18 Sep राज्यों को स्थानीय निकायों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देना चाहिए: राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष

✎ राज्य वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है और राज्य तथा स्थानीय निकायों के बीच राजस्व के वितरण के सिद्धांतों पर राज्यपाल को सिफारिशें करता है, जो भारत में राजकोषीय विकेंद्रीकरण…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संघवाद, स्थानीय स्वशासन, शक्तियों का पृथक्करण, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध | GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था, सरकारी बजट, राजकोषीय संघवाद
- Prelims: राज्य वित्त आयोग, स्थानीय स्वशासन, 73वां संविधान संशोधन अधिनियम, 74वां संविधान संशोधन अधिनियम, वित्तीय स्वायत्तता, राजकोषीय संघवाद, संपत्ति कर, विकेंद्रीकरण
- Essay: भारत में लोकतंत्र का विकेंद्रीकरण और स्थानीय निकायों की भूमिका, स्थानीय स्वशासन: चुनौतियाँ और आगे की राह
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है और राज्य तथा स्थानीय निकायों के बीच राजस्व के वितरण के सिद्धांतों पर राज्यपाल को सिफारिशें करता है, जो भारत में राजकोषीय विकेंद्रीकरण के लिए महत्वपूर्ण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु सरकार द्वारा गठित सातवें राज्य वित्त आयोग (SSFC) के अध्यक्ष ने स्थानीय निकायों को अधिक अधिकार, वित्तीय स्वायत्तता और संसाधन प्रदान करने का आह्वान किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पर्याप्त और अनुमानित वित्तीय संसाधनों के बिना कोई भी संस्था सार्थक स्वायत्तता का प्रयोग नहीं कर सकती और अपने कार्यों का निर्वहन नहीं कर सकती। यह टिप्पणी स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने और भारतीय लोकतंत्र में विकेंद्रीकरण के वादे को साकार करने के महत्व को रेखांकित करती है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान के 73वें और 74वें संशोधन अधिनियमों ने ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया, जिससे भारत में विकेंद्रीकरण की नींव रखी गई।
- इन संशोधनों ने राज्यों को स्थानीय निकायों को शक्तियाँ और कार्य सौंपने का अधिकार दिया, जिसमें कराधान और राजस्व संग्रह शामिल है।
- अनुच्छेद 243I और 243Y के तहत, प्रत्येक राज्य को एक राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) का गठन करना अनिवार्य है, जो स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करेगा और राज्यपाल को सिफारिशें देगा।
- स्थानीय निकाय अभी भी केंद्र और राज्य सरकारों से प्राप्त हस्तांतरण पर काफी हद तक निर्भर करते हैं, जिससे उनकी वित्तीय स्वायत्तता सीमित हो जाती है।
- ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए संपत्ति और व्यावसायिक करों जैसे स्वयं के राजस्व स्रोतों (Own Sources of Revenue – OSR) का प्रतिशत कई राज्यों में 1% से 8% तक है, जो उनकी वित्तीय कमजोरी को दर्शाता है।
- OECD देशों में संपत्ति कर संग्रह GDP का लगभग 1.1% है, जबकि भारत में यह केवल 0.2% है, जो स्थानीय निकायों के लिए राजस्व बढ़ाने की क्षमता को इंगित करता है।
राज्य वित्त आयोग क्या है?
- राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission – SFC) एक संवैधानिक निकाय है जिसका गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243I (पंचायतों के लिए) और 243Y (नगरपालिकाओं के लिए) के तहत किया जाता है।
- इसका मुख्य कार्य राज्य और स्थानीय निकायों के बीच तथा विभिन्न स्थानीय निकायों के बीच करों, शुल्कों, टोलों और फीसों के शुद्ध आगमों के वितरण के सिद्धांतों के संबंध में राज्यपाल को सिफारिशें करना है।
- यह उन करों, शुल्कों, टोलों और फीसों का अवधारण करने के लिए पंचायतों/नगरपालिकाओं को सौंपे जा सकने वाले या उनके द्वारा विनियोजित किए जा सकने वाले सिद्धांतों के बारे में भी सिफारिशें करता है।
- आयोग राज्य की संचित निधि से पंचायतों/नगरपालिकाओं को दिए जाने वाले सहायता अनुदान के सिद्धांतों की भी सिफारिश करता है।
- यह पंचायतों/नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए आवश्यक उपायों के बारे में राज्यपाल को सिफारिशें प्रस्तुत करता है।
- राज्यपाल आयोग द्वारा की गई प्रत्येक सिफारिश और उस पर की गई कार्रवाई के स्पष्टीकरण ज्ञापन को राज्य विधानमंडल के समक्ष रखवाते हैं।
- SFC की सिफारिशें प्रकृति में सलाहकार होती हैं और राज्य सरकार पर बाध्यकारी नहीं होती हैं, हालांकि वे वित्तीय विकेंद्रीकरण के लिए महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्यों के वित्त आयोग की भूमिका | स्थानीय निकायों को वित्तीय स्वायत्तता और संसाधनों की सिफारिश करना। |
| विकेंद्रीकरण | भारतीय लोकतंत्र को संवैधानिक वादे से एक जीवंत वास्तविकता बनाना। |
| स्थानीय सरकारों के राजस्व के अपने स्रोत (OSR) | संपत्ति कर, पेशेवर कर, किराए और शुल्कों के माध्यम से राजस्व जुटाना। |
| महिलाओं के लिए 50% आरक्षण | स्थानीय निकायों में महिला प्रतिनिधियों के सशक्तिकरण को बढ़ावा देना। |
| GIS-आधारित कर संग्रह | राजस्व संग्रह दक्षता में सुधार और पारदर्शिता बढ़ाना। |
महत्व
शासन और लोकतंत्र
- स्थानीय निकायों को अधिक अधिकार और वित्तीय स्वायत्तता प्रदान करके जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करना।
- विकेंद्रीकरण के माध्यम से शासन को नागरिकों के करीब लाना, जिससे जवाबदेही और दक्षता में सुधार हो।
आर्थिक विकास
- स्थानीय स्तर पर राजस्व जुटाने की क्षमता में वृद्धि से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर विकास सुनिश्चित करना।
- स्थानीय सरकारों को पर्याप्त और अनुमानित वित्तीय संसाधन प्रदान करके बुनियादी ढांचे और सेवाओं में निवेश को बढ़ावा देना।
सामाजिक सशक्तिकरण
- स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को सशक्त बनाना और उनके अनौपचारिक हस्तक्षेपों को कम करना।
- स्थानीय स्वशासन मॉडल में विश्वास को बढ़ावा देना, जिससे समुदाय-आधारित विकास और भागीदारी को बल मिले।
चुनौतियाँ
1. वित्तीय निर्भरता
- स्थानीय सरकारें केंद्र और राज्य सरकारों से हस्तांतरण पर काफी हद तक निर्भर रहती हैं।
- राजस्व के अपने स्रोतों (OSR) का ग्रामीण स्थानीय निकायों के लिए 1% से 8% तक कम होना।
यूपीएससी लिंक: राजकोषीय संघवाद, स्थानीय स्वशासन
2. कम संपत्ति कर संग्रह
- भारत में संपत्ति कर संग्रह GDP का केवल 0.2% है, जबकि OECD देशों में यह 1.1% है।
- शहरी और ग्रामीण विकास के लिए संपत्ति कर जैसे स्थानीय करों का कम संग्रह एक बाधा है।
यूपीएससी लिंक: स्थानीय वित्त, शहरीकरण
3. महिला प्रतिनिधियों की भूमिका में हस्तक्षेप
- स्थानीय निकायों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के पति द्वारा अनौपचारिक रूप से उनकी भूमिका संभालने का मुद्दा।
- महिलाओं के लिए 50% आरक्षण के बावजूद वास्तविक सशक्तिकरण की कमी।
यूपीएससी लिंक: महिला सशक्तिकरण, पंचायती राज
4. नौकरशाही का वातावरण
- स्थानीय निकायों के कार्यों में अत्यधिक नौकरशाही हस्तक्षेप और लोगों के प्रति नौकरशाही की जवाबदेही की कमी।
- स्वशासन मॉडल पर विश्वास की कमी और नौकरशाही पर अत्यधिक निर्भरता।
यूपीएससी लिंक: शासन, विकेंद्रीकरण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| राजस्व के अपने स्रोतों की कमी | स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता और विकास क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव। |
| केंद्र और राज्य पर निर्भरता | स्थानीय सरकारों की योजना और कार्यान्वयन में स्वायत्तता का अभाव। |
| कम संपत्ति कर संग्रह | शहरी और ग्रामीण बुनियादी ढांचे के विकास के लिए अपर्याप्त धन। |
| महिला प्रतिनिधियों की भूमिका में हस्तक्षेप | जमीनी स्तर पर महिला सशक्तिकरण और प्रभावी प्रतिनिधित्व में बाधा। |
| अत्यधिक नौकरशाही नियंत्रण | स्थानीय स्वशासन के सिद्धांतों के खिलाफ और जवाबदेही की कमी। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- तमिलनाडु ग्राम सशक्तिकरण, परिवर्तन और कायाकल्प पहल (Tamil Nadu Village Empowerment, Transformation and Rejuvenation Initiative – TN-VETRI)
आगे की राह
- स्थानीय निकायों को कर लगाने और एकत्र करने के लिए अधिक अधिकार प्रदान करना, विशेष रूप से संपत्ति कर और पेशेवर करों में।
- राजस्व के अपने स्रोतों (OSR) को बढ़ाने के लिए GIS-आधारित कर संग्रह प्रणालियों और उपयोगकर्ता शुल्कों जैसे अभिनव तरीकों को अपनाना।
- केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्थानीय निकायों को हस्तांतरित किए जाने वाले धन के हिस्से को बढ़ाना (जैसे 10% से 12% तक)।
- निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को सशक्त बनाने के लिए जागरूकता कार्यक्रम और कानूनी ढाँचे को मजबूत करना।
- नौकरशाही हस्तक्षेप को कम करना और स्थानीय स्वशासन मॉडल में विश्वास को बढ़ावा देना।
- स्थानीय निकायों के कार्यों और जिम्मेदारियों में स्पष्टता लाना ताकि वे प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्य वित्त आयोग · स्थानीय स्वशासन · वित्तीय स्वायत्तता · विकेंद्रीकरण · राजस्व के स्रोत · संवैधानिक प्रावधान · 73वां संशोधन अधिनियम · 74वां संशोधन अधिनियम · संपत्ति कर · राजकोषीय संघवाद · महिला सशक्तिकरण · ग्रामीण विकास
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243I’, ‘note’: ‘राज्य वित्त आयोग का गठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243Y’, ‘note’: ‘नगरपालिकाओं के वित्त आयोग का गठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243G’, ‘note’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 243W’, ‘note’: ‘नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, प्राधिकार और उत्तरदायित्व’}
- {‘article’: ‘ग्यारहवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘पंचायतों के कार्यात्मक विषय’}
- {‘article’: ‘बारहवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘नगरपालिकाओं के कार्यात्मक विषय’}
अवधारणा प्रवाह
राज्य वित्त आयोग की सिफारिशें → स्थानीय निकायों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता → राजस्व के अपने स्रोतों में वृद्धि → बेहतर स्थानीय विकास और सेवाएँ → जमीनी स्तर पर लोकतंत्र का सशक्तिकरण
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) का गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत किया जाता है।
2. यह राज्य और स्थानीय निकायों के बीच करों के वितरण के सिद्धांतों पर राज्यपाल को सिफारिशें करता है।
3. 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियमों ने राज्य वित्त आयोग को एक संवैधानिक निकाय का दर्जा दिया।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। राज्य वित्त आयोग का गठन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 243I (पंचायतों के लिए) और 243Y (नगरपालिकाओं के लिए) के तहत किया जाता है, न कि अनुच्छेद 280 के तहत। अनुच्छेद 280 केंद्रीय वित्त आयोग से संबंधित है। कथन 2 सही है। राज्य वित्त आयोग राज्य और स्थानीय निकायों के बीच करों के वितरण के सिद्धांतों पर राज्यपाल को सिफारिशें करता है। कथन 3 सही है। 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधन अधिनियमों ने राज्य वित्त आयोग को एक संवैधानिक निकाय का दर्जा दिया, जिससे स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से स्थानीय निकायों के ‘अपने राजस्व स्रोत’ (Own Sources of Revenue – OSR) में शामिल हो सकता/सकते है/हैं?
1. संपत्ति कर
2. व्यावसायिक कर
3. उपयोगकर्ता शुल्क (User Charges)
4. राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 1, 2 और 3
- केवल 3 और 4
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: केवल 1, 2 और 3 — स्थानीय निकायों के अपने राजस्व स्रोत वे होते हैं जिन्हें वे सीधे अपने अधिकार क्षेत्र से एकत्र करते हैं। संपत्ति कर, व्यावसायिक कर और उपयोगकर्ता शुल्क (जैसे पार्किंग शुल्क, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन शुल्क) इसके उदाहरण हैं। राज्य सरकार से प्राप्त अनुदान हस्तांतरण भुगतान होते हैं, न कि स्थानीय निकायों के अपने राजस्व स्रोत।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ स्थानीय निकायों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता और संसाधनों की आवश्यकता क्यों है? भारत में स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने में राज्य वित्त आयोग की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** स्थानीय स्वशासन के महत्व और वित्तीय स्वायत्तता की आवश्यकता पर संक्षिप्त प्रकाश डालें।
2. **वित्तीय स्वायत्तता की आवश्यकता:**
* विकेंद्रीकरण (Decentralisation) के लक्ष्यों की प्राप्ति।
* सेवा वितरण में दक्षता और जवाबदेही।
* स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता।
* केंद्रीय और राज्य सरकारों पर निर्भरता कम करना।
* वर्तमान में राजस्व के सीमित स्रोत (जैसे संपत्ति कर का GDP में कम प्रतिशत)।
3. **राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission – SFC) की भूमिका:**
* **संवैधानिक प्रावधान:** अनुच्छेद 243I और 243Y के तहत इसकी स्थापना।
* **कार्य:** राज्य और स्थानीय निकायों के बीच करों, शुल्कों और उपकरों के शुद्ध आगमों के वितरण के सिद्धांतों पर राज्यपाल को सिफारिशें करना।
* स्थानीय निकायों को दिए जाने वाले अनुदान सहायता के सिद्धांतों का निर्धारण।
* स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति में सुधार के उपायों पर सिफारिशें।
* **सफलताएं:** 73वें और 74वें संशोधनों के बाद स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा मिलने से SFC की सिफारिशों को महत्व मिला है।
4. **चुनौतियाँ और सीमाएँ (समालोचनात्मक परीक्षण):**
* **सिफारिशों का बाध्यकारी न होना:** SFC की सिफारिशें आमतौर पर सलाहकार प्रकृति की होती हैं, राज्य सरकारें उन्हें मानने के लिए बाध्य नहीं होतीं।
* **गठन में देरी और अनियमितता:** कई राज्यों में SFC का गठन समय पर नहीं होता या अनियमित होता है।
* **अपर्याप्त स्टाफ और विशेषज्ञता:** SFC के पास अक्सर पर्याप्त विशेषज्ञता और स्टाफ की कमी होती है।
* **राजनीतिक हस्तक्षेप:** राज्य सरकारों का हस्तक्षेप इसकी स्वायत्तता को प्रभावित कर सकता है।
* **राजस्व के सीमित आधार:** स्थानीय निकायों के लिए नए राजस्व स्रोतों की पहचान करने में चुनौतियाँ।
* **अधिकारों का हस्तांतरण:** कार्यों, निधियों और कार्यकर्ताओं (Functions, Funds, Functionaries – 3F’s) के पूर्ण हस्तांतरण का अभाव।
5. **सुधार के उपाय:**
* SFC की सिफारिशों को बाध्यकारी बनाना।
* समय पर गठन और नियमित कार्यप्रणाली सुनिश्चित करना।
* राजस्व आधार को मजबूत करने के लिए GIS-आधारित कर संग्रह जैसे नवाचार।
* महिला निर्वाचित प्रतिनिधियों का सशक्तिकरण।
* स्थानीय निकायों को कर लगाने और एकत्र करने का अधिकार देना।
6. **निष्कर्ष:** स्थानीय निकायों की वित्तीय स्वायत्तता भारतीय लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण और जमीनी स्तर पर विकास के लिए आवश्यक है। SFC की भूमिका को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए संस्थागत और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है ताकि यह केवल एक संवैधानिक वादा न होकर एक जीवंत वास्तविकता बन सके।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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