव आयुक्त पदेन सदस्य होते हैं।
कथन 2 सही है। आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष के रूप में शामिल होते हैं।
कथन 3 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान बल प्राप्त होता है और उन्हें संसद द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में परिसीमन प्रक्रिया के संवैधानिक आधारों और उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए। दक्षिण भारतीय राज्यों द्वारा व्यक्त की जा रही चिंताओं के आलोक में, क्या आपको लगता है कि वर्तमान परिसीमन मॉडल संघवाद के सिद्धांतों के साथ न्याय करता है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: परिसीमन की परिभाषा और इसका महत्व।
2. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 82 और 170 का उल्लेख, परिसीमन आयोग का गठन और उसकी शक्तियां।
3. परिसीमन के उद्देश्य: ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ सिद्धांत, समान प्रतिनिधित्व, जनसंख्या में परिवर्तन को समायोजित करना।
4. वर्तमान परिसीमन मॉडल: 1971 की जनगणना पर आधारित स्थगन (2026 तक), 84वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2001।
5. दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं: जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण कम प्रतिनिधित्व का डर, वित्तीय हस्तांतरण पर संभावित नकारात्मक प्रभाव।
6. संघवाद पर प्रभाव: जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंड, राज्यों के बीच असमान प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय असंतुलन का बढ़ना।
7. समालोचनात्मक परीक्षण: संघवाद के सिद्धांतों (राज्यों की स्वायत्तता, समान प्रतिनिधित्व) के साथ टकराव, ‘एक राज्य, एक मूल्य’ बनाम ‘एक व्यक्ति, एक मूल्य’ की बहस।
8. संभावित समाधान/सुझाव: लोकसभा सीटों में वृद्धि, राज्यों के लिए न्यूनतम सीटों की गारंटी, जनसंख्या नियंत्रण को पुरस्कृत करने के उपाय, राज्यों के साथ व्यापक परामर्श।
9. निष्कर्ष: संघवाद और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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