राज्य बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : सरकार द्वारा कला का अपराधीकरण और दमन

राज्य बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता : सरकार द्वारा कला का अपराधीकरण और दमन

मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 2  के अंतर्गत ‘ भारतीय संविधान एवं शासन व्यवस्था ’ से संबंधित। 

चर्चा में क्यों? 

हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ पर की गई कार्रवाई ने देश में एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक-सामाजिक संवेदनशीलता के बीच चल रहे पुराने विवाद को केंद्र में ला दिया है। यह मामला केवल एक फिल्म या उसके शीर्षक तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रश्न को सामने लाता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कला की स्वतंत्रता की सीमा क्या है और सरकार किस परिस्थिति में हस्तक्षेप कर सकती है।

भारत जैसे बहुलतावादी समाज में, जहाँ धर्म, जाति और सांस्कृतिक पहचान लोगों के जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, वहाँ सिनेमा की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली होती है। सिनेमा न केवल मनोरंजन का माध्यम है, बल्कि सामाजिक आलोचना, राजनीतिक विमर्श और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का सशक्त साधन भी है। ऐसे में जब किसी फिल्म पर धार्मिक या जातिगत भावनाओं को आहत करने का आरोप लगता है और सरकार आपराधिक कार्रवाई का सहारा लेती है, तो यह बहस और भी तीखी हो जाती है।

संवैधानिक और कानूनी ढाँचा : 

  1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार लेखन, भाषण, कला, साहित्य और सिनेमा—सभी पर समान रूप से लागू होता है। फिल्म निर्माता भी इसी संवैधानिक संरक्षण के अंतर्गत आते हैं।
  • a. दर्शकों का पहुंच का अधिकार: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का तात्पर्य केवल सृजन के अधिकार से ही नहीं है, बल्कि दर्शकों के विविध, यहां तक ​​कि चौंकाने वाले या उत्तेजक दृष्टिकोणों को ग्रहण करने के अधिकार से भी है।
  • b. न्यायिक सुरक्षा उपाय: अदालतें अक्सर फिल्म निर्माताओं को राज्य के अतिचार से बचाने के लिए हस्तक्षेप करती हैं, यह दोहराते हुए कि कलात्मक अभिव्यक्ति को केवल इसलिए दबाया नहीं जा सकता क्योंकि यह अलोकप्रिय है या कुछ समूहों को नाराज करती है
  • c. कलात्मक आलोचना का अधिकार: कलाकारों और फिल्म निर्माताओं को सामाजिक मानदंडों को चुनौती देने, सरकार की आलोचना करने और राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक विषयों सहित विवादास्पद विषयों का पता लगाने का अधिकार है।

2. किन्तु यह स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं है। अनुच्छेद 19(2) राज्य को यह अधिकार देता है कि वह “यथोचित प्रतिबंध” लगा सकता है, यदि अभिव्यक्ति से सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, शालीनता, राष्ट्र की अखंडता या किसी समुदाय के बीच वैमनस्य फैलने का खतरा हो। यही वह प्रावधान है जिसके आधार पर सरकारें समय-समय पर फिल्मों पर रोक लगाती रही हैं।

‘घूसखोर पंडित’ के मामले में भी सरकार का तर्क यही रहा कि फिल्म का शीर्षक और कथानक किसी विशेष समुदाय की भावनाओं को आहत कर सकता है तथा सामाजिक शांति भंग होने की आशंका है। दूसरी ओर, फिल्म के समर्थकों का कहना है कि यह भ्रष्टाचार पर आधारित एक काल्पनिक कथा है और इसका उद्देश्य किसी धर्म या जाति का अपमान करना नहीं है।

सरकार द्वारा कला का अपराधीकरण और दमन 

  • पूर्व-सेंसरशिप: भारत जैसे कई देशों में, फिल्मों को सार्वजनिक प्रदर्शन से पहले एक नियामक निकाय (जैसे, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड – सीबीएफसी) द्वारा प्रमाणित किया जाना अनिवार्य है, जो अक्सर दमन के एक तंत्र के रूप में कार्य करता है।
  • व्यापक और व्यक्तिपरक आधार: सरकारी दमन को अक्सर “सार्वजनिक व्यवस्था,” “शिष्टता,” या “नैतिकता” जैसे अस्पष्ट शब्दों द्वारा उचित ठहराया जाता है, जिससे अधिकारियों को ऐसी सामग्री को लक्षित करने की अनुमति मिलती है जो राजनीतिक रूप से असुविधाजनक हो या सरकार की आलोचना करती हो।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप: सेंसरशिप का इस्तेमाल अक्सर एक विशिष्ट राजनीतिक एजेंडा को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है, जिसमें राजनीतिक असहमति या विवादास्पद ऐतिहासिक घटनाओं को दर्शाने वाली फिल्मों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है या उनमें अनिवार्य रूप से कटौती की जाती है।
  • भय का प्रभाव और स्व-सेंसरशिप: सेंसरशिप, कानूनी चुनौतियों और वित्तीय नुकसान के डर से फिल्म निर्माता स्व-सेंसरशिप करने के लिए मजबूर हो जाते हैं, जिससे राजनीतिक कल्पनाशीलता मंद पड़ जाती है और सूक्ष्म, विचारोत्तेजक कला का दमन होता है।
  • हाशिए पर पड़े लोगों की आवाजों का दमन: सेंसरशिप अक्सर उन फिल्मों को निशाना बनाती है जो जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिक हिंसा या पुलिस की बर्बरता जैसी कठोर वास्तविकताओं को दर्शाती हैं, जिससे मौजूदा सत्ता संरचनाओं को चुनौती देने वाली आवाजों को प्रभावी ढंग से चुप करा दिया जाता है

संस्थागत संरचना में विद्यमान चुनौतियाँ और संरचनात्मक कमियाँ 

  • एफसीएटी का उन्मूलन: भारत में फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) के उन्मूलन से सीबीएफसी के निर्णयों को चुनौती देने का एक महत्वपूर्ण, त्वरित और अक्सर कलाकार-समर्थक मार्ग समाप्त हो गया है, जिससे फिल्म निर्माताओं को उच्च न्यायालयों का सहारा लेना पड़ रहा है, जो समय लेने वाला और महंगा है।
  • डिजिटल विनियमन: स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म (ओटीटी) के उदय के साथ, सरकार ने नए, सख्त नियमों के माध्यम से अपनी सेंसरशिप का दायरा बढ़ा दिया है, जिससे अक्सर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर स्व-सेंसरशिप की स्थिति पैदा हो जाती है, जो एक स्वतंत्र, स्वायत्त डिजिटल स्पेस के शुरुआती वादे के विपरीत है।
  • प्रचार बनाम आलोचनात्मक कला: जहां आलोचनात्मक फिल्मों को गंभीर,अक्सर मनमानी पाबंदियों का सामना करना पड़ता है, वहीं सरकार की विचारधारा के अनुरूप फिल्मों को कभी-कभी उदार व्यवहार मिलता है, जिससे “सुरक्षित” या राज्य-प्रायोजित सामग्री में वृद्धि होती है।

महत्वपूर्ण मामले और कानूनी विवाद :

  • के.ए. अब्बास बनाम भारत संघ (1970): सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 19(2) के तहत फिल्मों की पूर्व-सेंसरशिप को एक उचित प्रतिबंध के रूप में बरकरार रखा, सिनेमा को इसके तीव्र दृश्य प्रभाव के कारण कला के अन्य रूपों से अलग किया।
  • एस. रंगराजन बनाम पी. जगजीवन राम (1989): न्यायालय ने स्थापित किया कि किसी फिल्म पर केवल इसलिए प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता क्योंकि वह विवादास्पद है या विरोध प्रदर्शन करने वाली भीड़ द्वारा हिंसा की धमकियों के कारण, यह कहते हुए कि राज्य को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए।
  • उड़ता पंजाब (2016): सीबीएफसी ने 94 कट की मांग की, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट ने फिल्म को केवल एक कट के साथ रिलीज करने की अनुमति दी, जिससे उचित, गैर-मनमानी प्रमाणन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया।
  • लिपस्टिक अंडर माय बुर्का (2016): शुरू में “महिला-उन्मुख” होने के कारण प्रमाणन से इनकार कर दिया गया था, लेकिन फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण (एफसीएटी) ने इस फैसले को पलट दिया और इसे रिलीज करने की अनुमति दे दी।

सिनेमा: सामाजिक आलोचना का माध्यम – 

भारतीय सिनेमा का इतिहास देखें तो अनेक फिल्मों ने समाज की कुरीतियों, भ्रष्टाचार, धार्मिक पाखंड और सत्ता के दुरुपयोग को उजागर किया है। कई बार इन फिल्मों ने तीखी प्रतिक्रियाएँ भी उत्पन्न कीं, परंतु समय के साथ वे सामाजिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गईं।

कला का स्वभाव ही प्रश्न उठाना है। यदि फिल्में केवल सुरक्षित और विवाद-रहित विषयों तक सीमित हो जाएँ, तो वे समाज का यथार्थ चित्रण नहीं कर पाएँगी। ‘घूसखोर पंडित’ जैसे शीर्षक, भले ही कुछ लोगों को असुविधाजनक लगें, परंतु संभव है कि उनका उद्देश्य भ्रष्टाचार या सामाजिक पाखंड पर व्यंग्य करना हो।

यही वह बिंदु है जहाँ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक-सामाजिक संवेदनशीलता के बीच टकराव उत्पन्न होता है। क्या किसी समुदाय के नाम का उपयोग नकारात्मक संदर्भ में करना स्वतः अपराध है? या इसे व्यंग्य और रचनात्मक स्वतंत्रता के दायरे में देखा जाना चाहिए? यह प्रश्न न्यायिक व्याख्या और सामाजिक समझ दोनों पर निर्भर करता है

धार्मिक भावनाएँ और आपराधिक कानून :

भारतीय दंड संहिता में ऐसे कई प्रावधान हैं जिनका उपयोग धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने या समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने के आरोप में किया जाता है। इन धाराओं का उद्देश्य सामाजिक सद्भाव बनाए रखना है। परंतु व्यवहार में कभी-कभी इनका प्रयोग अभिव्यक्ति को दबाने के लिए भी किया जाता है।

जब किसी फिल्म के खिलाफ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज होती है या आपराधिक मुकदमा चलता है, तो इसका प्रभाव केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहता। निर्माता, निर्देशक और कलाकार सामाजिक दबाव, विरोध-प्रदर्शन और व्यक्तिगत सुरक्षा की चिंता का सामना करते हैं। कई बार फिल्म की रिलीज़ से पहले ही उसे रोक दिया जाता है, जिससे न्यायिक परीक्षण का अवसर भी सीमित हो जाता है।

ऐसी परिस्थितियों में यह प्रश्न उठता है कि क्या राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना? यदि विरोध की आशंका के आधार पर ही किसी फिल्म पर रोक लगा दी जाए, तो क्या यह उन समूहों को अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन नहीं देता जो धमकी या हिंसा के माध्यम से असहमति व्यक्त करते हैं?

लोकतंत्र में असहमति का स्थान

लोकतंत्र का मूल तत्व है—विचारों की विविधता। किसी भी समाज में ऐसे विचार या कलात्मक अभिव्यक्तियाँ होंगी जो सभी को स्वीकार्य नहीं होंगी। प्रश्न यह है कि असहमति का समाधान कैसे किया जाए।

न्यायपालिका ने कई मामलों में यह कहा है कि केवल इस आधार पर कि किसी अभिव्यक्ति से कुछ लोगों की भावनाएँ आहत हो सकती हैं, उसे प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता। यदि ऐसा होने लगे, तो सबसे संवेदनशील समूह अभिव्यक्ति की सीमा तय करने लगेंगे। परंतु साथ ही न्यायालयों ने यह भी माना है कि यदि अभिव्यक्ति जानबूझकर घृणा या हिंसा भड़काने के उद्देश्य से की गई हो, तो उस पर रोक उचित है।

इसलिए संतुलन आवश्यक है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि कलाकार सामाजिक जिम्मेदारी से मुक्त हो जाएँ। और धार्मिक भावनाओं की रक्षा का अर्थ यह नहीं कि हर आलोचना को अपराध मान लिया जाए।

समाधान की दिशा :

(1)पूर्व-सेंसरशिप के बजाय प्रमाणिक समीक्षा: किसी फिल्म को देखने और उसकी संपूर्ण संदर्भ में समीक्षा करने के बाद ही निर्णय लिया जाए, केवल शीर्षक या प्रचार सामग्री के आधार पर नहीं।

(2)संवाद की संस्कृति: आपत्तिजनक लगने वाली सामग्री पर सीधे प्रतिबंध लगाने के बजाय रचनाकारों और समुदायों के बीच संवाद को प्रोत्साहित किया जाए।

(3)न्यायिक मार्ग का सम्मान: अंतिम निर्णय न्यायालयों पर छोड़ना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुकूल है।

(4)कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी: यदि विरोध या हिंसा की आशंका हो, तो राज्य का दायित्व अभिव्यक्ति को रोकना नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना होना चाहिए।

निष्कर्ष :

‘घूसखोर पंडित’ पर उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक-सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है। यह संघर्ष समय-समय पर नए रूप में सामने आता रहेगा।
लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि वह आलोचना और असहमति को सह सके। सिनेमा समाज का दर्पण है—कभी वह सुंदर छवि दिखाता है, तो कभी कुरूप वास्तविकता। यदि हर असुविधाजनक प्रतिबिंब को ढक दिया जाए, तो समाज आत्ममंथन का अवसर खो देगा।
साथ ही यह भी सच है कि बहुल समाज में जिम्मेदार अभिव्यक्ति आवश्यक है। कलाकारों को यह समझना होगा कि उनकी रचनाएँ व्यापक प्रभाव डालती हैं। परंतु राज्य को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आपराधिक कानून का प्रयोग अंतिम उपाय के रूप में हो, न कि प्राथमिक प्रतिक्रिया के रूप में।

अंततः प्रश्न केवल एक फिल्म का नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक मूल्य का है जो नागरिकों को सोचने, प्रश्न करने और अभिव्यक्त होने का अधिकार देता है। यदि यह अधिकार संतुलित और विवेकपूर्ण ढंग से संरक्षित किया जाए, तो समाज अधिक परिपक्व और सहिष्णु बन सकता है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.भारतीय संविधान के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत फिल्में अन्य अभिव्यक्तियों की तुलना में कम स्तर का संरक्षण प्राप्त करती हैं।

  2. अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत “लोक व्यवस्था (Public Order)” और “राज्य की सुरक्षा (Security of State)” पृथक आधार हैं।

  3. “यथोचित प्रतिबंध” केवल संसद द्वारा विधि के माध्यम से ही लगाए जा सकते हैं, कार्यपालिका आदेश द्वारा नहीं।

  4. पूर्व-नियंत्रण (Pre-censorship) को सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्णतः असंवैधानिक घोषित किया है।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 4
(d) 1, 2 और 4

उत्तर: (a)

 मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. फिल्मों एवं डिजिटल सामग्री के नियमन के संदर्भ में राज्य की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। पूर्व-प्रमाणन (Pre-censorship) की संवैधानिक स्थिति तथा अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(2) के अंतर्गत अभिव्यक्ति पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की सीमा पर चर्चा कीजिए। क्या मात्र विरोध या सार्वजनिक असंतोष की आशंका प्रतिबंध का पर्याप्त आधार हो सकती है? आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।                                                                                                                  ( शब्द सीमा – 250, अंक – 15 )

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