06 Aug राज्यसभा ने न्यायाधीश विधेयक पारित किया; विपक्ष ने अध्यादेश मार्ग और विविधता की कमी उठाई
✎ उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करता है, जिसके पारित होने पर अध्यादेश मार्ग और न्यायिक विविधता पर बहस छिड़ गई।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: संघ और राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघवाद से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा उसकी चुनौतियाँ। | GS Paper II — भारतीय संविधान: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थाएँ। | GS Paper II — न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली।
- Prelims: उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026, अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति, अनुच्छेद 124, धन विधेयक (Money Bill), न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया, न्यायिक विविधता
- Essay: भारतीय न्यायपालिका: चुनौतियाँ और सुधार, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करता है, जिसके पारित होने पर अध्यादेश मार्ग और न्यायिक विविधता पर बहस छिड़ गई।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, राज्यसभा ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया है, जो मई में प्रख्यापित एक अध्यादेश का स्थान लेता है। इस विधेयक का उद्देश्य भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करना है। इस विधेयक पर चर्चा के दौरान, विपक्ष ने सरकार द्वारा अध्यादेश मार्ग अपनाने और न्यायपालिका में विविधता की कमी जैसे मुद्दों पर चिंता व्यक्त की।
पृष्ठभूमि
- उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 मूल रूप से सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करता है।
- समय-समय पर, मामलों के बढ़ते बोझ और न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की गई है।
- यह विधेयक मई में जारी एक अध्यादेश का स्थान लेता है, जिसने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी थी।
- विपक्ष ने इस बात पर आपत्ति जताई कि सरकार ने संसद सत्र शुरू होने से ठीक पहले अध्यादेश का मार्ग क्यों चुना, जबकि संसद जल्द ही मिलने वाली थी।
- चर्चा के दौरान, कई सांसदों ने न्यायपालिका में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया।
- कुछ सांसदों ने न्याय तक पहुँच को आसान बनाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठें स्थापित करने की भी मांग की।
उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 और संबंधित प्रावधान
- यह विधेयक उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित 34 से बढ़ाकर 38 करता है।
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 124 (1) यह प्रावधान करता है कि भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा जिसमें भारत का एक मुख्य न्यायाधीश और जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती, तब तक अन्य न्यायाधीश होंगे।
- संसद को कानून द्वारा न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का अधिकार है। यह विधेयक इसी संवैधानिक प्रावधान के तहत लाया गया है।
- यह एक धन विधेयक (Money Bill) के रूप में लोकसभा में पारित हुआ और फिर राज्यसभा द्वारा अनुमोदित किया गया। धन विधेयक केवल लोकसभा में ही प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
- अध्यादेश (Ordinance) जारी करने की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को प्राप्त है, जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हों जिनमें तुरंत कार्रवाई करना आवश्यक हो।
- न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम (Supreme Court Collegium) द्वारा की जाती है, जबकि केंद्र सरकार नियुक्तियों को अधिसूचित करती है।
- न्यायपालिका में विविधता की कमी का मुद्दा एक महत्वपूर्ण चिंता का विषय है, क्योंकि यह न्याय प्रणाली की समावेशिता और प्रतिनिधित्व को प्रभावित करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अध्यादेश का स्थान | यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 का स्थान लेता है, जिसे मई में प्रख्यापित किया गया था। |
| न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि | यह विधेयक भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करता है। |
| धन विधेयक | यह विधेयक एक धन विधेयक (Money Bill) है, जिसे लोकसभा द्वारा पारित किया गया और राज्यसभा ने ध्वनि मत से मंजूरी दी। |
| संसद में चर्चा | राज्यसभा में इस विधेयक पर लगभग दो घंटे तक चर्चा हुई, जिसमें विपक्ष ने अध्यादेश मार्ग और न्यायिक विविधता की कमी पर चिंता जताई। |
| न्याय तक पहुँच | न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का उद्देश्य लंबित मामलों को कम करना और न्याय तक पहुँच में सुधार करना है। |
महत्व
न्यायिक प्रशासन पर प्रभाव
- सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से लंबित मामलों के निपटान में तेजी आने की उम्मीद है।
- यह न्यायालय को अधिक समर्पित पीठें (dedicated benches) स्थापित करने में सक्षम करेगा, जिससे विभिन्न प्रकार के मामलों पर अधिक प्रभावी ढंग से ध्यान केंद्रित किया जा सकेगा।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से न्यायिक कार्यभार को कम करने में मदद मिल सकती है, जिससे न्यायाधीशों को प्रत्येक मामले पर अधिक समय और ध्यान देने का अवसर मिलेगा।
विधायी प्रक्रिया का महत्व
- अध्यादेश के स्थान पर विधेयक पारित करना संसदीय सर्वोच्चता और विधायी प्रक्रिया के पालन को दर्शाता है।
- धन विधेयक के रूप में इसका पारित होना विधायी प्रक्रिया में लोकसभा की विशेष भूमिका को रेखांकित करता है।
- विधेयक पर संसद में चर्चा, भले ही विपक्ष ने विरोध किया हो, लोकतांत्रिक विचार-विमर्श के महत्व को दर्शाती है।
सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व
- न्यायपालिका में SC, ST, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया गया है, जो न्यायिक प्रणाली में समावेशिता की आवश्यकता को उजागर करता है।
- यह विधेयक सीधे तौर पर विविधता के मुद्दे को संबोधित नहीं करता है, लेकिन यह न्यायिक सुधारों पर व्यापक बहस का हिस्सा है जिसमें प्रतिनिधित्व भी शामिल है।
- क्षेत्रीय पीठों की मांग न्याय तक पहुँच को विकेंद्रीकृत करने और भौगोलिक बाधाओं को कम करने की आवश्यकता को दर्शाती है।
चुनौतियाँ
1. अध्यादेश मार्ग का उपयोग
- विपक्ष ने सरकार द्वारा संसद सत्र से ठीक पहले अध्यादेश लाने की ‘जल्दबाजी’ पर सवाल उठाया।
- अध्यादेश का उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाना चाहिए जब संसद सत्र में न हो और तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता हो।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: अध्यादेश जारी करने की शक्ति
2. न्यायिक विविधता की कमी
- सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में SC, ST, OBC, अल्पसंख्यकों और महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व एक गंभीर चिंता का विषय है।
- यह न्यायपालिका की वैधता और समावेशिता पर सवाल उठाता है, क्योंकि यह समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व
3. न्याय तक पहुँच और क्षेत्रीय पीठें
- न्याय तक पहुँच को आसान बनाने और भौगोलिक बाधाओं को दूर करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों की स्थापना की मांग की गई है।
- वर्तमान प्रणाली में, दूरदराज के क्षेत्रों के लोगों के लिए दिल्ली में सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचना महंगा और कठिन हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: शासन: न्याय तक पहुँच में सुधार
4. निचली अदालतों में न्यायाधीशों की कमी
- कई सांसदों ने जिला अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया, जहाँ करोड़ों मामले लंबित हैं।
- निचली अदालतों में न्यायाधीशों की कमी समग्र न्यायिक प्रणाली पर दबाव डालती है और न्याय में देरी का एक प्रमुख कारण है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय न्यायपालिका: अधीनस्थ न्यायालयों की भूमिका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| अध्यादेश का मार्ग | संसद सत्र से ठीक पहले अध्यादेश लाने की आवश्यकता पर सवाल। |
| न्यायिक विविधता का अभाव | SC, ST, अल्पसंख्यक और महिलाओं का न्यायपालिका में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व। |
| क्षेत्रीय पीठों की मांग | न्याय तक पहुँच को आसान बनाने और भौगोलिक बाधाओं को कम करने की आवश्यकता। |
| निचली अदालतों में लंबित मामले | जिला अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि की आवश्यकता। |
| न्यायिक नियुक्तियाँ | सरकार द्वारा नियुक्तियों में देरी और कॉलेजियम प्रणाली की प्रभावशीलता। |
आगे की राह
- न्यायिक नियुक्तियों में विविधता सुनिश्चित करने के लिए एक पारदर्शी और समावेशी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
- न्यायपालिका में SC, ST, OBC, अल्पसंख्यक और महिला उम्मीदवारों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए सक्रिय उपाय किए जाने चाहिए।
- सर्वोच्च न्यायालय की क्षेत्रीय पीठों की स्थापना की व्यवहार्यता का अध्ययन किया जाना चाहिए ताकि न्याय तक पहुँच में सुधार हो सके।
- निचली अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने और बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए तत्काल कदम उठाए जाने चाहिए ताकि लंबित मामलों को कम किया जा सके।
- अध्यादेश मार्ग का उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों तक सीमित रखा जाना चाहिए, और नियमित विधायी मामलों के लिए संसदीय प्रक्रिया का पालन किया जाना चाहिए।
- न्यायिक सुधारों पर व्यापक चर्चा की जानी चाहिए जिसमें न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ प्रक्रियात्मक दक्षता और प्रौद्योगिकी के उपयोग जैसे पहलू भी शामिल हों।
- सरकार और न्यायपालिका के बीच समन्वय बढ़ाया जाना चाहिए ताकि न्यायिक रिक्तियों को समय पर भरा जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
न्यायिक नियुक्तियाँ · अध्यादेश मार्ग · न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि · न्यायिक विविधता · न्यायालयों में लंबित मामले · न्यायिक सक्रियता · संसद की भूमिका · धन विधेयक · उच्च न्यायपालिका · न्यायिक जवाबदेही · न्यायिक सुधार · अनुच्छेद 370
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124(1)’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124(2)’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 127’, ‘note’: ‘तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 217’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 123’, ‘note’: ‘राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति’}
अवधारणा प्रवाह
न्यायाधीशों की कमी और लंबित मामले → सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का प्रस्ताव → अध्यादेश के माध्यम से प्रारंभिक वृद्धि → संसद द्वारा अध्यादेश का विधेयक में रूपांतरण → विधेयक पर संसदीय चर्चा और पारित होना → न्यायिक दक्षता में संभावित सुधार → न्यायपालिका में विविधता और पहुँच पर बहस जारी
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि केवल एक संवैधानिक संशोधन विधेयक के माध्यम से ही की जा सकती है।
2. सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 एक धन विधेयक (Money Bill) के रूप में पारित किया गया था।
3. भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की वर्तमान स्वीकृत संख्या 38 है।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या संसद द्वारा कानून बनाकर बढ़ाई जा सकती है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करके किया जाता है, न कि संवैधानिक संशोधन विधेयक से। कथन 2 सही है। यह विधेयक धन विधेयक के रूप में पारित किया गया था। कथन 3 सही है। विधेयक पारित होने के बाद, भारत के मुख्य न्यायाधीश सहित सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़कर 38 हो गई है।
Q2. अभिकथन (A): सरकार द्वारा अध्यादेश (Ordinance) का मार्ग चुनना हमेशा संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के विरुद्ध होता है।
कारण (R): अध्यादेश केवल तभी प्रख्यापित किया जा सकता है जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता हो।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A असत्य है, लेकिन R सत्य है। — अभिकथन (A) असत्य है। यद्यपि अध्यादेश का अत्यधिक उपयोग संसदीय लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय हो सकता है, लेकिन यह हमेशा ‘विरुद्ध’ नहीं होता है। संविधान स्वयं अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान करता है, जो कुछ परिस्थितियों में आवश्यक हो सकता है। कारण (R) सत्य है। अनुच्छेद 123 के तहत, राष्ट्रपति अध्यादेश तभी जारी कर सकते हैं जब संसद के दोनों सदन सत्र में न हों और उन्हें विश्वास हो कि ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके लिए तत्काल कार्रवाई आवश्यक है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के लिए अध्यादेश मार्ग अपनाने पर विपक्ष द्वारा उठाई गई आपत्तियों और न्यायपालिका में विविधता की कमी के मुद्दे का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से न्यायपालिका की मूलभूत समस्याओं का समाधान हो पाएगा? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 और न्यायाधीशों की संख्या 34 से 38 करने के संदर्भ में संक्षिप्त पृष्ठभूमि।
2. **अध्यादेश मार्ग पर आपत्तियाँ:**
* **संवैधानिक प्रावधान:** अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति का उल्लेख।
* **विपक्ष की चिंताएँ:** संसद सत्र शुरू होने से ठीक पहले अध्यादेश लाने की आवश्यकता पर सवाल, संसदीय सर्वोच्चता का उल्लंघन, ‘तत्काल आवश्यकता’ के औचित्य पर प्रश्न।
* **न्यायिक समीक्षा:** डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य जैसे मामलों का उल्लेख जहाँ अध्यादेशों के बार-बार उपयोग की आलोचना की गई।
3. **न्यायपालिका में विविधता की कमी का मुद्दा:**
* **आँकड़े:** SC, ST, OBC, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के प्रतिनिधित्व से संबंधित हालिया आँकड़ों का उल्लेख (जैसा कि समाचार में दिया गया है)।
* **महत्व:** न्यायिक स्वतंत्रता, समावेशी न्याय, सार्वजनिक विश्वास और न्याय तक पहुँच के लिए विविधता का महत्व।
* **चुनौतियाँ:** कॉलेजियम प्रणाली की भूमिका, सामाजिक-आर्थिक बाधाएँ, प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए तंत्र की कमी।
4. **केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से समाधान?**
* **हाँ (सकारात्मक पक्ष):** लंबित मामलों को कम करने में मदद, विशेष पीठों का गठन, कार्यभार का बेहतर प्रबंधन।
* **नहीं (नकारात्मक पक्ष/मूलभूत समस्याएँ):**
* **संरचनात्मक मुद्दे:** न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता, कॉलेजियम प्रणाली में सुधार की आवश्यकता।
* **सामाजिक प्रतिनिधित्व:** विविधता की कमी का मुद्दा संख्या वृद्धि से हल नहीं होगा।
* **अवर न्यायालयों की स्थिति:** जिला न्यायालयों में न्यायाधीशों की कमी और लंबित मामलों का अंबार।
* **न्याय तक पहुँच:** क्षेत्रीय पीठों की मांग, न्याय प्रक्रिया की लागत और जटिलता।
* **बुनियादी ढाँचा:** न्यायालयों में भौतिक और तकनीकी बुनियादी ढाँचे की कमी।
5. **निष्कर्ष:** एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना एक आवश्यक कदम हो सकता है, लेकिन यह न्यायपालिका की सभी समस्याओं का रामबाण नहीं है। व्यापक न्यायिक सुधारों, विविधता सुनिश्चित करने और अवर न्यायालयों को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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