05 Aug राज्यसभा में SC न्यायाधीश विधेयक चर्चा: मानसून सत्र का 13वां दिन, विपक्ष का हंगामा
✎ सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को बढ़ाने का उद्देश्य रखता है, जिसका उद्देश्य न्यायिक कार्यभार को कम करना है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, संसद और न्यायपालिका | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में)
- Prelims: संसद सत्र, अध्यादेश, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या, संसदीय प्रक्रिया, बैंकर बही साक्ष्य अधिनियम
- Essay: संसदीय लोकतंत्र में वाद-विवाद और गतिरोध, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यप्रणाली
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को बढ़ाने का उद्देश्य रखता है, जिसका उद्देश्य न्यायिक कार्यभार को कम करना है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा दोनों में विपक्षी दलों के लगातार विरोध के कारण कार्यवाही बाधित हुई। इसी बीच, राज्यसभा में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पर चर्चा हुई, जिसे लोकसभा पहले ही पारित कर चुकी है। विपक्ष ने विभिन्न मुद्दों पर सरकार से स्पष्टीकरण की मांग की, जिससे सदन में गतिरोध बना रहा।
पृष्ठभूमि
- संसद का मानसून सत्र विपक्षी दलों के विरोध प्रदर्शनों से बाधित रहा, जिसमें गृह मंत्री के बयान की मांग, राम मंदिर दान के कथित दुरुपयोग पर चर्चा और जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने जैसे मुद्दे शामिल थे।
- राज्यसभा ने ‘सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026’ पर चर्चा की, जिसे 3 अगस्त को लोकसभा में ध्वनि मत से पारित किया गया था।
- यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करता है।
- विपक्ष द्वारा संसद परिसर में विरोध मार्च निकाला गया और सदन के वेल में प्रवेश तथा तख्तियों के उपयोग पर प्रतिबंध जैसे नियमों का उल्लंघन भी देखा गया।
- राष्ट्रपति द्वारा 5 जून को प्रख्यापित आयकर (संशोधन) अध्यादेश, 2026 (संख्या 2, 2026) को अस्वीकृत करने के लिए एक वैधानिक संकल्प भी सदन में पेश किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 क्या है?
- यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करता है।
- इसका मुख्य उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या में वृद्धि करना है।
- यह संशोधन न्यायपालिका पर बढ़ते कार्यभार को कम करने और मामलों के त्वरित निपटान में सहायता करने के उद्देश्य से लाया गया है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 | यह विधेयक उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या में वृद्धि करता है। |
| न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि | मुख्य न्यायाधीश सहित स्वीकृत शक्ति 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी। |
| लंबित मामलों का निपटान | न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से लंबित मामलों के त्वरित निपटान में सहायता मिलेगी। |
| न्यायपालिका पर कार्यभार कम करना | यह न्यायपालिका पर बढ़ते कार्यभार को कम करने में सहायक होगा। |
| अध्यादेश का स्थान | यह विधेयक पहले जारी किए गए एक अध्यादेश का स्थान लेता है। |
महत्व
न्यायिक महत्व
- यह विधेयक उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 करता है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश (CJI) भी शामिल हैं।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से लंबित मामलों (Pending Cases) के बोझ को कम करने और न्याय वितरण प्रणाली (Justice Delivery System) को अधिक कुशल बनाने में मदद मिलेगी।
- यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कार्यक्षमता को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, विशेष रूप से जब मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
शासनिक महत्व
- संसद द्वारा विधेयक पारित करना विधायी प्रक्रिया (Legislative Process) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो दर्शाता है कि सरकार न्यायिक सुधारों के प्रति प्रतिबद्ध है।
- अध्यादेश (Ordinance) के स्थान पर विधेयक लाना संसदीय सर्वोच्चता (Parliamentary Supremacy) और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान को दर्शाता है।
सामाजिक महत्व
- त्वरित न्याय (Speedy Justice) नागरिकों का मौलिक अधिकार है, और न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि इस अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम है।
- न्यायिक प्रणाली में सुधार से जनता का न्यायपालिका में विश्वास बढ़ता है, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
चुनौतियाँ
1. संसदीय कार्यवाही में व्यवधान
- विपक्ष के लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण संसद के मानसून सत्र में कार्यवाही बाधित हुई है।
- विधेयकों पर बिना बहस के पारित होना लोकतांत्रिक सिद्धांतों के लिए चिंता का विषय है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संसद और राज्य विधानमंडल
2. न्यायिक नियुक्तियाँ
- न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के बावजूद, नियुक्तियों की प्रक्रिया में देरी से न्यायिक रिक्तियां (Judicial Vacancies) बनी रह सकती हैं।
- न्यायिक नियुक्तियों को लेकर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संभावित मतभेद एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: न्यायपालिका
3. न्यायिक सक्रियता और संयम
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के साथ, न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) और न्यायिक संयम (Judicial Restraint) के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
- यह सुनिश्चित करना कि बढ़ी हुई संख्या से न्यायपालिका की गुणवत्ता और दक्षता प्रभावित न हो।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: न्यायपालिका की भूमिका
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| संसदीय गतिरोध | विपक्ष के विरोध के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों पर पर्याप्त चर्चा का अभाव। |
| न्यायिक रिक्तियां | न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के बावजूद, नियुक्तियों में देरी से रिक्तियां बनी रह सकती हैं। |
| न्यायपालिका पर कार्यभार | केवल संख्या बढ़ाने से ही लंबित मामलों का पूरी तरह समाधान नहीं होगा, अन्य संरचनात्मक सुधारों की भी आवश्यकता है। |
| लोकतांत्रिक बहस का ह्रास | संसद में व्यवधान के कारण महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्वजनिक बहस और जांच का अवसर खोना। |
आगे की राह
- संसदीय कार्यवाही को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार और विपक्ष के बीच रचनात्मक संवाद और सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
- विधेयकों पर पर्याप्त बहस और चर्चा सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पवित्रता बनी रहे।
- न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाना चाहिए ताकि रिक्तियों को शीघ्र भरा जा सके।
- न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ, न्यायिक बुनियादी ढांचे (Judicial Infrastructure) और तकनीकी उन्नयन पर भी ध्यान देना चाहिए।
- न्यायपालिका में वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) तंत्रों को मजबूत करना चाहिए ताकि मामलों का बोझ कम हो सके।
- न्यायिक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि न्यायाधीशों की गुणवत्ता और दक्षता बनी रहे।
- संसद के नियमों और प्रक्रियाओं का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि सदन की गरिमा बनी रहे और व्यवधानों को रोका जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
संसद में व्यवधान · न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि · न्यायपालिका की स्वतंत्रता · संसदीय कार्यवाही · लोकसभा · राज्यसभा · अध्यादेश · विधायी प्रक्रिया · न्यायिक दक्षता · संसदीय गतिरोध
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124’, ‘note’: ‘उच्चतम न्यायालय की स्थापना और गठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 130’, ‘note’: ‘उच्चतम न्यायालय का स्थान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 145’, ‘note’: ‘न्यायालय के नियम’}
अवधारणा प्रवाह
उच्चतम न्यायालय में लंबित मामलों में वृद्धि। → न्यायपालिका पर बढ़ते कार्यभार को कम करने की आवश्यकता महसूस हुई। → सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 जारी किया गया। → अध्यादेश को प्रतिस्थापित करने के लिए विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया। → विधेयक पारित होने के बाद न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 34 से बढ़कर 38 हो गई। → बढ़ी हुई संख्या से लंबित मामलों के निपटान में तेजी आने की उम्मीद है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को संसद कानून द्वारा बढ़ा सकती है।
2. सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 ने मुख्य न्यायाधीश सहित न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 कर दिया है।
3. भारत के संविधान के अनुच्छेद 124 में सर्वोच्च न्यायालय के गठन और न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 124(1) संसद को कानून द्वारा न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित करने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है क्योंकि विधेयक ने स्वीकृत संख्या को 34 से 38 कर दिया है। कथन 3 भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 124 सर्वोच्च न्यायालय के गठन, स्वतंत्रता, क्षेत्राधिकार, शक्तियों और प्रक्रियाओं से संबंधित है।
Q2. अभिकथन (A): संसद में विपक्ष द्वारा लगातार व्यवधानों के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा बाधित होती है।
कारण (R): संसदीय कार्यवाही के दौरान विरोध प्रदर्शनों के लिए सदन के वेल में प्रवेश करना और तख्तियां दिखाना नियमों के विरुद्ध है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि समाचार रिपोर्ट में व्यवधानों के कारण चर्चा बाधित होने का उल्लेख है। कारण (R) भी सही है क्योंकि राज्यसभा के सभापति ने इन नियमों का उल्लेख किया था। हालांकि, कारण (R) सीधे तौर पर यह नहीं बताता कि व्यवधान क्यों होते हैं, बल्कि यह बताता है कि विरोध प्रदर्शन के कौन से तरीके नियमों के खिलाफ हैं। इसलिए, R, A की सही व्याख्या नहीं है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 के पारित होने के आलोक में, भारत में न्यायिक दक्षता सुनिश्चित करने में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के महत्व का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही, संसदीय व्यवधानों के कारण विधायी प्रक्रिया पर पड़ने वाले प्रभावों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 और न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का संक्षिप्त उल्लेख।
2. न्यायिक दक्षता में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का महत्व:
क. लंबित मामलों का बोझ: बड़ी संख्या में लंबित मामलों को कम करने में सहायता।
ख. त्वरित न्याय: मामलों के तेजी से निपटान में योगदान।
ग. विशेषज्ञता: विभिन्न पीठों के गठन और विशिष्ट क्षेत्रों में विशेषज्ञता को बढ़ावा।
घ. कार्यभार का वितरण: मौजूदा न्यायाधीशों पर कार्यभार कम करना।
ङ. न्याय तक पहुंच: नागरिकों के लिए न्याय तक पहुंच में सुधार।
3. आलोचनात्मक परीक्षण/चुनौतियाँ:
क. केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं: बुनियादी ढांचे, सहायक कर्मचारियों और प्रक्रियात्मक सुधारों की आवश्यकता।
ख. नियुक्ति प्रक्रिया: न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी और कॉलेजियम प्रणाली की भूमिका।
ग. गुणवत्ता बनाम मात्रा: यह सुनिश्चित करना कि नियुक्तियाँ योग्यता के आधार पर हों।
घ. न्यायिक सक्रियता और संयम के बीच संतुलन।
4. संसदीय व्यवधानों का विधायी प्रक्रिया पर प्रभाव:
क. विधेयकों पर अपर्याप्त चर्चा: महत्वपूर्ण कानूनों पर सार्थक बहस की कमी।
ख. अध्यादेशों का सहारा: सरकार द्वारा अध्यादेशों के माध्यम से कानून बनाने की प्रवृत्ति में वृद्धि।
ग. लोकतंत्र का क्षरण: संसद की जवाबदेही और विचार-विमर्श की भूमिका कमजोर होना।
घ. सार्वजनिक धन की बर्बादी: सत्रों के बाधित होने से करदाताओं के पैसे का नुकसान।
ङ. विपक्ष की भूमिका: सार्थक विरोध और व्यवधान के बीच अंतर।
5. निष्कर्ष: न्यायिक दक्षता और सुचारू संसदीय कामकाज के लिए संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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