20 Feb भारत के शहरी विकास परिदृश्य में उभरते परिवर्तन : मेट्रो बनाम छोटे शहर
पाठ्यक्रम :
मुख्य परीक्षा : GS3 – भारतीय अर्थव्यवस्था, शहरीकरण, अवसंरचना एवं क्षेत्रीय विकास
प्रारंभिक परीक्षा : भारतीय अर्थव्यवस्था एवं शहरी विकास
खबरों में क्यों ?
हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट हुई है कि भारत का आर्थिक और सामाजिक विकास केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा। Delhi, Mumbai और Bengaluru जैसे मेट्रो शहर लंबे समय से विकास के केंद्र रहे हैं, परंतु अब टियर-2 और टियर-3 शहर निवेश, रोजगार और जनसंख्या आकर्षण के नए केंद्र बनकर उभर रहे हैं। इस प्रवृत्ति ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या भारत का भविष्य अब महानगरों के बजाय मध्यम और छोटे शहरों में आकार ले रहा है?

भारत के शहरी विकास परिदृश्य में उभरते परिवर्तन :
1. मेट्रो शहरों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ :
(a) अत्यधिक जनसंख्या और भीड़भाड़ –
* महानगर अपनी वहन क्षमता (Carrying Capacity) के निकट पहुँच चुके हैं
* ट्रैफिक जाम, लंबी यात्रा अवधि और भीड़भाड़ उत्पादकता को प्रभावित कर रही है।
(b) बढ़ती जीवन लागत –
* आवास किराया अत्यधिक महँगा
* शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की उच्च लागत
* मध्यम वर्ग के लिए सीमित बचत
(c) पर्यावरणीय दबाव –
* वायु प्रदूषण
* जल संकट
* हरित क्षेत्र में कमी
# परिवर्तन के प्रभाव –
A. जीवन गुणवत्ता में गिरावट
B. मानसिक तनाव में वृद्धि
C. अनियंत्रित शहरीकरण
2. टियर-2 और टियर-3 शहरों का उभार :
(a) रोजगार का विकेंद्रीकरण –
* आईटी, स्टार्टअप, मैन्युफैक्चरिंग एवं ई-कॉमर्स कंपनियाँ अब छोटे शहरों में विस्तार कर रही हैं।
* वर्क-फ्रॉम-होम संस्कृति ने भौगोलिक निर्भरता कम की है।
(b) अवसंरचना विकास –
* नए एयरपोर्ट और एक्सप्रेसवे
* बेहतर रेलवे कनेक्टिविटी
* डिजिटल इंडिया के तहत इंटरनेट विस्तार
(c) निवेश और रियल एस्टेट अवसर –
* कम संपत्ति मूल्य
* निवेशकों के लिए उभरते बाजार
# उभार का प्रभाव –
A. संतुलित क्षेत्रीय विकास
B. स्थानीय रोजगार सृजन
C. ग्रामीण-शहरी माइग्रेशन में कमी
3. जीवन गुणवत्ता में सुधार :
(a) कम जीवन लागत –
* कम किराया
* कम परिवहन व्यय
* उच्च बचत दर
(b) संतुलित जीवनशैली –
* कम प्रदूषण
*कम ट्रैफिक
* परिवार के साथ अधिक समय
(c) सामाजिक स्थिरता –
* सामुदायिक जुड़ाव
* सुरक्षित वातावरण
4. संभावित चुनौतियाँ –
A. उच्च स्तरीय स्वास्थ्य एवं शिक्षा संस्थानों की सीमित उपलब्धता
B. कुशल कार्यबल की कमी
C. शहरी नियोजन में अनुभव का अभाव
D. अव्यवस्थित विस्तार का खतरा
यदि समय रहते योजनाबद्ध विकास नहीं किया गया, तो ये शहर भी भविष्य में मेट्रो जैसी समस्याओं का सामना कर सकते हैं।
भारत में शहरी शासन का विकास :
(1) केंद्रीकृत महानगरीय मॉडल –
A. आर्थिक गतिविधियाँ कुछ बड़े शहरों तक सीमित
B. संसाधनों का असमान वितरण
(2) विकेंद्रीकरण की दिशा में प्रयास –
A. स्मार्ट सिटी मिशन
B. अमृत योजना
C. क्षेत्रीय औद्योगिक कॉरिडोर
(3) संतुलित क्षेत्रीय विकास की आवश्यकता –
A. बहु-केंद्रित (Multi-Nodal) विकास मॉडल
B. स्थानीय निकायों की सशक्त भूमिका
C. सतत (Sustainable) शहरीकरण
विकास बनाम संतुलन की बहस :
1. क्या मेट्रो शहर अप्रासंगिक हो जाएंगे ? नहीं –
वे अभी भी वित्त, वैश्विक निवेश और उच्च तकनीक के केंद्र बने रहेंगे।
2. क्या छोटे शहर विकास का भविष्य हैं ? हाँ यदि –
A. नियोजित अवसंरचना
B. पर्यावरणीय संतुलन
C. समावेशी नीतियाँ अपनाई जाएँ
निष्कर्ष :
भारत का भविष्य अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं है। टियर-2 और टियर-3 शहर आर्थिक विकास, निवेश और जीवन गुणवत्ता के नए केंद्र बनकर उभर रहे हैं। हालाँकि यह परिवर्तन सकारात्मक है, परंतु इसके साथ सुनियोजित शहरीकरण, पर्यावरण संरक्षण और संतुलित क्षेत्रीय विकास की रणनीति आवश्यक है। भारत के लिए दीर्घकालिक समाधान यही है कि विकास बहु-केंद्रित, समावेशी और सतत हो ताकि मेट्रो और छोटे शहर दोनों मिलकर राष्ट्रीय प्रगति में योगदान दे सकें।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
प्रश्न. भारत में उभरते शहरी विकास के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. टियर-2 और टियर-3 शहरों में निवेश और रोजगार वृद्धि की प्रवृत्ति देखी जा रही है।
2. मेट्रो शहरों में जीवन लागत कम होने के कारण माइग्रेशन बढ़ रहा है।
3. विकेंद्रीकृत विकास क्षेत्रीय संतुलन को बढ़ावा दे सकता है।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (c)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. “भारत में शहरी विकास की दिशा मेट्रो शहरों से आगे बढ़कर टियर-2 और टियर-3 शहरों की ओर स्थानांतरित हो रही है।”
मेट्रो शहरों की चुनौतियों, छोटे शहरों के अवसरों तथा संतुलित क्षेत्रीय विकास के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

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