30 Oct सीएजी रिपोर्ट: उत्तराखंड में गंगा प्रदूषण 32 गुना बढ़ा, नमामि गंगे पर उठे सवाल
✎ CAG लेखापरीक्षा (अनुच्छेद 148 व 151) ने दिखाया कि नमामि गंगे में सीवेज अवसंरचना का निर्माण तभी प्रभावी है जब STP का उपयोग, घरेलू कनेक्शन और नालों की टैपिंग सुनिश्चित हो, क्योंकि उपचारित न हुआ सीवेज ही गंगा में कोलीफॉर्म वृद्धि का…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी (नदी प्रदूषण, सीवेज प्रबंधन, राष्ट्रीय नदी संरक्षण कार्यक्रम) | GS Paper II — शासन एवं संवैधानिक संस्थाएं (CAG की लेखापरीक्षा भूमिका, राज्य एवं केंद्र के बीच समन्वय, जिला स्तरीय समितियां) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा एवं आपदा प्रबंधन से जुड़ा संदर्भ केवल तब, जब नदी स्वास्थ्य और जल-जनित रोगों पर चर्चा हो
- Prelims: नमामि गंगे (Namami Gange) कार्यक्रम और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG), कोलीफॉर्म (Coliform) बैक्टीरिया: मल-संदूषण का संकेतक, सीवेज उपचार संयंत्र (STP) की क्षमता, उपयोग और घरेलू कनेक्शन, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और उसके मानक, अनुच्छेद 148 (CAG की नियुक्ति व कर्तव्य) और अनुच्छेद 151 (लेखापरीक्षा प्रतिवेदन), पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974, गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया जाना (वर्ष 2008), देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी का संगम
- Essay: विकास परियोजनाओं में अवसंरचना निर्माण और उसके वास्तविक उपयोग के बीच का अंतर: क्या सार्वजनिक निवेश का परिणाम मापा जाना चाहिए?, नदी प्रदूषण नियंत्रण में सहकारी संघवाद की भूमिका: केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों के बीच उत्तरदायित्व का सवाल
त्वरित पुनरावृत्ति: CAG लेखापरीक्षा (अनुच्छेद 148 व 151) ने दिखाया कि नमामि गंगे में सीवेज अवसंरचना का निर्माण तभी प्रभावी है जब STP का उपयोग, घरेलू कनेक्शन और नालों की टैपिंग सुनिश्चित हो, क्योंकि उपचारित न हुआ सीवेज ही गंगा में कोलीफॉर्म वृद्धि का प्रमुख कारण है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक लेखापरीक्षा रिपोर्ट ने नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत उत्तराखंड में सीवेज प्रबंधन की कमियों को उजागर किया है। रिपोर्ट में वर्ष 2018 से 2023 की अवधि की लेखापरीक्षा के निष्कर्ष हैं। इसके अनुसार देवप्रयाग से हरिद्वार के लगभग 93 किलोमीटर क्षेत्र में गंगा के जल में कोलीफॉर्म का स्तर 32 गुना बढ़ गया है, जिसका एक प्रमुख कारण बिना उपचारित सीवेज का नदी में पहुंचना बताया गया है। रिपोर्ट में 37 सीवेज उपचार संयंत्रों (STP) में से 12 की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए हैं, कुछ संयंत्रों से कोई घरेलू कनेक्शन नहीं जुड़ा पाया गया है, तथा कई जिला गंगा समितियों द्वारा नदी बेसिन प्रबंधन योजना न बनाए जाने का उल्लेख है। यह रिपोर्ट इस बात की याद दिलाती है कि अवसंरचना के निर्माण के साथ उसका उपयोग, रखरखाव और घरों तक नेटवर्क का विस्तार भी उतना ही आवश्यक है।
पृष्ठभूमि
- गंगा भारत की सबसे बड़ी नदियों में से एक है। इसका उद्गम उत्तराखंड के गंगोत्री क्षेत्र में माना जाता है। देवप्रयाग में अलकनंदा और भागीरथी के संगम से इसे गंगा नाम मिलता है, और हरिद्वार से यह मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती है।
- गंगा सफाई का पहला बड़ा राष्ट्रीय प्रयास गंगा कार्य योजना (Ganga Action Plan) के रूप में वर्ष 1985 में आरंभ हुआ था। इसके बाद प्रदूषण नियंत्रण के लिए कई चरणों में कार्यक्रम चलाए गए।
- वर्ष 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया गया। इसके बाद वर्ष 2014 में नमामि गंगे कार्यक्रम आरंभ हुआ, जिसके क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) कार्यरत है, जो जल शक्ति मंत्रालय के अधीन है।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पर्यावरण से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत स्थापित है। वह प्रदूषण नियंत्रण संबंधी मानकों के पालन की निगरानी करता रहा है।
- CAG की लेखापरीक्षा रिपोर्ट संसद या राज्य विधानमंडल के समक्ष रखी जाती है (अनुच्छेद 151), जिससे सरकारी व्यय की जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
नमामि गंगे कार्यक्रम और सीवेज प्रबंधन की मूल अवधारणा क्या है?
- नमामि गंगे कार्यक्रम गंगा और उसकी सहायक नदियों के प्रदूषण को कम करने, नदी के पुनरुद्धार और घाटों के विकास के लिए एक एकीकृत कार्यक्रम है।
- कोलीफॉर्म एक प्रकार के जीवाणु समूह हैं, जिनकी उपस्थिति जल में मल-संदूषण का संकेत देती है। इसलिए इनका स्तर नदी के जल की गुणवत्ता का एक प्रमुख मापदंड है।
- सीवेज उपचार संयंत्र (STP) घरों और नालों से आने वाले सीवेज को नदी में छोड़ने से पहले उपचारित करते हैं। इनकी प्रभावशीलता के लिए क्षमता के अनुरूप सीवेज आवक, नालों की टैपिंग और घरेलू कनेक्शन का होना आवश्यक है।
- सीवेज प्रबंधन में केवल संयंत्र का निर्माण पर्याप्त नहीं है; घरों को सीवर नेटवर्क से जोड़ना और नालों को संयंत्र तक पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
- अनुच्छेद 48A राज्य को पर्यावरण की रक्षा और सुधार का निर्देश देता है, और अनुच्छेद 51A(छ) (ङ) के अंतर्गत नागरिकों पर भी पर्यावरण संरक्षण का कर्तव्य है।
- पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 केंद्र सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए व्यापक शक्तियां देता है, जबकि जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 जल प्रदूषण नियंत्रण के लिए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की व्यवस्था करता है।
- जिला गंगा समितियां और नदी बेसिन प्रबंधन योजनाएं जमीनी स्तर पर नदी संरक्षण के नियोजन और समन्वय की इकाइयां हैं, जिनके न बनने से योजना का क्रियान्वयन प्रभावित होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| ऑडिट अवधि और तुलना | CAG ने वर्ष 2018 से 2023 के बीच सीवेज प्रबंधन का ऑडिट किया और देवप्रयाग से हरिद्वार (हर की पैड़ी) के दस वर्षों के आंकड़ों की तुलना की, जिससे प्रदूषण की प्रवृत्ति का आकलन संभव हुआ। |
| कोलीफॉर्म (Coliform) में वृद्धि | अक्तूबर 2023 तक देवप्रयाग से हरिद्वार के लगभग 93 किलोमीटर के खंड में कुल कोलीफॉर्म का स्तर 32 गुना बढ़ गया। कोलीफॉर्म मल-जनित संदूषण का सूचक है। |
| बिना उपचारित सीवेज का प्रवाह | 37 सीवेज उपचार संयंत्र (STP) में से 12 से बिना उपचारित सीवेज सीधे गंगा और सहायक नदियों में जा रहा था, जो मुख्य कारण माना गया है। |
| निष्क्रिय संयंत्र | सात शहरों में बने 21 STP से एक भी घरेलू कनेक्शन नहीं जुड़ा था, इसलिए संयंत्रों की वास्तविक क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा था। |
| घरेलू सीवर कनेक्शन की कमी | श्रीनगर में केवल 12.22 प्रतिशत, चमोली-गोपेश्वर में 6.42 प्रतिशत और उत्तरकाशी के ज्ञानसू में 9.39 प्रतिशत घर सीवर नेटवर्क से जुड़े थे। |
| जिला गंगा समितियों की भूमिका | श्रीनगर, उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, देहरादून और हरिद्वार जिलों में नदी बेसिन प्रबंधन योजना नहीं बनाई गई, जिससे स्थानीय स्तर पर नियोजन कमजोर रहा। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- गंगा के जल की गुणवत्ता जलीय जैव विविधता और नदी के स्व-शुद्धिकरण की क्षमता से जुड़ी है, इसलिए कोलीफॉर्म में वृद्धि पारिस्थितिकी के लिए गंभीर संकेत है।
- पर्वतीय क्षेत्र में ऊपरी धारा का प्रदूषण निचली धारा के मैदानी शहरों तक पहुंचकर पूरे नदी तंत्र की गुणवत्ता प्रभावित करता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य महत्व
- बिना उपचारित सीवेज वाले जल के उपयोग से जलजनित रोगों का खतरा बढ़ता है, जो स्वच्छ जल के अधिकार से सीधे जुड़ा विषय है।
- नदी के किनारे बसे तीर्थ नगरों में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के स्नान से जोखिम और बढ़ जाता है।
प्रशासनिक और वित्तीय महत्व
- राज्य सरकार द्वारा सीवेज विकास पर 55.08 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद गंगा फ्रंट टाउन में सीवरेज विस्तार के लिए कोई राशि खर्च नहीं हुई, जो व्यय की दिशा और प्राथमिकताओं पर प्रश्न उठाता है।
- CAG की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक निधि के उपयोग की प्रभावशीलता जांचने का संवैधानिक-प्रशासनिक साधन है और नीति-सुधार के लिए आधार देती है।
नीतिगत और न्यायिक महत्व
- कई संयंत्र राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के मानकों के अनुरूप काम नहीं कर रहे थे, जिससे पर्यावरणीय न्याय और अनुपालन का प्रश्न जुड़ता है।
- यह मामला नगरीय अवसंरचना, जल संस्थानों और स्थानीय निकायों के बीच समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
चुनौतियाँ
1. सीवेज अवसंरचना का अधूरा विस्तार
- कई शहरों में STP बने हैं, पर उनसे जुड़ने वाली सीवर लाइनें और घरेलू कनेक्शन पर्याप्त नहीं हैं।
- पहाड़ी भूभाग, बिखरी हुई बसावट और सीमित निर्माण-क्षेत्र सीवर नेटवर्क के विस्तार को कठिन बनाते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण संरक्षण और अवसंरचना
2. संयंत्रों का संचालन और रखरखाव
- संयंत्रों की उपचार क्षमता अपर्याप्त पाई गई, जिससे वे प्रवाह के अनुरूप शोधन नहीं कर पाते।
- उत्तराखंड जल संस्थान द्वारा खामियों के कारण श्रीनगर के STP को अपने अधीन लेने से इनकार करना संचालन-दायित्व के हस्तांतरण की समस्या दिखाता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: स्थानीय शासन और शहरी निकायों के कार्य
3. नाली-टैपिंग और अवैध निकास
- नालों की प्रभावी टैपिंग न होने से सीवेज सीधे नदी में पहुंच रहा है।
- सीवेज को उपचार संयंत्र तक ले जाने वाली व्यवस्था की कमी प्रदूषण के स्रोत पर नियंत्रण को कठिन बनाती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: जल प्रदूषण और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन
4. समन्वय और नियोजन की कमी
- जिला गंगा समितियों द्वारा नदी बेसिन प्रबंधन योजना न बनाए जाने से बहु-स्तरीय नियोजन बाधित हुआ।
- राज्य, नगरीय निकाय, जल संस्थान और केंद्रीय परियोजना प्राधिकरण के बीच जवाबदेही स्पष्ट न होने से क्रियान्वयन में विलंब होता है।
यूपीएससी लिंक: GS-2: केंद्र-राज्य समन्वय और सहकारी संघवाद
5. निगरानी और मानकों का अनुपालन
- कई संयंत्र NGT के मानकों के अनुरूप नहीं पाए गए, जिससे निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठता है।
- ऊपरी धारा में बढ़ता प्रदूषण निचली धारा के शहरों में सीधा प्रभाव डालता है, पर अंतर-क्षेत्रीय निगरानी तंत्र सीमित है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: पर्यावरण नियामक तंत्र और न्यायिक हस्तक्षेप
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| कम घरेलू कनेक्शन | श्रीनगर, चमोली-गोपेश्वर और ज्ञानसू में सीवर कनेक्शन 15 प्रतिशत से भी कम, जिससे सीवेज का बड़ा हिस्सा उपचार से बाहर है। |
| निष्क्रिय STP | 21 STP से शून्य घरेलू कनेक्शन होने से निवेश का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा। |
| बिना उपचारित सीवेज का नदी में प्रवाह | 12 STP से सीधा निकास कोलीफॉर्म में तीव्र वृद्धि का प्रमुख कारण बताया गया है। |
| नालों की अपर्याप्त टैपिंग | सीवेज का नदी तक सीधा पहुंचना स्रोत-स्तर पर नियंत्रण की विफलता दर्शाता है। |
| बेसिन योजनाओं का अभाव | सात जिलों में नदी बेसिन प्रबंधन योजना न होने से दीर्घकालिक नियोजन कमजोर है। |
| मानक-अनुपालन की कमी | कई संयंत्रों का NGT मानकों से नीचे चलना पर्यावरणीय नियमों के प्रवर्तन पर प्रश्न उठाता है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- नमामि गंगे कार्यक्रम (Namami Gange Programme)
आगे की राह
- प्रत्येक STP के साथ सीवर नेटवर्क और घरेलू कनेक्शन को एक साथ योजनाबद्ध कर समयबद्ध लक्ष्य तय किए जाएं।
- STP के संचालन-रखरखाव की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से किसी एक एजेंसी को सौंपी जाए और उसके लिए पर्याप्त वित्तीय प्रावधान हो।
- नालों की टैपिंग का सर्वेक्षण कर अवैध निकास बिंदुओं की पहचान और उन्हें सीवेज नेटवर्क से जोड़ने का कार्य प्राथमिकता पर हो।
- सभी प्रभावित जिलों में नदी बेसिन प्रबंधन योजना बनाकर उसे नगरीय और ग्रामीण विकास योजनाओं से जोड़ा जाए।
- STP के प्रवाह और उपचार गुणवत्ता की नियमित निगरानी के लिए वास्तविक समय डेटा और सार्वजनिक प्रकटीकरण की व्यवस्था हो।
- गंगा फ्रंट टाउन में सीवरेज विस्तार के लिए वित्तीय आवंटन सुनिश्चित कर प्राथमिकता-आधारित व्यय सुनिश्चित किया जाए।
- NGT के मानकों के अनुपालन की समीक्षा के लिए संयंत्र-वार स्वतंत्र मूल्यांकन और सुधार-कार्य योजना लागू की जाए।
- CAG की सिफारिशों पर कार्रवाई-रिपोर्ट (Action Taken Report) तैयार कर उसका अनुवर्ती मूल्यांकन किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) · नमामि गंगे कार्यक्रम · सीवेज उपचार संयंत्र (STP) · गंगा नदी प्रदूषण · कोलीफॉर्म बैक्टीरिया · जल प्रदूषण नियंत्रण · पर्यावरण संरक्षण · राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) · शहरी सीवेज प्रबंधन · गंगा नदी बेसिन प्रबंधन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: स्वच्छ पर्यावरण और स्वच्छ जल से जीवन का अधिकार
- अनुच्छेद 48A: राज्य द्वारा पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का निर्देश
- अनुच्छेद 51A(g): नागरिकों का प्राकृतिक पर्यावरण संरक्षण का मूल कर्तव्य
- अनुच्छेद 47: जनस्वास्थ्य सुधार का राज्य का कर्तव्य
- अनुच्छेद 243W: नगरपालिकाओं को 12वीं अनुसूची के कार्य सौंपना
अवधारणा प्रवाह
नगरीय और कस्बाई क्षेत्रों में सीवर नेटवर्क और घरेलू कनेक्शन का अपर्याप्त विस्तार। → नालों की प्रभावी टैपिंग न होने से अनुपचारित सीवेज का सीधा नदी में प्रवेश। → सीवेज उपचार संयंत्रों का निष्क्रिय रहना या अपर्याप्त क्षमता से चलना। → बिना उपचारित सीवेज के कारण गंगा में कोलीफॉर्म का स्तर बढ़ना (देवप्रयाग से हरिद्वार खंड में 32 गुना)। → जल-गुणवत्ता में गिरावट से जलीय पारिस्थितिकी और जनस्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव। → CAG ऑडिट द्वारा खामियों की पहचान और नीतिगत सुधार की सिफारिश।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट के अनुसार, नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच गंगा में कोलीफॉर्म का स्तर 32 गुना बढ़ गया है।
2. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कई सीवेज उपचार संयंत्र (STP) राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के मानकों के अनुरूप काम नहीं कर रहे थे।
3. CAG की रिपोर्ट में घरेलू सीवर कनेक्शन की कमी को भी गंगा प्रदूषण का एक प्रमुख कारण बताया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि CAG की रिपोर्ट में देवप्रयाग से हरिद्वार के बीच गंगा में कोलीफॉर्म स्तर में 32 गुना वृद्धि का उल्लेख किया गया है। कथन 2 सही है क्योंकि रिपोर्ट में कई STP के NGT मानकों के अनुरूप काम न करने की बात कही गई है। कथन 3 भी सही है क्योंकि घरेलू सीवर कनेक्शन की कमी को भी प्रदूषण का एक महत्वपूर्ण कारण बताया गया है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कथन नमामि गंगे कार्यक्रम के संदर्भ में सही है/हैं?
1. यह एक एकीकृत संरक्षण मिशन है जिसका उद्देश्य गंगा नदी का प्रदूषण कम करना और उसका कायाकल्प करना है।
2. इस कार्यक्रम को जल शक्ति मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया जा रहा है।
3. इसके प्रमुख स्तंभों में सीवेज उपचार अवसंरचना, नदी सतह की सफाई और जैव विविधता संरक्षण शामिल हैं।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1 सही है। नमामि गंगे कार्यक्रम एक एकीकृत संरक्षण मिशन है। कथन 2 सही है। यह कार्यक्रम जल शक्ति मंत्रालय के तहत कार्यान्वित किया जा रहा है। कथन 3 सही है। सीवेज उपचार, नदी सतह की सफाई और जैव विविधता संरक्षण इसके प्रमुख स्तंभ हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की हालिया रिपोर्ट नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत गंगा नदी में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करती है। इस संदर्भ में, नमामि गंगे कार्यक्रम के उद्देश्यों और कार्यान्वयन में आने वाली प्रमुख चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** CAG रिपोर्ट का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए नमामि गंगे कार्यक्रम के महत्व को रेखांकित करें।
2. **नमामि गंगे के उद्देश्य:** कार्यक्रम के मुख्य उद्देश्यों को सूचीबद्ध करें (जैसे प्रदूषण उन्मूलन, नदी कायाकल्प, जैव विविधता संरक्षण, जनभागीदारी)।
3. **कार्यान्वयन में चुनौतियाँ (CAG रिपोर्ट के आलोक में):**
* सीवेज उपचार संयंत्रों (STP) की अपर्याप्त क्षमता और खराब कार्यप्रणाली (उदाहरण: 12 STP से बिना उपचारित सीवेज)।
* घरेलू सीवर कनेक्शन की कमी (उदाहरण: श्रीनगर, चमोली, उत्तरकाशी के आंकड़े)।
* नालों की अप्रभावी टैपिंग।
* राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) मानकों का पालन न होना।
* जिला गंगा समितियों द्वारा नदी बेसिन प्रबंधन योजना का अभाव।
* वित्तीय आवंटन और उपयोग में विसंगतियाँ (जैसे गंगा फ्रंट टाउन में सीवरेज पर खर्च न होना)।
* कोलीफॉर्म बैक्टीरिया के स्तर में वृद्धि (देवप्रयाग से हरिद्वार तक 32 गुना)।
4. **समालोचनात्मक विश्लेषण:** कार्यक्रम की सफलताओं (यदि कोई हो) और विफलताओं का संतुलित मूल्यांकन करें। नीति निर्माण और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच के अंतर को उजागर करें।
5. **सुझावात्मक उपाय:** चुनौतियों का समाधान करने के लिए व्यवहार्य सुझाव दें (जैसे STP क्षमता बढ़ाना, घरेलू कनेक्शन अनिवार्य करना, निगरानी तंत्र मजबूत करना, जन जागरूकता बढ़ाना, अंतर-विभागीय समन्वय)।
6. **निष्कर्ष:** गंगा नदी के सतत संरक्षण के लिए एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: amarujala.com
Uttarakhand PCS (UKPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: सीएजी की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के अंतर्गत उत्तराखंड में गंगा नदी के किनारे स्थित देवप्रयाग से हरिद्वार तक के खंड में प्रदूषण में कितने गुना वृद्धि दर्ज की गई है?
- 16 गुना
- 24 गुना
- 32 गुना
- 40 गुना
उत्तर: 32 गुना — सीएजी की रिपोर्ट में देवप्रयाग से हरिद्वार तक के गंगा खंड में प्रदूषण में 32 गुना वृद्धि का उल्लेख किया गया है।
Mains: सीएजी की रिपोर्ट में ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम के अंतर्गत उत्तराखंड में गंगा प्रदूषण नियंत्रण में विफलता के प्रमुख कारणों का विश्लेषण करते हुए, राज्य सरकार द्वारा उठाए जाने वाले सुधारात्मक कदमों पर चर्चा कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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