तमिलनाडु सरकार ने लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव पारित किया

After anti-NEET bill, Vijay-led Tamil Nadu govt votes to freeze Lok Sabha strength at 543 — concept mind map

तमिलनाडु सरकार ने लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव पारित किया

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✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन है, जो जनसंख्या में बदलाव को दर्शाता है, और भारत में यह 2026 के बाद की जनगणना के आधार पर होगा, जिससे जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व पर संभावित प्रभाव…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, संसद और राज्य विधायिकाएँ  |  GS Paper II — सामाजिक न्याय, जनसंख्या और संबंधित मुद्दे
  • Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 81, अनुच्छेद 82, जनसंख्या नियंत्रण, महिला आरक्षण, लोकसभा सीटें
  • Essay: संघवाद और राज्यों का प्रतिनिधित्व: जनसंख्या नियंत्रण के निहितार्थ, भारत में संसदीय लोकतंत्र और प्रतिनिधित्व का भविष्य

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन है, जो जनसंख्या में बदलाव को दर्शाता है, और भारत में यह 2026 के बाद की जनगणना के आधार पर होगा, जिससे जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व पर संभावित प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ रही हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें केंद्र सरकार से लोकसभा सीटों की संख्या को वर्तमान 543 पर ही बनाए रखने का आग्रह किया गया है। राज्य सरकार का तर्क है कि यदि 1971 के बाद की जनगणना के आधार पर परिसीमन किया जाता है, तो जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने वाले दक्षिणी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु का संसदीय प्रतिनिधित्व स्थायी रूप से प्रभावित होगा।

पृष्ठभूमि

  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 81 लोकसभा की संरचना से संबंधित है, जिसमें राज्यों को सीटों का आवंटन जनसंख्या के आधार पर होता है।
  • अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन (Delimitation) अधिनियम बनाने का अधिकार देता है, जिसके तहत परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है।
  • परिसीमन आयोग का कार्य लोकसभा और राज्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन करना है, ताकि जनसंख्या में परिवर्तन को दर्शाया जा सके।
  • 1976 में, 42वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों के परिसीमन को 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया गया था, ताकि राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के उपाय अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
  • बाद में, 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इस स्थगन को 2026 तक बढ़ा दिया गया, जिसका अर्थ है कि 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही परिसीमन किया जाएगा।
  • दक्षिणी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु ने जनसंख्या नियंत्रण में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से कम रही है।

परिसीमन क्या है और इसके निहितार्थ क्या हैं?

  • परिसीमन का अर्थ है किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण या पुन:निर्धारण करना।
  • इसका मुख्य उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो।
  • भारत में परिसीमन का कार्य एक उच्च-शक्ति वाले निकाय, परिसीमन आयोग द्वारा किया जाता है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • वर्तमान में, लोकसभा और राज्य विधानसभा सीटों का आवंटन 1971 की जनगणना के आंकड़ों पर आधारित है, और यह 2026 तक अपरिवर्तित रहेगा।
  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों को यह चिंता है कि यदि परिसीमन 2026 के बाद की जनगणना के आधार पर किया जाता है, तो उनकी संसदीय सीटों की संख्या कम हो सकती है, जबकि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की सीटें बढ़ सकती हैं।
  • यह संघवाद के सिद्धांत पर बहस छेड़ता है, जहाँ राज्यों को उनके जनसंख्या नियंत्रण प्रयासों के लिए ‘दंडित’ किए जाने की आशंका है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
लोकसभा सीटों का स्थिरीकरण तमिलनाडु सरकार ने केंद्र से लोकसभा सीटों की संख्या को 543 पर स्थिर रखने का आग्रह किया है।
जनसंख्या नियंत्रण का प्रभाव राज्य का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने वाले दक्षिणी राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व प्रभावित होगा यदि परिसीमन 1971 के बाद की जनगणना पर आधारित हो।
महिला आरक्षण का तत्काल कार्यान्वयन प्रस्ताव में मौजूदा 543 लोकसभा सीटों में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने की भी मांग की गई है।
परिसीमन का आधार प्रस्ताव में 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन और लोकसभा तथा विधानसभा सदस्यों की संख्या को 550 से बढ़ाकर 850 करने के लिए संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने का आह्वान किया गया है।
NEET का विरोध तमिलनाडु विधानसभा ने NEET परीक्षा को समाप्त करने के लिए एक अलग प्रस्ताव भी पारित किया है, इसे सामाजिक न्याय और राज्य अधिकारों के विरुद्ध बताया है।

महत्व

संघवाद पर प्रभाव

  • यह प्रस्ताव संघवाद (Federalism) के सिद्धांतों पर बहस को फिर से शुरू करता है, विशेष रूप से राज्यों के प्रतिनिधित्व और केंद्र-राज्य संबंधों के संदर्भ में।
  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व में संभावित कमी से संघीय संतुलन पर गंभीर प्रश्न उठते हैं।

संसदीय प्रतिनिधित्व और जनसांख्यिकी

  • परिसीमन (Delimitation) और लोकसभा सीटों के स्थिरीकरण का मुद्दा भारत की बदलती जनसांख्यिकी और विभिन्न राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को उजागर करता है।
  • यह दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दर्शाता है कि जनसंख्या नियंत्रण के उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप संसद में उनका राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है।

सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व

  • महिला आरक्षण के तत्काल कार्यान्वयन की मांग लैंगिक समानता और संसद में महिलाओं के पर्याप्त प्रतिनिधित्व के महत्व पर जोर देती है।
  • NEET के विरोध का मुद्दा शिक्षा और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में राज्य के अधिकारों और स्वायत्तता से संबंधित है।

चुनौतियाँ

1. जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व

  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को डर है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से संसद में उनका प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा, जो उनके प्रयासों को दंडित करेगा।
  • यह चुनौती संघवाद के मूल सिद्धांतों और राज्यों के बीच समानता के प्रश्न को उठाती है।

2. परिसीमन की आवश्यकता और आधार

  • भारत में निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन लंबे समय से रुका हुआ है, जिससे विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में भारी असमानताएँ पैदा हो गई हैं।
  • 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन की मांग और सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव एक जटिल संवैधानिक और राजनीतिक चुनौती प्रस्तुत करता है।

3. महिला आरक्षण का कार्यान्वयन

  • महिला आरक्षण विधेयक पारित होने के बावजूद, इसके कार्यान्वयन को जनगणना और परिसीमन के बाद तक के लिए टाल दिया गया है, जिससे तत्काल प्रतिनिधित्व की मांग उठ रही है।
  • यह चुनौती राजनीतिक इच्छाशक्ति और महिलाओं के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक संवैधानिक प्रक्रियाओं से संबंधित है।

4. राज्य के अधिकार बनाम केंद्रीय कानून

  • NEET जैसे केंद्रीय कानूनों के खिलाफ राज्यों का विरोध शिक्षा जैसे समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन पर बहस को दर्शाता है।
  • यह चुनौती संघवाद के भीतर राज्यों की स्वायत्तता और उनके विधायी अधिकारों के दायरे से संबंधित है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
लोकसभा सीटों का स्थिरीकरण जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का संसदीय प्रतिनिधित्व कम होने का डर।
परिसीमन का आधार 1971 के बाद की जनगणना पर आधारित परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व स्थायी रूप से प्रभावित होगा।
महिला आरक्षण का कार्यान्वयन जनगणना और परिसीमन से पहले 33 प्रतिशत महिला आरक्षण को तत्काल लागू करने की मांग।
NEET परीक्षा का विरोध राज्य के अधिकारों और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन के रूप में देखा जा रहा है।
संघीय संतुलन जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व से संघीय ढांचे में असंतुलन पैदा होने की आशंका।

आगे की राह

  • केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और परामर्श को बढ़ावा देना ताकि परिसीमन और प्रतिनिधित्व से संबंधित चिंताओं को दूर किया जा सके।
  • परिसीमन के लिए एक निष्पक्ष और पारदर्शी तंत्र विकसित करना जो जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के हितों की रक्षा करे।
  • महिला आरक्षण के तत्काल कार्यान्वयन के लिए संवैधानिक और विधायी विकल्पों पर विचार करना, जनगणना और परिसीमन की प्रतीक्षा किए बिना।
  • शिक्षा जैसे समवर्ती सूची के विषयों पर केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग और समन्वय को मजबूत करना।
  • राज्यों की विशिष्ट क्षेत्रीय चिंताओं और आकांक्षाओं को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित संघीय दृष्टिकोण अपनाना।
  • एक विशेषज्ञ समिति का गठन करना जो परिसीमन के विभिन्न मॉडलों और उनके राज्यों पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करे।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परिसीमन · लोकसभा सीटों का स्थगन · जनसंख्या नियंत्रण · संघवाद · संवैधानिक संशोधन · महिला आरक्षण · समान प्रतिनिधित्व · राज्यों का प्रतिनिधित्व · जनगणना · संसदीय लोकतंत्र

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 81: लोकसभा की संरचना
  • अनुच्छेद 82: प्रत्येक जनगणना के बाद पुनर्समायोजन (परिसीमन)
  • अनुच्छेद 170: विधानसभाओं की संरचना

अवधारणा प्रवाह

राज्य जनसंख्या नियंत्रण उपाय लागू करते हैं।  →  जनसंख्या नियंत्रण वाले राज्यों को संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी का डर है।  →  तमिलनाडु सरकार लोकसभा सीटों को स्थिर करने का प्रस्ताव करती है।  →  परिसीमन और महिला आरक्षण के तत्काल कार्यान्वयन की मांग की जाती है।  →  संघवाद और केंद्र-राज्य संबंधों पर बहस तेज होती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार, प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्समायोजन किया जाता है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा लोकसभा सीटों की संख्या को 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था।
3. परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसके आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा लोकसभा सीटों को 2001 तक के लिए स्थिर किया गया था, जिसे बाद में 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया। कथन 3 सही है। परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है और इसके आदेशों को न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती ताकि परिसीमन प्रक्रिया में देरी न हो।

Q2. अभिकथन (A): दक्षिणी राज्यों द्वारा जनसंख्या नियंत्रण उपायों को प्रभावी ढंग से लागू करने के कारण भविष्य के परिसीमन में उनकी संसदीय सीटों में कमी आ सकती है।
कारण (R): लोकसभा सीटों का वर्तमान स्थगन 1971 की जनगणना पर आधारित है और 2026 के बाद नई जनगणना के आधार पर परिसीमन की संभावना है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे भविष्य में जनसंख्या-आधारित परिसीमन में उनकी सीटें कम हो सकती हैं। कारण (R) भी सही है क्योंकि वर्तमान स्थगन 1971 की जनगणना पर आधारित है और 2026 के बाद नई जनगणना के आधार पर परिसीमन होने की संभावना है, जो सीधे अभिकथन के परिणाम से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में लोकसभा सीटों के परिसीमन को 2026 तक स्थगित करने के निर्णय के पीछे के तर्क की जाँच करें। क्या यह निर्णय संघवाद और राज्यों के बीच समान प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों के साथ सामंजस्य स्थापित करता है? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** परिसीमन का संक्षिप्त अर्थ और लोकसभा सीटों के स्थगन का संदर्भ (1971 की जनगणना, 2026 तक स्थगन)।
2. **स्थगन के पीछे का तर्क:**
* जनसंख्या नियंत्रण को बढ़ावा देना: उन राज्यों को दंडित न करना जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता प्राप्त की है।
* राष्ट्रीय एकीकरण: जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय असमानताओं के कारण राज्यों के बीच राजनीतिक असंतुलन को रोकना।
* स्थिरता: संसदीय प्रतिनिधित्व में अचानक और बड़े बदलावों से बचना।
3. **संघवाद और समान प्रतिनिधित्व पर प्रभाव:**
* **सकारात्मक पहलू:** जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के हितों की रक्षा करता है, जो संघवाद के सिद्धांत के अनुरूप है कि राज्यों को उनके प्रयासों के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
* **नकारात्मक पहलू/चुनौतियाँ:**
* ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ सिद्धांत का उल्लंघन: विभिन्न राज्यों में एक सांसद के निर्वाचन क्षेत्र की जनसंख्या में भारी असमानता।
* जनसांख्यिकीय बदलाव: पिछले 50 वर्षों में हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को प्रतिबिंबित न करना।
* प्रतिनिधित्व का असंतुलन: अधिक जनसंख्या वाले राज्यों का कम प्रतिनिधित्व और कम जनसंख्या वाले राज्यों का अधिक प्रतिनिधित्व।
* लोकतांत्रिक वैधता पर प्रश्न: क्या वर्तमान प्रतिनिधित्व वास्तविक जनसंख्या वितरण को दर्शाता है?
4. **आगे का रास्ता/समाधान:**
* महिला आरक्षण विधेयक में मौजूदा सीटों पर 33% आरक्षण का प्रावधान।
* संभावित समाधान: लोकसभा सीटों की संख्या में वृद्धि करना (जैसे तमिलनाडु सरकार का प्रस्ताव), लेकिन प्रतिनिधित्व के लिए एक ‘न्यायसंगत’ सूत्र विकसित करना जो जनसंख्या नियंत्रण को भी पुरस्कृत करे।
* एक विशेषज्ञ समिति का गठन जो विभिन्न मॉडलों का अध्ययन करे (जैसे ‘वेटेड वोटिंग’ या ‘दोहरी सदस्यता’ प्रणाली)।
5. **निष्कर्ष:** संघवाद और समान प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए, एक ऐसे समाधान की वकालत करना जो जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्यों को बनाए रखते हुए लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की वैधता सुनिश्चित करे।

स्रोत: Hindustan Times


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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