आरबीआई का कृषि बुनियादी ढांचे के लिए ₹100 करोड़ ऋण सीमा का प्रस्ताव: विश्लेषण

आरबीआई का कृषि बुनियादी ढांचे के लिए ₹100 करोड़ ऋण सीमा का प्रस्ताव: विश्लेषण

आरबीआई का कृषि बुनियादी ढांचे के लिए ₹100 करोड़ ऋण सीमा का प्रस्ताव: विश्लेषण

प्राथमिकता क्षेत्र ऋण: प्रस्तावित परिवर्तनवर्तमानप्रस्तावितकृषि अवसंरचना ऋणकोई विशिष्ट सीमा नहींप्रति कर्जदार ₹100 करोड़फसल/कटाई गतिविधियाँकोई विशिष्ट सीमा नहींप्रति कर्जदार ₹4 करोड़शिक्षा ऋणपुरानी सीमा₹25 लाख तकनवीकरणीय ऊर्जापुरानी सीमा₹35 करोड़ तक
प्राथमिकता क्षेत्र ऋण: प्रस्तावित परिवर्तन

✎ प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (PSL) नियामक निर्देशों के माध्यम से कृषि, MSME, शिक्षा, आवास और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में बैंक ऋण का निर्दिष्ट प्रवाह सुनिश्चित करता है, और RBI इसकी श्रेणियाँ व ऋण-सीमाएँ निर्धारित करता है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था (बैंकिंग, वित्तीय समावेशन, कृषि वित्त और मौद्रिक एवं नियामक व्यवस्था)  |  GS Paper II — शासन (वैधानिक एवं नियामक संस्थाएँ, केंद्रीय बैंक के निर्देश और नीति-निर्माण प्रक्रिया)
  • Prelims: प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (PSL) और इसके अंतर्गत आने वाली प्रमुख श्रेणियाँ, समायोजित निवल बैंक ऋण (ANBC) — PSL लक्ष्य की गणना का आधार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की निर्देश जारी करने की शक्ति — बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB) — क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976, किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) — अल्पावधि फसल ऋण का माध्यम, कृषि अवसंरचना निधि (Agriculture Infrastructure Fund) — कृषि परिसंपत्तियों के लिए मध्यम-दीर्घकालिक वित्तपोषण, वित्तीय समावेशन और ऋण-प्रवाह में ग्रामीण एवं कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी
  • Essay: ग्रामीण अर्थव्यवस्था में संस्थागत ऋण: कृषि के आधुनिकीकरण और अवसंरचना निर्माण में बैंकिंग प्रणाली की भूमिका, नियामक निर्देशों का सरलीकरण: विनियमन की स्पष्टता, वित्तीय स्थिरता और समावेशी विकास के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (PSL) नियामक निर्देशों के माध्यम से कृषि, MSME, शिक्षा, आवास और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में बैंक ऋण का निर्दिष्ट प्रवाह सुनिश्चित करता है, और RBI इसकी श्रेणियाँ व ऋण-सीमाएँ निर्धारित करता है।

💬 Doubt on this topic? Ask Aanya, your free AI study-buddy, for an instant explanation. Ask Aanya →

यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिजर्व बैंक ने प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण से जुड़े मौजूदा दिशानिर्देशों की समीक्षा के बाद वाणिज्यिक बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों सहित विभिन्न विनियमित संस्थाओं के लिए मसौदा निर्देश प्रस्तावित किए हैं। इन मसौदों में कृषि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए प्रति कर्जदार कुल 100 करोड़ रुपये तक का ऋण मंजूर करने का प्रस्ताव है, जबकि फसल ऋण और कटाई-पूर्व एवं कटाई-पश्चात गतिविधियों के लिए प्रति कर्जदार इकाई चार करोड़ रुपये की सीमा प्रस्तावित की गई है। यह कदम विभिन्न निर्देशों को एकीकृत करने की व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है। मसौदे में शिक्षा के लिए 25 लाख रुपये तक के ऋण और नवीकरणीय ऊर्जा से जुड़ी जन-केंद्रित परियोजनाओं के लिए 35 करोड़ रुपये तक के ऋण को भी प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के अंतर्गत वर्गीकृत करने का उल्लेख है। ये प्रस्ताव अभी मसौदे के रूप में हैं, इसलिए परीक्षा की दृष्टि से इन्हें अंतिम नियम मानने के बजाय नीति-प्रक्रिया के चरण के रूप में समझना उचित है।

पृष्ठभूमि

  • प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण की अवधारणा 1969 में 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद विकसित हुई, जिसका उद्देश्य कृषि, लघु उद्योग और कमजोर वर्गों को बैंकिंग ऋण का पर्याप्त प्रवाह सुनिश्चित करना था।
  • 1970 के दशक से बैंकों के लिए क्षेत्रवार लक्ष्य निर्धारित किए गए, और समय के साथ इन श्रेणियों की परिभाषा और लक्ष्य-मानकों में संशोधन होते रहे।
  • क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 के अंतर्गत हुई, जिससे ग्रामीण और कृषि क्षेत्र में संस्थागत ऋण का विस्तार हो सके।
  • कृषि अवसंरचना निधि की घोषणा और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाएँ कृषि ऋण के विभिन्न स्वरूपों को दर्शाती हैं, जिनमें अल्पावधि फसल ऋण और दीर्घावधि परिसंपत्ति-निर्माण ऋण अलग-अलग उद्देश्यों से दिए जाते हैं।
  • RBI समय-समय पर बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A के अंतर्गत बैंकों को निर्देश जारी करता है, और निर्देशों का एकीकरण नियामक ढांचे को सरल और सुसंगत बनाने के लिए किया जाता है।

प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र ऋण (PSL) क्या है?

  • PSL से आशय उस ऋण से है जो बैंक कृषि, लघु उद्योग, निर्यात, शिक्षा, आवास और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे उन क्षेत्रों को देते हैं जिन्हें आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से विशेष प्राथमिकता दी गई है।
  • घरेलू वाणिज्यिक बैंकों के लिए PSL लक्ष्य सामान्यतः समायोजित निवल बैंक ऋण (ANBC) या बैंक की ऑफ-बैलेंस शीट एक्सपोज़र के आधार पर निर्धारित होता है, जिसमें कुल लक्ष्य का एक बड़ा हिस्सा सामान्यतः 40 प्रतिशत रखा गया है।
  • इस कुल लक्ष्य के भीतर कृषि के लिए अलग उप-लक्ष्य निर्धारित है, जो सामान्यतः 18 प्रतिशत है।
  • RBI विनियमन की शक्ति के अंतर्गत PSL की श्रेणियाँ, पात्रता, ऋण-सीमा और वर्गीकरण के मानदंड निर्धारित करता है, जिन्हें संशोधित किया जा सकता है।
  • कृषि ऋण के अंतर्गत फसल ऋण, कृषि एवं सहायक गतिविधियों के लिए मध्यम-दीर्घकालिक ऋण और कृषि अवसंरचना के लिए ऋण आते हैं, जिनकी सीमाएँ उद्देश्य के अनुसार अलग हो सकती हैं।
  • प्रति कर्जदार ऋण-सीमा तय करने का उद्देश्य एक ही उधारकर्ता को अत्यधिक ऋण देने के जोखिम को सीमित करते हुए परियोजना-स्तर पर पर्याप्त वित्तपोषण सुनिश्चित करना है।
  • PSL ऋण-प्रवाह को नियामक दिशा देता है, पर इससे जुड़ी चुनौती यह है कि ऋण की गुणवत्ता, अनुत्पादक आस्तियों (NPA) का जोखिम और संस्थागत क्षमता भी संतुलित रहें।
  • PSL के अंतर्गत आने वाले ऋण के लिए बैंक की वास्तविक प्रणाली और उसकी जोखिम-नीति दोनों महत्वपूर्ण हैं, इसलिए वर्गीकरण के मानदंड स्पष्ट होना आवश्यक है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
प्रस्तावित ऋण सीमा कृषि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए प्रति कर्जदार कुल 100 करोड़ रुपये तक का ऋण प्राथमिकता वाले क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending – PSL) के अंतर्गत मंजूर किया जा सकेगा। यह बड़ी परियोजनाओं की वित्तीय जरूरत को पूरा करने की दिशा में एक कदम है।
फसल ऋण और मध्यम-दीर्घकालिक कृषि ऋण वाणिज्यिक बैंकों के लिए प्रस्तावित मसौदे में फसल ऋण, कृषि एवं सहायक गतिविधियों के मध्यम व दीर्घकालिक ऋण और कटाई से पहले व बाद की गतिविधियों के लिए प्रति कर्जदार इकाई 4 करोड़ रुपये की सीमा प्रस्तावित है। इससे अल्पकालिक और दीर्घकालिक कृषि वित्त के बीच स्पष्ट विभाजन बनता है।
शिक्षा ऋण की सीमा व्यावसायिक पाठ्यक्रमों सहित शिक्षा के लिए व्यक्तियों को 25 लाख रुपये तक के ऋण को प्राथमिकता वाले क्षेत्र में वर्गीकृत किया जा सकेगा। इससे उच्च शिक्षा के वित्तीय समावेशन को सहारा मिलता है।
नवीकरणीय ऊर्जा और सामाजिक अवसंरचना नवीकरणीय ऊर्जा आधारित सड़क प्रकाश व्यवस्था और दूरदराज के गांवों के विद्युतीकरण जैसे जन-केंद्रित कार्यों के लिए प्रति कर्जदार 35 करोड़ रुपये तक का ऋण इस श्रेणी में आएगा। व्यक्तिगत परिवारों के लिए ऋण सीमा 10 लाख रुपये प्रस्तावित है।
निर्देशों का एकीकरण आरबीआई द्वारा विभिन्न दिशानिर्देशों को एक ढांचे में समेटने की प्रक्रिया के तहत वाणिज्यिक बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों सहित सभी विनियमित संस्थाओं के लिए मसौदा निर्देश जारी किए गए हैं। इससे नियामकीय स्पष्टता और अनुपालन में सरलता आने की उम्मीद है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • कृषि बुनियादी ढांचे जैसे कोल्ड स्टोरेज, भंडारण, प्रसंस्करण और सिंचाई परियोजनाओं में बड़े निवेश के लिए बैंकिंग वित्त की उपलब्धता बढ़ेगी।
  • कृषि-आधारित मूल्य शृंखला के मजबूत होने से कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी और किसानों की आय में स्थिरता की संभावना बनती है।
  • आर्थिक संवृद्धि में निजी निवेश की भागीदारी को प्रोत्साहन मिलता है, क्योंकि बैंक अब बड़ी परियोजनाओं को भी प्राथमिकता वाले क्षेत्र के अंतर्गत वित्त दे सकेंगे।

सामाजिक और समावेशी महत्व

  • शिक्षा ऋण की सीमा बढ़ाने के प्रस्ताव से मध्यवर्गीय और निम्न-आय परिवारों के छात्रों को व्यावसायिक शिक्षा के लिए वित्तीय सहायता मिलती है।
  • व्यक्तिगत आवास ऋण की सीमा सहित ये प्रावधान आवास और सामाजिक बुनियादी ढांचे को सुलभ बनाने में सहायक हैं।

ऊर्जा और पर्यावरणीय महत्व

  • नवीकरणीय ऊर्जा आधारित सड़क प्रकाश और दूरदराज के गांवों के विद्युतीकरण के लिए ऋण सुविधा से स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा मिलता है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में ऊर्जा पहुंच सुधरने से कृषि उत्पादकता और स्थानीय रोजगार पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

नियामकीय महत्व

  • विभिन्न दिशानिर्देशों को एकीकृत करने से बैंकों के लिए अनुपालन का बोझ घटता है और नियामकीय ढांचा अधिक पारदर्शी बनता है।
  • प्राथमिकता वाले क्षेत्र की परिभाषा और श्रेणियों को अद्यतन करने से बदलती आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप नीति को ढालने का अवसर मिलता है।

चुनौतियाँ

1. ऋण सीमा से जुड़ा संकेंद्रण जोखिम

  • प्रति कर्जदार 100 करोड़ रुपये तक का ऋण बैंकों के किसी एक खाते में बड़ी राशि का संकेंद्रण पैदा कर सकता है।
  • किसी एक बड़ी परियोजना के विफल होने पर बैंक की परिसंपत्ति गुणवत्ता पर गहरा असर पड़ सकता है।

2. प्राथमिकता वाले क्षेत्र के वर्गीकरण का दुरुपयोग

  • बड़ी परियोजनाओं को कृषि या नवीकरणीय ऊर्जा के नाम पर वर्गीकृत करने से वास्तविक छोटे और सीमांत किसानों की हिस्सेदारी कम हो सकती है।
  • वर्गीकरण के मानदंड स्पष्ट और निगरानी योग्य न हों, तो लक्ष्य की पूर्ति केवल कागजों पर दिख सकती है।

3. छोटे और सीमांत किसानों तक पहुंच

  • बड़े ऋण की सीमा का लाभ अधिकतर संगठित, बड़े उद्यमियों और सहकारी संस्थाओं को मिल सकता है।
  • सीमांत किसानों के पास औपचारिक जमानत और दस्तावेज कम होने से उन्हें बैंकिंग ऋण की प्रक्रिया में कठिनाई आती है।

4. गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) का जोखिम

  • कृषि क्षेत्र मौसम, मूल्य और फसल विफलता के जोखिमों से प्रभावित रहता है, जिससे ऋण वसूली में अनिश्चितता बनी रहती है।
  • दीर्घकालिक अवसंरचना परियोजनाओं में भुगतान अवधि लंबी होती है, जिससे बैंकों की तरलता पर दबाव पड़ सकता है।

5. परियोजना मूल्यांकन और क्षमता की कमी

  • बैंकों के पास कृषि अवसंरचना परियोजनाओं के तकनीकी और आर्थिक मूल्यांकन की विशेषज्ञता सीमित हो सकती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों की शाखाओं में प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी से परियोजना की निगरानी प्रभावित होती है।

6. क्षेत्रीय असमानता

  • कृषि ऋण का प्रवाह अधिकतर विकसित और उच्च उत्पादकता वाले राज्यों की ओर केंद्रित रहता है।
  • पूर्वी और पिछड़े राज्यों में बैंकिंग पहुंच और ऋण वितरण का स्तर अपेक्षाकृत कम है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
संकेंद्रण जोखिम एक बड़े कर्जदार पर अत्यधिक ऋण से बैंक की जोखिम-विविधता घट सकती है।
वर्गीकरण की पारदर्शिता बड़ी परियोजनाओं को प्राथमिकता वाले क्षेत्र में शामिल करने से नीति का मूल उद्देश्य कमजोर हो सकता है।
सीमांत किसानों का बहिष्करण लाभ का बड़ा हिस्सा संगठित और बड़े उद्यमियों को मिलने की आशंका रहती है।
परिसंपत्ति गुणवत्ता कृषि जोखिम और लंबी अवधि की परियोजनाओं से NPA बढ़ने की संभावना है।
संस्थागत क्षमता ग्रामीण शाखाओं में परियोजना मूल्यांकन और निगरानी की सीमित क्षमता है।
क्षेत्रीय असमानता पिछड़े राज्यों तक ऋण प्रवाह पर्याप्त नहीं पहुंचने की समस्या बनी रह सकती है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • कृषि अवसंरचना कोष (Agriculture Infrastructure Fund)
  • किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card – KCC)

आगे की राह

  • बड़े ऋण के लिए परियोजना-स्तरीय जोखिम मूल्यांकन और स्वतंत्र तकनीकी जांच की अनिवार्य व्यवस्था की जाए।
  • प्राथमिकता वाले क्षेत्र के वर्गीकरण के लिए स्पष्ट, सार्वजनिक और निगरानी योग्य मानदंड निर्धारित किए जाएं।
  • सीमांत और छोटे किसानों के लिए अलग उप-लक्ष्य रखे जाएं, ताकि लाभ का वितरण संतुलित रहे।
  • कृषि ऋण के संकेंद्रण की निगरानी के लिए बैंकों को एकल कर्जदार और समूह-स्तर पर सीमा-निर्धारण का पालन करना चाहिए।
  • ग्रामीण बैंकों और सहकारी संस्थाओं की परियोजना मूल्यांकन क्षमता को प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता से मजबूत किया जाए।
  • पिछड़े और पूर्वी राज्यों में ऋण प्रवाह की राज्यवार आंकड़ेबद्ध समीक्षा कर लक्ष्य-आधारित हस्तक्षेप किया जाए।
  • फसल बीमा और मौसम-आधारित जोखिम प्रबंधन को कृषि ऋण के साथ जोड़कर परिसंपत्ति गुणवत्ता को सुरक्षित रखा जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending – PSL) · कृषि अवसंरचना ऋण · कृषि अवसंरचना कोष (Agriculture Infrastructure Fund) · समायोजित निवल बैंक ऋण (Adjusted Net Bank Credit – ANBC) · वित्तीय समावेशन (Financial Inclusion) · ऋण संकेंद्रण जोखिम (Credit Concentration Risk) · गैर-निष्पादित आस्तियाँ (Non-Performing Assets – NPA) · निर्देशों का एकीकरण (Consolidation of Directions) · बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (Banking Regulation Act, 1949) · नाबार्ड (NABARD) · नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) · संस्थागत ऋण प्रवाह (Institutional Credit Flow)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 46: कमजोर वर्गों के आर्थिक हितों का संवर्धन
  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची प्रविष्टि 45: बैंकिंग पर संघ का विधायी अधिकार

अवधारणा प्रवाह

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा प्राथमिकता वाले क्षेत्र ऋण के दिशानिर्देशों की समीक्षा की जाती है।  →  निर्देशों को एकीकृत करने के लिए वाणिज्यिक बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों हेतु मसौदा निर्देश जारी किए जाते हैं।  →  कृषि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए प्रति कर्जदार 100 करोड़ रुपये तक की ऋण सीमा प्रस्तावित की जाती है।  →  बैंक ऋण वितरण में इन परियोजनाओं को प्राथमिकता वाले क्षेत्र में गिनते हैं, जिससे पूंजी का प्रवाह बढ़ता है।  →  कृषि अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा और शिक्षा क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से उत्पादन और रोजगार पर प्रभाव पड़ता है।  →  यदि मूल्यांकन और निगरानी कमजोर रहे, तो संकेंद्रण और NPA का जोखिम बढ़ता है, इसलिए नियामकीय संतुलन आवश्यक है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending – PSL) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. घरेलू बैंकों के लिए PSL लक्ष्य समायोजित निवल बैंक ऋण (ANBC) या ऑफ-बैलेंस शीट एक्सपोज़र के क्रेडिट समतुल्य (CEOBE), जो भी अधिक हो, के प्रतिशत के रूप में निर्धारित होता है।
2. कृषि क्षेत्र के लिए समग्र PSL लक्ष्य के भीतर एक उप-लक्ष्य निर्धारित है।
3. लघु वित्त बैंकों से अपेक्षा है कि वे घरेलू वाणिज्यिक बैंकों की तुलना में कुल ANBC का अधिक अनुपात PSL में दें।
4. PSL के लक्ष्य संसद द्वारा पारित अधिनियम के माध्यम से तय किए जाते हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — कथन 1, 2 और 3 सही हैं। घरेलू बैंकों के लिए लक्ष्य ANBC या CEOBE में से जो अधिक हो, उसके आधार पर तय होता है, और कृषि का उप-लक्ष्य समग्र लक्ष्य के भीतर आता है। लघु वित्त बैंकों से ANBC का लगभग 75% PSL में देने की अपेक्षा है, जो घरेलू वाणिज्यिक बैंकों के 40% से अधिक है। कथन 4 गलत है, क्योंकि PSL दिशानिर्देश भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किए जाते हैं, संसद के अधिनियम द्वारा नहीं।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए, जिनमें एक अभिकथन (A) और एक कारण (R) दिया गया है:
अभिकथन (A): भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा कृषि अवसंरचना परियोजनाओं के लिए प्रति कर्जदार ऋण-सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव दीर्घ-गर्भकालीन ग्रामीण परिसंपत्तियों में अधिक संस्थागत ऋण प्रवाह को प्रोत्साहित कर सकता है।
कारण (R): PSL के अंतर्गत किसी ऋण को प्राथमिकता क्षेत्र में तभी गिना जाता है जब वह निर्धारित ऋण-सीमा के भीतर हो, और यह सीमा दिशानिर्देशों में संशोधन के माध्यम से बदली जा सकती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, परंतु R गलत है।
  4. A गलत है, परंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन और कारण दोनों सही हैं। PSL में ऋण-सीमा और श्रेणी-निर्धारण RBI के दिशानिर्देशों से तय होते हैं, इसलिए ऊँची सीमा से बड़ी कृषि अवसंरचना परियोजनाएँ PSL में गिनी जा सकती हैं। यह सीमा संशोधन-योग्य है, इसलिए R, A की सीधी व्याख्या करता है। ध्यान रहे कि यह प्रस्ताव अभी मसौदे के स्तर पर है।

Q3. निम्नलिखित सूची-I (संस्था/प्रावधान) का सूची-II (विशेषता) से मिलान कीजिए:
सूची-I
A. कृषि अवसंरचना कोष (Agriculture Infrastructure Fund)
B. क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (Regional Rural Bank)
C. लघु वित्त बैंक (Small Finance Bank)
D. विदेशी बैंक (Foreign Bank)

सूची-II
1. इसका प्रशासनिक मंत्रालय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय है।
2. केंद्र सरकार, संबंधित राज्य सरकार और प्रायोजक बैंक की संयुक्त हिस्सेदारी वाली संरचना होती है।
3. PSL के लिए कुल ANBC का लगभग 75% लक्ष्य रखा गया है।
4. कुल ANBC (या CEOBE) का लगभग 40% PSL लक्ष्य लागू होता है।

सही उत्तर चुनिए:

  1. A-1, B-2, C-3, D-4
  2. A-2, B-1, C-3, D-4
  3. A-1, B-3, C-2, D-4
  4. A-3, B-1, C-2, D-4

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — कृषि अवसंरचना कोष का प्रशासन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय करता है (A-1)। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का स्वामित्व केंद्र सरकार, राज्य सरकार और प्रायोजक बैंक में बंटा होता है (B-2)। लघु वित्त बैंकों का PSL लक्ष्य ANBC का लगभग 75% है (C-3)। विदेशी बैंकों के लिए लक्ष्य लगभग 40% है (D-4)। मिलान में सूची-I और सूची-II के कूटों का क्रम ध्यान से जाँचें।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (Priority Sector Lending – PSL) को वित्तीय समावेशन का एक प्रभावी साधन माना जाता है, किंतु इसकी ऋण-सीमाओं और श्रेणी-निर्धारण में बार-बार हो रहे संशोधन इसके उद्देश्य पर प्रश्न उठाते हैं। कृषि अवसंरचना परियोजनाओं के लिए प्रति कर्जदार 100 करोड़ रुपये तक की ऋण-सीमा प्रस्तावित करने के संदर्भ में PSL की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि यदि ऐसी ऊँची ऋण-सीमाएँ अधिकतर बड़े कर्जदारों के पक्ष में जाती हैं, तो लघु और सीमांत किसानों के हितों और बैंकिंग प्रणाली के जोखिम-प्रबंधन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON: (1) परिचय: PSL का उद्देश्य — बैंकों को उन क्षेत्रों (कृषि, MSME, निर्यात, शिक्षा, आवास, सामाजिक बुनियादी ढाँचा, नवीकरणीय ऊर्जा) में ऋण देने के लिए बाध्य करना जिन्हें बाज़ार सामान्यतः कम ऋण देता; समाजवादी-कल्याणकारी पृष्ठभूमि में 1969 और 1980 के बैंक राष्ट्रीयकरण के बाद इसका औपचारिक विस्तार। (2) ढाँचा: घरेलू बैंकों के लिए ANBC या CEOBE का 40% लक्ष्य; कृषि का 18% उप-लक्ष्य; कमजोर वर्गों हेतु उप-लक्ष्य; लघु वित्त बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) के लिए ऊँचे लक्ष्य; वैधानिक आधार — बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 21 व 35A के अंतर्गत RBI के निर्देश, तथा RBI अधिनियम, 1934। (3) वर्तमान संदर्भ: RBI द्वारा दिशानिर्देशों का एकीकरण; मसौदे में कृषि अवसंरचना के लिए प्रति कर्जदार 100 करोड़ रुपये, फसल एवं कटाई-पूर्व/पश्चात ऋण के लिए 4 करोड़ रुपये, शिक्षा ऋण 25 लाख रुपये, व्यक्तिगत आवास 10 लाख रुपये और नवीकरणीय ऊर्जा आधारित जन-केंद्रित परियोजनाओं के लिए 35 करोड़ रुपये। सहायक संस्थागत उपाय — कृषि अवसंरचना कोष (Agriculture Infrastructure Fund) और नाबार्ड (NABARD) की पुनर्वित्त भूमिका। (4) पक्ष में तर्क: दीर्घकालिक ग्रामीण परिसंपत्तियों (भंडारण, शीत-शृंखला, प्रसंस्करण) के लिए बड़े ऋण की आवश्यकता; PSL के अंतर्गत गणना से बैंकों की रुचि; वित्तीय समावेशन और ग्रामीण आय-वृद्धि। (5) विपक्ष/चिंताएँ: ऋण-संकेंद्रण जोखिम; PSL-वर्गीकरण का संभावित दुरुपयोग (व्यावसायिक परियोजनाओं को कृषि-लेबल देना); छोटे किसानों तक लाभ न पहुँचना; गैर-निष्पादित आस्तियों (NPA) का बढ़ना और बैंकों की पूँजी पर दबाव; पूर्व में ऋण-माफी और PSL-प्रमाणन की समीक्षा की आवश्यकता। (6) संतुलित निष्कर्ष: सीमाओं का सूक्ष्म-स्तरीय सत्यापन, लाभार्थी-आधारित निगरानी, परियोजना-मूल्यांकन तंत्र, सार्वजनिक प्रकटीकरण और वित्तीय स्थिरता के बीच संतुलन; नरसिम्हम समिति जैसी सुधार समितियों की PSL-समीक्षा सिफारिशों का संदर्भ।

स्रोत: hindi.theprint.in


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


Related guides on our sites

No Comments

Post A Comment