अल्लाहाबाद उच्च न्यायालय: वयस्क व्यक्ति को धर्म एवं जीवनसाथी चुनने का अधिकार

‘Brainwashed into Islam’: Father’s claim fails to sway Allahabad High Court — labelled illustration

अल्लाहाबाद उच्च न्यायालय: वयस्क व्यक्ति को धर्म एवं जीवनसाथी चुनने का अधिकार

✎ इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दोहराया कि एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म चुनने और जीवन साथी का चयन करने का संवैधानिक अधिकार है, जिसे पारिवारिक आपत्तियाँ ओवरराइड नहीं कर सकतीं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, मौलिक अधिकार, न्यायपालिका की संरचना और कार्यप्रणाली  |  GS Paper I — भारतीय समाज: धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक सशक्तिकरण
  • Prelims: अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 25, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, हैबियस कॉर्पस, धर्मांतरण विरोधी कानून, उच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार, वयस्क की स्वायत्तता
  • Essay: व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम पारिवारिक मूल्य, धर्मनिरपेक्षता और भारतीय समाज में इसकी प्रासंगिकता

त्वरित पुनरावृत्ति: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दोहराया कि एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म चुनने और जीवन साथी का चयन करने का संवैधानिक अधिकार है, जिसे पारिवारिक आपत्तियाँ ओवरराइड नहीं कर सकतीं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में फैसला सुनाया कि एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म चुनने और जीवन साथी का चयन करने का अधिकार है। न्यायालय ने यह भी कहा कि किसी वयस्क व्यक्ति की संवैधानिक रूप से संरक्षित स्वायत्तता को पारिवारिक चिंताएँ या आपत्तियाँ ओवरराइड नहीं कर सकतीं। यह निर्णय एक पिता द्वारा दायर याचिका के संदर्भ में आया था, जिसमें उसने अपने बेटे के धर्म परिवर्तन और विवाह को चुनौती दी थी।

पृष्ठभूमि

  • एक पिता ने अपने बेटे आयुष मलिक के कथित अवैध धर्मांतरण और मुस्लिम महिला से शादी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी।
  • पिता ने आरोप लगाया कि उसके बेटे को ‘गुमराह’ किया गया है और उसने स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन नहीं किया है।
  • बेटे आयुष मलिक ने न्यायालय को बताया कि वह 31 वर्ष का है, बी.फार्मा तक शिक्षित है और उसने 2014 में स्वेच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया था।
  • उसने यह भी बताया कि उसने चांदनी कुरैशी से शादी करने का फैसला किया है और उसके माता-पिता को यह स्वीकार्य नहीं है।
  • बेटे के अनुसार, उसके इस निर्णय के कारण चांदनी और उसके परिवार के खिलाफ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम (UP Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act) के तहत FIR दर्ज की गई थी।
  • न्यायालय ने हैबियस कॉर्पस (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए आयुष को अदालत में पेश करने का निर्देश दिया था।
  • न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म चुनने और जीवन साथी चुनने का पूर्ण अधिकार है, और यह अधिकार संवैधानिक रूप से संरक्षित है।

भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वायत्तता

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है।
  • यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों के अधीन है।
  • अनुच्छेद 21 ‘प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के संरक्षण’ का अधिकार प्रदान करता है, जिसमें व्यक्तिगत स्वायत्तता और अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने का अधिकार भी शामिल है।
  • उच्चतम न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि एक वयस्क व्यक्ति को अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार है, जिसमें धर्म और विवाह का चुनाव शामिल है।
  • हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) एक रिट है जो अदालत द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति को पेश करने के लिए जारी की जाती है जिसे हिरासत में लिया गया है, ताकि हिरासत की वैधता की जांच की जा सके।
  • धर्मांतरण विरोधी कानून विभिन्न राज्यों में लागू हैं, जिनका उद्देश्य बलपूर्वक, धोखाधड़ी या प्रलोभन द्वारा किए गए धर्मांतरण को रोकना है। हालांकि, ये कानून स्वेच्छा से किए गए धर्मांतरण पर लागू नहीं होते।
  • न्यायपालिका ऐसे मामलों में व्यक्तियों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, विशेषकर जब पारिवारिक या सामाजिक दबाव के कारण इन अधिकारों का उल्लंघन होता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
वयस्क व्यक्ति की स्वायत्तता संविधान द्वारा संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निर्णय लेने का अधिकार।
धर्म चुनने का अधिकार भारत के संविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का धर्म अपनाने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता।
जीवन साथी चुनने का अधिकार एक वयस्क व्यक्ति का मौलिक अधिकार जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के दायरे में आता है।
परिवार की चिंता बनाम संवैधानिक अधिकार पारिवारिक संबंध में व्यक्त की गई चिंता संवैधानिक रूप से संरक्षित व्यक्तिगत स्वायत्तता का स्थान नहीं ले सकती।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका अवैध हिरासत के खिलाफ दायर की जाने वाली एक महत्वपूर्ण न्यायिक रिट, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करती है।

महत्व

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकार

  • यह निर्णय भारत के संविधान के तहत प्रत्येक वयस्क नागरिक को प्राप्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से धर्म की स्वतंत्रता और जीवन साथी चुनने के अधिकार को रेखांकित करता है।
  • यह न्यायिक निर्णय स्थापित करता है कि परिवार की चिंताएं या सामाजिक दबाव किसी वयस्क व्यक्ति के संवैधानिक रूप से संरक्षित अधिकारों को कमजोर नहीं कर सकते हैं।
  • यह मामला व्यक्तिगत स्वायत्तता (Autonomy) के सिद्धांत को मजबूत करता है, जिसके अनुसार एक वयस्क व्यक्ति अपने जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।

न्यायिक समीक्षा और संवैधानिक मूल्य

  • उच्च न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य और निजी व्यक्तियों द्वारा संभावित अवैध हिरासत से नागरिकों की रक्षा में न्यायपालिका की भूमिका पर जोर दिया।
  • यह निर्णय संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को बनाए रखता है, यह सुनिश्चित करता है कि राज्य या अन्य संस्थाएं किसी व्यक्ति के धार्मिक विकल्पों में हस्तक्षेप न करें।
  • यह दर्शाता है कि न्यायपालिका किस प्रकार संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करती है, व्यक्तिगत अधिकारों और राज्य के कानूनों के बीच संतुलन स्थापित करती है।

सामाजिक-कानूनी निहितार्थ

  • यह निर्णय अंतर-धार्मिक विवाहों और धर्मांतरण से संबंधित मामलों में कानूनी स्पष्टता प्रदान करता है, विशेष रूप से ‘लव जिहाद’ जैसे आरोपों के संदर्भ में।
  • यह उन कानूनों के अनुप्रयोग को प्रभावित कर सकता है जो ‘गैरकानूनी धर्मांतरण’ को प्रतिबंधित करते हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन न करें।
  • यह समाज में व्यक्तिगत पसंद और पारिवारिक अपेक्षाओं के बीच चल रहे तनाव को उजागर करता है और न्यायपालिका की भूमिका को ऐसे विवादों को संवैधानिक ढांचे के भीतर हल करने में महत्वपूर्ण बनाता है।

चुनौतियाँ

1. व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम पारिवारिक अपेक्षाएँ

  • भारत में, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक सम्मान/परंपराओं के बीच अक्सर टकराव होता है, खासकर विवाह और धर्म जैसे संवेदनशील मामलों में।
  • परिवार अक्सर अपने सदस्यों के निर्णयों पर सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव डालते हैं, जिससे व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।

2. धर्मांतरण विरोधी कानून का दुरुपयोग

  • कुछ राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून हैं, जिनका उद्देश्य जबरन धर्मांतरण को रोकना है, लेकिन कभी-कभी इनका उपयोग स्वेच्छा से धर्मांतरण करने वाले व्यक्तियों को परेशान करने के लिए किया जाता है।
  • इन कानूनों की व्याख्या और अनुप्रयोग में अक्सर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राज्य के हस्तक्षेप के बीच एक नाजुक संतुलन की आवश्यकता होती है।

3. न्यायिक सक्रियता और व्यक्तिगत अधिकार

  • न्यायपालिका को व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के बीच संतुलन बनाना होता है, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहां परिवार या समुदाय राज्य की सहायता से व्यक्तिगत पसंद को बाधित करने का प्रयास करते हैं।
  • उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षक के रूप में महत्वपूर्ण हो जाती है।

4. सामाजिक रूढ़िवादिता और सहिष्णुता

  • अंतर-धार्मिक विवाह और धर्मांतरण अभी भी भारतीय समाज के कुछ वर्गों में सामाजिक रूढ़िवादिता और असहिष्णुता का सामना करते हैं।
  • यह चुनौती संवैधानिक मूल्यों जैसे धर्मनिरपेक्षता और समानता को जमीनी स्तर पर लागू करने में बाधा डालती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
वयस्क की स्वायत्तता पर पारिवारिक हस्तक्षेप पारिवारिक दबाव या चिंता संवैधानिक रूप से संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण कर सकती है।
धर्मांतरण विरोधी कानूनों का दुरुपयोग स्वेच्छा से धर्मांतरण करने वाले व्यक्तियों के खिलाफ इन कानूनों का उपयोग उन्हें परेशान करने या उनके अधिकारों का उल्लंघन करने के लिए किया जा सकता है।
व्यक्तिगत पसंद पर सामाजिक दबाव अंतर-धार्मिक विवाह या धर्मांतरण के मामलों में समाज का दबाव व्यक्तियों के स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
कानून प्रवर्तन एजेंसियों की भूमिका पुलिस द्वारा परिवार के पक्ष में कार्य करने या ‘गैरकानूनी’ धर्मांतरण के आरोपों के आधार पर व्यक्तियों को हिरासत में लेने की संभावना।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का महत्व अवैध हिरासत के मामलों में व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता।

आगे की राह

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाना, विशेष रूप से धर्म की स्वतंत्रता और जीवन साथी चुनने के अधिकार के संबंध में।
  • धर्मांतरण विरोधी कानूनों की समीक्षा करना ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे स्वेच्छा से धर्मांतरण करने वाले वयस्कों के अधिकारों का उल्लंघन न करें और उनके दुरुपयोग को रोका जा सके।
  • कानून प्रवर्तन एजेंसियों को संवेदनशील बनाना ताकि वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान करें, न कि केवल पारिवारिक या सामाजिक दबावों के आगे झुकें।
  • न्यायपालिका को व्यक्तिगत अधिकारों के संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका को लगातार मजबूत करना, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जहां राज्य या निजी व्यक्ति इन अधिकारों का उल्लंघन करने का प्रयास करते हैं।
  • अंतर-धार्मिक विवाहों और व्यक्तिगत विकल्पों के प्रति सामाजिक सहिष्णुता और स्वीकृति को बढ़ावा देना, शिक्षा और संवाद के माध्यम से रूढ़िवादिता को चुनौती देना।
  • कानूनी सहायता और परामर्श सेवाओं तक पहुंच सुनिश्चित करना ताकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन का सामना करने वाले व्यक्तियों को प्रभावी ढंग से अपने अधिकारों का बचाव करने में मदद मिल सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

व्यक्तिगत स्वतंत्रता · धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार · अनुच्छेद 25 · अनुच्छेद 21 · निजता का अधिकार · व्यस्क की स्वायत्तता · पसंद का अधिकार · अंतर-धार्मिक विवाह · बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट · उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम · न्यायिक समीक्षा · मूल अधिकार

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 25’, ‘note’: ‘अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 26’, ‘note’: ‘धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 32’, ‘note’: ‘संवैधानिक उपचारों का अधिकार (बंदी प्रत्यक्षीकरण)’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

एक वयस्क व्यक्ति द्वारा स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन और विवाह का निर्णय।  →  परिवार द्वारा इस निर्णय का विरोध और ‘दिमाग धोने’ का आरोप।  →  परिवार द्वारा पुलिस में FIR दर्ज कराना और कथित अवैध हिरासत।  →  मित्र द्वारा उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करना।  →  उच्च न्यायालय द्वारा वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता और संवैधानिक अधिकारों को बरकरार रखना।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 किसी भी व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है।
2. निजता का अधिकार (Right to Privacy) भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मूल अधिकार है।
3. बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट (Habeas Corpus Writ) का उपयोग किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत से मुक्त कराने के लिए किया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार सुनिश्चित करता है। कथन 2 सही है। पुट्टास्वामी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मूल अधिकार घोषित किया। कथन 3 सही है। बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट का उद्देश्य अवैध रूप से हिरासत में लिए गए व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करवाना और यदि हिरासत अवैध पाई जाती है तो उसे मुक्त कराना है।

Q2. अभिकथन (A): इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक वयस्क व्यक्ति को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और जीवन साथी चुनने के अधिकार को बरकरार रखा है।
कारण (R): परिवार की चिंताएँ किसी वयस्क व्यक्ति की संवैधानिक रूप से संरक्षित स्वायत्तता पर हावी नहीं हो सकतीं।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A का सही स्पष्टीकरण नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A का सही स्पष्टीकरण है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यही बात कही है। कारण (R) भी सही है और यह अभिकथन का सही स्पष्टीकरण है, क्योंकि न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि पारिवारिक चिंताएँ वयस्क व्यक्ति की संवैधानिक स्वायत्तता को अधिभावी नहीं कर सकतीं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में एक वयस्क व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की संवैधानिक स्थिति का परीक्षण कीजिए। क्या ‘विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध’ जैसे कानून इन अधिकारों को सीमित करते हैं? हाल के न्यायिक निर्णयों के आलोक में चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता के मूल अधिकारों (अनुच्छेद 21 और 25) का संक्षिप्त परिचय।
2. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार) का विस्तृत उल्लेख। इसमें निजता के अधिकार (पुट्टास्वामी मामला) और पसंद के अधिकार (लिव-इन रिलेशनशिप, विवाह आदि) को शामिल करें।
3. वयस्क की स्वायत्तता: न्यायालयों द्वारा वयस्क व्यक्ति की अपनी पसंद के जीवन साथी और धर्म चुनने की स्वायत्तता पर जोर देने वाले निर्णयों का उल्लेख (जैसे हादिया मामला, शक्ति वाहिनी मामला, वर्तमान इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय)।
4. धर्म संपरिवर्तन कानून: ‘विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध’ कानूनों (जैसे उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम) के प्रावधानों और उनके पीछे के तर्क का वर्णन।
5. अधिकारों पर सीमाएँ: चर्चा करें कि क्या ये कानून मूल अधिकारों को सीमित करते हैं, विशेषकर ‘जबरन’ या ‘धोखाधड़ी’ से धर्म परिवर्तन की परिभाषा के संदर्भ में। न्यायिक समीक्षा की भूमिका पर प्रकाश डालें।
6. न्यायिक दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के उन निर्णयों का उल्लेख करें जिन्होंने इन कानूनों की संवैधानिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर उनके प्रभाव पर विचार किया है। इसमें ‘धोखाधड़ी’ या ‘जबरन’ धर्म परिवर्तन के सबूत की आवश्यकता पर जोर दें।
7. निष्कर्ष: मूल अधिकारों और राज्य के विनियमन के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए निष्कर्ष प्रस्तुत करें।

स्रोत: The Indian Express

Uttar Pradesh PCS (UPPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: ‘मस्तिष्क धोने’ (ब्रेनवॉशिंग) के आरोप के तहत ‘इस्लाम में धर्मांतरण’ के मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा पिता के दावे को खारिज करने का मुख्य आधार क्या था?

  1. धर्मांतरण के लिए स्वतंत्र सहमति का अभाव
  2. धर्मांतरण के प्रमाण का अभाव
  3. उच्च न्यायालय का धर्मांतरण पर अधिकार क्षेत्र न होना
  4. धर्मांतरण के पीछे राजनीतिक हस्तक्षेप

उत्तर: धर्मांतरण के लिए स्वतंत्र सहमति का अभाव — उच्च न्यायालय ने पिता के दावे को खारिज करते हुए धर्मांतरण के लिए स्वतंत्र सहमति का अभाव बताया, जो उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से संबंधित है।

Mains: ‘उत्तर प्रदेश में धार्मिक स्वतंत्रता बनाम सामाजिक सद्भाव’ विषय पर प्रकाश डालते हुए, राज्य सरकार द्वारा ऐसे मामलों में कानूनी और प्रशासनिक उपायों का विश्लेषण कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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