सुप्रीम कोर्ट में सीबीएसई की खाड़ी नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट में सीबीएसई की खाड़ी नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई — सुप्रीम कोर्ट में सीबीएसई की खाड़ी देशों के छात्रों के मूल्यांकन नीति को चुनौती द

सुप्रीम कोर्ट में सीबीएसई की खाड़ी नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, शासन और सामाजिक न्याय  |  GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आंतरिक सुरक्षा
  • Prelims: CBSE, सर्वोच्च न्यायालय, न्यायिक समीक्षा, अनुच्छेद 32, शिक्षा नीति, खाड़ी देश
  • Essay: शिक्षा का अधिकार और न्यायपालिका की भूमिका, आपदा और शिक्षा: चुनौतियाँ एवं समाधान

त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय CBSE की उस मूल्यांकन नीति की न्यायिक समीक्षा कर रहा है, जिसे खाड़ी देशों में ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण रद्द की गई कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाओं के लिए लागू किया गया था, क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने इसे अनुचित और भेदभावपूर्ण बताया है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) CBSE की उस मूल्यांकन नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जो खाड़ी देशों में नियमित कक्षा 12 के छात्रों के लिए 27 मार्च को जारी की गई थी। इन छात्रों की बोर्ड परीक्षाएँ ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण रद्द कर दी गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने इस नीति को अनुचित और भेदभावपूर्ण बताते हुए इसे रद्द करने या संशोधित करने की मांग की है।

पृष्ठभूमि

  • ईरान-अमेरिका संघर्ष के कारण CBSE ने सात पश्चिम एशियाई देशों (बहरीन, ईरान, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब और UAE) में कक्षा 12 की बोर्ड परीक्षाएँ रद्द कर दी थीं।
  • परीक्षाएँ रद्द होने के बाद, CBSE ने नियमित छात्रों के लिए 27 मार्च को एक मूल्यांकन योजना अधिसूचित की, जिसमें आंतरिक मूल्यांकन (internal assessment) के अंकों को आधार बनाया गया था।
  • खाड़ी देशों के 30 छात्रों ने इस मूल्यांकन योजना को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है, जिसमें इसे अनुचित और भेदभावपूर्ण बताया गया है।
  • एक अलग याचिका में, निजी उम्मीदवारों के लिए 21 जून को अधिसूचित मूल्यांकन फार्मूले को भी चुनौती दी गई है। निजी उम्मीदवारों के पास नियमित छात्रों की तरह स्कूल-आधारित आंतरिक मूल्यांकन रिकॉर्ड नहीं होते हैं।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र और CBSE को नोटिस जारी कर इस मामले पर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
  • याचिकाकर्ताओं ने CBSE से एक निष्पक्ष, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण मूल्यांकन तंत्र अपनाने, विशेष नई परीक्षा और विशेष सुधार परीक्षा आयोजित करने की मांग की है।

CBSE और न्यायिक समीक्षा

  • CBSE (Central Board of Secondary Education) भारत में स्कूली शिक्षा के लिए एक प्रमुख बोर्ड है, जो संबद्ध स्कूलों में परीक्षाएँ आयोजित करता है और पाठ्यक्रम निर्धारित करता है।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) भारतीय संविधान की एक मूलभूत विशेषता है, जिसके तहत न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका द्वारा बनाए गए कानूनों और नीतियों की संवैधानिकता की जाँच करती है।
  • भारत में न्यायिक समीक्षा का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को प्राप्त है। यह संविधान के अनुच्छेद 13, 32, 226 और 227 के तहत निहित है।
  • जब कोई व्यक्ति या समूह किसी सरकारी नीति या कानून को अपने मौलिक अधिकारों का उल्लंघन मानता है या उसे मनमाना, अनुचित या भेदभावपूर्ण पाता है, तो वह न्यायिक समीक्षा के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
  • वर्तमान मामले में, छात्र CBSE की मूल्यांकन नीति को चुनौती दे रहे हैं, यह तर्क देते हुए कि यह उनके शिक्षा के अधिकार (Right to Education) और समानता के अधिकार (Right to Equality) का उल्लंघन करती है।
  • न्यायालय यह निर्धारित करेगा कि क्या CBSE की नीति संवैधानिक प्रावधानों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
CBSE की मूल्यांकन नीति खाड़ी देशों में कक्षा 12 के छात्रों के लिए परीक्षा रद्द होने के बाद अंक निर्धारण का आधार।
नियमित छात्रों की नीति (27 मार्च) स्कूल-आधारित आंतरिक मूल्यांकन (आवधिक परीक्षण, अर्ध-वार्षिक परीक्षा, प्री-बोर्ड) पर आधारित।
निजी छात्रों की नीति (21 जून) कक्षा 10 बोर्ड परीक्षा के सैद्धांतिक अंकों का 40% और कक्षा 12 के अंतिम प्रयास के सैद्धांतिक अंकों का 60%।
सर्वोच्च न्यायालय में याचिका छात्रों द्वारा मूल्यांकन नीति को अनुचित और भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती।
ईरान-अमेरिका संघर्ष खाड़ी देशों में बोर्ड परीक्षाओं को रद्द करने का मूल कारण।

महत्व

सामाजिक महत्व

  • यह मामला खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीय छात्रों के भविष्य और शैक्षिक अवसरों को सीधे प्रभावित करता है।
  • यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सभी छात्रों को, चाहे वे कहीं भी हों, एक निष्पक्ष और समान मूल्यांकन प्रणाली मिले।

शैक्षिक महत्व

  • यह मुद्दा CBSE जैसी राष्ट्रीय शिक्षा बोर्डों की मूल्यांकन नीतियों की पारदर्शिता और गैर-भेदभावपूर्ण प्रकृति पर सवाल उठाता है।
  • यह शिक्षा प्रणाली में आकस्मिक परिस्थितियों (जैसे संघर्ष या महामारी) के दौरान लचीलेपन और अनुकूलनशीलता की आवश्यकता को उजागर करता है।

न्यायिक महत्व

  • सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के सिद्धांत को दर्शाती है, जहाँ कार्यपालिका या नियामक निकायों द्वारा बनाई गई नीतियों की संवैधानिकता और निष्पक्षता की जाँच की जाती है।
  • यह मामला न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करता है कि वह नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे और प्रशासन में निष्पक्षता सुनिश्चित करे।

चुनौतियाँ

1. मूल्यांकन में असमानता

  • नियमित और निजी छात्रों के लिए अलग-अलग मूल्यांकन मानदंड, विशेषकर आंतरिक मूल्यांकन डेटा की अनुपलब्धता के कारण, भेदभावपूर्ण प्रतीत होते हैं।
  • यह छात्रों के बीच असमानता की भावना पैदा करता है और उनके भविष्य के शैक्षिक और व्यावसायिक अवसरों को प्रभावित कर सकता है।

2. पारदर्शिता और निष्पक्षता का अभाव

  • छात्रों का आरोप है कि वर्तमान मूल्यांकन योजना निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं है, जिससे उनके अंकों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • एक स्पष्ट और समझने योग्य मूल्यांकन प्रक्रिया की कमी छात्रों और अभिभावकों में अविश्वास पैदा करती है।

3. विशेष परीक्षा की आवश्यकता

  • छात्रों की मांग है कि उन्हें विशेष नई परीक्षा (Special Fresh Examination) और विशेष सुधार परीक्षा (Special Improvement Examination) में बैठने का अवसर दिया जाए, ताकि वे अपने प्रदर्शन में सुधार कर सकें।
  • विषयों की संख्या पर प्रतिबंध के बिना परीक्षा देने और बेहतर स्कोर को बनाए रखने की अनुमति न देना छात्रों के लिए एक बड़ी चुनौती है।

4. अप्रत्याशित परिस्थितियों का प्रबंधन

  • क्षेत्रीय संघर्षों या अन्य अप्रत्याशित घटनाओं के कारण परीक्षा रद्द होने की स्थिति में एक मजबूत और न्यायसंगत आकस्मिक योजना की कमी।
  • ऐसी स्थितियों में छात्रों के शैक्षिक भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए पूर्व-निर्धारित और लचीली नीतियां आवश्यक हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
नियमित बनाम निजी छात्र मूल्यांकन आंतरिक मूल्यांकन डेटा की उपलब्धता के आधार पर अलग-अलग मानदंड, जिससे निजी छात्रों को नुकसान।
मूल्यांकन योजना की निष्पक्षता छात्रों का मानना है कि मार्च 27 की योजना अनुचित और भेदभावपूर्ण है, जिससे उनके अंकों पर असर पड़ सकता है।
पारदर्शिता का अभाव स्पष्ट और समझने योग्य मूल्यांकन तंत्र की कमी से छात्रों में असंतोष।
विशेष परीक्षा का अवसर छात्रों को अपने प्रदर्शन में सुधार के लिए विशेष परीक्षा देने की अनुमति न मिलना।
संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों के छात्र खाड़ी देशों में संघर्ष के कारण परीक्षा रद्द होने से छात्रों के भविष्य पर अनिश्चितता।

आगे की राह

  • CBSE को एक समान, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण मूल्यांकन तंत्र विकसित करना चाहिए जो सभी छात्रों पर समान रूप से लागू हो।
  • नियमित और निजी छात्रों के लिए मूल्यांकन में समानता सुनिश्चित करने हेतु वैकल्पिक मूल्यांकन विधियों पर विचार किया जाना चाहिए।
  • छात्रों को विशेष नई परीक्षा और विशेष सुधार परीक्षा में बैठने का अवसर प्रदान किया जाना चाहिए, जिसमें विषयों की संख्या पर कोई प्रतिबंध न हो।
  • छात्रों को दोनों परीक्षाओं में से बेहतर अंक बनाए रखने का विकल्प दिया जाना चाहिए ताकि उनके हितों की रक्षा हो सके।
  • भविष्य में ऐसी अप्रत्याशित परिस्थितियों के लिए एक स्पष्ट और पूर्व-निर्धारित आकस्मिक मूल्यांकन नीति तैयार की जानी चाहिए।
  • नीति निर्माण प्रक्रिया में छात्रों और अभिभावकों के प्रतिनिधियों को शामिल कर उनकी चिंताओं को दूर किया जाना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

CBSE मूल्यांकन नीति · गल्फ छात्र · न्यायिक समीक्षा · समानता का अधिकार · भेदभाव रहित मूल्यांकन · शिक्षा का अधिकार · प्राकृतिक न्याय · संविधान का अनुच्छेद 14

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता
  • अनुच्छेद 21A: शिक्षा का अधिकार

अवधारणा प्रवाह

खाड़ी देशों में संघर्ष के कारण CBSE कक्षा 12 की परीक्षा रद्द।  →  CBSE द्वारा नियमित और निजी छात्रों के लिए अलग-अलग मूल्यांकन नीतियां जारी।  →  छात्रों द्वारा मूल्यांकन नीतियों को अनुचित और भेदभावपूर्ण बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका।  →  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा केंद्र और CBSE को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।  →  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यायिक समीक्षा के माध्यम से छात्रों के अधिकारों और नीति की निष्पक्षता की जांच।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 14 समानता के अधिकार से संबंधित है।
2. सर्वोच्च न्यायालय न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग केवल केंद्र सरकार के कानूनों पर कर सकता है, राज्य सरकारों के कानूनों पर नहीं।
3. CBSE एक स्वायत्त निकाय है जो भारत में माध्यमिक शिक्षा के लिए नीतियां बनाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 3 — कथन 1 सही है क्योंकि अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण का प्रावधान करता है। कथन 2 गलत है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के कानूनों की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कर सकता है। कथन 3 सही है क्योंकि CBSE भारत में माध्यमिक शिक्षा के लिए नीतियां और पाठ्यक्रम निर्धारित करने वाला एक प्रमुख बोर्ड है।

Q2. हाल ही में समाचारों में रही CBSE की गल्फ छात्रों के लिए मूल्यांकन नीति का मुद्दा निम्नलिखित में से किस अधिकार से संबंधित है?

  1. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  2. स्वतंत्रता का अधिकार
  3. समानता का अधिकार
  4. संवैधानिक उपचारों का अधिकार

उत्तर: समानता का अधिकार — यह मुद्दा मुख्य रूप से समानता के अधिकार (Right to Equality) से संबंधित है, क्योंकि छात्रों ने मूल्यांकन नीति को ‘अनुचित और भेदभावपूर्ण’ बताया है। वे एक निष्पक्ष, पारदर्शी और गैर-भेदभावपूर्ण मूल्यांकन तंत्र की मांग कर रहे हैं, जो अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन न करे।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ CBSE द्वारा गल्फ देशों में 12वीं कक्षा के छात्रों के लिए अपनाई गई मूल्यांकन नीति पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया हस्तक्षेप के आलोक में, भारत में शिक्षा के अधिकार और न्यायिक समीक्षा के महत्व पर चर्चा कीजिए। क्या ऐसी नीतियां छात्रों के समानता के अधिकार का उल्लंघन करती हैं? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (250 शब्द)

रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में, शिक्षा के अधिकार (Right to Education) के संवैधानिक प्रावधानों और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की अवधारणा को संक्षेप में समझाएं। दूसरे भाग में, CBSE की मूल्यांकन नीति के विशिष्ट संदर्भ में छात्रों के समानता के अधिकार (Right to Equality) के संभावित उल्लंघन पर चर्चा करें। बताएं कि कैसे सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है कि प्रशासनिक नीतियां संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करें। नीति के ‘अनुचित और भेदभावपूर्ण’ होने के तर्कों का विश्लेषण करें और न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता को उजागर करें।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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