हिमाचल में नदियों से रेत-बजरी निकालने पर सरकार ने लगाई रोक, जानिए नए नियम

हिमाचल: बिजली परियोजनाओं की कंपनियां अब मनमाने ढंग से नहीं निकाल सकेंगी नदी से रेत-बजरी, सरकार सख्त — labelled illustration

हिमाचल में नदियों से रेत-बजरी निकालने पर सरकार ने लगाई रोक, जानिए नए नियम

✎ हिमाचल प्रदेश सरकार जलविद्युत परियोजनाओं द्वारा नदी से रेत-बजरी खनन पर सख्त नियंत्रण लागू कर रही है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार और पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सके।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भूगोल (भारत एवं विश्व का भौतिक, सामाजिक, आर्थिक भूगोल)  |  GS Paper III — पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन, अर्थव्यवस्था (बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा)  |  GS Paper II — शासन, पारदर्शिता एवं जवाबदेही (सरकारी नीतियाँ एवं हस्तक्षेप)
  • Prelims: खनन सामग्री पर राज्य का अधिकार, जलविद्युत परियोजनाएँ, नदी बेसिन प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, खनिज रियायत नियम
  • Essay: प्राकृतिक संसाधनों का सतत प्रबंधन और विकास, राज्य के अधिकार और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: हिमाचल प्रदेश सरकार जलविद्युत परियोजनाओं द्वारा नदी से रेत-बजरी खनन पर सख्त नियंत्रण लागू कर रही है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार और पर्यावरण संरक्षण को सुनिश्चित किया जा सके।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

हिमाचल प्रदेश सरकार ने जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ी कंपनियों द्वारा नदियों से रेत-बजरी और अन्य खनन सामग्री निकालने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने का निर्णय लिया है। अब ये कंपनियाँ सरकार की अनुमति के बिना अपने स्तर पर खनन के लिए निविदाएँ जारी नहीं कर सकेंगी, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार को प्रमुखता दी जा सके।

पृष्ठभूमि

  • हिमाचल प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाएँ बड़ी संख्या में संचालित हैं या निर्माणाधीन हैं, जिनमें निजी, केंद्रीय और अन्य संस्थाएँ शामिल हैं।
  • इन परियोजनाओं को भूमि विभिन्न शर्तों के तहत उपलब्ध कराई जाती है, लेकिन इससे उन्हें नदी से रेत-बजरी निकालने का स्वतः अधिकार नहीं मिलता।
  • वर्तमान में, कुछ परियोजना संचालक अपने स्तर पर परियोजना क्षेत्र में उपलब्ध रेत-बजरी निकालने के लिए निविदाएँ जारी करते रहे हैं।
  • राज्य सरकार का मानना है कि नदियों से निकलने वाली खनन सामग्री पर राज्य का अधिकार है और इस प्रक्रिया को नियंत्रित किया जाना चाहिए।
  • मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने विधानसभा में नदियों से निकलने वाली खनन सामग्री और ड्रेजिंग के मुद्दे पर सरकार का रुख स्पष्ट किया था।
  • सतलुज और चिनाब नदी बेसिन हिमाचल प्रदेश में जलविद्युत परियोजनाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, जहाँ कई बड़ी परियोजनाएँ स्थित हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
नदी से रेत-बजरी खनन पर नियंत्रण जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ी कंपनियों द्वारा अनियंत्रित खनन पर रोक
सरकारी अनुमति अनिवार्य कंपनियों को खनन के लिए अब सरकार से अनुमति लेनी होगी, अपने स्तर पर टेंडर जारी नहीं कर सकेंगी
प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य का अधिकार राज्य सरकार हिमाचल के प्राकृतिक संसाधनों पर अपने अधिकार को प्रमुखता दे रही है
पर्यावरणीय स्थिरता अनियंत्रित खनन से होने वाले पर्यावरणीय क्षरण को रोकने में सहायक
राजस्व सृजन खनन सामग्री की निकासी के लिए सरकारी निविदा प्रक्रिया से राज्य के राजस्व में वृद्धि की संभावना

महत्व

पर्यावरणीय महत्व

  • नदी तल से अत्यधिक रेत और बजरी निकालने से नदी पारिस्थितिकी तंत्र (River Ecosystem) को गंभीर क्षति पहुँचती है, जिससे जलीय जीवन और नदी के प्राकृतिक प्रवाह पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  • यह कदम नदियों के कटाव (Erosion) को कम करने, भूजल स्तर (Groundwater Level) को बनाए रखने और नदी के किनारों की स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद करेगा।

आर्थिक महत्व

  • खनन सामग्री पर राज्य के अधिकार को पुनः स्थापित करने से अवैध खनन पर अंकुश लगेगा और राज्य के राजस्व में वृद्धि होगी।
  • सरकारी निविदा प्रक्रिया से पारदर्शिता बढ़ेगी और खनन क्षेत्र में उचित प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा।

शासन और नियामक महत्व

  • यह नीतिगत बदलाव प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में सरकार की भूमिका को मजबूत करता है और नियामक ढांचे को अधिक प्रभावी बनाता है।
  • यह सुनिश्चित करेगा कि विकास परियोजनाएं (Development Projects) पर्यावरणीय नियमों और संवहनीयता (Sustainability) के सिद्धांतों का पालन करें।

चुनौतियाँ

1. अवैध खनन पर नियंत्रण

  • नई व्यवस्था के बावजूद, अवैध खनन गतिविधियों पर प्रभावी ढंग से अंकुश लगाना एक चुनौती बनी रहेगी, जिसके लिए मजबूत निगरानी और प्रवर्तन तंत्र की आवश्यकता होगी।
  • दूरदराज के क्षेत्रों में खनन गतिविधियों की निगरानी करना और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करना मुश्किल हो सकता है।

2. परियोजनाओं में देरी

  • नई निविदा प्रक्रिया और अनुमति प्रणाली से जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में देरी हो सकती है, जिससे परियोजना लागत में वृद्धि और ऊर्जा उत्पादन लक्ष्यों पर असर पड़ सकता है।
  • अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया में नौकरशाही बाधाएँ (Bureaucratic Hurdles) उत्पन्न हो सकती हैं।

3. राजस्व का उचित उपयोग

  • खनन से प्राप्त राजस्व का प्रभावी ढंग से उपयोग सुनिश्चित करना एक चुनौती होगी, ताकि यह स्थानीय समुदायों और पर्यावरणीय संरक्षण में योगदान दे सके।
  • राजस्व के वितरण और उपयोग में पारदर्शिता बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।

4. पर्यावरणीय प्रभाव आकलन

  • खनन के पर्यावरणीय प्रभावों का सटीक आकलन करना और उसके आधार पर खनन की मात्रा और तरीकों को विनियमित करना एक जटिल कार्य है।
  • वैज्ञानिक डेटा और विशेषज्ञता की कमी एक बाधा बन सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
अवैध खनन नई नीति के बावजूद, अवैध खनन पर पूर्ण नियंत्रण सुनिश्चित करना मुश्किल हो सकता है।
परियोजनाओं में विलंब सरकारी अनुमति और निविदा प्रक्रियाओं से जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में देरी की संभावना।
प्रशासनिक जटिलताएँ अनुमति प्रक्रिया में नौकरशाही और पारदर्शिता की कमी से भ्रष्टाचार की आशंका।
पर्यावरणीय निगरानी खनन के पर्यावरणीय प्रभावों की प्रभावी निगरानी और शमन उपायों को लागू करने में चुनौतियाँ।
राजस्व का प्रबंधन खनन से प्राप्त राजस्व का स्थानीय विकास और पर्यावरणीय संरक्षण के लिए उचित उपयोग सुनिश्चित करना।

आगे की राह

  • एक मजबूत और पारदर्शी नियामक ढाँचा स्थापित करना जो खनन गतिविधियों की प्रभावी निगरानी और प्रवर्तन सुनिश्चित करे।
  • खनन के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment – EIA) को अनिवार्य बनाना और उसके आधार पर खनन योजनाओं को मंजूरी देना।
  • खनन से प्राप्त राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत स्थानीय समुदायों के विकास और पर्यावरणीय बहाली (Environmental Restoration) के लिए आवंटित करना।
  • खनन गतिविधियों की निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक जैसे ड्रोन और उपग्रह इमेजरी का उपयोग करना।
  • जलविद्युत परियोजना कंपनियों और सरकारी विभागों के बीच समन्वय बढ़ाना ताकि परियोजनाओं में अनावश्यक देरी न हो।
  • अवैध खनन के खिलाफ जन जागरूकता अभियान चलाना और स्थानीय समुदायों को निगरानी प्रक्रिया में शामिल करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन · जलविद्युत परियोजनाएँ · खनन विनियमन · राज्य का अधिकार · पर्यावरणीय प्रभाव आकलन · सतत विकास · संघवाद · राजकोषीय राजस्व · नदी पारिस्थितिकी · सार्वजनिक-निजी भागीदारी

अवधारणा प्रवाह

जलविद्युत परियोजनाओं द्वारा अनियंत्रित नदी खनन  →  नदी पारिस्थितिकी तंत्र और पर्यावरण को क्षति  →  राज्य सरकार द्वारा नीतिगत हस्तक्षेप और सख्ती  →  खनन के लिए सरकारी अनुमति और निविदा प्रक्रिया अनिवार्य  →  अवैध खनन पर नियंत्रण और पर्यावरणीय स्थिरता

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान के तहत, खनिज संसाधनों का स्वामित्व और विनियमन केवल केंद्र सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
2. जलविद्युत परियोजनाएं अक्सर नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर महत्वपूर्ण पर्यावरणीय प्रभाव डालती हैं।
3. राज्य सरकारें अपने क्षेत्र में खनन गतिविधियों को विनियमित करने के लिए कानून बना सकती हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। भारत में खनिज संसाधनों का स्वामित्व और विनियमन केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसमें राज्य सरकारें अपने क्षेत्र में खनिजों के विनियमन के लिए कानून बना सकती हैं। कथन 2 सही है। जलविद्युत परियोजनाएं बांध निर्माण और नदी के प्रवाह में बदलाव के कारण नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करती हैं। कथन 3 सही है। राज्य सरकारें अपने क्षेत्र में खनन गतिविधियों को विनियमित करने के लिए कानून बनाने की शक्ति रखती हैं, जैसा कि हिमाचल प्रदेश के मामले में देखा गया है।

Q2. भारत में ‘खनिज संसाधनों पर राज्य का अधिकार’ निम्नलिखित में से किस सिद्धांत को दर्शाता है?

  1. केंद्र सरकार का पूर्ण नियंत्रण
  2. राज्य सरकारों का अपने क्षेत्र में खनिजों के दोहन और विनियमन का अधिकार
  3. निजी कंपनियों का बिना किसी सरकारी हस्तक्षेप के खनन का अधिकार
  4. अंतर्राष्ट्रीय संधियों के तहत खनिजों का विनियमन

उत्तर: राज्य सरकारों का अपने क्षेत्र में खनिजों के दोहन और विनियमन का अधिकार — भारत में ‘खनिज संसाधनों पर राज्य का अधिकार’ इस सिद्धांत को दर्शाता है कि राज्य सरकारों को अपने भौगोलिक क्षेत्र के भीतर स्थित खनिज संसाधनों के दोहन, विनियमन और उनसे राजस्व प्राप्त करने का अधिकार है। यह संघवाद की भावना के अनुरूप है, जहां केंद्र और राज्य दोनों के पास विशिष्ट शक्तियां होती हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार के महत्व पर चर्चा करें, विशेष रूप से जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े खनन गतिविधियों के संदर्भ में। इस संदर्भ में, सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा सकने वाले कदमों का भी विश्लेषण करें। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार की अवधारणा को परिभाषित करें और इसके संवैधानिक आधार (जैसे सातवीं अनुसूची) का संक्षिप्त उल्लेख करें। हिमाचल प्रदेश के जलविद्युत परियोजनाओं से रेत-बजरी खनन के संदर्भ को स्थापित करें।
2. **प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार का महत्व:**
* **राजस्व सृजन:** राज्य के लिए आर्थिक स्वायत्तता और विकास परियोजनाओं के वित्तपोषण का स्रोत।
* **स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति:** स्थानीय समुदायों की जरूरतों और आकांक्षाओं के अनुरूप संसाधनों का प्रबंधन।
* **पर्यावरणीय संरक्षण:** स्थानीय पारिस्थितिकी और पर्यावरण के प्रति अधिक संवेदनशील विनियमन।
* **संघवाद का सुदृढ़ीकरण:** केंद्र-राज्य संबंधों में संतुलन बनाए रखना।
* **जवाबदेही:** स्थानीय स्तर पर बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित करना।
3. **जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े खनन के संदर्भ में:**
* **अनियंत्रित खनन के मुद्दे:** पर्यावरणीय क्षति (नदी के प्रवाह में बदलाव, कटाव), राजस्व हानि, अवैध खनन।
* **राज्य के हस्तक्षेप का औचित्य:** अनियंत्रित दोहन को रोकना, राजस्व को सुरक्षित करना, पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करना।
4. **सतत विकास सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा उठाए जा सकने वाले कदम:**
* **कठोर नियामक ढांचा:** स्पष्ट खनन नीतियां और नियम, जिसमें पर्यावरण मंजूरी, खनन योजना और पुनर्वास शामिल हों।
* **पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA):** परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का गहन मूल्यांकन और शमन उपाय।
* **राजस्व का उचित बंटवारा:** खनन से प्राप्त राजस्व का स्थानीय समुदायों और पर्यावरणीय बहाली में निवेश।
* **प्रौद्योगिकी का उपयोग:** अवैध खनन की निगरानी के लिए ड्रोन, उपग्रह इमेजरी जैसी तकनीकों का उपयोग।
* **सामुदायिक भागीदारी:** स्थानीय समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना।
* **पुनर्वनरोपण और पारिस्थितिक बहाली:** खनन प्रभावित क्षेत्रों का पुनर्वास।
* **पारदर्शिता और जवाबदेही:** निविदा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना।
5. **निष्कर्ष:** प्राकृतिक संसाधनों पर राज्य के अधिकार को मान्यता देते हुए, सतत विकास के सिद्धांतों के साथ इसे संतुलित करने की आवश्यकता पर बल दें, ताकि आर्थिक लाभ के साथ-साथ पर्यावरणीय और सामाजिक कल्याण भी सुनिश्चित हो सके।

स्रोत: amarujala.com

Himachal Pradesh PCS (HPPSC (HAS)) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में लागू किए गए नियमों के अनुसार, बिजली परियोजनाओं की कंपनियों द्वारा नदी से रेत-बजरी निकालने पर क्या प्रतिबंध लगाया गया है?

  1. A. मनमाने ढंग से निकासी की अनुमति नहीं होगी, सरकारी अनुमति अनिवार्य होगी
  2. B. केवल सरकारी कंपनियां ही रेत-बजरी निकाल सकेंगी
  3. C. नदी से रेत-बजरी निकालने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है
  4. D. बिजली परियोजनाओं को रेत-बजरी निकालने के लिए अतिरिक्त कर देना होगा

उत्तर: A. मनमाने ढंग से निकासी की अनुमति नहीं होगी, सरकारी अनुमति अनिवार्य होगी — नई नियमावली के तहत बिजली परियोजनाओं की कंपनियों को नदी से रेत-बजरी निकालने के लिए सरकार से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि मनमाने ढंग से निकासी पर रोक लग सके।

Mains: हिमाचल प्रदेश में बिजली परियोजनाओं की कंपनियों द्वारा नदी से रेत-बजरी निकालने के संदर्भ में राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का वर्णन कीजिए। इसके साथ ही, इन कदमों के सकारात्मक एवं नकारात्मक प्रभावों पर प्रकाश डालिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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