24 Mar महिलाओं की गरिमा एवं घरेलू कार्य: समान साझेदारी की ओर न्यायपालिका का संदेश
1. प्रस्तावना
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने एक तलाक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि “विवाह किसी नौकरानी को रखने का अनुबंध नहीं, बल्कि दो समान व्यक्तियों की साझेदारी है।” यह टिप्पणी उस याचिका के संदर्भ में आई जिसमें पति ने पत्नी द्वारा घरेलू कार्य न करने को “क्रूरता” का आधार बताया था।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि घरेलू कार्य केवल महिला का दायित्व नहीं है, बल्कि यह दोनों जीवनसाथियों की साझा जिम्मेदारी है। यह दृष्टिकोण न केवल कानूनी व्याख्या को पुनर्परिभाषित करता है, बल्कि भारतीय समाज में गहराई से जड़ जमा चुकी पितृसत्तात्मक धारणाओं को चुनौती देता है।

2. विषय की प्रासंगिकता : UPSC के संदर्भ में
GS–1 (समाज) : लैंगिक असमानता और पितृसत्ता, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, पारिवारिक संरचना में परिवर्तन
GS–2 (राजव्यवस्था एवं सामाजिक न्याय) : न्यायपालिका की भूमिका, लैंगिक न्याय और संवैधानिक मूल्यों का संरक्षण, न्यायिक सक्रियता
GS–3 (अर्थव्यवस्था) : महिला श्रम बल भागीदारी, केयर इकॉनमी और अवैतनिक श्रम, मानव संसाधन का उपयोग
प्रारंभिक परीक्षा हेतु : GDP की अवधारणा, श्रम बल भागीदारी दर (FLFP), लैंगिक समानता से जुड़े तथ्य
3. अवैतनिक श्रम और केयर इकॉनमी का स्वरूप
भारतीय समाज में घरेलू कार्यों का भार मुख्यतः महिलाओं पर होता है, जिसे “अवैतनिक श्रम” कहा जाता है। यह कार्य अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद अदृश्य बना रहता है।
केयर इकॉनमी के प्रमुख घटक:
बच्चों की देखभाल
बुजुर्गों की सेवा
घरेलू प्रबंधन
मुख्य विशेषताएँ:
अवैतनिक (Unpaid)
GDP में शामिल नहीं
“Hidden Economy” का हिस्सा
👉 परिणामस्वरूप महिलाओं के योगदान का आर्थिक मूल्यांकन नहीं हो पाता।
4. महिलाओं के रोजगार पर प्रभाव
घरेलू जिम्मेदारियों का असमान वितरण महिलाओं की कार्यबल भागीदारी को सीमित करता है।
मुख्य प्रभाव:
रोजगार में कम भागीदारी
करियर में बाधा या अवरोध
आर्थिक निर्भरता
महत्वपूर्ण आँकड़े:
महिला श्रम बल भागीदारी दर ~ 35.3% (2026)
G20 देशों में अपेक्षाकृत निम्न
👉 यह स्थिति भारत की आर्थिक विकास क्षमता को प्रभावित करती है।
5. STEM विरोधाभास (Education–Employment Gap)
यद्यपि महिलाएँ शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, परंतु रोजगार में यह प्रगति परिलक्षित नहीं होती।
आँकड़े:
42.6% STEM स्नातक = महिलाएँ
केवल 27% STEM रोजगार
मुख्य कारण:
विवाह और सामाजिक अपेक्षाएँ
घरेलू भूमिकाओं की प्राथमिकता
👉 यह मानव पूंजी के अपूर्ण उपयोग को दर्शाता है।
6. न्यायिक सक्रियता और सामाजिक परिवर्तन
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, जहाँ न्यायपालिका सामाजिक दिशा निर्धारित करती है।
मुख्य पहलू:
विवाह में समानता की पुनर्स्थापना
लैंगिक भूमिकाओं को चुनौती
पुरुषों की घरेलू भागीदारी को बढ़ावा
👉 यह व्यवहारिक एवं मानसिक परिवर्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
7. व्यापक सामाजिक आयाम
भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक संरचना के कारण घरेलू कार्यों को महिला की जिम्मेदारी माना जाता रहा है।
सामाजिक मान्यताएँ → महिलाओं पर अतिरिक्त बोझ
विवाह → रोजगार में गिरावट
घरेलू कार्य → अदृश्य आर्थिक योगदान
👉 यह असमानता सामाजिक न्याय और आर्थिक दक्षता दोनों को प्रभावित करती है।
8. आगे की राह (Way Forward)
घरेलू कार्यों का समान बंटवारा
अवैतनिक श्रम की नीतिगत मान्यता
कार्यस्थलों पर लचीली व्यवस्था (Flexible Work)
क्रेच और देखभाल सुविधाओं का विस्तार
लैंगिक संवेदनशीलता पर सामाजिक जागरूकता
9. निष्कर्ष
न्यायालय की यह टिप्पणी केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का संकेत है। महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए आवश्यक है कि घरेलू स्तर पर जिम्मेदारियों का समान वितरण हो। “वास्तविक लैंगिक समानता की शुरुआत घर से होती है।” महिलाओं का सशक्तिकरण केवल नीतियों से नहीं, बल्कि घरेलू स्तर पर समान जिम्मेदारी के वितरण से संभव है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1.अवैतनिक घरेलू कार्य GDP में शामिल होते हैं।
2.भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर पुरुषों की तुलना में कम है।
3.STEM शिक्षा प्राप्त करने वाली अधिकांश महिलाएँ STEM नौकरियों में प्रवेश करती हैं।
सही विकल्प चुनिए:
(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
👉 उत्तर: (b) केवल 2
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न
“अवैतनिक घरेलू श्रम भारत में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण में एक प्रमुख बाधा है।” हाल के सर्वोच्च न्यायालय के अवलोकनों के संदर्भ में इसकी समीक्षा कीजिए। (150–250 शब्द)

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