03 Nov आईएनएस सह्याद्रि: भारत-कोरिया नौसेना अभ्यास और हिंद-प्रशांत सुरक्षा
✎ द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास सहयोग और अंतर-संचालन क्षमता दोनों को बढ़ाते हैं, और भारत-कोरिया गणराज्य संबंध 2015 से विशेष सामरिक भागीदारी के स्तर पर हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (भारत और प्रमुख शक्तियों के साथ द्विपक्षीय तथा क्षेत्रीय समूह; हिंद-प्रशांत क्षेत्र की रणनीति) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (समुद्री सुरक्षा; रक्षा सेनाओं की भूमिका और सैन्य अभ्यास)
- Prelims: आईएनएस सह्याद्रि — शिवालिक श्रेणी का बहुउद्देशीय स्टील्थ फ्रिगेट (भारतीय नौसेना), INDROK (भारत-कोरिया गणराज्य नौसेना द्विपक्षीय अभ्यास; आईएन–आरओकेएन), ROKS Munmu the Great — कोरिया गणराज्य नौसेना का विध्वंसक पोत, बुसान — दक्षिण कोरिया का सबसे बड़ा बंदरगाह नगर और प्रमुख नौसैनिक एवं व्यापारिक केंद्र, हिंद-प्रशांत — भारत की नीति में ‘सागर’ (SAGAR) और ‘आसियान’ केंद्रीयता के साथ जुड़ी अवधारणा, समुद्री विधि पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) — समुद्री क्षेत्रों, अधिकारों और नौवहन की स्वतंत्रता का आधार, अंतर-संचालन क्षमता (Interoperability) — सहयोगी बलों के बीच संयुक्त संचालन की क्षमता, विशेष सामरिक भागीदारी — भारत और दक्षिण कोरिया के संबंधों का वर्तमान स्तर (2015 से)
- Essay: बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में समुद्री सहयोग: सैन्य अभ्यास से विश्वास-निर्माण तक, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए बहुपक्षीय नौसैनिक सहभागिता की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास सहयोग और अंतर-संचालन क्षमता दोनों को बढ़ाते हैं, और भारत-कोरिया गणराज्य संबंध 2015 से विशेष सामरिक भागीदारी के स्तर पर हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस सह्याद्रि ने 29 अक्टूबर 2026 को दक्षिण कोरिया के बुसान में भारत-कोरिया गणराज्य नौसेना द्विपक्षीय अभ्यास (आईएन–आरओकेएन) सफलतापूर्वक संपन्न किया। इस अभ्यास में बंदरगाह चरण के दौरान पेशेवर चर्चाएँ, पोतों का आपसी दौरा, परिचालन संबंधी जानकारी का आदान-प्रदान और विषय विशेषज्ञों का आदान-प्रदान हुआ। समुद्री चरण में आईएनएस सह्याद्रि और कोरिया गणराज्य नौसेना के पोत ROKS Munmu the Great ने समन्वित नौवहन, हेलीकॉप्टर संचालन और संयुक्त समुद्री युद्धाभ्यास किए। भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार इस अभ्यास से समुद्री सहयोग, अंतर-संचालन क्षमता और आपसी विश्वास को बल मिला तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा के साझा प्रयासों को प्रोत्साहन मिला। प्रासंगिकता इसलिए है कि यह अभ्यास द्विपक्षीय रक्षा सहयोग को व्यावहारिक स्तर पर परखने और आगे बढ़ाने का एक उदाहरण है।
पृष्ठभूमि
- भारत और दक्षिण कोरिया के संबंध 2015 में ‘विशेष सामरिक भागीदारी’ के स्तर तक पहुँचे। इसके बाद रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार और समुद्री क्षेत्र में सहयोग का दायरा बढ़ा।
- भारत की ‘Act East’ नीति (पूर्व की ओर देखो नीति का विस्तार) के अंतर्गत पूर्वी एशिया के देशों के साथ रणनीतिक और सुरक्षा संबंधों को प्राथमिकता दी गई है, जिसमें दक्षिण कोरिया एक महत्वपूर्ण साझेदार है।
- भारतीय नौसेना पिछले दो दशकों में कई देशों की नौसेनाओं के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय अभ्यास करती रही है। इनका उद्देश्य खोज-बचाव, समुद्री सुरक्षा, पोतों की संयुक्त कार्यप्रणाली और परिचालन मानकों में समानता लाना है।
- हिंद-प्रशांत क्षेत्र विश्व व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ से होकर वैश्विक समुद्री व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इसलिए नौवहन की स्वतंत्रता और समुद्री विधि का पालन इस क्षेत्र की प्रमुख चिंताएँ हैं।
- समुद्री विधि के मूल ढाँचे के रूप में समुद्री विधि पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) को माना जाता है, जो तटीय राज्यों के अधिकार, विशेष आर्थिक क्षेत्र और खुले समुद्र की व्यवस्था तय करता है।
द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास क्या है?
- द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास दो देशों की नौसेनाओं के बीच आयोजित ऐसा संयुक्त प्रशिक्षण है, जिसमें पोत, विमान और कर्मी परिचालन समन्वय का अभ्यास करते हैं।
- ऐसे अभ्यासों के दो प्रमुख चरण होते हैं: बंदरगाह चरण, जिसमें पेशेवर चर्चा, पोतों का दौरा और जानकारी का आदान-प्रदान होता है; और समुद्री चरण, जिसमें नौवहन, हेलीकॉप्टर संचालन और युद्धाभ्यास होते हैं।
- अंतर-संचालन क्षमता का अर्थ है कि दो नौसेनाएँ एक-दूसरे की संचार प्रणाली, संकेत प्रक्रिया और परिचालन मानकों को समझकर संयुक्त रूप से काम कर सकें।
- ऐसे अभ्यास सैन्य तैयारी के साथ-साथ विश्वास-निर्माण (Confidence Building) का भी माध्यम होते हैं, क्योंकि इनसे दोनों देशों के कर्मियों के बीच संस्थागत संपर्क बनता है।
- समुद्री सहयोग में खोज-बचाव, मानवीय सहायता, समुद्री डकैती-रोधी अभियान और प्रदूषण नियंत्रण जैसे गैर-युद्ध क्षेत्र भी शामिल होते हैं।
- आईएनएस सह्याद्रि भारतीय नौसेना के शिवालिक वर्ग का युद्धपोत है, जिसका नाम पश्चिमी घाट की सह्याद्रि पर्वत श्रेणी पर रखा गया है।
- इन अभ्यासों का भू-राजनीतिक महत्व यह है कि वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में खुले, नियम-आधारित और सहयोगात्मक समुद्री व्यवस्था के पक्ष में राजनयिक संकेत भी देते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अभ्यास का स्वरूप | भारत-कोरिया गणराज्य नौसेना द्विपक्षीय अभ्यास (India-ROK Navy Bilateral Exercise) एक द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास है, जिसमें बंदरगाह चरण और समुद्री चरण दोनों शामिल थे |
| भारतीय सहभागी पोत | भारतीय नौसेना का युद्धपोत आईएनएस सह्याद्रि (INS Sahyadri), जो भारत की नौसैनिक परिचालन क्षमता और समुद्री पहुँच का प्रतिनिधित्व करता है |
| कोरियाई सहभागी पोत | कोरिया गणराज्य की नौसेना का पोत आरओकेएस मुनमु द ग्रेट (ROKS Munmu the Great), जिसके साथ समन्वित नौवहन और संयुक्त युद्धाभ्यास हुए |
| स्थान और तिथि | 29 अक्टूबर 2026 को कोरिया गणराज्य के बुसान बंदरगाह पर आयोजित; बुसान कोरिया का प्रमुख समुद्री पत्तन है |
| बंदरगाह चरण की गतिविधियाँ | पेशेवर चर्चाएँ, एक-दूसरे के पोतों का दौरा, परिचालन जानकारी का साझाकरण और विषय विशेषज्ञों का आदान-प्रदान |
| समुद्री चरण की गतिविधियाँ | समन्वित नौवहन, हेलीकॉप्टर संचालन और संयुक्त समुद्री युद्धाभ्यास, जिनसे व्यावहारिक समन्वय और सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों का आदान-प्रदान हुआ |
महत्व
सामरिक महत्व
- अंतर-संचालन क्षमता (Interoperability) बढ़ने से संयुक्त अभियानों में दोनों नौसेनाएँ एक-दूसरे की प्रक्रियाओं और संकेत-व्यवस्था को समझकर तेज़ी से तालमेल बिठा सकती हैं
- हेलीकॉप्टर संचालन और समन्वित नौवहन का अभ्यास समुद्री निगरानी, खोज और बचाव तथा सतही युद्ध जैसे कार्यों में व्यावहारिक दक्षता बढ़ाता है
- पोतों के आपसी दौरे से परिचालन विश्वास बनता है, जो संकट के समय सूचना साझाकरण को सरल बनाता है
कूटनीतिक महत्व
- भारत और कोरिया गणराज्य के बीच विशेष सामरिक साझेदारी (Special Strategic Partnership) की भावना को रक्षा सहयोग के स्तर पर ठोस रूप मिलता है
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान और खेल गतिविधियों से जनस्तर पर सौहार्द बढ़ता है, जो दीर्घकालिक द्विपक्षीय संबंधों का आधार है
हिंद-प्रशांत से जुड़ा महत्व
- भारत की हिंद-प्रशांत नीति और कोरिया गणराज्य के इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण में समुद्री सुरक्षा साझा हित के रूप में उभरती है
- मुक्त, खुले और नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था के प्रति दोनों देशों की प्रतिबद्धता इस अभ्यास के माध्यम से व्यावहारिक रूप लेती है
समुद्री सुरक्षा और कानून
- समुद्री नौवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन, 1982 (UNCLOS) के ढाँचे से निर्देशित होती है, जिसका भारत और कोरिया गणराज्य दोनों पक्ष हैं
- अभ्यास के दौरान साझा समुद्री दृष्टिकोण से सामूहिक सुरक्षा का वातावरण बनता है, जो व्यापार मार्गों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है
चुनौतियाँ
1. परिचालन मानकों में भिन्नता
- दोनों नौसेनाओं की संचार प्रणाली, संकेत-व्यवस्था और तकनीकी मानक अलग हैं, जिससे वास्तविक संकट में समन्वय कठिन हो सकता है
- अभ्यास की सफलता के बावजूद स्थायी मानकीकरण के लिए नियमित और गहन प्रशिक्षण आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: GS-3: सुरक्षा चुनौतियाँ और रक्षा क्षेत्र में आधुनिकीकरण
2. भौगोलिक दूरी और संसाधन सीमाएँ
- भारत और कोरिया गणराज्य के बीच भौगोलिक दूरी के कारण नियमित संयुक्त गतिविधियों की लागत और समय-सारिणी चुनौतीपूर्ण रहती है
- सीमित पोत-उपलब्धता और रखरखाव आवश्यकताएँ लंबी अवधि के सहयोग को प्रभावित कर सकती हैं
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत के विदेश संबंध और द्विपक्षीय सहयोग
3. हिंद-प्रशांत में बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा
- इस क्षेत्र में विभिन्न शक्तियों की नौसैनिक उपस्थिति बढ़ रही है, जिससे समुद्री तनाव और शक्ति-संतुलन की चुनौती उत्पन्न होती है
- बहुपक्षीय और द्विपक्षीय अभ्यासों के बीच संतुलन बनाए रखना कूटनीतिक दृष्टि से जटिल है
यूपीएससी लिंक: GS-2: भारत और उसके पड़ोस तथा क्षेत्रीय संगठनों से संबंध
4. समुद्री मार्गों की सुरक्षा
- हिंद और प्रशांत महासागर को जोड़ने वाले प्रमुख समुद्री मार्गों पर व्यापार सुरक्षा एक निरंतर चिंता है
- समुद्री डकैती, अवैध मत्स्यन और तस्करी जैसी गैर-पारंपरिक चुनौतियाँ भी नौसैनिक सहयोग की आवश्यकता बढ़ाती हैं
यूपीएससी लिंक: GS-3: आंतरिक सुरक्षा और समुद्री सीमा प्रबंधन
5. सहयोग को संस्थागत रूप देने की आवश्यकता
- अभ्यास एक-बारगी आयोजन न रहकर नियमित प्रशिक्षण, विशेषज्ञ विनिमय और डेटा साझाकरण के ढाँचे में बदलना चाहिए
- द्विपक्षीय सहयोग की निरंतरता के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएँ और समय-बद्ध कार्ययोजना आवश्यक है
यूपीएससी लिंक: GS-2: द्विपक्षीय और बहुपक्षीय समझौते तथा शासन-प्रक्रिया
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| तकनीकी अंतर-संचालन | संचार प्रणालियों और परिचालन मानकों में भिन्नता संकट के समय समन्वय को धीमा कर सकती है |
| भौगोलिक दूरी | भारत और कोरिया गणराज्य के बीच दूरी नियमित संयुक्त गतिविधियों की लागत और आवृत्ति को सीमित करती है |
| सामरिक प्रतिस्पर्धा | हिंद-प्रशांत में बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति से शक्ति-संतुलन और समुद्री तनाव की स्थिति बन सकती है |
| समुद्री मार्ग सुरक्षा | व्यापारिक जलमार्गों पर समुद्री डकैती, तस्करी और अवैध गतिविधियों से आर्थिक हित प्रभावित होते हैं |
| संस्थागत निरंतरता | एक-बारगी अभ्यासों से दीर्घकालिक सहयोग सुनिश्चित नहीं होता, जब तक नियमित ढाँचा न हो |
आगे की राह
- नियमित द्विपक्षीय अभ्यासों को वार्षिक कार्ययोजना के रूप में संस्थागत करना, ताकि परिचालन सीख लगातार बनी रहे
- संचार प्रणालियों और संकेत-व्यवस्था के संयुक्त मानकीकरण पर कार्य करना, जिससे अंतर-संचालन क्षमता टिकाऊ हो
- विशेषज्ञ आदान-प्रदान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार करके अधिकारियों के बीच संस्थागत समझ बढ़ाना
- समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) के लिए सूचना साझाकरण तंत्र को मज़बूत करना
- समुद्री डकैती, अवैध मत्स्यन और तस्करी से निपटने में क्षेत्रीय समुद्री सहयोग को गैर-पारंपरिक सुरक्षा तक विस्तारित करना
- UNCLOS, 1982 के सिद्धांतों के अनुरूप नौवहन की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विवाद समाधान को द्विपक्षीय सहयोग का आधार बनाए रखना
- सांस्कृतिक और खेल आदान-प्रदान को रक्षा सहयोग के पूरक के रूप में जारी रखना, ताकि जनस्तर पर विश्वास मज़बूत हो
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
समुद्री सुरक्षा (Maritime Security) · अंतर-संचालन क्षमता (Interoperability) · हिंद-प्रशांत (Indo-Pacific) · मुक्त नौवहन (Freedom of Navigation) · विशेष आर्थिक क्षेत्र (Exclusive Economic Zone) · संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन (UNCLOS) · एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy) · सागर (SAGAR: Security and Growth for All in the Region) · समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) · द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास · विशेष सामरिक साझेदारी · सामूहिक सुरक्षा बनाम गठबंधन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने का राज्य का निर्देश
अवधारणा प्रवाह
भारत और कोरिया गणराज्य के बीच विशेष सामरिक साझेदारी और हिंद-प्रशांत नीति में समुद्री सहयोग की साझा इच्छा → आईएनएस सह्याद्रि का बुसान बंदरगाह पर पहुँचना और दोनों नौसेनाओं के बीच पेशेवर चर्चाएँ व पोत-दौरे → परिचालन जानकारी और विशेषज्ञों के आदान-प्रदान से सर्वोत्तम कार्यप्रणालियों की साझा समझ बनना → समुद्री चरण में समन्वित नौवहन, हेलीकॉप्टर संचालन और संयुक्त युद्धाभ्यास से व्यावहारिक तालमेल का परीक्षण → अंतर-संचालन क्षमता और परिचालन विश्वास में वृद्धि → आपसी विश्वास के सुदृढ़ होने से भविष्य के नियमित सहयोग और समुद्री सुरक्षा का आधार मज़बूत होना → हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति, स्थिरता और सुरक्षा के सामूहिक प्रयासों को गति मिलना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन (UNCLOS), 1982 के अंतर्गत विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) तटरेखा से अधिकतम 200 समुद्री मील तक विस्तृत हो सकता है।
2. तट से लगे समुद्र की प्रादेशिक सीमा (Territorial Sea) अधिकतम 12 समुद्री मील तक निर्धारित की जा सकती है।
3. महाद्वीपीय शेल्फ (Continental Shelf) सदैव 200 समुद्री मील तक ही सीमित रहता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: UNCLOS का अनुच्छेद 57 EEZ की अधिकतम सीमा 200 समुद्री मील निर्धारित करता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 3 के अनुसार प्रादेशिक सीमा 12 समुद्री मील तक हो सकती है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 76 की शर्तों के अंतर्गत महाद्वीपीय शेल्फ 350 समुद्री मील तक विस्तृत हो सकता है, इसलिए इसे सदैव 200 समुद्री मील तक सीमित मानना त्रुटिपूर्ण है।
Q2. कथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यास भारतीय नौसेना और साझेदार नौसेनाओं के बीच परिचालन अंतर-संचालन क्षमता को बढ़ाते हैं।
कारण (R): ऐसे अभ्यासों में संयुक्त नौवहन, हेलीकॉप्टर संचालन और सूचना साझाकरण से दोनों नौसेनाओं की परिचालन प्रक्रियाएँ एक-दूसरे के लिए अधिक परिचित और समन्वित हो जाती हैं।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अभ्यासों में संयुक्त नौवहन और सूचना साझाकरण से परिचालन प्रक्रियाओं की समझ बढ़ती है, जिससे अंतर-संचालन क्षमता सुदृढ़ होती है। अतः (R), (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित स्तंभों का सही मिलान कीजिए:
स्तंभ I (नीति/विधि)
A. सागर (SAGAR)
B. एक्ट ईस्ट नीति (Act East Policy)
C. संयुक्त राष्ट्र समुद्री विधि सम्मेलन (UNCLOS), 1982
स्तंभ II (विवरण)
1. समुद्री क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास का सिद्धांत
2. पूर्वोन्मुख (Look East) नीति का उन्नत और विस्तारित रूप
3. तटीय राज्यों के समुद्री अधिकारों और दायित्वों से संबंधित विधिक संहिता
सही उत्तर चुनिए:
- (a) A-1, B-2, C-3
- (b) A-2, B-1, C-3
- (c) A-1, B-3, C-2
- (d) A-3, B-1, C-2
उत्तर: (a) A-1, B-2, C-3 — SAGAR का सिद्धांत समुद्री क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास है (A-1)। एक्ट ईस्ट नीति पूर्वोन्मुख नीति का उन्नत रूप है (B-2)। UNCLOS तटीय राज्यों के समुद्री अधिकार और दायित्वों की विधिक संहिता है (C-3)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ हिंद-प्रशांत क्षेत्र में द्विपक्षीय नौसैनिक अभ्यासों को प्रायः केवल प्रतीकात्मक सद्भावना माना जाता है, किंतु इनका वास्तविक महत्व परिचालन अंतर-संचालन क्षमता के निर्माण में निहित है। भारत-कोरिया गणराज्य नौसेना अभ्यास के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इसके साथ यह भी स्पष्ट कीजिए कि बहुपक्षीय ढाँचों की तुलना में द्विपक्षीय सहभागिता की क्या सीमाएँ हैं और क्या ये सीमाएँ समुद्री सुरक्षा की साझा चुनौतियों के समाधान में बाधक बनती हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर की संरचना इस प्रकार होनी चाहिए:
1. भूमिका: भारत-कोरिया गणराज्य नौसेना द्विपक्षीय अभ्यास (INDIA-ROKN) का तथ्यात्मक उल्लेख: INS सह्याद्रि का 29 अक्टूबर 2026 को बुसान में संपन्न होना, ROKS Munmu the Great की सहभागिता, बंदरगाह चरण (पेशेवर चर्चा, पोत-दौरे, विषय-विशेषज्ञ आदान-प्रदान) और समुद्री चरण (समन्वित नौवहन, हेलीकॉप्टर संचालन, संयुक्त युद्धाभ्यास)।
2. कथन का समर्थन (प्रतीकात्मकता से परिचालन तक):
– अभ्यास में बंदरगाह चरण से समुद्री चरण तक का क्रम: संवाद को व्यावहारिक परिचालन गतिविधियों में बदलना।
– अंतर-संचालन क्षमता का अर्थ: संचार प्रणाली, नौवहन प्रक्रियाएँ, सिग्नलिंग और संयुक्त संचालन प्रक्रियाओं में समानता।
– अल्फ्रेड थायर महान (Alfred Thayer Mahan) की ‘The Influence of Sea Power upon History’ (1890) के अनुसार समुद्री शक्ति का आधार नौसेना की तैयारी और समुद्र में सहयोग की क्षमता है।
3. कथन की सीमाएँ और प्रतिवाद:
– सांस्कृतिक आदान-प्रदान और खेल गतिविधियाँ सौहार्द बढ़ाती हैं, परंतु परिचालन क्षमता के मापन का सीधा संकेतक नहीं हैं।
– अभ्यास की आवृत्ति, साझा प्रशिक्षण और प्रौद्योगिकी सहयोग का दीर्घकालिक प्रभाव अभ्यास-विशेष से आगे जाता है, जिसे अलग से आँकना आवश्यक है।
4. भारत की नीतिगत पृष्ठभूमि:
– एक्ट ईस्ट नीति (2014 में पूर्वोन्मुख नीति का उन्नत रूप) के अंतर्गत समुद्री सहयोग।
– SAGAR (Security and Growth for All in the Region) सिद्धांत, जिसमें समुद्री क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास पर बल है।
– भारत-कोरिया गणराज्य विशेष सामरिक साझेदारी (2010 में स्थापित) का आर्थिक, तकनीकी और रक्षा आयाम।
– मुक्त नौवहन का विधिक आधार: UNCLOS, 1982 का अनुच्छेद 87 (खुले समुद्र की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 58 (EEZ में नौवहन और ओवरफ्लाइट की स्वतंत्रता); भारत का UNCLOS से अनुसमर्थन 1995 में।
5. द्विपक्षीय बनाम बहुपक्षीय तुलना:
– द्विपक्षीय अभ्यास में विश्वास, गहन परिचय और लक्षित समन्वय संभव है।
– बहुपक्षीय ढाँचे (जैसे Quad और बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास) व्यापक समुद्री डोमेन जागरूकता और साझा नियम-आधारित व्यवस्था को मज़बूत करते हैं, किंतु उनकी समन्वय-लागत और राजनयिक जटिलता अधिक है।
– समुद्री डोमेन जागरूकता (Maritime Domain Awareness) के लिए सूचना-साझाकरण समझौतों की आवश्यकता पर विचार।
6. निष्कर्ष: द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सहभागिता परस्पर पूरक हैं; सही संतुलन में ही समुद्री सुरक्षा की साझा चुनौतियों का समाधान संभव है। अंत में स्वतंत्र, खुले और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत के सामूहिक संकल्प के साथ समापन।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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