भारत की नई NDC: जलवायु प्रतिबद्धताओं की बढ़ी हुई महत्वाकांक्षा और क्रियान्वयन की चुनौती

भारत की नई NDC: जलवायु प्रतिबद्धताओं की बढ़ी हुई महत्वाकांक्षा और क्रियान्वयन की चुनौती

पाठ्यक्रम संबंध (Syllabus Mapping)
प्रारंभिक परीक्षा हेतु: NDC, UNFCCC, पेरिस समझौता, उत्सर्जन तीव्रता, कार्बन सिंक, गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता, COP
मुख्य परीक्षा हेतु:
GS–3: पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संक्रमण, अवसंरचना, सतत विकास
GS–2: अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ एवं समझौते, वैश्विक जलवायु शासन
निबंध: विकास बनाम पर्यावरण, जलवायु न्याय, हरित विकास

चर्चा में क्यों?

भारत ने अपनी अद्यतन Nationally Determined Contribution (NDC) को स्वीकृति दी है। इसके तहत 2035 तक स्थापित विद्युत क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त करने, 2005 के स्तर की तुलना में उत्सर्जन तीव्रता में 47% की कमी लाने तथा कार्बन सिंक को 3.5–4 अरब टन CO₂ समतुल्य तक बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह अद्यतन ऐसे समय में आया है जब 2025 में भारत की उत्सर्जन वृद्धि दो दशकों के न्यूनतम स्तर तक धीमी पाई गई।

NDC क्या है?

NDC पेरिस समझौते के अंतर्गत देशों द्वारा प्रस्तुत वे स्वैच्छिक जलवायु लक्ष्य हैं, जिनके माध्यम से वे बताते हैं कि वे उत्सर्जन कम करने, स्वच्छ ऊर्जा बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्या कदम उठाएँगे। यह वैश्विक जलवायु शासन का एक प्रमुख साधन है, परंतु इसकी वास्तविक प्रभावशीलता अंततः घरेलू नीतियों, वित्त और क्रियान्वयन क्षमता पर निर्भर करती है।

भारत की पुरानी और नई प्रतिबद्धतियाँ

भारत की पहले की NDC प्रतिबद्धताओं में 2030 तक 50% गैर-जीवाश्म क्षमता, 45% उत्सर्जन तीव्रता में कमी और 2.5–3 अरब टन CO₂ समतुल्य कार्बन सिंक का लक्ष्य शामिल था। अब अद्यतन NDC में 2035 तक 60% गैर-जीवाश्म क्षमता, 47% उत्सर्जन तीव्रता में कमी तथा अधिक बड़े कार्बन सिंक का लक्ष्य रखा गया है। उल्लेखनीय है कि भारत 2026 की शुरुआत तक लगभग 52% गैर-जीवाश्म क्षमता हासिल कर चुका था, अर्थात उसने पूर्व लक्ष्य को समय से पहले पार कर लिया।

यह अद्यतन क्यों महत्त्वपूर्ण है?

भारत की नई NDC केवल संख्यात्मक वृद्धि नहीं है, बल्कि यह तीन स्तरों पर महत्त्वपूर्ण है।
पहला, यह दर्शाती है कि भारत जलवायु कार्रवाई में केवल “न्यूनतम अनुपालन” की नीति तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि चरणबद्ध रूप से अपनी महत्वाकांक्षा बढ़ा रहा है।
दूसरा, यह भारत को 2035 के जलवायु लक्ष्यों की घोषणा करने वाले प्रमुख G20 देशों की पंक्ति में अधिक स्पष्टता के साथ स्थापित करती है।
तीसरा, यह संकेत देती है कि भारत का ऊर्जा संक्रमण अब केवल नीतिगत घोषणा नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

क्या NDC वास्तव में स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को गति देती है?

यहीं सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है। उपलब्ध विश्लेषण बताता है कि NDC एक उपयोगी नीति-फ्रेमवर्क तो प्रदान करती है, परंतु यह अपने आप में पर्याप्त नहीं होती। वैश्विक स्तर पर UNEP Emissions Gap Report 2025 के अनुसार मौजूदा NDCs, 1.5°C तापवृद्धि सीमा तक पहुँचने के लिए आवश्यक उत्सर्जन अंतर का 14% से भी कम हिस्सा पाटती हैं। कई देशों ने 2015 के बाद बार-बार लक्ष्यों से पीछे रहना जारी रखा है। साथ ही, अधिकांश देशों ने जीवाश्म ईंधन उत्पादन में कटौती, सब्सिडी सुधार और वित्तपोषण के ठोस ढाँचे प्रस्तुत नहीं किए हैं।
दूसरे शब्दों में, NDC ने प्रगति को track और report करने में अपेक्षाकृत अधिक मदद की है, लेकिन जीवाश्म ईंधन आधारित अर्थव्यवस्था से गहरे संरचनात्मक बदलाव लाने में इसकी भूमिका सीमित रही है। सौर और पवन ऊर्जा की तेज़ प्रगति भी कई बार NDC की तुलना में घटती लागत, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और औद्योगिक नीतियों के कारण अधिक हुई है।

भारत की उत्सर्जन प्रवृत्ति: क्या बदलाव की शुरुआत हो चुकी है?

2025 के एक विश्लेषण के अनुसार भारत के CO₂ उत्सर्जन में केवल 0.7% की वृद्धि हुई, जो कोविड अवधि को छोड़कर दो दशकों में सबसे धीमी वृद्धि थी। विद्युत क्षेत्र से उत्सर्जन 3.8% घटा और कोयला आधारित बिजली उत्पादन में 1973 के बाद पहली बार गिरावट दर्ज की गई। इसी अवधि में भारत ने 47 GW सौर, 6.3 GW पवन, 4 GW जलविद्युत और 0.6 GW परमाणु क्षमता जोड़ी, जो लगभग 5% तक की मांग वृद्धि को पूरा करने के लिए पर्याप्त रही।
यह संकेत देता है कि भारत के विद्युत क्षेत्र में एक संभावित inflection point उभर रहा है, जहाँ स्वच्छ ऊर्जा की वार्षिक वृद्धि बिजली की बढ़ती मांग के बराबर पहुँच सकती है। दीर्घकालिक अनुमान 2035-36 तक 70% गैर-जीवाश्म क्षमता की संभावना भी दर्शाते हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी चेताया है कि 2025 की अनुकूल परिस्थितियाँ—जैसे अपेक्षाकृत नरम मौसम और कमजोर औद्योगिक गतिविधि—अस्थायी रूप से उत्सर्जन को कम कर सकती हैं; अतः स्थायी निष्कर्ष निकालने से पहले आगामी वर्षों की प्रवृत्तियाँ देखना आवश्यक होगा।

फिर भी चुनौतियाँ कहाँ हैं?

भारत की जलवायु रणनीति की सबसे बड़ी जटिलता यह है कि उसके लक्ष्य emissions intensity पर आधारित हैं, न कि कुल उत्सर्जन की निरपेक्ष सीमा पर। इसका अर्थ यह है कि यदि GDP तेज़ी से बढ़ती है, तो कुल उत्सर्जन भी बढ़ सकते हैं, भले ही प्रति इकाई GDP उत्सर्जन घट रहा हो। भारत इस दृष्टिकोण को जलवायु न्याय और निम्न प्रति व्यक्ति उत्सर्जन के आधार पर उचित ठहराता है, परंतु दीर्घकाल में यह मॉडल सीमाओं से टकरा सकता है।
दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों के समानांतर भारत 100 GW नई कोयला क्षमता, 2040 तक पेट्रोकेमिकल क्षेत्र में 1 ट्रिलियन डॉलर निवेश और 2031 तक कोयला-आधारित इस्पात क्षमता में 50% वृद्धि जैसी योजनाओं पर भी आगे बढ़ रहा है। यदि इन क्षेत्रों में उत्सर्जन नियंत्रण और तकनीकी उन्नयन नहीं हुआ, तो नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त लाभ काफी हद तक निष्प्रभावी हो सकते हैं।
तीसरी चुनौती ग्रिड अवसंरचना की है। 37 GW से अधिक नवीकरणीय क्षमता अपर्याप्त ग्रिड तैयारियों के कारण पूर्ण उपयोग में नहीं आ पा रही। इसका मतलब है कि केवल क्षमता जोड़ना पर्याप्त नहीं; ट्रांसमिशन, स्टोरेज, फ्लेक्सिबल ग्रिड और डिस्पैचेबिलिटी भी उतनी ही आवश्यक हैं।
चौथी चुनौती कार्बन सिंक की विश्वसनीयता से जुड़ी है। भारत का वन एवं वृक्ष आवरण लगभग 24% के आसपास है, जबकि दीर्घकालिक आकांक्षा 33% की रही है। साथ ही, वृक्ष आवरण और वास्तविक प्राकृतिक वनों की गुणवत्ता में अंतर को लेकर भी बहस है। इसलिए कार्बन सिंक लक्ष्य केवल वृक्षारोपण संख्या से नहीं, बल्कि पारिस्थितिक गुणवत्ता, जैव-विविधता और दीर्घकालिक संरक्षण से तय होंगे।

आगे की राह

भारत की नई NDC यह स्पष्ट करती है कि देश जलवायु कार्रवाई में अपनी भूमिका को क्रमशः अधिक गंभीरता से निभा रहा है। परंतु वास्तविक सफलता के लिए केवल लक्ष्य-घोषणा नहीं, बल्कि कुछ बुनियादी नीतिगत शर्तें पूरी करनी होंगी—
ग्रिड आधुनिकीकरण और ऊर्जा भंडारण में तेज़ निवेश
कोयला आधारित क्षेत्रों में न्यायपूर्ण संक्रमण
भारी उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन के लिए ठोस रोडमैप
कार्बन सिंक के लिए गुणवत्तापूर्ण वन-पुनर्स्थापन
जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी और स्थानीय संस्थागत क्षमता में वृद्धि

निष्कर्ष

भारत की नई NDC एक महत्त्वपूर्ण और अपेक्षाकृत अधिक महत्वाकांक्षी जलवायु प्रतिबद्धता है। यह भारत को वैश्विक जलवायु राजनीति में अधिक सक्रिय, उत्तरदायी और रणनीतिक रूप में प्रस्तुत करती है। फिर भी असली परीक्षा लक्ष्यों की घोषणा में नहीं, बल्कि विकास और पर्यावरण के बीच मौजूद अंतर्विरोधों को नीति, तकनीक और संस्थागत क्षमता के माध्यम से सुलझाने में होगी. यदि भारत ऊर्जा संक्रमण, औद्योगिक परिवर्तन और पारिस्थितिक पुनरुत्थान को साथ लेकर चलता है, तभी उसकी NDC वैश्विक दस्तावेज़ से आगे बढ़कर वास्तविक परिवर्तन का माध्यम बन पाएगी।

प्रारंभिक परीक्षा हेतु संभावित प्रश्न

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1.यह पेरिस समझौते के अंतर्गत देशों द्वारा प्रस्तुत स्वैच्छिक जलवायु प्रतिबद्धतियाँ हैं।
2.NDC के लक्ष्य कानूनी रूप से सभी देशों पर समान रूप से बाध्यकारी होते हैं।
3.भारत की अद्यतन NDC में गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता, उत्सर्जन तीव्रता और कार्बन सिंक से संबंधित लक्ष्य शामिल हैं।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 3 (b) केवल 2 और 3 (c) केवल 1 और 2 (d) 1, 2 और 3

मुख्य परीक्षा हेतु संभावित प्रश्न

“भारत की नई NDC जलवायु महत्वाकांक्षा में वृद्धि को दर्शाती है, परंतु इसकी सफलता ऊर्जा अवसंरचना, औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और कार्बन सिंक की गुणवत्ता पर निर्भर करेगी।” टिप्पणी कीजिए।

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