17 Aug लोकसभा सीटों में 50% वृद्धि: क्या यह राजनीतिक धोखा है? जानिए पूरा विश्लेषण
Lok Sabha seatsDelimitation processFederal balancePopulation growth✎ परिसीमन आयोग का कार्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है, जो जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है, लेकिन 2026 तक सीटों की संख्या स्थिर है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय | GS Paper II — संघवाद से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ
- Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, लोकसभा सीटें, राज्य विधानसभा सीटें, जनसंख्या अनुपात, संवैधानिक संशोधन
- Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और भविष्य, प्रतिनिधित्व और जनसंख्या: भारतीय लोकतंत्र में संतुलन की तलाश
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन आयोग का कार्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है, जो जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है, लेकिन 2026 तक सीटों की संख्या स्थिर है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने लोकसभा सीटों में एक समान 50% वृद्धि के प्रस्ताव पर चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि यह कदम जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को दंडित करेगा और उत्तर भारतीय राज्यों के मुकाबले उनके प्रतिनिधित्व को और कम कर देगा। इस टिप्पणी ने परिसीमन (Delimitation) और लोकसभा सीटों के पुनर्गठन के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है, जो भारतीय संघवाद और प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों के लिए महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- भारत के संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
- परिसीमन आयोग का मुख्य कार्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है ताकि जनसंख्या के आधार पर सीटों का समानुपातिक वितरण सुनिश्चित किया जा सके।
- अंतिम पूर्ण परिसीमन 2002 में हुआ था, जिसने 2001 की जनगणना के आंकड़ों का उपयोग किया था।
- संविधान के 84वें संशोधन अधिनियम, 2001 के अनुसार, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की कुल संख्या को 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया गया है। यह प्रावधान जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से किया गया था।
- एंग्लो-इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित दो सीटें (अनुच्छेद 331) 104वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 2019 द्वारा समाप्त कर दी गई हैं।
- परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, लेकिन जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय असमानताओं के कारण यह एक संवेदनशील मुद्दा बन गया है।
परिसीमन क्या है?
- परिसीमन का अर्थ किसी देश या विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने या फिर से तय करने की प्रक्रिया है।
- भारत में, परिसीमन आयोग अधिनियम के प्रावधानों के तहत एक परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है।
- इस आयोग को भारत के राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाता है और इसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्यों के राज्य चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं।
- परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान माना जाता है और उन्हें किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
- आयोग का मुख्य कार्य जनसंख्या के आधार पर सीटों का आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों का सीमांकन करना है, ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में जनसंख्या का अनुपात यथासंभव समान हो।
- यह अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की पहचान भी करता है, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात में होती हैं।
- परिसीमन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक राज्य को लोकसभा में सीटों की संख्या इस प्रकार आवंटित की जाए कि सीटों की संख्या और राज्य की जनसंख्या के बीच का अनुपात सभी राज्यों के लिए यथासंभव समान हो।
- हालांकि, यह सिद्धांत उन राज्यों पर लागू नहीं होता जिनकी जनसंख्या 60 लाख से कम है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| लोकसभा सीटों में वृद्धि का प्रस्ताव | जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्गठन का विचार, जिससे उत्तर और दक्षिण राज्यों के प्रतिनिधित्व में असंतुलन की आशंका। |
| जनसंख्या आधारित परिसीमन (Delimitation) | संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों का समायोजन, लेकिन वर्तमान में 2026 तक स्थगन। |
| दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएँ | जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण लोकसभा में प्रतिनिधित्व घटने का भय, जिसे ‘सफलता के लिए दंड’ के रूप में देखा जा रहा है। |
| प्रतिनिधित्व का असंतुलन | सीटों में समान प्रतिशत वृद्धि से भी उत्तर और दक्षिण के बीच मौजूदा प्रतिनिधित्व अंतर का और अधिक बढ़ना। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- लोकसभा सीटों में प्रस्तावित वृद्धि से विभिन्न राज्यों के बीच राजनीतिक शक्ति संतुलन पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
- जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत के राज्यों को, उनके प्रयासों के बावजूद कम प्रतिनिधित्व मिलने की आशंका है, जिससे संघवाद (Federalism) पर तनाव बढ़ सकता है।
- यह मुद्दा क्षेत्रीय पहचान और प्रतिनिधित्व के दावों को मजबूत कर सकता है, जिससे राष्ट्रीय एकीकरण के समक्ष चुनौतियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
संवैधानिक महत्व
- परिसीमन का मुद्दा संविधान के अनुच्छेद 81 (लोकसभा की संरचना) और अनुच्छेद 82 (प्रत्येक जनगणना के बाद पुनर्समायोजन) से जुड़ा है।
- वर्तमान में, लोकसभा सीटों का परिसीमन 2026 तक के लिए स्थगित है, ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न किया जाए। इस स्थगन को हटाने या इसमें बदलाव करने से संवैधानिक बहस छिड़ सकती है।
- समान प्रतिनिधित्व और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत को बनाए रखते हुए जनसंख्या परिवर्तन को समायोजित करना एक जटिल संवैधानिक चुनौती है।
सामाजिक महत्व
- युवा पीढ़ी (Gen Z) के विरोध प्रदर्शनों से यह संकेत मिलता है कि वे स्थापित राजनीति और शासन में अधिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही चाहते हैं।
- पेपर लीक जैसी घटनाओं के कारण युवाओं में असंतोष बढ़ रहा है, जो शासन प्रणाली में सुधार की मांग को दर्शाता है।
- राजनीतिक दलों के लिए यह एक चुनौती है कि वे युवा मतदाताओं की आकांक्षाओं को कैसे पूरा करें और उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में शामिल करें।
चुनौतियाँ
1. जनसंख्या आधारित परिसीमन और क्षेत्रीय असंतुलन
- जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों में वृद्धि से उन राज्यों को अधिक प्रतिनिधित्व मिलेगा जिनकी जनसंख्या तेजी से बढ़ी है, जबकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा।
- यह दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए एक ‘दंड’ के रूप में देखा जा रहा है, जिससे संघवाद और क्षेत्रीय समानता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संघवाद; केंद्र-राज्य संबंध
2. प्रतिनिधित्व में असमानता का विस्तार
- सीटों में समान प्रतिशत वृद्धि भी उत्तर और दक्षिण के बीच मौजूदा प्रतिनिधित्व अंतर को और बढ़ाएगी, जिससे दक्षिण की ‘आवाज’ कमजोर पड़ सकती है।
- यह संसद में क्षेत्रीय हितों के प्रभावी प्रतिनिधित्व को बाधित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: संसद और राज्य विधायिकाएँ – संरचना, कार्य
3. युवाओं का असंतोष और शासन में पारदर्शिता
- पेपर लीक जैसी घटनाओं के कारण युवा पीढ़ी में सरकार के प्रति असंतोष बढ़ रहा है, जो शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी को दर्शाता है।
- यह राजनीतिक दलों के लिए एक चुनौती है कि वे युवाओं की अपेक्षाओं को कैसे पूरा करें और उन्हें राजनीतिक प्रक्रिया में विश्वास दिलाएं।
यूपीएससी लिंक: शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही
4. राजनीतिक दलों के समक्ष चुनौती
- युवा मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताएं और स्थापित राजनीति के प्रति उनका अविश्वास सभी राजनीतिक दलों के लिए एक चुनौती है।
- उन्हें अपनी नीतियों और कार्यप्रणाली में बदलाव लाने की आवश्यकता है ताकि वे युवा पीढ़ी की आकांक्षाओं को पूरा कर सकें।
यूपीएससी लिंक: राजनीतिक दल और दबाव समूह
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| लोकसभा सीटों में 50% वृद्धि का प्रस्ताव | जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों का प्रतिनिधित्व घटने की आशंका, जिससे क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ेगा। |
| जनसंख्या आधारित परिसीमन | दक्षिण भारतीय राज्यों द्वारा इसे ‘सफलता के लिए दंड’ के रूप में देखना, संघवाद पर तनाव। |
| उत्तर और दक्षिण के बीच प्रतिनिधित्व का अंतर | सीटों में समान प्रतिशत वृद्धि से भी यह अंतर और बढ़ेगा, जिससे दक्षिण की ‘आवाज’ कमजोर होगी। |
| युवा पीढ़ी का विरोध प्रदर्शन | शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी के प्रति असंतोष, स्थापित राजनीति में बदलाव की मांग। |
आगे की राह
- परिसीमन के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए जो जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित न करे और सभी क्षेत्रों के उचित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करे।
- जनसंख्या के बजाय मतदाताओं की संख्या या अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों को परिसीमन का आधार बनाने पर विचार किया जा सकता है।
- शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए, विशेषकर भर्ती प्रक्रियाओं और सार्वजनिक सेवाओं में।
- युवाओं की आकांक्षाओं को समझने और उन्हें मुख्यधारा की राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल करने के लिए राजनीतिक दलों को अपनी नीतियों और संवाद में सुधार करना चाहिए।
- संघवाद के सिद्धांतों को बनाए रखते हुए राज्यों के बीच विश्वास और सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि क्षेत्रीय चिंताओं को प्रभावी ढंग से संबोधित किया जा सके।
- संसद में विभिन्न क्षेत्रों के हितों का प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए सीटों के आवंटन के वैकल्पिक मॉडलों पर विचार किया जा सकता है।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व · संघवाद · राज्यों का प्रतिनिधित्व · संवैधानिक प्रावधान · समान प्रतिनिधित्व · राजनीतिक प्रतिनिधित्व · क्षेत्रीय असमानता · जनसांख्यिकीय लाभांश · लोकतांत्रिक सिद्धांत · संसदीय लोकतंत्र
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 81: लोकसभा की संरचना
- अनुच्छेद 82: प्रत्येक जनगणना के बाद पुनर्समायोजन
- अनुच्छेद 170: विधानसभाओं की संरचना
- अनुच्छेद 330: लोकसभा में अनुसूचित जातियों/जनजातियों के लिए सीटों का आरक्षण
अवधारणा प्रवाह
जनसंख्या वृद्धि में क्षेत्रीय भिन्नता → जनसंख्या आधारित परिसीमन का प्रस्ताव → दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व में संभावित कमी → क्षेत्रीय असंतुलन और संघवाद पर तनाव → युवाओं का असंतोष और शासन में पारदर्शिता की मांग
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत, प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम संसद द्वारा अधिनियमित किया जाता है।
2. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती है।
3. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग के आदेश अंतिम होते हैं और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। कथन 3 गलत है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा सीटों के परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया गया था, लेकिन बाद में 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा इसे 2026 तक बढ़ा दिया गया।
Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
- परिसीमन आयोग एक उच्च-शक्ति वाला निकाय है जिसके आदेशों में कानून का बल होता है।
- आयोग के आदेशों को लोकसभा या राज्य विधानसभा द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है।
- परिसीमन आयोग में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त, संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त और सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश शामिल होते हैं।
- परिसीमन आयोग का मुख्य कार्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है।
उत्तर: परिसीमन आयोग में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त, संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त और सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश शामिल होते हैं। — परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष के रूप में होते हैं। अन्य सदस्य भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्य के चुनाव आयुक्त होते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत में लोकसभा सीटों के परिसीमन के पीछे के संवैधानिक सिद्धांतों की विवेचना कीजिए। क्या जनसंख्या के आधार पर सीटों में एकसमान वृद्धि संघवाद और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के सिद्धांतों को कमजोर कर सकती है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिसीमन के संवैधानिक सिद्धांतों (अनुच्छेद 82, 170) और उसके उद्देश्यों (समान प्रतिनिधित्व, एक व्यक्ति एक वोट) की व्याख्या करें। 42वें और 84वें संविधान संशोधनों के माध्यम से परिसीमन के स्थगन पर चर्चा करें। जनसंख्या आधारित सीटों में एकसमान वृद्धि के पक्ष और विपक्ष में तर्क प्रस्तुत करें। पक्ष में: जनसंख्या परिवर्तन के अनुसार प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना। विपक्ष में: दक्षिणी राज्यों जैसे जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व में कमी, उत्तरी राज्यों के प्रतिनिधित्व में वृद्धि से क्षेत्रीय असंतुलन, संघवाद पर संभावित प्रभाव, राज्यों के बीच अविश्वास। निष्कर्ष में संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें कि कैसे जनसंख्या नियंत्रण को दंडित किए बिना न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता है, जैसे कि सीटों की संख्या को स्थिर रखना या वैकल्पिक फार्मूले अपनाना।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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