07 Mar तेहरान में सत्ता-संकट और 1979 की इस्लामी क्रांति की विरासत : पश्चिम एशिया की भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और भारत के रणनीतिक हित
मुख्य परीक्षा – सामान्य अध्ययन
GS–2 : अंतर्राष्ट्रीय संबंध, भारत के अन्य देशों के साथ संबंध, पश्चिम एशिया की भू-राजनीति, वैश्विक शक्ति-संतुलन
GS–3 : ऊर्जा सुरक्षा, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, सामरिक समुद्री मार्ग, तेल बाजार
GS–1 : वैश्विक राजनीतिक परिवर्तन और उनका क्षेत्रीय समाजों पर प्रभाव
प्रारंभिक परीक्षा के लिये : Supreme Leader, Strait of Hormuz, GCC, Remittances, BRICS Plus, Shanghai Cooperation Organisation (SCO)
चर्चा में क्यों?
हाल ही में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर संयुक्त सैन्य कार्रवाई की खबरों ने पश्चिम एशिया को एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीतिक केंद्र में ला दिया है। इस अभियान का घोषित उद्देश्य तेहरान में शासन परिवर्तन (Regime Change) लाना बताया जा रहा है। यह घटनाक्रम केवल एक सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती के रूप में देखा जा रहा है जिसकी नींव 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में पड़ी थी।
1979 की क्रांति ने न केवल ईरान की राजनीतिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया था, बल्कि पश्चिम एशिया में शक्ति-संतुलन को भी नई दिशा दी थी। इस क्रांति के बाद स्थापित इस्लामी गणराज्य ने क्षेत्रीय राजनीति, वैश्विक ऊर्जा बाजार और महाशक्तियों के बीच संबंधों को गहराई से प्रभावित किया। वर्तमान संकट इस प्रश्न को पुनः सामने ला रहा है कि क्या ईरान की क्रांतिकारी राजनीतिक व्यवस्था टिकाऊ है या वह किसी बड़े परिवर्तन के दौर में प्रवेश कर चुकी है।

1979 की इस्लामी क्रांति : ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक परिवर्तन
ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति आधुनिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं में से एक मानी जाती है। इससे पहले ईरान पर पहलवी वंश के शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था, जो पश्चिमी शक्तियों विशेषकर अमेरिका के करीबी सहयोगी माने जाते थे। शाह के शासन में आधुनिकीकरण और पश्चिमीकरण की नीतियाँ अपनाई गईं, परंतु इसके साथ ही राजनीतिक दमन और सामाजिक असंतोष भी बढ़ता गया।
इसी असंतोष की पृष्ठभूमि में अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमेनी के नेतृत्व में एक व्यापक जन आंदोलन खड़ा हुआ जिसने अंततः राजशाही व्यवस्था को समाप्त कर दिया। इस क्रांति के परिणामस्वरूप ईरान में इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई और धार्मिक नेतृत्व को राजनीतिक सत्ता के केंद्र में स्थापित किया गया। इस नई व्यवस्था में सर्वोच्च नेता (Supreme Leader) को सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक अधिकार प्रदान किया गया। यह पद देश की राजनीतिक दिशा, रक्षा नीति और न्यायिक व्यवस्था तक को प्रभावित करता है। अयातुल्लाह अली खामेनेई ने इस पद पर रहते हुए इस व्यवस्था को और अधिक संस्थागत रूप दिया और इसे ईरान की राष्ट्रीय पहचान का प्रमुख तत्व बना दिया।
क्रांति की वैचारिक दिशा और पश्चिम एशिया की राजनीति
ईरानी क्रांति केवल एक घरेलू राजनीतिक परिवर्तन तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके साथ एक वैचारिक दृष्टिकोण भी जुड़ा हुआ था। ईरान ने स्वयं को पश्चिमी प्रभुत्व के विरुद्ध प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। उसने अमेरिका और इज़राइल की नीतियों का खुलकर विरोध किया और फिलिस्तीनी मुद्दे को अपना प्रमुख कूटनीतिक एजेंडा बनाया। ईरान ने मध्य पूर्व में अपने क्रांतिकारी विचारों के प्रसार की भी कोशिश की। इससे क्षेत्र में कई राजनीतिक और सांप्रदायिक तनाव उत्पन्न हुए। विशेषकर खाड़ी के सुन्नी अरब देशों को यह भय सताने लगा कि ईरान शिया राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाकर क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को बदलना चाहता है। इसी कारण से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों ने ईरान की नीतियों को संदेह की दृष्टि से देखा और क्षेत्रीय राजनीति में एक नई प्रतिस्पर्धा का वातावरण पैदा हुआ। इस प्रतिस्पर्धा ने पश्चिम एशिया को दशकों तक अस्थिर बनाए रखा।
शासन परिवर्तन की संभावना और ईरान की राजनीतिक स्थिरता
हालिया घटनाओं के संदर्भ में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो गया है कि यदि ईरान के वर्तमान नेतृत्व को चुनौती मिलती है तो क्या इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था टिक पाएगी। सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की संभावित मृत्यु या हटाए जाने की खबरों ने इस बहस को और तेज कर दिया है। ईरान के राजनीतिक ढांचे की विशेषता यह है कि सत्ता केवल एक व्यक्ति पर आधारित नहीं है, बल्कि यह विभिन्न संस्थानों—जैसे रिवोल्यूशनरी गार्ड, धार्मिक परिषदों और सुरक्षा संस्थाओं—के जटिल नेटवर्क पर टिकी हुई है। इसलिए केवल नेतृत्व परिवर्तन से पूरे शासन तंत्र का पतन तुरंत संभव नहीं माना जाता। पिछले दो दशकों में ईरान में कई बार जन विरोध प्रदर्शन हुए हैं। आर्थिक संकट, बेरोजगारी, सामाजिक प्रतिबंधों और राजनीतिक असंतोष ने कई बार बड़े पैमाने पर आंदोलन खड़े किए हैं। हालांकि इन आंदोलनों को सुरक्षा तंत्र ने कठोरता से दबा दिया। यही कारण है कि शासन परिवर्तन की संभावना होने के बावजूद यह प्रक्रिया सरल नहीं होगी। यदि बाहरी हस्तक्षेप बढ़ता है, तो यह ईरान के भीतर राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया को भी जन्म दे सकता है।
पश्चिम एशिया पर संभावित क्षेत्रीय प्रभाव
ईरान की क्रांतिकारी नीति ने पश्चिम एशिया की राजनीति को दशकों तक प्रभावित किया है। इसने क्षेत्र में सांप्रदायिक विभाजन को गहरा किया और कई देशों को सुरक्षा की दृष्टि से चिंतित किया। विशेष रूप से खाड़ी के देशों को यह आशंका रही कि ईरान की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ उनके आंतरिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं। वर्तमान संकट के दौरान कई अरब देशों ने प्रारंभिक चरण में तटस्थ रहने की कोशिश की थी लेकिन जब ईरान द्वारा अमेरिकी ठिकानों और नागरिक अवसंरचना को निशाना बनाने की खबरें सामने आईं, तब इन देशों ने अपने सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए सामूहिक रूप से अधिक सतर्क रुख अपनाया। आज पश्चिम एशिया में राजनीतिक संघर्ष का केंद्र केवल अरब जनता की भावनाएँ नहीं हैं, बल्कि ईरान का आंतरिक समाज भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। विशेषकर शहरी वर्ग और युवा आबादी राजनीतिक सुधारों की मांग कर रही है।
वैश्विक ऊर्जा बाजार पर प्रभाव
ईरान विश्व के प्रमुख तेल और गैस भंडार वाले देशों में से एक है। इसलिए वहां की राजनीतिक अस्थिरता का प्रभाव वैश्विक ऊर्जा बाजार पर सीधे पड़ता है। 1979 की क्रांति के समय भी वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल देखी गई थी जिसे 1980 के तेल संकट के रूप में जाना जाता है। आज की स्थिति भी कुछ हद तक उसी प्रकार की चिंताएँ पैदा कर रही है। विशेष रूप से हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा व्यापार का अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है जिसके माध्यम से दुनिया के एक बड़े हिस्से का तेल परिवहन होता है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो बीमा लागत बढ़ सकती है, जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इसका प्रभाव उन देशों पर अधिक पड़ेगा जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं।
वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा और ईरान
1979 की क्रांति के बाद ईरान ने धीरे-धीरे रूस और चीन के साथ अपने संबंध मजबूत किए। पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण ईरान को वैकल्पिक आर्थिक और राजनीतिक साझेदारों की आवश्यकता थी। इसी प्रक्रिया में वह बहुपक्षीय मंचों जैसे BRICS Plus और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के साथ जुड़ता गया। यदि भविष्य में ईरान में ऐसा शासन स्थापित होता है जो अमेरिका के अधिक निकट हो, तो इससे रूस और चीन की क्षेत्रीय रणनीति को बड़ा झटका लग सकता है। पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। इस प्रकार ईरान का प्रश्न केवल एक क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का भी एक महत्वपूर्ण आयाम बन चुका है।
भारत के लिए रणनीतिक महत्व
भारत के लिए पश्चिम एशिया केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं बल्कि ऊर्जा, व्यापार, सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों से जुड़े हितों का केंद्र है। इसलिए ईरान में होने वाले किसी भी बड़े राजनीतिक परिवर्तन का प्रभाव भारत की विदेश नीति पर अवश्य पड़ेगा। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से पूरा होता है। इसके अलावा भारत का महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार भी इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। इसलिए इस क्षेत्र में स्थिरता भारत के आर्थिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
खाड़ी देशों में भारतीय प्रवासी समुदाय
पश्चिम एशिया में भारतीय प्रवासी समुदाय दुनिया के सबसे बड़े प्रवासी समूहों में से एक है। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों में लगभग नौ मिलियन से अधिक भारतीय रहते हैं। इनमें सबसे बड़ी संख्या संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में है। केवल संयुक्त अरब अमीरात में ही लगभग 43 लाख भारतीय रहते हैं, जो वहां की कुल जनसंख्या का लगभग 35 प्रतिशत हैं। इनमें केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, बिहार और पंजाब से आए लोग बड़ी संख्या में शामिल हैं। इसके अतिरिक्त इज़राइल में लगभग एक लाख से अधिक भारतीय और ईरान में दस हजार से अधिक भारतीय नागरिक रहते हैं। इस क्षेत्र में हजारों भारतीय छात्र भी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं।
आर्थिक महत्व : प्रेषण और व्यापार
खाड़ी क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय रिजर्व बैंक के 2025 के प्रेषण सर्वेक्षण के अनुसार भारत को 2023–24 में लगभग 118.7 अरब डॉलर का विदेशी प्रेषण प्राप्त हुआ। इसमें संयुक्त अरब अमीरात का योगदान लगभग 19.2 प्रतिशत था, जबकि सऊदी अरब का योगदान लगभग 6.7 प्रतिशत रहा। कतर, कुवैत और ओमान भी भारत को प्रेषण भेजने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं। इसके अतिरिक्त खाड़ी देश भारतीय पर्यटकों और यात्रियों के लिए भी प्रमुख गंतव्य हैं। वर्ष 2025 में लगभग 86 लाख भारतीय संयुक्त अरब अमीरात गए, जबकि लगभग 34 लाख भारतीय सऊदी अरब और 11 लाख भारतीय कतर की यात्रा पर गए।
संघर्ष पर भारत का प्रभाव और नीति चुनौतियाँ
भारत की इस संघर्ष को सीधे प्रभावित करने की क्षमता सीमित है, क्योंकि यह मुख्यतः अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच का सामरिक संघर्ष है। फिर भी भारत को इसके संभावित प्रभावों के लिए तैयार रहना होगा। ऊर्जा आपूर्ति में बाधा, क्षेत्रीय गठबंधनों में बदलाव और ईरान की विदेश नीति में परिवर्तन जैसे कई कारक भारत के हितों को प्रभावित कर सकते हैं। यदि भविष्य में ईरान कम टकराववादी नीति अपनाता है, तो वह भारत के लिए एक महत्वपूर्ण आर्थिक और रणनीतिक साझेदार बन सकता है लेकिन यदि क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ती है, तो इससे भारत के व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा पर जोखिम उत्पन्न हो सकता है।
निष्कर्ष
तेहरान में चल रहा राजनीतिक संकट केवल एक देश की आंतरिक समस्या नहीं है, बल्कि यह वैश्विक भू-राजनीति की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। 1979 की इस्लामी क्रांति ने जिस राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना की थी, वही आज नई चुनौतियों का सामना कर रही है। इस संकट का परिणाम पश्चिम एशिया की राजनीति, वैश्विक ऊर्जा बाजार और महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा को गहराई से प्रभावित कर सकता है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि वह इस बदलते परिदृश्य में संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनाए। तेहरान में जो भी परिवर्तन होगा, उसका प्रभाव केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे पश्चिम एशिया और वैश्विक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर उसकी छाया पड़ेगी। इसलिए यह घटनाक्रम आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति की दिशा निर्धारित करने वाला एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. ईरान विश्व के सबसे बड़े तेल और गैस भंडार वाले देशों में से एक है।
2. ईरान ने हाल के वर्षों में रूस और चीन के साथ अपने रणनीतिक संबंध मजबूत किए हैं।
3. ईरान NATO का सदस्य है।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर : (a)
Q2. खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. यह पश्चिम एशिया का एक क्षेत्रीय आर्थिक और राजनीतिक संगठन है।
2.इसके सदस्य देशों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर शामिल हैं।
3.ईरान और इराक इसके सदस्य हैं।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर : (a)
Q3. Strait of Hormuz के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है।
2. विश्व के लगभग 20% तेल व्यापार का मार्ग इसी से होकर गुजरता है।
3. यह भारत और इंडोनेशिया के बीच स्थित है।
सही उत्तर चुनिए:
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर : (a)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न
Q1. पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के संदर्भ में भारत की विदेश नीति के समक्ष प्रमुख चुनौतियों और अवसरों का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)
Q2. “1979 की इस्लामी क्रांति ने पश्चिम एशिया की भू-राजनीति को गहराई से प्रभावित किया।” वर्तमान ईरान संकट के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)
Q3. ईरान के साथ भारत के संबंध केवल ऊर्जा तक सीमित नहीं हैं। वर्तमान भू-राजनीतिक परिवर्तनों के संदर्भ में भारत-ईरान संबंधों का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)

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