09 Aug न्यायाधिकरण नियुक्तियों में पारदर्शिता के लिए राष्ट्रीय आयोग विधेयक अगले सप्ताह लोकसभा में

✎ राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग विधेयक का उद्देश्य विभिन्न न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता, स्वतंत्रता और एकरूपता लाना है, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और डिज़ाइन तथा कार्यान्वयन से उत्पन्न मुद्दे | GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका का पृथक्करण
- Prelims: राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग, न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक स्वतंत्रता, अनुच्छेद 323A, अनुच्छेद 323B
- Essay: भारत में न्यायिक सुधारों की आवश्यकता और चुनौतियाँ, संस्थागत स्वतंत्रता और जवाबदेही: भारतीय लोकतंत्र के आधार स्तंभ
त्वरित पुनरावृत्ति: राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग विधेयक का उद्देश्य विभिन्न न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता, स्वतंत्रता और एकरूपता लाना है, जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्र सरकार विभिन्न न्यायाधिकरणों (Tribunals) में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्तियों की व्यवस्था को सुव्यवस्थित करने के लिए एक नया विधेयक लोकसभा में पेश करने की तैयारी में है। इस प्रस्तावित कानून के तहत एक स्वतंत्र राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (National Tribunals Commission) का गठन किया जाएगा, जिसका उद्देश्य नियुक्तियों में स्पष्ट मानक, पारदर्शी प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है। यह कदम सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के निर्देशों के बाद उठाया जा रहा है, जिसने पूर्व में न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को रद्द कर दिया था।
पृष्ठभूमि
- न्यायाधिकरण अर्ध-न्यायिक निकाय होते हैं जिन्हें विशेष प्रकार के विवादों को हल करने के लिए स्थापित किया जाता है, जिससे अदालतों पर बोझ कम हो सके।
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 323A और 323B संसद और राज्य विधानमंडलों को क्रमशः प्रशासनिक और अन्य मामलों के लिए न्यायाधिकरण स्थापित करने का अधिकार देते हैं।
- विभिन्न न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों की प्रक्रिया और सदस्यों की योग्यता को लेकर समय-समय पर चिंताएं व्यक्त की जाती रही हैं, विशेषकर न्यायिक स्वतंत्रता और कार्यपालिका के हस्तक्षेप के संबंध में।
- सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) और न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) के सिद्धांतों के विपरीत मानते हुए रद्द कर दिया था।
- सर्वोच्च न्यायालय ने एक स्वतंत्र और पेशेवर विशेषज्ञता वाले राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का निर्देश दिया था, ताकि नियुक्तियों में पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित की जा सके।
- प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य न्यायाधिकरणों में अध्यक्षों और सदस्यों की नियुक्ति तथा उनकी योग्यता में दक्षता, स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता लाना है।
राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग क्या है?
- राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग एक प्रस्तावित स्वतंत्र निकाय है जिसका गठन विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन एवं नियुक्ति की प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए किया जाएगा।
- इसका मुख्यालय राष्ट्रीय राजधानी में होगा और इसमें एक अध्यक्ष तथा चार सदस्य होंगे, जिनमें दो न्यायिक सदस्य और दो तकनीकी सदस्य शामिल होंगे।
- आयोग का अध्यक्ष बनने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय (High Court) के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश पात्र होंगे।
- इस आयोग का मुख्य कार्य विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन से जुड़े कार्यों को देखना और नियुक्तियों में स्पष्ट मानक व पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करना होगा।
- यह आयोग न्यायिक और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करके नियुक्तियों में संस्थागत स्वतंत्रता और दक्षता लाने का प्रयास करेगा।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन | विभिन्न न्यायाधिकरणों के अध्यक्षों और सदस्यों के चयन के लिए एक स्वतंत्र निकाय की स्थापना। |
| अध्यक्ष और सदस्य | आयोग में एक अध्यक्ष (सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश) और चार सदस्य (दो न्यायिक, दो तकनीकी) होंगे। |
| उद्देश्य | नियुक्तियों में दक्षता, स्वतंत्रता, पारदर्शिता और एकरूपता सुनिश्चित करना। |
| मुख्यालय | राष्ट्रीय राजधानी में स्थित होगा। |
| न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 का प्रतिस्थापन | यह विधेयक कानून बनने के बाद न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 को समाप्त कर देगा। |
महत्व
न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही
- यह विधेयक न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त कर न्यायिक स्वतंत्रता को मजबूत करेगा।
- एक स्वतंत्र आयोग द्वारा नियुक्तियाँ प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही लाएंगी।
शासन और दक्षता
- योग्य और विशेषज्ञ सदस्यों की नियुक्ति से न्यायाधिकरणों के कामकाज में दक्षता आएगी।
- नियुक्ति प्रक्रिया में एकरूपता से न्यायाधिकरणों के बीच मानकीकरण सुनिश्चित होगा।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन
- यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के उन निर्देशों का पालन करता है, जिनमें न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों पर जोर दिया गया था।
- यह न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को रद्द करने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुरूप है।
चुनौतियाँ
1. शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत
- कार्यपालिका द्वारा न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों पर नियंत्रण से शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत का उल्लंघन होता है।
- न्यायाधिकरणों को न्यायपालिका के एक अभिन्न अंग के रूप में देखा जाता है, और उनकी स्वतंत्रता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: संविधान: शक्तियों का पृथक्करण
2. न्यायिक स्वतंत्रता का हनन
- नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के अत्यधिक हस्तक्षेप से न्यायाधिकरणों के सदस्यों की न्यायिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है।
- यह सदस्यों को बिना किसी भय या पक्षपात के निर्णय लेने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: संविधान: न्यायिक स्वतंत्रता
3. नियुक्ति प्रक्रिया में अस्पष्टता
- वर्तमान में न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए कोई स्पष्ट और पारदर्शी प्रक्रिया का अभाव है।
- इससे नियुक्तियों में मनमानी और पक्षपात की संभावना बढ़ जाती है।
यूपीएससी लिंक: शासन: पारदर्शिता और जवाबदेही
4. न्यायाधिकरणों का कमजोर होना
- अयोग्य या राजनीतिक रूप से नियुक्त सदस्यों से न्यायाधिकरणों की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता कम हो सकती है।
- यह न्याय वितरण प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
यूपीएससी लिंक: शासन: न्याय वितरण प्रणाली
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| कार्यपालिका का हस्तक्षेप | न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न। |
| नियुक्ति में अस्पष्टता | पारदर्शिता और योग्यता आधारित चयन का अभाव। |
| न्यायिक स्वतंत्रता का हनन | न्यायाधिकरणों के सदस्यों पर बाहरी दबाव का खतरा। |
| न्यायाधिकरणों की प्रभावशीलता | अयोग्य नियुक्तियों से न्याय वितरण प्रणाली का कमजोर होना। |
आगे की राह
- राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग को पर्याप्त स्वायत्तता और संसाधन प्रदान किए जाएं ताकि वह प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।
- नियुक्ति प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाने के लिए स्पष्ट मानदंड और समय-सीमा निर्धारित की जाए।
- आयोग में न्यायिक और तकनीकी विशेषज्ञों का उचित संतुलन सुनिश्चित किया जाए ताकि विविध मामलों से निपटा जा सके।
- न्यायाधिकरणों के सदस्यों के लिए सेवा शर्तों, कार्यकाल और सुरक्षा को मजबूत किया जाए ताकि उनकी स्वतंत्रता बनी रहे।
- न्यायाधिकरणों के कामकाज की नियमित निगरानी और मूल्यांकन किया जाए ताकि उनकी दक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
- न्यायाधिकरणों के लिए पर्याप्त बुनियादी ढाँचा और सहायक कर्मचारी उपलब्ध कराए जाएं ताकि वे अपने कार्यों को सुचारु रूप से कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग · न्यायाधिकरण सुधार विधेयक 2026 · न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम 2021 · शक्तियों का पृथक्करण · न्यायिक स्वतंत्रता · नियुक्ति प्रक्रिया · पारदर्शिता · जवाबदेही · उच्चतम न्यायालय के निर्देश · प्रशासनिक न्याय
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 50: कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण
- अनुच्छेद 323A: प्रशासनिक अधिकरण
- अनुच्छेद 323B: अन्य विषयों के लिए अधिकरण
अवधारणा प्रवाह
सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता पर जोर दिया। → न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधान रद्द किए गए। → सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का निर्देश दिया। → केंद्र सरकार ने न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए विधेयक प्रस्तावित किया। → विधेयक में राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का प्रावधान है। → यह आयोग नियुक्तियों में पारदर्शिता और स्वतंत्रता सुनिश्चित करेगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग का गठन उच्चतम न्यायालय के निर्देश के बाद किया जा रहा है।
2. प्रस्तावित आयोग में केवल न्यायिक सदस्य ही शामिल होंगे।
3. यह विधेयक न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 का स्थान लेगा।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन का निर्देश दिया था। कथन 2 गलत है क्योंकि प्रस्तावित आयोग में न्यायिक और तकनीकी दोनों सदस्य शामिल होंगे। कथन 3 सही है क्योंकि विधेयक के कानून बनने के बाद न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 समाप्त हो जाएगा।
Q2. अभिकथन (A): केंद्र सरकार न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों की व्यवस्था को नए सिरे से व्यवस्थित करने की तैयारी में है।
कारण (R): उच्चतम न्यायालय ने न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों के विपरीत माना था।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि सरकार न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों को व्यवस्थित कर रही है। कारण (R) भी सही है क्योंकि उच्चतम न्यायालय ने 2021 के अधिनियम के कुछ प्रावधानों को न्यायिक स्वतंत्रता के विपरीत माना था, और यही कारण है कि सरकार नई व्यवस्था ला रही है। अतः R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ न्यायाधिकरणों में नियुक्तियों के लिए प्रस्तावित राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग के गठन के पीछे के औचित्य का परीक्षण कीजिए। न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांतों को बनाए रखने में यह आयोग कितना सफल हो सकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** न्यायाधिकरणों की भूमिका और उनकी नियुक्तियों से संबंधित मौजूदा चुनौतियों का संक्षिप्त परिचय। राष्ट्रीय न्यायाधिकरण आयोग (NTC) के गठन के संदर्भ में उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का उल्लेख।
2. **गठन का औचित्य:**
* न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के कुछ प्रावधानों को उच्चतम न्यायालय द्वारा रद्द किया जाना।
* शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) और न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) के सिद्धांतों का उल्लंघन।
* नियुक्तियों में स्पष्ट मानक, पारदर्शी प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की आवश्यकता।
* उच्चतम न्यायालय द्वारा एक स्वतंत्र और पेशेवर विशेषज्ञता वाले आयोग के गठन का निर्देश।
3. **आयोग की सफलता की संभावना (न्यायिक स्वतंत्रता और शक्तियों के पृथक्करण के संदर्भ में):**
* **सकारात्मक पक्ष:**
* आयोग में न्यायिक और तकनीकी विशेषज्ञों का समावेश।
* अध्यक्ष के लिए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश की पात्रता।
* नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और एकरूपता लाने का प्रयास।
* कार्यकाल और कामकाज से जुड़े मानकों को स्पष्ट करना।
* **चुनौतियाँ/आशंकाएँ:**
* आयोग की वास्तविक स्वायत्तता और सरकार के हस्तक्षेप की संभावना।
* तकनीकी सदस्यों की भूमिका और न्यायिक सदस्यों के साथ संतुलन।
* नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के प्रभाव को पूरी तरह समाप्त करने की चुनौती।
* उच्चतम न्यायालय के पूर्व के निर्णयों, जैसे कि मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2021) मामले में दिए गए निर्देशों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करना।
4. **निष्कर्ष:** न्यायिक स्वतंत्रता और प्रभावी प्रशासनिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए आयोग के महत्व को रेखांकित करते हुए, इसकी सफलता के लिए आवश्यक शर्तों (जैसे विधायी स्पष्टता, कार्यान्वयन में ईमानदारी) पर बल देना।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

No Comments