30 Jul सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: पेलेट गन के इस्तेमाल पर कानून बना रहे तब तक वैध
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, कार्यप्रणाली, संशोधन, कार्यपालिका और न्यायपालिका का कार्यकरण | GS Paper II — सरकार की नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा: कानून और व्यवस्था तथा सुरक्षा एजेंसियां
- Prelims: पेलेट गन, अनुच्छेद 21, अल्ट्रा वायर्स (Ultra Vires), भीड़ नियंत्रण, मानवाधिकार, न्यायिक समीक्षा, रैपिड एक्शन फोर्स (RAF), पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPRD)
- Essay: लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का अधिकार और राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन, तकनीकी प्रगति और मानवाधिकारों का संरक्षण: भीड़ नियंत्रण के आधुनिक तरीके
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्चतम न्यायालय ने भीड़ नियंत्रण में पेलेट गन के उपयोग को चुनौती देने के लिए संबंधित कानूनी प्रावधानों को ‘अल्ट्रा वायर्स’ घोषित करने की आवश्यकता पर बल दिया है, जो अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने हाल ही में कहा है कि पेलेट गन के उपयोग को प्रतिबंधित करने की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं को पहले उन कानूनी प्रावधानों को चुनौती देनी होगी जो असाधारण भीड़ नियंत्रण स्थितियों में इनके उपयोग की अनुमति देते हैं। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि वह दुरुपयोग के विशिष्ट मामलों की जांच के लिए तैयार है। यह टिप्पणी पूर्व विशेष निदेशक यशोवर्धन आज़ाद और दो व्यक्तियों द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की गई, जिन्होंने कथित तौर पर पेलेट गन की चोटें झेली थीं, जिसमें ऐसी बंदूकों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गई थी।
पृष्ठभूमि
- याचिकाकर्ताओं ने नागरिक सभाओं के दौरान कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा भीड़ तितर-बितर करने के लिए पंप-एक्शन राइफलों या प्रोजेक्टाइल एक्शन गन (PAG) से दागे गए पेलेट सहित, पूर्ण या आंशिक रूप से धात्विक गतिज प्रक्षेप्य (kinetic projectiles) के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
- याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यद्यपि इन बंदूकों को आग्नेयास्त्रों के ‘कम घातक’ या ‘गैर-घातक’ विकल्प के रूप में वर्णित किया जाता है, लेकिन भीड़ पर करीब से फायरिंग करने से विशेष रूप से महत्वपूर्ण अंगों में घातक या गंभीर चोटें लग सकती हैं।
- उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के कानून प्रवर्तन में कम घातक हथियारों पर दिशानिर्देशों (United Nations Guidelines on Less Lethal Weapons in Law Enforcement) का हवाला दिया, जो भीड़ पर ऐसे हथियारों के उपयोग के खिलाफ चेतावनी देते हैं। ये दिशानिर्देश यह भी कहते हैं कि आंशिक या पूर्ण रूप से धात्विक पेलेट से भरी प्रोजेक्टाइल-एक्टिवेटेड गन या पेलेट गन का भीड़ नियंत्रण के लिए उपयोग ‘आवश्यकता, आनुपातिकता और तर्कसंगतता’ (necessity, proportionality, and reasonableness) के संवैधानिक परीक्षणों में विफल रहता है।
- याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील ने कहा कि पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (Bureau of Police Research and Development – BPRD) के एक दस्तावेज़ में, जो भीड़ नियंत्रण के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure – SOP) निर्धारित करता है, पेलेट गन के उपयोग को शामिल नहीं किया गया है। हालांकि, न्यायालय ने इस दस्तावेज़ को केवल एक ‘प्रस्ताव’ बताया।
पेलेट गन क्या हैं और इनका उपयोग क्यों विवादास्पद है?
- पेलेट गन एक प्रकार की बंदूक है जो छोटे, अक्सर धात्विक या रबर के छर्रे (pellets) दागती है, जिनका उपयोग आमतौर पर भीड़ नियंत्रण के लिए किया जाता है।
- इन्हें अक्सर ‘कम घातक’ या ‘गैर-घातक’ हथियार के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिसका अर्थ है कि इनका उद्देश्य घातक चोटों के बजाय दर्द या चोट पहुंचाना है ताकि भीड़ को तितर-बितर किया जा सके।
- विवाद का मुख्य कारण यह है कि करीब से या गलत तरीके से इस्तेमाल किए जाने पर पेलेट गंभीर चोटें, स्थायी विकलांगता (जैसे आंखों की रोशनी का नुकसान) या यहां तक कि मृत्यु का कारण बन सकते हैं।
- मानवाधिकार संगठनों और चिकित्सा विशेषज्ञों ने पेलेट गन के उपयोग पर चिंता व्यक्त की है, विशेष रूप से नागरिक विरोध प्रदर्शनों के दौरान, क्योंकि ये अक्सर अंधाधुंध तरीके से चोट पहुंचाते हैं।
- भारत में, पेलेट गन का उपयोग जम्मू-कश्मीर में भीड़ नियंत्रण के लिए व्यापक रूप से किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप कई नागरिक गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
- अनुच्छेद 21 (Article 21) ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ की गारंटी देता है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पेलेट गन का उपयोग इस मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, क्योंकि यह व्यक्तियों के जीवन और शारीरिक अखंडता को खतरे में डालता है।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की अवधारणा के तहत, न्यायालय किसी भी कानून या सरकारी कार्रवाई की संवैधानिक वैधता की जांच कर सकता है। इस मामले में, न्यायालय उन कानूनी प्रावधानों की समीक्षा कर सकता है जो पेलेट गन के उपयोग की अनुमति देते हैं, यह निर्धारित करने के लिए कि क्या वे अनुच्छेद 21 के ‘अल्ट्रा वायर्स’ (यानी, अधिकार क्षेत्र से बाहर) हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| छर्रे वाली बंदूकों का उपयोग | भीड़ नियंत्रण के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक ‘कम घातक’ हथियार। |
| कानूनी प्रावधानों को चुनौती | सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि छर्रे वाली बंदूकों पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए पहले इसके उपयोग की अनुमति देने वाले कानूनी प्रावधानों को चुनौती देनी होगी। |
| अनुच्छेद 21 का उल्लंघन | याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि छर्रे वाली बंदूकों का उपयोग जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है, खासकर जब नागरिक सभाओं के खिलाफ इस्तेमाल किया जाता है। |
| अवैध सभा और बल का प्रयोग | भीड़ को अवैध सभा घोषित करने, तितर-बितर करने की घोषणा करने और फिर उचित बल का प्रयोग करने की प्रक्रिया में छर्रे वाली बंदूकों का उपयोग शामिल है। |
| गोला-बारूद लॉग का संरक्षण | सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को RAF कर्मियों के गोला-बारूद लॉग को संरक्षित करने का निर्देश दिया, जो जंतर-मंतर विरोध प्रदर्शनों के दौरान तैनात थे। |
महत्व
नागरिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार
- यह मामला नागरिक स्वतंत्रता (Civil Liberties) और मानवाधिकारों (Human Rights) के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण है, विशेषकर विरोध प्रदर्शनों के दौरान नागरिकों के खिलाफ बल के प्रयोग के संबंध में।
- यह राज्य की शक्ति और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।
कानून प्रवर्तन और भीड़ नियंत्रण
- यह कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा भीड़ नियंत्रण में ‘कम घातक’ हथियारों के उपयोग की वैधता और नैतिकता पर सवाल उठाता है।
- यह पुलिस बल के मानकीकृत संचालन प्रक्रियाओं (Standard Operating Procedures – SOPs) की समीक्षा और अद्यतन करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
न्यायिक समीक्षा और संवैधानिक मूल्य
- सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के महत्व को दर्शाती है, जहाँ न्यायालय यह जांच कर सकता है कि क्या कोई कानूनी प्रावधान संविधान के अनुरूप है।
- यह संवैधानिक मूल्यों, विशेषकर जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका को मजबूत करता है।
चुनौतियाँ
1. छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग की वैधता
- वर्तमान में, कुछ पुलिस नियमों में छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग की अनुमति है, लेकिन याचिकाकर्ता इन प्रावधानों को चुनौती दे रहे हैं।
- यह चुनौती इस बात पर केंद्रित है कि क्या ये प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करते हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, मौलिक अधिकार
2. भीड़ नियंत्रण में अत्यधिक बल का प्रयोग
- याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि छर्रे वाली बंदूकों को ‘कम घातक’ बताया जाता है, लेकिन भीड़ पर करीब से चलाने पर वे गंभीर या घातक चोटें पहुंचा सकती हैं।
- यह मुद्दा कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा भीड़ नियंत्रण के दौरान बल के आनुपातिकता (Proportionality) और आवश्यकता (Necessity) से संबंधित है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा, मानवाधिकार
3. मानकीकृत संचालन प्रक्रियाओं (SOPs) का अभाव/स्पष्टता
- याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि पुलिस अनुसंधान और विकास ब्यूरो (Bureau of Police Research and Development – BPRD) के SOPs में छर्रे वाली बंदूकों का उपयोग शामिल नहीं है, जबकि न्यायालय ने इसे ‘प्रस्ताव’ बताया।
- यह भीड़ नियंत्रण के लिए स्पष्ट और सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत SOPs की आवश्यकता को दर्शाता है।
यूपीएससी लिंक: शासन, पुलिस सुधार
4. जवाबदेही और पारदर्शिता
- सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गोला-बारूद लॉग को संरक्षित करने का निर्देश कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक कदम है।
- यह बल के उपयोग के प्रत्येक मामले की उचित जांच और दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने के महत्व पर जोर देता है।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| छर्रे वाली बंदूकों से चोटें | नागरिकों को गंभीर और घातक चोटें, विशेषकर महत्वपूर्ण अंगों को, जो अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। |
| कानूनी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता | छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग की अनुमति देने वाले नियमों की संवैधानिक वैधता पर सवाल, क्या वे अनुच्छेद 21 के ‘अल्ट्रा वायर्स’ हैं। |
| अंतर्राष्ट्रीय दिशानिर्देशों का उल्लंघन | संयुक्त राष्ट्र के ‘कम घातक हथियारों पर दिशानिर्देश’ भीड़ पर ऐसे हथियारों के उपयोग के खिलाफ चेतावनी देते हैं, जो ‘आवश्यकता, आनुपातिकता और तर्कसंगतता’ के संवैधानिक परीक्षणों में विफल रहते हैं। |
| पुलिस SOPs में अस्पष्टता | भीड़ नियंत्रण के लिए छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग के संबंध में पुलिस SOPs की स्पष्टता और बाध्यकारी प्रकृति पर विवाद। |
| जवाबदेही की कमी | बल के दुरुपयोग के मामलों में कानून प्रवर्तन कर्मियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने में चुनौतियाँ। |
आगे की राह
- छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग की अनुमति देने वाले कानूनी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की गहन न्यायिक समीक्षा की जाए।
- भीड़ नियंत्रण के लिए ‘कम घातक’ हथियारों के उपयोग पर स्पष्ट और व्यापक राष्ट्रीय SOPs विकसित किए जाएं, जो अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप हों।
- कानून प्रवर्तन कर्मियों को भीड़ नियंत्रण के लिए वैकल्पिक, गैर-घातक तरीकों में व्यापक प्रशिक्षण प्रदान किया जाए।
- बल के उपयोग के सभी मामलों में, विशेषकर जहाँ चोटें आई हों, त्वरित, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित की जाए।
- नागरिकों के मौलिक अधिकारों, विशेषकर जीवन के अधिकार और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सम्मान सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए।
- छर्रे वाली बंदूकों जैसे हथियारों के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के विकल्पों पर विचार किया जाए और उनके स्थान पर अधिक मानवीय विकल्प तलाशे जाएं।
- कानून प्रवर्तन एजेंसियों में जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए गोला-बारूद लॉग और घटना रिपोर्टिंग का सख्त रखरखाव सुनिश्चित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
छर्रे वाली बंदूकें · भीड़ नियंत्रण · अनुच्छेद 21 · जीवन का अधिकार · अल्ट्रा वायर्स · आवश्यकता का सिद्धांत · आनुपातिकता का सिद्धांत · युक्तियुक्तता का सिद्धांत · संयुक्त राष्ट्र दिशानिर्देश · पुलिस विनियमन · कानून प्रवर्तन · मानव अधिकार
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
अवधारणा प्रवाह
नागरिक विरोध प्रदर्शन → कानून प्रवर्तन द्वारा भीड़ नियंत्रण → छर्रे वाली बंदूकों का उपयोग → नागरिकों को गंभीर चोटें/मृत्यु → अनुच्छेद 21 का संभावित उल्लंघन → सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी चुनौती → कानूनी प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की जांच
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में कहा है कि छर्रे वाली बंदूकों का उपयोग तब तक कानूनी है जब तक कि इसके उपयोग की अनुमति देने वाले नियमों को असंवैधानिक घोषित नहीं किया जाता।
2. याचिकाकर्ताओं ने भीड़ नियंत्रण के लिए छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की है।
3. संयुक्त राष्ट्र दिशानिर्देश कानून प्रवर्तन में ‘कम घातक’ हथियारों के रूप में छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग का समर्थन करते हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने यही बात कही है। कथन 2 भी सही है क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने पूर्ण प्रतिबंध की मांग की है। कथन 3 गलत है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र दिशानिर्देश भीड़ पर ऐसे हथियारों के उपयोग के खिलाफ चेतावनी देते हैं और इसे आवश्यकता, आनुपातिकता और युक्तियुक्तता के संवैधानिक परीक्षणों में विफल मानते हैं।
Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं से कहा है कि यदि वे छर्रे वाली बंदूकों पर प्रतिबंध चाहते हैं, तो उन्हें उन कानूनी प्रावधानों को चुनौती देनी होगी जो उनके उपयोग की अनुमति देते हैं।
कारण (R): न्यायालय का मानना है कि पुलिस विनियम असाधारण भीड़ नियंत्रण स्थितियों में छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग की अनुमति देते हैं, और इन प्रावधानों को अनुच्छेद 21 के ‘अल्ट्रा वायर्स’ के रूप में चुनौती दी जानी चाहिए।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) और कारण (R) दोनों सत्य हैं। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि कानूनी प्रावधानों को चुनौती देना आवश्यक है, और इसका कारण यह है कि पुलिस विनियम कुछ स्थितियों में इनके उपयोग की अनुमति देते हैं, जिन्हें अनुच्छेद 21 के तहत चुनौती दी जा सकती है। इसलिए, R, A की सही व्याख्या है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भीड़ नियंत्रण के लिए छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया रुख का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस संदर्भ में, अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार और कानून प्रवर्तन में बल के उपयोग से संबंधित संवैधानिक सिद्धांतों की व्याख्या कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय का संक्षिप्त उल्लेख, जिसमें कहा गया है कि छर्रे वाली बंदूकों का उपयोग तब तक कानूनी है जब तक कि नियमों को असंवैधानिक घोषित नहीं किया जाता।
2. सर्वोच्च न्यायालय का रुख: याचिकाकर्ताओं को उन कानूनी प्रावधानों को चुनौती देने की आवश्यकता पर न्यायालय के जोर पर चर्चा करें जो छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग की अनुमति देते हैं (जैसे पुलिस विनियम)। ‘अल्ट्रा वायर्स’ और अनुच्छेद 21 के संदर्भ में चुनौती की आवश्यकता को उजागर करें।
3. याचिकाकर्ताओं के तर्क: याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए मुख्य बिंदुओं को शामिल करें, जैसे कि ‘कम घातक’ होने के बावजूद गंभीर चोटें या घातक परिणाम, विशेष रूप से महत्वपूर्ण अंगों पर। साहिल लोछब जैसे पीड़ितों का उल्लेख करें।
4. संवैधानिक सिद्धांत और अनुच्छेद 21: जीवन के अधिकार (अनुच्छेद 21) के दायरे और महत्व की व्याख्या करें। बल के उपयोग के संबंध में ‘आवश्यकता’, ‘आनुपातिकता’ और ‘युक्तियुक्तता’ के सिद्धांतों को विस्तार से समझाएं, और बताएं कि कैसे छर्रे वाली बंदूकों का उपयोग इन परीक्षणों में विफल हो सकता है (संयुक्त राष्ट्र दिशानिर्देशों का संदर्भ)।
5. पुलिस प्रक्रियाएं: ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BPRD) द्वारा निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) में छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग की स्थिति पर चर्चा करें, और न्यायालय की टिप्पणी कि यह ‘एक प्रस्ताव’ है।
6. समालोचनात्मक विश्लेषण: छर्रे वाली बंदूकों के उपयोग के पक्ष और विपक्ष में तर्कों का संतुलन प्रस्तुत करें। एक ओर, कानून और व्यवस्था बनाए रखने की आवश्यकता; दूसरी ओर, नागरिकों के मानवाधिकारों और शारीरिक अखंडता की सुरक्षा।
7. निष्कर्ष: एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जो नागरिकों के अधिकारों और राज्य की सुरक्षा जिम्मेदारियों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर दे, और भविष्य में इस मुद्दे पर संभावित कानूनी विकास का संकेत दे।
स्रोत: The Indian Express
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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