वायनाड भूस्खलन 2024: जलवायु एवं भूविज्ञान का गंभीर अध्ययन

2024 Wayanad landslides: Study reveals the interplay of climate and geology — labelled illustration

वायनाड भूस्खलन 2024: जलवायु एवं भूविज्ञान का गंभीर अध्ययन

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3D cutaway: 2024 Wayanad landslides

✎ वायनाड भूस्खलन ने दर्शाया कि आपदाएँ केवल एक कारक का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि जलवायु, भूविज्ञान और भू-आकृति विज्ञान जैसे कई अंतर्संबंधित कारकों का जटिल परिणाम होती हैं।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक भूगोल)  |  GS Paper III — आपदा प्रबंधन (आपदा और आपदा प्रबंधन)
  • Prelims: वायनाड भूस्खलन, पश्चिमी घाट, भूवैज्ञानिक कारक, जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन के प्रकार, आपदा न्यूनीकरण, पर्यावरणीय प्रभाव आकलन
  • Essay: जलवायु परिवर्तन और मानव-पर्यावरण अंतःक्रिया: आपदाओं का बढ़ता जोखिम, सतत विकास और आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना का महत्व

त्वरित पुनरावृत्ति: वायनाड भूस्खलन ने दर्शाया कि आपदाएँ केवल एक कारक का परिणाम नहीं होतीं, बल्कि जलवायु, भूविज्ञान और भू-आकृति विज्ञान जैसे कई अंतर्संबंधित कारकों का जटिल परिणाम होती हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

2024 में वायनाड (केरल) में हुए विनाशकारी भूस्खलन पर एक नए अध्ययन ने इस आपदा के कारणों पर प्रकाश डाला है। अध्ययन के अनुसार, यह भूस्खलन केवल अत्यधिक वर्षा का परिणाम नहीं था, बल्कि भूवैज्ञानिक, भू-आकृतिक और संरचनात्मक कारकों के संयोजन ने भी इसकी तीव्रता और विनाशकारी प्रभाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह अध्ययन ‘लैंडस्लाइड्स’ नामक अंतरराष्ट्रीय पीयर-रिव्यू जर्नल में प्रकाशित हुआ है, जिसमें केरल विश्वविद्यालय, IISER मोहाली और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने योगदान दिया है।

पृष्ठभूमि

  • वायनाड भूस्खलन 30 जुलाई, 2024 की रात को हुआ था, जब 48 घंटों के भीतर लगभग 573 मिमी की असाधारण भारी वर्षा हुई थी।
  • इस वर्षा ने पुन्नपुझा नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में बड़े पैमाने पर ढलान विफलता (slope failure) को ट्रिगर किया।
  • यह घटना तेजी से एक उच्च गति वाले मलबे के प्रवाह (debris flow) में बदल गई, जो लगभग 8 किमी तक यात्रा की और लगभग 768 मीटर नीचे उतरते हुए पंचिरीमट्टम, मुंडक्कई और चूरालमला से गुजरी।
  • भूस्खलन में भारी मात्रा में चट्टान, मिट्टी और वनस्पति बह गई, जिससे व्यापक विनाश हुआ।
  • अध्ययन में पाया गया कि प्रभावित क्षेत्र की पहाड़ियाँ प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानों से बनी हैं, जिनमें लाखों वर्षों से बार-बार विरूपण (deformation) हुआ है, जिससे कमजोर तल (planes of weakness) जैसे कतरनी क्षेत्र (shear zones), फ्रैक्चर और फोलिएशन (foliations) बने हैं।
  • समय के साथ, वर्षा जल इन फ्रैक्चर में प्रवेश कर गया, जिससे व्यापक रासायनिक अपक्षय (chemical weathering) हुआ और कठोर चट्टान का एक बड़ा हिस्सा सतह के नीचे नरम, गहरे अपक्षयित पदार्थ में बदल गया।

भूस्खलन (Landslide) क्या है?

  • भूस्खलन एक भूवैज्ञानिक घटना है जिसमें चट्टानों, मलबे या मिट्टी का ढलान से नीचे की ओर खिसकना शामिल है।
  • यह गुरुत्वाकर्षण के कारण होता है, लेकिन अक्सर वर्षा, भूकंप, ज्वालामुखी गतिविधि या मानवजनित गतिविधियों जैसे कारकों से ट्रिगर होता है।
  • भूस्खलन के विभिन्न प्रकार होते हैं, जिनमें मलबे का प्रवाह (debris flow), चट्टान का गिरना (rockfall), कीचड़ का प्रवाह (mudflow) और ढलान का खिसकना (slump) शामिल हैं।
  • पश्चिमी घाट जैसे क्षेत्रों में, भारी मानसूनी वर्षा और भंगुर भूवैज्ञानिक संरचनाओं का संयोजन भूस्खलन के लिए एक उच्च जोखिम पैदा करता है।
  • वायनाड भूस्खलन के मामले में, अत्यधिक वर्षा ने कमजोर भूवैज्ञानिक संरचनाओं (जैसे कतरनी क्षेत्र और फ्रैक्चर) में पानी के दबाव को बढ़ा दिया, जिससे चट्टान द्रव्यमान की शक्ति कम हो गई और भूस्खलन शुरू हो गया।
  • घाटी की संकीर्ण संरचना और मजबूत चट्टानों (जैसे मेटागैब्रो) की उपस्थिति ने मलबे के प्रवाह की गति और विनाशकारी क्षमता को बढ़ा दिया।
  • भूस्खलन के प्रभाव में जान-माल का नुकसान, बुनियादी ढांचे का विनाश, कृषि भूमि का नुकसान और पर्यावरणीय क्षरण शामिल हैं।
  • आपदा प्रबंधन के दृष्टिकोण से, भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों की पहचान, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और भूमि उपयोग नियोजन महत्वपूर्ण हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
अत्यधिक वर्षा भूस्खलन का तात्कालिक कारण, 48 घंटों में लगभग 573 मिमी वर्षा।
भूवैज्ञानिक कमजोरियाँ प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानें, अपरूपण क्षेत्र (shear zones), दरारें और पर्णन (foliations) भूस्खलन की शुरुआत और गति को निर्धारित करते हैं।
रासायनिक अपक्षय बारिश के पानी ने दरारों में प्रवेश कर चट्टानों को नरम, गहरे अपक्षयित पदार्थ में बदल दिया, जिससे ढलान की स्थिरता कम हुई।
घाटी का स्वरूप संकीर्ण घाटियों ने भूस्खलन को उच्च गति के मलबे के प्रवाह में बदल दिया, जिससे विनाशकारी प्रभाव बढ़ा।
पुन्नापुझा नदी का ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र भूस्खलन का उद्गम स्थल, जहां ढलान की विफलता शुरू हुई।

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • यह अध्ययन जलवायु परिवर्तन और भूवैज्ञानिक कारकों के बीच जटिल अंतःक्रिया को उजागर करता है, जो पश्चिमी घाट जैसे संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्रों में भूस्खलन की घटनाओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
  • यह भविष्य में ऐसी आपदाओं के जोखिम मूल्यांकन और शमन रणनीतियों के विकास के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है।

आपदा प्रबंधन

  • यह दर्शाता है कि केवल वर्षा की तीव्रता पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, भूवैज्ञानिक और भू-आकृतिक कारकों को भी आपदा प्रबंधन योजनाओं में शामिल करना आवश्यक है।
  • यह भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण और विकास गतिविधियों के लिए सख्त दिशानिर्देशों की आवश्यकता पर बल देता है।

सामाजिक-आर्थिक प्रभाव

  • वायनाड जैसे क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों के लिए भूस्खलन के विनाशकारी परिणामों को रेखांकित करता है, जिसमें जान-माल का नुकसान और विस्थापन शामिल है।
  • यह आपदा के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण प्रयासों की जटिलता और आवश्यकता को दर्शाता है।

वैज्ञानिक और अनुसंधान

  • यह अध्ययन भूस्खलन के कारणों और गतिशीलता की गहरी समझ प्रदान करता है, जो भू-खतरों पर आगे के शोध के लिए एक मॉडल के रूप में कार्य कर सकता है।
  • ड्रोन-माउंटेड LiDAR और उच्च-रिज़ॉल्यूशन एरियल इमेजरी जैसी उन्नत तकनीकों का उपयोग भूस्खलन क्षेत्रों के अध्ययन में उनके महत्व को दर्शाता है।

चुनौतियाँ

1. भूस्खलन जोखिम मूल्यांकन

  • भूवैज्ञानिक कमजोरियों और जलवायु कारकों के जटिल अंतर्संबंध के कारण भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों की सटीक पहचान करना कठिन है।
  • अत्यधिक वर्षा की घटनाओं की भविष्यवाणी और उनके भूस्खलन पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन एक चुनौती बना हुआ है।

2. बुनियादी ढांचा और विकास

  • भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में सड़क, भवन और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण से जोखिम बढ़ सकता है।
  • विकास परियोजनाओं और पर्यावरणीय स्थिरता के बीच संतुलन बनाना एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

3. पुनर्वास और पुनर्निर्माण

  • भूस्खलन से प्रभावित लोगों का सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वास करना और उनके जीवन को फिर से स्थापित करना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है।
  • क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण और भविष्य की आपदाओं के प्रति लचीलापन सुनिश्चित करना महंगा और समय लेने वाला हो सकता है।

4. जलवायु परिवर्तन अनुकूलन

  • बढ़ती चरम मौसमी घटनाओं के साथ, समुदायों और बुनियादी ढांचे को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल बनाना एक सतत चुनौती है।
  • जलवायु-लचीली प्रथाओं को अपनाना और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
भूवैज्ञानिक कमजोरियाँ प्राचीन चट्टानों में प्राकृतिक कमजोरियों की पहचान और मानचित्रण जटिल है, जिससे जोखिम मूल्यांकन में चुनौतियाँ आती हैं।
जलवायु परिवर्तन अत्यधिक और अप्रत्याशित वर्षा पैटर्न भूस्खलन की आवृत्ति और तीव्रता को बढ़ा रहे हैं, जिससे तैयारी मुश्किल हो जाती है।
घाटी का भू-आकृति विज्ञान संकीर्ण घाटियों में मलबे के प्रवाह की उच्च गति और विनाशकारी क्षमता, जिससे जान-माल का अधिक नुकसान होता है।
भूमि उपयोग परिवर्तन वनोन्मूलन और अनुचित कृषि पद्धतियाँ ढलानों की स्थिरता को कम कर सकती हैं, जिससे भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का अभाव दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में प्रभावी भूस्खलन प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों की स्थापना और रखरखाव में चुनौतियाँ।

आगे की राह

  • भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों का विस्तृत भूवैज्ञानिक और भू-आकृतिक मानचित्रण (geological and geomorphological mapping) किया जाना चाहिए ताकि कमजोर क्षेत्रों की पहचान की जा सके।
  • अत्यधिक वर्षा की घटनाओं की निगरानी और भविष्यवाणी के लिए उन्नत मौसम विज्ञान प्रणालियों और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों के लिए सख्त भवन संहिता और भूमि उपयोग योजनाएँ लागू की जानी चाहिए।
  • वनीकरण और ढलान स्थिरीकरण (slope stabilization) तकनीकों के माध्यम से प्राकृतिक ढलानों को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
  • स्थानीय समुदायों को भूस्खलन जोखिमों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए और आपदा प्रतिक्रिया प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के अनुकूल होने के लिए दीर्घकालिक रणनीतियाँ विकसित की जानी चाहिए, जिसमें जल निकासी प्रबंधन और बुनियादी ढांचे का लचीलापन शामिल है।
  • भूस्खलन अनुसंधान और निगरानी के लिए ड्रोन-आधारित LiDAR जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

भूस्खलन · जलवायु परिवर्तन · भूगर्भीय कारक · पश्चिमी घाट · आपदा प्रबंधन · पर्यावरणीय भेद्यता · अत्यधिक वर्षा · भू-आकृति विज्ञान · सतत विकास · जोखिम मूल्यांकन · पूर्वानुमान प्रणाली · अनुकूलन रणनीतियाँ

अवधारणा प्रवाह

अत्यधिक मानसूनी वर्षा (लगभग 573 मिमी/48 घंटे)  →  पानी का चट्टानों की दरारों में घुसना और रासायनिक अपक्षय  →  चट्टान की ताकत में कमी और ढलान के भीतर पानी का दबाव बढ़ना  →  भूवैज्ञानिक कमजोरियों (अपरूपण क्षेत्र) के साथ ढलान की विफलता  →  उच्च गति के मलबे के प्रवाह में बदलना  →  व्यापक विनाश और जान-माल का नुकसान

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वायनाड भूस्खलन 2024 केवल अत्यधिक वर्षा का परिणाम था।
2. भूस्खलन की गति और विनाशकारी प्रभाव को निर्धारित करने में भूगर्भीय कमजोरियों और घाटी के स्वरूपों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
3. पश्चिमी घाट भूस्खलन के प्रति संवेदनशील क्षेत्र हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि अध्ययन के अनुसार, भूस्खलन केवल अत्यधिक वर्षा का परिणाम नहीं था, बल्कि भूगर्भीय, भू-आकृतिक और संरचनात्मक कारकों का भी परिणाम था। कथन 2 सही है क्योंकि अध्ययन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि भूगर्भीय कमजोरियों और घाटी के स्वरूपों ने भूस्खलन के पैमाने, गति और विनाशकारी प्रभाव को निर्धारित किया। कथन 3 सही है क्योंकि पश्चिमी घाट अपनी भूगर्भीय संरचना और भारी वर्षा के कारण भूस्खलन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं, जैसा कि वायनाड घटना से भी स्पष्ट होता है।

Q2. अभिकथन (A): वायनाड में 2024 का भूस्खलन अत्यधिक विनाशकारी था।
कारण (R): इस क्षेत्र की पहाड़ियों के नीचे प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानें हैं जिनमें लाखों वर्षों से बार-बार विरूपण हुआ है, जिससे प्राकृतिक कमजोरियां पैदा हुई हैं।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि समाचार में वायनाड भूस्खलन को ‘सबसे विनाशकारी भूस्खलनों में से एक’ बताया गया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि अध्ययन में बताया गया है कि क्षेत्र की पहाड़ियों के नीचे प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानें हैं जिनमें विरूपण के कारण प्राकृतिक कमजोरियां (जैसे अपरूपण क्षेत्र, फ्रैक्चर) विकसित हुई हैं। ये कमजोरियां, अत्यधिक वर्षा के साथ मिलकर, भूस्खलन को अत्यधिक विनाशकारी बनाने में महत्वपूर्ण कारक थीं। इसलिए, R, A की सही व्याख्या है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ वायनाड भूस्खलन 2024 के संदर्भ में, भूस्खलन की घटना में जलवायु और भूगर्भीय कारकों के अंतर्संबंध का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। भारत में भूस्खलन जोखिम को कम करने के लिए आपदा प्रबंधन रणनीतियों में इन अंतर्संबंधों को कैसे एकीकृत किया जा सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: वायनाड भूस्खलन 2024 का संक्षिप्त उल्लेख और इसके विनाशकारी प्रभाव। (20-30 शब्द)
2. जलवायु और भूगर्भीय कारकों का अंतर्संबंध (मुख्य भाग 1):
a. जलवायु कारक: अत्यधिक वर्षा (573 मिमी/48 घंटे) और इसका ट्रिगर के रूप में कार्य।
b. भूगर्भीय कारक: प्राचीन क्रिस्टलीय चट्टानें, लाखों वर्षों में विरूपण से उत्पन्न प्राकृतिक कमजोरियां (अपरूपण क्षेत्र, फ्रैक्चर, फोलिएशन)।
c. रासायनिक अपक्षय: वर्षा जल द्वारा फ्रैक्चर में प्रवेश और चट्टानों का नरम, अत्यधिक अपक्षयित सामग्री में बदलना।
d. जल दबाव में वृद्धि: अत्यधिक वर्षा के दौरान अंतर्संबंधित फ्रैक्चर में जल का तेजी से घुसपैठ, जिससे ढलान के भीतर जल दबाव में वृद्धि और चट्टान द्रव्यमान की ताकत का कमजोर होना।
e. घाटी के स्वरूपों की भूमिका: संकरी घाटी के खंडों और मजबूत चट्टानों (जैसे मेटागैब्रो) की उपस्थिति का भूस्खलन की गति और विनाश पर प्रभाव।
f. निष्कर्ष: यह दर्शाना कि भूस्खलन केवल वर्षा का परिणाम नहीं था, बल्कि भूगर्भीय कमजोरियों ने इसकी शुरुआत, यात्रा और विनाशकारी क्षमता को निर्धारित किया।
3. आपदा प्रबंधन रणनीतियों में एकीकरण (मुख्य भाग 2):
a. जोखिम मूल्यांकन: भूगर्भीय मानचित्रण (Geological mapping), LiDAR और उच्च-रिज़ॉल्यूशन हवाई इमेजरी का उपयोग करके संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान।
b. प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली: अत्यधिक वर्षा और भूगर्भीय अस्थिरता के संकेतों के आधार पर उन्नत पूर्वानुमान और चेतावनी प्रणालियों का विकास।
c. भूमि उपयोग योजना: भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में निर्माण और विकास गतिविधियों पर प्रतिबंध या विनियमन।
d. इंजीनियरिंग समाधान: ढलानों को स्थिर करने के लिए रिटेनिंग वॉल, ड्रेनेज सिस्टम और अन्य भू-तकनीकी उपायों का उपयोग।
e. सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को जोखिमों के बारे में शिक्षित करना और उन्हें निकासी योजनाओं में शामिल करना।
f. नीतिगत ढांचा: राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों (SDMA) की भूमिका को मजबूत करना, राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण रणनीति (National Landslide Risk Reduction Strategy) का प्रभावी कार्यान्वयन।
4. निष्कर्ष: एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देना जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और अंतर्निहित भूगर्भीय कमजोरियों दोनों को संबोधित करे ताकि भविष्य में ऐसी आपदाओं को रोका जा सके। (20-30 शब्द)

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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