19 Feb भारत के वन और वनस्पति आवरण के सामने प्रमुख चुनौतियां
पाठ्यक्रम :
मुख्य परीक्षा : GS3– पर्यावरण, जैव विविधता, जलवायु परिवर्तन एवं पर्यावरणीय शासन
प्रारंभिक परीक्षा : पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी
खबरों में क्यों ?
हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट से जुड़ी याचिकाओं का निपटारा करते हुए कहा कि परियोजना को दी गई पर्यावरणीय स्वीकृति में पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। यह ₹80,000 करोड़ से अधिक की परियोजना लगभग 166 वर्ग किमी क्षेत्र में फैली है, जिसमें 130 वर्ग किमी उष्णकटिबंधीय वर्षावन के डायवर्जन का प्रस्ताव है। इस घटना ने पुनः यह प्रश्न उठाया है कि भारत की वन एवं वनस्पति आच्छादन को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है तथा वन शासन (Forest Governance) इनसे किस प्रकार निपटने का प्रयास कर रहा है।

भारत के वन एवं वनस्पति आच्छादन के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
1. वनाग्नि (Forest Fires) : भारत के लगभग 54.4% वन क्षेत्र आग-प्रवण हैं। वन सर्वेक्षण के अनुसार 2023–24 से 2024–25 के बीच वनाग्नि घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। अब आग केवल ग्रीष्मकाल तक सीमित नहीं, बल्कि शीतकाल में भी बढ़ रही है।
प्रमुख कारण:
1. पश्चिमी हिमालय में चीड़ की पत्तियों का संचय
2. मध्य भारत में तेंदूपत्ता संग्रह
3. पूर्वोत्तर में झूम खेती
4. जलवायु परिवर्तन (उच्च तापमान, अनियमित वर्षा, लंबा शुष्क काल)
प्रभाव:
1. जैव विविधता की हानि
2. मृदा अपरदन
3. कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि
4. आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव
2. आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ (Invasive Alien Species) : भारत आर्थिक एवं पारिस्थितिक क्षति के मामले में विश्व में दूसरे स्थान पर है।
प्रमुख उदाहरण:
Lantana camara – भारत के बाघ अभयारण्यों के 40% से अधिक क्षेत्र में फैल चुकी।
Prosopis juliflora – दिल्ली रिज और शुष्क क्षेत्रों में पारिस्थितिकी को प्रभावित किया।
प्रभाव:
1. देशज प्रजातियों का प्रतिस्थापन
2. जैव विविधता में कमी
3. आग की संवेदनशीलता में वृद्धि
4. पारिस्थितिक संतुलन का विघटन
3. एकल प्रजाति वृक्षारोपण (Monoculture Plantations)
1. चीड़, यूकेलिप्टस, सागौन जैसी प्रजातियाँ अधिक ज्वलनशील
2. कम कार्बन संचयन क्षमता
3. जैव विविधता में कमी
इसके विपरीत, मिश्रित देशज प्रजातियाँ (जैसे ओक, रोडोडेंड्रॉन) अधिक नमी बनाए रखती हैं और अधिक कार्बन संग्रहित करती हैं।
4. अवसंरचना विकास हेतु वन भूमि का डायवर्जन : पिछले पाँच वर्षों (2020–2025) में 99,000 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि गैर-वानिकी उद्देश्यों हेतु डायवर्ट की गई।
प्रमुख उदाहरण:
ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट
दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे
वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर
समस्याएँ:
1. आवासीय विखंडन (Habitat Fragmentation)
2. मैंग्रोव एवं वर्षावनों को क्षति
3. मानव-वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि
भारत में वन शासन का विकास :
औपनिवेशिक काल –
भारतीय वन अधिनियम 1865, 1878
भारतीय वन अधिनियम 1927 : राज्य नियंत्रण, समुदायों के अधिकारों में कटौती, राजस्व-केंद्रित नीति
स्वतंत्रता पश्चात संरक्षणवादी दृष्टिकोण –
1. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972, 2022 – संरक्षित क्षेत्रों की स्थापना,
2. राष्ट्रीय वन नीति 1988 – 33% वन आच्छादन लक्ष्य, संयुक्त वन प्रबंधन
3. अधिकार-आधारित सुधार : वन अधिकार अधिनियम 2006
a. वनवासियों के अधिकारों की मान्यता
b. संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी
हालिया संशोधन : वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023
1. सीमा क्षेत्रों में छूट
2. जैव विविधता संरक्षण बनाम विकास की बहस
3. वर्तमान चुनौतियों के समाधान हेतु उपाय
4. उन्नत फायर-अर्ली वार्निंग सिस्टम
5. उच्च-रिज़ॉल्यूशन सैटेलाइट मॉनिटरिंग
6. देशज मिश्रित प्रजातियों का वृक्षारोपण
7. ग्राम सभा आधारित वन प्रबंधन
8. आक्रामक प्रजातियों का वैज्ञानिक नियंत्रण
9. पारिस्थितिक समकक्षता के साथ क्षतिपूरक वनीकरण
10. क्षतिपूरक वनीकरण की सीमाएँ
11. उष्णकटिबंधीय वर्षावन का प्रतिस्थापन शुष्क क्षेत्रों में संभव नहीं
12. पारिस्थितिक जटिलता की भरपाई कठिन
13. जैव विविधता का दीर्घकालिक नुकसान
14. भारत की जलवायु प्रतिबद्धता पर प्रभाव
15. भारत ने 2030 तक 2.5–3.0 बिलियन टन CO₂ समतुल्य अतिरिक्त कार्बन सिंक सृजित करने का लक्ष्य रखा है।
16. वनाग्नि, डायवर्जन और एकल प्रजाति वृक्षारोपण इस लक्ष्य को कमजोर कर सकते हैं।
निष्कर्ष
भारत के वन बहुआयामी दबावों — वनाग्नि, आक्रामक प्रजातियाँ, एकल प्रजाति वृक्षारोपण और अवसंरचना विस्तार — से जूझ रहे हैं। वन शासन का विकास औपनिवेशिक नियंत्रण से सामुदायिक भागीदारी तक पहुँचा है, परंतु नीति-कार्यान्वयन अंतराल अभी भी विद्यमान है। दीर्घकालिक समाधान के लिए पारिस्थितिक अखंडता, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और विकास–संरक्षण संतुलन अनिवार्य है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न
प्रश्न . भारत में वन शासन के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1.भारतीय वन अधिनियम, 1927 ने समुदायों के पारंपरिक अधिकारों को सुदृढ़ किया।
2. राष्ट्रीय वन नीति, 1988 ने संयुक्त वन प्रबंधन पर बल दिया।
3. वन अधिकार अधिनियम, 2006 ने वनवासियों को संरक्षण में भागीदारी का अधिकार दिया।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (b)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न
Q.“भारत के वन पारिस्थितिक तंत्र पर बढ़ते विकासात्मक दबाव और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ वन शासन की प्रभावशीलता की परीक्षा ले रही हैं।”
वनाग्नि, आक्रामक प्रजातियाँ, एकल प्रजाति वृक्षारोपण एवं वन भूमि के डायवर्जन के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)**

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