23 Sep सुपर एल नीनो से भारत में 15,800 अतिरिक्त गर्मी से मौतें: जानिए पूरा मामला

✎ अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के गर्म होने की एक घटना है जो भारत में कमजोर मानसून और उच्च तापमान सहित वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है, और जलवायु परिवर्तन के साथ इसके प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS पेपर I — भूगोल (जलवायु विज्ञान, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव) | GS पेपर III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन (जलवायु परिवर्तन, आपदा न्यूनीकरण, स्वास्थ्य पर प्रभाव)
- Prelims: अल नीनो, ला नीना, ENSO, जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैसें, तापमान वृद्धि, मानसूनी वर्षा, ऊष्मा-संबंधी मृत्यु दर
- Essay: जलवायु परिवर्तन: भारत के समक्ष चुनौतियाँ और समाधान, मानव स्वास्थ्य पर पर्यावरणीय परिवर्तनों का प्रभाव
त्वरित पुनरावृत्ति: अल नीनो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के गर्म होने की एक घटना है जो भारत में कमजोर मानसून और उच्च तापमान सहित वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है, और जलवायु परिवर्तन के साथ इसके प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
शिकागो विश्वविद्यालय के एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, ‘सुपर अल नीनो’ से जुड़े तापमान वृद्धि के कारण सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में लगभग 15,800 अतिरिक्त गर्मी-संबंधी मौतों का अनुमान है। यह रिपोर्ट भारत को नाइजीरिया, इंडोनेशिया और सूडान के बाद चौथे सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक मानती है, जो वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों को रेखांकित करता है।
पृष्ठभूमि
- अल नीनो (El Niño) एक प्राकृतिक जलवायु घटना है जो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में असामान्य रूप से सतह के पानी के गर्म होने की विशेषता है।
- यह घटना वैश्विक मौसम पैटर्न को प्रभावित करती है, जिसमें भारतीय मानसून का कमजोर होना और भारत में उच्च तापमान शामिल है।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान में वृद्धि हो रही है, जिससे अल नीनो जैसी घटनाओं के प्रभाव और भी गंभीर हो सकते हैं।
- अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि तापमान में यह वृद्धि वैश्विक भूमि तापमान को सामान्य से 1.2°C ऊपर कर देगी, जिससे जनसंख्या उन परिस्थितियों के संपर्क में आएगी जो 20 साल बाद जलवायु परिवर्तन के कारण अपेक्षित हैं।
- भारत में, अनुमानित अतिरिक्त गर्मी-संबंधी मौतों का लगभग आधा हिस्सा दिसंबर से फरवरी के बीच हो सकता है, जो सर्दियों के महीनों में भी असामान्य गर्मी की ओर इशारा करता है।
- यह रिपोर्ट यूरोपीय सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट्स (European Centre for Medium-Range Weather Forecasts) के मौसमी पूर्वानुमानों का उपयोग करती है और मृत्यु दर अनुमानों को स्थानीय जलवायु, भेद्यता और अनुकूलन क्षमता के लिए समायोजित करती है।
- भारत में गर्मी से संबंधित मृत्यु दर का जोखिम अन्य क्षेत्रों के विपरीत, पूर्वानुमान क्षितिज से परे गर्मियों के महीनों में भी बढ़ने की संभावना है।
अल नीनो क्या है?
- अल नीनो दक्षिणी दोलन (El Niño-Southern Oscillation – ENSO) चक्र का एक गर्म चरण है, जो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय दबाव में बड़े पैमाने पर बदलाव को संदर्भित करता है।
- यह घटना तब होती है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्सों में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है।
- अल नीनो व्यापारिक पवनों (Trade Winds) को कमजोर करता है, जिससे गर्म पानी पश्चिमी प्रशांत से पूर्वी प्रशांत की ओर बढ़ता है।
- इसके विपरीत, ला नीना (La Niña) ENSO चक्र का ठंडा चरण है, जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से ठंडा हो जाता है।
- भारत में, अल नीनो आमतौर पर कमजोर मानसूनी वर्षा और सूखे की स्थिति से जुड़ा होता है, जबकि ला नीना मजबूत मानसून और अधिक वर्षा लाता है।
- अल नीनो के कारण वैश्विक स्तर पर मौसम पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव आते हैं, जिनमें कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़, जबकि अन्य में सूखा और गर्मी शामिल है।
- यह कृषि, जल संसाधनों, पारिस्थितिकी तंत्रों और मानव स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।
- ‘सुपर अल नीनो’ शब्द का उपयोग विशेष रूप से तीव्र अल नीनो घटनाओं का वर्णन करने के लिए किया जाता है, जिनके प्रभाव सामान्य अल नीनो की तुलना में अधिक गंभीर होते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सुपर अल-नीनो (Super El Niño) | यह एक मौसमी घटना है जो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में असामान्य रूप से गर्म होने का कारण बनती है, जिससे भारतीय मानसून कमजोर होता है और तापमान में वृद्धि होती है। |
| अतिरिक्त गर्मी से होने वाली मौतें | अध्ययन के अनुसार, सितंबर 2026 से फरवरी 2027 के बीच भारत में सामान्य वर्ष की तुलना में लगभग 15,800 अतिरिक्त गर्मी से संबंधित मौतें होने का अनुमान है। |
| वैश्विक तापमान वृद्धि | सुपर अल-नीनो के कारण वैश्विक भूमि का तापमान सामान्य से 1.2°C अधिक होने का अनुमान है, जिससे अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या में 44 प्रतिशत की वृद्धि होगी। |
| सर्वाधिक प्रभावित देश | भारत नाइजीरिया, इंडोनेशिया और सूडान के बाद चौथा सबसे अधिक प्रभावित देश होने का अनुमान है। |
| दीर्घकालिक जोखिम | भारत और पाकिस्तान जैसे उत्तरी गोलार्ध के देशों में गर्मी से संबंधित मृत्यु दर गर्मियों के महीनों में भी बढ़ती रहने की संभावना है, जो वर्तमान पूर्वानुमान अवधि से परे है। |
महत्व
पर्यावरण और जलवायु
- यह रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन और अल-नीनो जैसी प्राकृतिक घटनाओं के संयुक्त प्रभावों को उजागर करती है, जो भविष्य में अत्यधिक मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि का संकेत देती है।
- बढ़ते तापमान और अत्यधिक गर्मी के दिनों से पारिस्थितिक तंत्र, जैव विविधता और जल संसाधनों पर गंभीर दबाव पड़ेगा।
सामाजिक और स्वास्थ्य
- गर्मी से संबंधित मौतों में वृद्धि से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भारी बोझ पड़ेगा, विशेषकर कमजोर आबादी (जैसे बुजुर्ग, बच्चे और गरीब) के लिए।
- अत्यधिक गर्मी से कृषि उत्पादकता, श्रमिकों की उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे सामाजिक असमानताएं बढ़ सकती हैं।
शासन और नीति
- यह रिपोर्ट भारत को जलवायु परिवर्तन अनुकूलन (Climate Change Adaptation) और शमन (Mitigation) रणनीतियों को मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।
- आपदा प्रबंधन (Disaster Management) योजनाओं को अद्यतन करने और गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य आपात स्थितियों से निपटने के लिए तैयारियों को बढ़ाने की आवश्यकता है।
चुनौतियाँ
1. गर्मी से संबंधित मौतों की गणना
- भारत में गर्मी से होने वाली मौतों की सटीक गणना एक चुनौती बनी हुई है, जिससे नीति निर्माताओं के लिए समस्या की वास्तविक सीमा को समझना मुश्किल हो जाता है।
- मृत्यु के कारणों को वर्गीकृत करने में एकरूपता की कमी और अपर्याप्त डेटा संग्रह प्रणाली इस चुनौती को बढ़ाती है।
यूपीएससी लिंक: आपदा प्रबंधन, सार्वजनिक स्वास्थ्य
2. बुनियादी ढाँचा और अनुकूलन क्षमता
- भारत के कई क्षेत्रों में गर्मी की लहरों का सामना करने के लिए पर्याप्त बुनियादी ढाँचे (जैसे शीतलन केंद्र, पर्याप्त जल आपूर्ति) और अनुकूलन क्षमता की कमी है।
- शहरी ताप द्वीप (Urban Heat Island) प्रभाव और ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित संसाधनों के कारण जोखिम बढ़ जाता है।
यूपीएससी लिंक: जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण
3. संवेदनशील आबादी की सुरक्षा
- बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं, बाहरी श्रमिक और पुरानी बीमारियों से ग्रस्त लोग अत्यधिक गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जिनकी सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है।
- इन समूहों के लिए लक्षित हस्तक्षेप और जागरूकता कार्यक्रमों की कमी है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय, स्वास्थ्य
4. अंतर-मंत्रालयी समन्वय
- जलवायु परिवर्तन और इसके प्रभावों से निपटने के लिए विभिन्न सरकारी विभागों (स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधन, आपदा प्रबंधन) के बीच प्रभावी समन्वय की आवश्यकता है, जिसमें अक्सर कमी देखी जाती है।
- नीतियों और कार्यक्रमों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण आवश्यक है।
यूपीएससी लिंक: शासन, नीति निर्माण
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| डेटा की कमी | गर्मी से संबंधित मौतों और बीमारियों पर विश्वसनीय, वास्तविक समय के डेटा की कमी प्रभावी प्रतिक्रिया योजनाओं को बाधित करती है। |
| स्वास्थ्य सेवा तक पहुँच | ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं और शीतलन सुविधाओं तक सीमित पहुँच गर्मी से संबंधित बीमारियों के जोखिम को बढ़ाती है। |
| आजीविका पर प्रभाव | कृषि और निर्माण जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों की उत्पादकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिससे आर्थिक नुकसान होता है। |
| जागरूकता का अभाव | गर्मी की लहरों के खतरों और उनसे बचाव के उपायों के बारे में आम जनता, विशेषकर कमजोर वर्गों में जागरूकता की कमी। |
| दीर्घकालिक योजना | जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों को संबोधित करने और भविष्य की चरम घटनाओं के लिए तैयार रहने हेतु व्यापक और एकीकृत योजनाओं की कमी। |
आगे की राह
- गर्मी से संबंधित मौतों और बीमारियों पर एक मजबूत, मानकीकृत डेटा संग्रह और रिपोर्टिंग प्रणाली स्थापित करना।
- गर्मी कार्य योजना (Heat Action Plans) को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करना और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उन्हें अनुकूलित करना।
- सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढाँचे को मजबूत करना, जिसमें शीतलन केंद्र, पर्याप्त जल आपूर्ति और चिकित्सा कर्मियों का प्रशिक्षण शामिल है।
- जलवायु-अनुकूल वास्तुकला और शहरी नियोजन को बढ़ावा देना, जिसमें हरित स्थान और जल निकायों का संरक्षण शामिल है।
- किसानों और बाहरी श्रमिकों जैसे कमजोर समूहों के लिए लक्षित जागरूकता अभियान और अनुकूलन रणनीतियाँ विकसित करना।
- जलवायु परिवर्तन शमन प्रयासों को तेज करना और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश बढ़ाना।
- अल-नीनो जैसी मौसमी घटनाओं के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों और पूर्वानुमान क्षमताओं को मजबूत करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
अल नीनो · जलवायु परिवर्तन · अत्यधिक गर्मी से होने वाली मौतें · मानव स्वास्थ्य पर जलवायु प्रभाव · भारत में जलवायु भेद्यता · अनुकूलन क्षमता · आपदा जोखिम न्यूनीकरण · सतत विकास लक्ष्य · सार्वजनिक स्वास्थ्य · मौसम संबंधी घटनाएँ
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन के अधिकार का संरक्षण’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 47’, ‘note’: ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार’}
अवधारणा प्रवाह
सुपर अल-नीनो घटना → भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का गर्म होना → भारतीय मानसून का कमजोर होना → भारत में तापमान में वृद्धि और अत्यधिक गर्म दिन → गर्मी से संबंधित बीमारियों और मौतों में वृद्धि
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में असामान्य रूप से गर्म सतही जल की घटना है।
2. अल नीनो आमतौर पर भारतीय मानसून को कमजोर करता है और भारत में उच्च तापमान का कारण बनता है।
3. ‘सुपर अल नीनो’ एक ऐसी घटना है जो सामान्य अल नीनो की तुलना में अधिक तीव्र होती है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि अल नीनो पूर्वी और मध्य प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से संबंधित है। कथन 2 सही है क्योंकि अल नीनो का भारतीय मानसून पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे वर्षा कम होती है और तापमान बढ़ता है। कथन 3 भी सही है, ‘सुपर अल नीनो’ एक अनौपचारिक शब्द है जिसका उपयोग विशेष रूप से मजबूत अल नीनो घटनाओं का वर्णन करने के लिए किया जाता है, जिसके वैश्विक मौसम पैटर्न पर अधिक गंभीर प्रभाव पड़ते हैं।
Q2. अभिकथन (A): जलवायु परिवर्तन और अल नीनो जैसी मौसम संबंधी घटनाओं के कारण भारत में गर्मी से संबंधित मौतों में वृद्धि का अनुमान है।
कारण (R): भारत की बड़ी आबादी और कृषि पर निर्भरता इसे अत्यधिक तापमान के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है, जिससे अनुकूलन क्षमता प्रभावित होती है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि रिपोर्ट में ‘सुपर अल नीनो’ से जुड़ी गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया गया है। कारण (R) भी सही है क्योंकि भारत की घनी आबादी, खासकर ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में, और सीमित अनुकूलन क्षमता इसे जलवायु परिवर्तन और अत्यधिक गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है। अतः, R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ अल नीनो जैसी मौसम संबंधी घटनाओं के संदर्भ में, भारत में अत्यधिक गर्मी से होने वाली मौतों के बढ़ते जोखिम का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत की अनुकूलन क्षमता और शमन रणनीतियों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** अल नीनो और ‘सुपर अल नीनो’ का संक्षिप्त परिचय, भारत पर इसके प्रभावों का उल्लेख (विशेषकर अत्यधिक गर्मी से होने वाली मौतों का अनुमानित आंकड़ा)।
2. **भारत में अत्यधिक गर्मी से होने वाली मौतों का जोखिम:**
* **जलवायु भेद्यता:** भारत की भौगोलिक स्थिति, घनी आबादी, कृषि पर निर्भरता और निम्न आय वर्ग के लोगों की भेद्यता।
* **अल नीनो का प्रभाव:** भारतीय मानसून पर नकारात्मक प्रभाव, तापमान में वृद्धि, जल संकट और खाद्य सुरक्षा पर असर।
* **सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव:** गर्मी से संबंधित बीमारियाँ (हीट स्ट्रोक, निर्जलीकरण), मौजूदा स्वास्थ्य प्रणालियों पर दबाव।
* **सामाजिक-आर्थिक प्रभाव:** कृषि उत्पादकता में कमी, आजीविका का नुकसान, पलायन।
3. **अनुकूलन क्षमता और शमन रणनीतियाँ:**
* **राष्ट्रीय कार्य योजनाएँ:** राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC), राज्य कार्य योजनाएँ।
* **शुरुआती चेतावनी प्रणाली:** मौसम पूर्वानुमान, हीटवेव अलर्ट।
* **बुनियादी ढाँचा:** शहरी नियोजन में सुधार, हरित भवन, शीतलन केंद्र।
* **स्वास्थ्य सेवाएँ:** स्वास्थ्य कर्मियों का प्रशिक्षण, आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र।
* **जल प्रबंधन:** वर्षा जल संचयन, कुशल सिंचाई पद्धतियाँ।
* **अंतर्राष्ट्रीय सहयोग:** जलवायु वित्त, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण।
* **दीर्घकालिक शमन:** नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना, कार्बन उत्सर्जन में कमी।
4. **चुनौतियाँ और आगे की राह:** प्रभावी कार्यान्वयन में बाधाएँ, वित्तीय और तकनीकी सीमाएँ, जागरूकता की कमी। एक समग्र और बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।
5. **निष्कर्ष:** जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के प्रभावों को कम करने के लिए तत्काल और समन्वित प्रयासों की आवश्यकता, जिसमें अनुकूलन और शमन दोनों रणनीतियाँ शामिल हों।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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