19 Aug आरबीआई की अगस्त 2026 नीति: रेपो दर अपरिवर्तित, जानिए पूरा विवरण
✎ मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है, और यह प्रमुख नीतिगत दरों को निर्धारित करके इस…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। | GS Paper III — सरकारी बजटिंग।
- Prelims: मौद्रिक नीति समिति (MPC), रेपो दर, स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर, सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर, बैंक दर, तरलता समायोजन सुविधा (LAF), मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934
- Essay: भारत में आर्थिक स्थिरता और विकास के बीच संतुलन की चुनौतियाँ।, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बीच भारत की आर्थिक लचीलापन।
त्वरित पुनरावृत्ति: मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है, और यह प्रमुख नीतिगत दरों को निर्धारित करके इस उद्देश्य को प्राप्त करती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 19 अगस्त, 2026 को अपनी मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) की 62वीं बैठक के कार्यवृत्त (Minutes) जारी किए, जो 3 से 5 अगस्त, 2026 तक आयोजित की गई थी। इस बैठक में MPC ने वैश्विक और घरेलू आर्थिक परिदृश्य की गहन समीक्षा की। समिति ने तटस्थ रुख (Neutral Stance) बनाए रखने का भी फैसला किया, जो मौजूदा आर्थिक स्थितियों और भविष्य की चुनौतियों के प्रति RBI के दृष्टिकोण को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत मौद्रिक नीति समिति का गठन किया गया है।
- इसका मुख्य उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि आर्थिक विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखा जाता है।
- RBI अधिनियम की धारा 45ZL के अनुसार, RBI प्रत्येक MPC बैठक के चौदहवें दिन बैठक के कार्यवृत्त प्रकाशित करता है, जिसमें अपनाए गए प्रस्ताव, प्रत्येक सदस्य का वोट और उनका व्यक्तिगत वक्तव्य शामिल होता है।
- मौद्रिक नीति समिति मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न नीतिगत दरों (जैसे रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, MSF दर) का उपयोग करती है।
- वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में संघर्ष का फिर से शुरू होना, और अस्थिर तेल कीमतें वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करती हैं।
- घरेलू मोर्चे पर, उच्च आवृत्ति संकेतक स्थिर मांग और भारतीय अर्थव्यवस्था के लचीलेपन का संकेत देते हैं, बावजूद इसके कि वैश्विक चुनौतियाँ बनी हुई हैं।
मौद्रिक नीति समिति (MPC) और उसकी भूमिका
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारत में मौद्रिक नीति निर्धारण के लिए जिम्मेदार एक वैधानिक निकाय है। इसका गठन भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन करके किया गया था।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखना है। भारत सरकार ने RBI के परामर्श से 4 प्रतिशत (+/- 2 प्रतिशत) के मुद्रास्फीति लक्ष्य को अधिसूचित किया है।
- MPC प्रमुख नीतिगत दरों, जैसे रेपो दर (Repo Rate), को तय करती है, जो अर्थव्यवस्था में मुद्रा आपूर्ति और ऋण की लागत को प्रभावित करती है।
- रेपो दर वह दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी अल्पकालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए RBI से धन उधार लेते हैं। यह मौद्रिक नीति का सबसे महत्वपूर्ण उपकरण है।
- स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर वह दर है जिस पर बैंक RBI के पास अधिशेष तरलता जमा कर सकते हैं, बिना किसी संपार्श्विक (Collateral) के।
- सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर वह दर है जिस पर बैंक आपातकालीन स्थितियों में RBI से अतिरिक्त धन उधार ले सकते हैं। यह दर आमतौर पर रेपो दर से अधिक होती है।
- MPC की बैठकें कम से कम साल में चार बार होती हैं, और प्रत्येक बैठक के बाद कार्यवृत्त सार्वजनिक किए जाते हैं, जिसमें सदस्यों के विचार और वोट शामिल होते हैं।
- तटस्थ रुख (Neutral Stance) का अर्थ है कि MPC भविष्य में दरों में वृद्धि या कमी दोनों के लिए तैयार है, जो आने वाले डेटा और आर्थिक स्थितियों पर निर्भर करेगा। यह एक लचीला दृष्टिकोण है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मौद्रिक नीति समिति (MPC) की 62वीं बैठक | भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत गठित, यह समिति देश की मौद्रिक नीति निर्धारित करती है। |
| रेपो दर अपरिवर्तित (5.25 प्रतिशत) | यह प्रमुख नीतिगत दर है जो बैंकों को RBI से उधार लेने की लागत को प्रभावित करती है, जिससे अर्थव्यवस्था में ऋण प्रवाह और मुद्रास्फीति पर असर पड़ता है। |
| तटस्थ रुख जारी | यह दर्शाता है कि MPC न तो अर्थव्यवस्था को उत्तेजित करने और न ही उसे धीमा करने की कोशिश कर रही है, बल्कि मौजूदा आर्थिक स्थितियों के अनुसार प्रतिक्रिया देने के लिए लचीलापन बनाए हुए है। |
| वैश्विक और घरेलू आर्थिक समीक्षा | समिति वैश्विक और घरेलू दोनों कारकों का गहन मूल्यांकन करती है, जिसमें भू-राजनीतिक संघर्ष, मुद्रास्फीति, और आर्थिक संवृद्धि के रुझान शामिल हैं, ताकि एक सूचित निर्णय लिया जा सके। |
| मुद्रास्फीति और संवृद्धि दृष्टिकोण | MPC का प्राथमिक लक्ष्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए संवृद्धि को समर्थन देना है, इसलिए इन दोनों कारकों का विस्तृत विश्लेषण महत्वपूर्ण है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- रेपो दर को अपरिवर्तित रखने का निर्णय अर्थव्यवस्था में ऋण लागत को स्थिर रखता है, जिससे निवेश और उपभोग पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
- तटस्थ मौद्रिक नीति रुख यह संकेत देता है कि RBI मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को संतुलित मान रहा है और भविष्य के डेटा के आधार पर कार्रवाई करने के लिए तैयार है।
- यह निर्णय वैश्विक अनिश्चितताओं (जैसे पश्चिम एशिया में संघर्ष, अस्थिर तेल कीमतें) के बावजूद घरेलू आर्थिक लचीलेपन को दर्शाता है।
नीतिगत महत्व
- यह मौद्रिक नीति समिति की स्वायत्तता और उसके जनादेश (मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए संवृद्धि को समर्थन देना) के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- बैठक के कार्यवृत्त का प्रकाशन (भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZL के तहत) मौद्रिक नीति निर्माण प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।
स्थिरता का महत्व
- स्थिर नीतिगत दरें वित्तीय बाजारों में स्थिरता लाती हैं और निवेशकों के लिए अनुमानित वातावरण बनाती हैं।
- घरेलू मांग में स्थिरता और लचीलापन वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की अंतर्निहित शक्ति को उजागर करता है।
चुनौतियाँ
1. वैश्विक मुद्रास्फीति और भू-राजनीतिक जोखिम
- पश्चिम एशिया में संघर्ष का फिर से शुरू होना और अस्थिर तेल कीमतें वैश्विक मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती हैं, जिसका भारत पर भी असर पड़ सकता है।
- कई केंद्रीय बैंकों द्वारा दरें बढ़ाना वैश्विक पूंजी प्रवाह को प्रभावित कर सकता है और भारतीय रुपये पर दबाव डाल सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मुद्रास्फीति, वैश्विक आर्थिक रुझान
2. घरेलू मुद्रास्फीति की उम्मीदें
- घरेलू स्तर पर मुद्रास्फीति की उम्मीदें बनी हुई हैं, जिससे RBI के लिए मूल्य स्थिरता बनाए रखना एक चुनौती है।
- खाद्य और ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव घरेलू मुद्रास्फीति को अप्रत्याशित बना सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मुद्रास्फीति प्रबंधन
3. राजकोषीय स्थिरता
- प्रणालीगत अर्थव्यवस्थाओं में नाजुक सार्वजनिक वित्त वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए जोखिम पैदा करता है, जिसका अप्रत्यक्ष प्रभाव भारत पर भी पड़ सकता है।
- सरकार के राजकोषीय घाटे का स्तर मौद्रिक नीति के प्रभाव को सीमित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: राजकोषीय नीति, सार्वजनिक वित्त
4. आर्थिक संवृद्धि को बनाए रखना
- वैश्विक मंदी या व्यापार युद्धों का खतरा भारतीय निर्यात और समग्र आर्थिक संवृद्धि को प्रभावित कर सकता है।
- AI-संचालित उत्पादकता लाभों के बावजूद, वैश्विक इक्विटी बाजार की अस्थिरता निवेश के माहौल को प्रभावित कर सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: आर्थिक संवृद्धि और विकास
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पश्चिम एशिया में संघर्ष | वैश्विक तेल कीमतों में अस्थिरता और आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान का जोखिम। |
| वैश्विक मुद्रास्फीति | कई देशों में उच्च मुद्रास्फीति और केंद्रीय बैंकों द्वारा दर वृद्धि से वैश्विक पूंजी प्रवाह पर असर। |
| अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना | उच्च प्रतिफल और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख के कारण भारतीय रुपये पर अवमूल्यन का दबाव। |
| घरेलू मुद्रास्फीति की उम्मीदें | खाद्य और ईंधन की कीमतों में संभावित वृद्धि से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर दबाव। |
| वैश्विक इक्विटी बाजार की अस्थिरता | निवेशकों के जोखिम मूल्यांकन में बदलाव से पूंजी बाजार में उतार-चढ़ाव। |
आगे की राह
- RBI को वैश्विक और घरेलू आर्थिक संकेतकों की बारीकी से निगरानी जारी रखनी चाहिए ताकि उभरते जोखिमों का समय पर आकलन किया जा सके।
- सरकार को आपूर्ति-पक्ष के मुद्दों को संबोधित करने के लिए संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिससे मुद्रास्फीति के दबाव को कम किया जा सके।
- राजकोषीय नीति को विवेकपूर्ण बनाए रखना चाहिए ताकि मौद्रिक नीति के प्रयासों का समर्थन किया जा सके और व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
- वित्तीय बाजारों में तरलता प्रबंधन को प्रभावी ढंग से जारी रखना चाहिए ताकि ऋण प्रवाह सुचारू बना रहे।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और संवाद को बढ़ावा देना चाहिए ताकि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के प्रभावों को कम किया जा सके।
- घरेलू निवेश और उपभोग को बढ़ावा देने के लिए अनुकूल व्यावसायिक वातावरण और उपभोक्ता विश्वास को बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मौद्रिक नीति समिति · भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 · रेपो दर · मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण · तरलता समायोजन सुविधा · स्थायी जमा सुविधा · सीमांत स्थायी सुविधा · आर्थिक संवृद्धि · राजकोषीय नीति · वैश्विक आर्थिक परिदृश्य
अवधारणा प्रवाह
मौद्रिक नीति समिति की बैठक → वैश्विक और घरेलू आर्थिक स्थिति का आकलन → रेपो दर और नीतिगत रुख पर निर्णय → अर्थव्यवस्था में ऋण लागत और तरलता पर प्रभाव → मुद्रास्फीति और आर्थिक संवृद्धि पर असर
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. मौद्रिक नीति समिति (MPC) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. MPC का गठन भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत किया गया है।
2. भारतीय रिज़र्व बैंक का गवर्नर MPC का पदेन अध्यक्ष होता है।
3. MPC की बैठकों का कार्यवृत्त (minutes) प्रत्येक बैठक के चौदहवें दिन प्रकाशित किया जाता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। MPC का गठन भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत किया गया है। कथन 2 सही है। भारतीय रिज़र्व बैंक का गवर्नर MPC का पदेन अध्यक्ष होता है। कथन 3 सही है। भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZL के अनुसार, रिज़र्व बैंक प्रत्येक बैठक के चौदहवें दिन कार्यवृत्त प्रकाशित करता है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा मौद्रिक नीति का एक मात्रात्मक उपकरण नहीं है?
- रेपो दर
- खुले बाज़ार परिचालन (Open Market Operations)
- नैतिक अनुनय (Moral Suasion)
- नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio)
उत्तर: नैतिक अनुनय (Moral Suasion) — नैतिक अनुनय (Moral Suasion) मौद्रिक नीति का एक गुणात्मक उपकरण है, जबकि रेपो दर, खुले बाज़ार परिचालन और नकद आरक्षित अनुपात मात्रात्मक उपकरण हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मौद्रिक नीति समिति (MPC) के गठन, उद्देश्यों और कार्यप्रणाली का विस्तार से वर्णन कीजिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति प्रबंधन में इसकी भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: मौद्रिक नीति समिति (MPC) का संक्षिप्त परिचय और इसका गठन।
गठन: भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत इसका कानूनी आधार, सदस्यों की संरचना (3 RBI से, 3 सरकार द्वारा नियुक्त), और अध्यक्ष (RBI गवर्नर)।
उद्देश्य: प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना (मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण), आर्थिक संवृद्धि को ध्यान में रखते हुए। 4 प्रतिशत (+/- 2 प्रतिशत) का मुद्रास्फीति लक्ष्य।
कार्यप्रणाली: बैठकों की आवृत्ति, निर्णय लेने की प्रक्रिया (बहुमत से मतदान), कार्यवृत्त का प्रकाशन (धारा 45ZL)।
मुद्रास्फीति प्रबंधन में भूमिका: रेपो दर, SDF, MSF जैसे उपकरणों का उपयोग करके मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना। वैश्विक और घरेलू कारकों का विश्लेषण।
आलोचनात्मक परीक्षण: इसकी स्वायत्तता, सरकार के साथ समन्वय, वैश्विक झटकों के प्रति संवेदनशीलता, संवृद्धि पर प्रभाव, और नीतिगत पारेषण (policy transmission) की चुनौतियों पर चर्चा।
निष्कर्ष: भारतीय अर्थव्यवस्था में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका का सारांश और भविष्य की चुनौतियाँ।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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