वन अधिकार अधिनियम: बेंगलुरु में पहली क्षेत्रीय समीक्षा बैठक, जानिए प्रमुख बिंदु

बेंगलुरु में वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर पहली क्षेत्रीय समीक्षा बैठक आयोजित — diagram

वन अधिकार अधिनियम: बेंगलुरु में पहली क्षेत्रीय समीक्षा बैठक, जानिए प्रमुख बिंदु

वन अधिकार अधिनियम कार्यान्वयनजनजातीय कार्य मंत्रालयनीति निर्माणराज्य अधिकारियोंदावों की समीक्षाग्राम सभादावों का प्रस्तुतीकरणउप-मंडल/जिला समितिसत्यापन एवं अनुमोदनवन अधिकार अभिलेखडिजिटलीकरण एवं भूमि रिकॉर्ड
वन अधिकार अधिनियम कार्यान्वयन

✎ वन अधिकार अधिनियम, 2006, वन में रहने वाले समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें ग्राम सभा केंद्रीय भूमिका निभाती है, जिसका उद्देश्य उनकी आजीविका और वन संरक्षण को सुनिश्चित करना है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन, संविधान, राजव्यवस्था, सामाजिक न्याय  |  GS Paper III — पर्यावरण, जैव-विविधता, आपदा प्रबंधन
  • Prelims: वन अधिकार अधिनियम, 2006, जनजातीय कार्य मंत्रालय, व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR), सामुदायिक वन अधिकार (CFR), विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG), ग्राम सभा, वन शासन, वन संसाधन अधिकार
  • Essay: भारत में जनजातीय समुदायों का सशक्तिकरण: अधिकार, आजीविका और विकास, पर्यावरण संरक्षण और जनजातीय अधिकारों के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: वन अधिकार अधिनियम, 2006, वन में रहने वाले समुदायों के व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देता है, जिसमें ग्राम सभा केंद्रीय भूमिका निभाती है, जिसका उद्देश्य उनकी आजीविका और वन संरक्षण को सुनिश्चित करना है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने बेंगलुरु में अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (FRA) के कार्यान्वयन पर पहली क्षेत्रीय समीक्षा बैठक आयोजित की। इस बैठक में दक्षिणी राज्यों – आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना – के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया, जहाँ अधिनियम के कार्यान्वयन की स्थिति की समीक्षा की गई और लंबित दावों के निपटारे, सामुदायिक वन अधिकारों (CFR) तथा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के आवास अधिकारों की मान्यता पर चर्चा की गई।

पृष्ठभूमि

  • वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) को ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने और वन में रहने वाले समुदायों के अधिकारों को मान्यता देने के लिए अधिनियमित किया गया था, जो पीढ़ियों से वन संसाधनों पर निर्भर रहे हैं।
  • यह अधिनियम व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) और सामुदायिक वन अधिकार (CFR) दोनों को मान्यता देता है, जिसमें आजीविका, निवास और वन संसाधनों के प्रबंधन के अधिकार शामिल हैं।
  • अधिनियम ग्राम सभा को वन अधिकारों की मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया में एक केंद्रीय भूमिका प्रदान करता है, जिससे समुदाय-आधारित वन शासन को बढ़ावा मिलता है।
  • राष्ट्रीय स्तर पर, 30 जून 2026 तक 54 लाख से अधिक व्यक्तिगत वन अधिकार दावे प्राप्त हुए हैं, जिनमें से लगभग 238 लाख एकड़ भूमि पर 25.42 लाख पट्टे वितरित किए गए हैं।
  • अभी भी 10 लाख से अधिक दावे लंबित हैं और 19,845 सामुदायिक वन अधिकार मान्यता प्राप्त कर चुके हैं, जो कार्यान्वयन में चुनौतियों और विलंब को दर्शाता है।
  • मंत्रालय ने लंबित दावों के समयबद्ध निपटारे, पीवीटीजी के आवास अधिकारों की मान्यता और मान्यता प्राप्त अधिकारों को भूमि अभिलेखों में दर्ज करने को प्राथमिकता देने का आह्वान किया है।

वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) क्या है?

  • यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वन अधिकारों को मान्यता देता है, जो पीढ़ियों से वनों में निवास कर रहे हैं लेकिन जिनके अधिकारों को अक्सर अभिलेखों में दर्ज नहीं किया गया था।
  • यह अधिनियम वन भूमि पर व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) प्रदान करता है, जिसमें कृषि और निवास के लिए भूमि का अधिकार शामिल है, जो अधिकतम 4 हेक्टेयर तक सीमित है।
  • यह सामुदायिक वन अधिकार (CFR) को भी मान्यता देता है, जिसमें वन संसाधनों तक पहुँच, उपयोग, प्रबंधन और निपटान का अधिकार शामिल है, जैसे कि लघु वन उपज का संग्रह।
  • अधिनियम विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के आवास अधिकारों को मान्यता देने पर जोर देता है, जो उनकी संस्कृति, आजीविका और पारंपरिक ज्ञान के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • ग्राम सभा इस अधिनियम के तहत अधिकारों की पहचान और सत्यापन के लिए प्राथमिक प्राधिकारी है, जो समुदाय-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया को सुनिश्चित करती है।
  • अधिनियम का उद्देश्य जनजातीय समुदायों की आजीविका सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास को सुनिश्चित करना है, साथ ही वन संरक्षण में उनकी भागीदारी को मजबूत करना है।
  • हाल ही में, जनजातीय कार्य मंत्रालय और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक संयुक्त परामर्श जारी किया है, जो सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं को वन विभाग की कार्य योजनाओं के साथ एकीकृत करने में मदद करेगा।
  • मंत्रालय FRA अभिलेखों के डिजिटलीकरण के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का FRA पोर्टल विकसित कर रहा है, ताकि कार्यान्वयन प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सके।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
वन अधिकार अधिनियम, 2006 अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के वन अधिकारों को मान्यता प्रदान करता है।
व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) वन भूमि पर व्यक्तियों के अधिकार को सुरक्षित करता है, आजीविका और निवास सुनिश्चित करता है।
सामुदायिक वन अधिकार (CFR) वन संसाधनों पर समुदायों के सामूहिक अधिकारों को मान्यता देता है, पारंपरिक शासन को बढ़ावा देता है।
सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR) समुदायों को वन संसाधनों के प्रबंधन और उपयोग का अधिकार देता है, टिकाऊ आजीविका को बढ़ावा देता है।
विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) के आवास अधिकार इन समूहों की अद्वितीय संस्कृति, आजीविका और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली की रक्षा करता है।

महत्व

सामाजिक सशक्तिकरण

  • यह अधिनियम जनजातीय समुदायों और अन्य वन निवासियों को उनकी भूमि और संसाधनों पर अधिकार देकर उन्हें सशक्त बनाता है, जिससे उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार होता है।
  • सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता ग्राम सभाओं को वन शासन में केंद्रीय भूमिका देती है, जिससे स्थानीय स्वशासन मजबूत होता है।

आर्थिक सुरक्षा

  • वन अधिकारों की मान्यता से जनजातीय समुदायों की आजीविका सुरक्षित होती है, जिससे उन्हें वन उत्पादों और भूमि से आय प्राप्त करने का कानूनी अधिकार मिलता है।
  • विकास योजनाओं के साथ अधिकारों का अभिसरण (Convergence) टिकाऊ आजीविका के अवसर पैदा करता है और गरीबी को कम करने में मदद करता है।

पर्यावरणीय संरक्षण

  • सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के माध्यम से समुदाय-आधारित वन प्रबंधन को बढ़ावा मिलता है, जो वनों के टिकाऊ उपयोग और संरक्षण में सहायक है।
  • यह पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को मान्यता देता है जो जैव विविधता संरक्षण और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

शासन में सुधार

  • अधिनियम का कार्यान्वयन भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण और राष्ट्रीय स्तर के पोर्टल के विकास से पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाता है।
  • राज्यों के बीच क्षेत्रीय समीक्षा बैठकें कार्यान्वयन की चुनौतियों को समझने और एकीकृत रणनीतियाँ बनाने में मदद करती हैं।

चुनौतियाँ

1. दावों का लंबित होना

  • राष्ट्रीय स्तर पर 10 लाख से अधिक दावे लंबित हैं, जिससे लाभार्थियों को उनके अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है।
  • दावों के सत्यापन और निपटारे में देरी से जनजातीय समुदायों में निराशा बढ़ती है।

2. सामुदायिक वन अधिकारों की धीमी मान्यता

  • व्यक्तिगत वन अधिकारों की तुलना में सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता की दर कम है, जिससे वन शासन में समुदायों की भूमिका सीमित हो रही है।
  • सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं को वन विभाग की कार्य योजनाओं के साथ एकीकृत करने में चुनौतियाँ हैं।

3. रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण और एकीकरण

  • वन अधिकार अभिलेखों के डिजिटलीकरण और राष्ट्रीय पोर्टल के साथ राज्यों के मौजूदा रिकॉर्ड को जोड़ने में तकनीकी और प्रशासनिक चुनौतियाँ हैं।
  • अभिलेखों में अधिकारों को दर्ज करने में देरी से कानूनी अस्पष्टता बनी रहती है।

4. संस्थागत क्षमता और समन्वय

  • उप-मंडल और जिला स्तरीय समितियों के कामकाज में देरी, जैसा कि कर्नाटक में देखा गया, कार्यान्वयन को प्रभावित करती है।
  • जनजातीय कल्याण, राजस्व और वन विभागों के बीच प्रभावी समन्वय की कमी एक बड़ी बाधा है।

5. PVTG के आवास अधिकारों की मान्यता

  • PVTG के आवास अधिकारों की मान्यता में संवेदनशीलता और समुदाय की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना एक चुनौती है।
  • इन अधिकारों की विशिष्ट प्रकृति के कारण विशेष दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
दावों का लंबित होना अधिकारों से वंचित होना, प्रक्रियागत देरी।
सामुदायिक वन अधिकारों की धीमी मान्यता सामुदायिक शासन का कमजोर होना, संसाधनों का अप्रभावी प्रबंधन।
अभिलेखों का डिजिटलीकरण तकनीकी बाधाएँ, डेटा एकीकरण की कमी।
संस्थागत समन्वय की कमी कार्यान्वयन में बाधाएँ, अंतर-विभागीय संघर्ष।
PVTG आवास अधिकारों की विशिष्टता संवेदनशीलता का अभाव, समुदाय की भागीदारी की कमी।
खारिज किए गए दावों का पुन: सत्यापन प्रक्रियागत जटिलताएँ, समय की खपत।

आगे की राह

  • लंबित व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकार दावों के समयबद्ध निपटारे के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया जाए।
  • सामुदायिक वन अधिकारों और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता को प्राथमिकता दी जाए, और ग्राम सभाओं को सशक्त किया जाए।
  • वन अधिकार अभिलेखों के डिजिटलीकरण को गति दी जाए और राष्ट्रीय एफआरए पोर्टल के साथ राज्यों के डेटा का एकीकरण सुनिश्चित किया जाए।
  • विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTG) के आवास अधिकारों की पहचान और मान्यता में संवेदनशीलता और सक्रिय सामुदायिक भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
  • जनजातीय कल्याण, राजस्व और वन विभागों के बीच प्रभावी समन्वय और अभिसरण (Convergence) तंत्र स्थापित किया जाए।
  • वन विभाग की कार्य योजनाओं के साथ सामुदायिक वन संसाधन प्रबंधन योजनाओं के एकीकरण के लिए संयुक्त परामर्शों का प्रभावी कार्यान्वयन किया जाए।
  • खारिज किए गए दावों के पुन: सत्यापन की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जाए और पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
  • अधिकारों की मान्यता के बाद आजीविका सुरक्षा और विकास योजनाओं के साथ अभिसरण पर ध्यान केंद्रित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

वन अधिकार अधिनियम, 2006 · व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) · सामुदायिक वन अधिकार (CFR) · सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR) · ग्राम सभा · विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (PVTG) · जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA) · वन शासन · आवास अधिकार · अधिकारों का डिजिटलीकरण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • [‘अनुच्छेद 46’, ‘कमजोर वर्गों के शैक्षिक व आर्थिक हितों को बढ़ावा’]
  • [‘अनुच्छेद 244’, ‘अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन’]
  • [‘पांचवीं अनुसूची’, ‘अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों का प्रशासन व नियंत्रण’]
  • [‘छठी अनुसूची’, ‘असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम के जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन’]

अवधारणा प्रवाह

वन अधिकार अधिनियम, 2006 का अधिनियमन  →  जनजातीय समुदायों द्वारा वन अधिकारों के दावों का प्रस्तुतीकरण  →  दावों का सत्यापन और उप-मंडल/जिला स्तरीय समितियों द्वारा अनुमोदन  →  व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता तथा पट्टों का वितरण  →  वन अधिकार अभिलेखों का डिजिटलीकरण और भूमि रिकॉर्ड में एकीकरण  →  मान्यता प्राप्त अधिकारों के माध्यम से आजीविका सुरक्षा और सशक्तिकरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. वन अधिकार अधिनियम, 2006 के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. यह अधिनियम केवल अनुसूचित जनजातियों के वन अधिकारों को मान्यता देता है।
2. व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR) दावों के तहत 25 लाख एकड़ से अधिक भूमि पर पट्टे वितरित किए गए हैं।
3. ग्राम सभा इस अधिनियम के तहत अधिकारों की मान्यता प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि यह अधिनियम अनुसूचित जनजातियों के साथ-साथ अन्य पारंपरिक वन निवासियों के अधिकारों को भी मान्यता देता है। कथन 2 सही है, जैसा कि लेख में बताया गया है कि लगभग 238 लाख एकड़ भूमि पर पट्टे वितरित किए गए हैं। कथन 3 सही है क्योंकि ग्राम सभा वन अधिकारों की मान्यता और प्रबंधन में केंद्रीय भूमिका निभाती है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के प्रमुख उद्देश्यों में से एक नहीं है?

  1. वन भूमि पर रहने वाले समुदायों को व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता प्रदान करना।
  2. वन संसाधनों के स्थायी उपयोग और प्रबंधन को सुनिश्चित करना।
  3. वन्यजीव संरक्षण के लिए वन निवासियों को उनके पारंपरिक आवासों से विस्थापित करना।
  4. जनजातीय समुदायों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा को मजबूत करना।

उत्तर: वन्यजीव संरक्षण के लिए वन निवासियों को उनके पारंपरिक आवासों से विस्थापित करना। — वन अधिकार अधिनियम का उद्देश्य वन निवासियों को उनके अधिकारों की मान्यता देकर सशक्त बनाना है, न कि उन्हें विस्थापित करना। इसका एक प्रमुख उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ वन निवासियों के अधिकारों को संतुलित करना है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ वन अधिकार अधिनियम, 2006, भारत में जनजातीय समुदायों और अन्य पारंपरिक वन निवासियों के अधिकारों को सुरक्षित करने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों पर चर्चा करें और इसके कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों तथा उनके समाधान हेतु सुझाए गए उपायों का विश्लेषण करें। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) का संक्षिप्त परिचय और इसका महत्व।
मुख्य भाग:
1. अधिनियम के प्रमुख प्रावधान: व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR), सामुदायिक वन अधिकार (CFR), सामुदायिक वन संसाधन अधिकार (CFRR), आवास अधिकार (PVTG के लिए), ग्राम सभा की भूमिका, वन भूमि पर आजीविका और सांस्कृतिक अधिकारों की मान्यता।
2. कार्यान्वयन में चुनौतियाँ: दावों के निपटारे में देरी, खारिज किए गए दावों का पुन: सत्यापन, भूमि अभिलेखों में अधिकारों को दर्ज करने में समस्याएँ, सामुदायिक वन अधिकारों की कम मान्यता, उप-मंडल और जिला स्तरीय समितियों के कामकाज में बाधाएँ, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी।
3. समाधान हेतु सुझाए गए उपाय: लंबित दावों का समयबद्ध निपटारा, CFR और CFRR पर अधिक ध्यान, PVTG के आवास अधिकारों की संवेदनशीलता के साथ मान्यता, अधिकारों का डिजिटलीकरण (राष्ट्रीय FRA पोर्टल का उपयोग), ग्राम सभा के नेतृत्व वाले वन शासन को मजबूत करना, विकास योजनाओं के साथ अधिकारों का अभिसरण (कनवर्जेंस), MoTA और MoEFCC द्वारा संयुक्त परामर्श का प्रभावी उपयोग।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: बेंगलुरु में वन अधिकार अधिनियम के कार्यान्वयन पर पहली क्षेत्रीय समीक्षा बैठक का आयोजन किसके द्वारा किया गया था?

  1. A. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
  2. B. कर्नाटक राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग
  3. C. कर्नाटक वन विभाग
  4. D. पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, भारत सरकार

उत्तर: B. कर्नाटक राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग — इस बैठक का आयोजन कर्नाटक राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा किया गया था।

Mains: कर्नाटक में वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का विश्लेषण कीजिए। वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत वनवासियों को मिलने वाले अधिकारों के सन्दर्भ में बेंगलुरु जैसे शहरी क्षेत्रों में इसकी चुनौतियों पर प्रकाश डालिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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