19 Aug आरबीआई की 62वीं एमपीसी बैठक: रेपो रेट 5.25% पर अपरिवर्तित, जानें पूरा विवरण
✎ मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारतीय रिज़र्व बैंक का एक वैधानिक निकाय है जो मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक संवृद्धि के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए भारत की मौद्रिक नीति निर्धारित करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधन जुटाना, वृद्धि, विकास और रोजगार से संबंधित विषय | GS Paper III — सरकारी बजटिंग | GS Paper III — मुद्रास्फीति और इसका प्रबंधन
- Prelims: मौद्रिक नीति समिति (MPC), भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934, रेपो दर, स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर, सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर, बैंक दर, मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण, तरलता समायोजन सुविधा (LAF), तटस्थ रुख
- Essay: भारतीय अर्थव्यवस्था की चुनौतियाँ और अवसर: वैश्विक संदर्भ में, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक संवृद्धि के बीच संतुलन साधने में केंद्रीय बैंक की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारतीय रिज़र्व बैंक का एक वैधानिक निकाय है जो मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक संवृद्धि के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए भारत की मौद्रिक नीति निर्धारित करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने अपनी मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) की 62वीं बैठक के कार्यवृत्त (minutes) जारी किए हैं, जो 3 से 5 अगस्त, 2026 तक आयोजित की गई थी। यह निर्णय वैश्विक और घरेलू आर्थिक परिस्थितियों के विस्तृत मूल्यांकन के बाद लिया गया है, जिसमें वैश्विक अस्थिरता, बढ़ती मुद्रास्फीति की चिंताएँ और भारतीय अर्थव्यवस्था का लचीलापन शामिल है।
पृष्ठभूमि
- भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत मौद्रिक नीति समिति का गठन किया गया है।
- MPC का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि आर्थिक संवृद्धि के लक्ष्य को ध्यान में रखना है।
- भारत सरकार ने RBI के परामर्श से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI) आधारित मुद्रास्फीति के लिए 4 प्रतिशत (+/- 2 प्रतिशत) का लक्ष्य निर्धारित किया है।
- MPC की बैठकें वर्ष में कम से कम चार बार आयोजित की जाती हैं, और प्रत्येक बैठक के 14वें दिन कार्यवृत्त प्रकाशित किए जाते हैं।
- रेपो दर वह दर है जिस पर RBI बैंकों को अल्पकालिक धन उधार देता है, और यह अर्थव्यवस्था में तरलता (liquidity) और ऋण की लागत को प्रभावित करती है।
- वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक तनाव, विशेषकर पश्चिम एशिया में संघर्ष का फिर से शुरू होना, तेल की कीमतों में अस्थिरता और वैश्विक मुद्रास्फीति की चिंताओं को बढ़ा रहा है।
मौद्रिक नीति समिति (MPC) क्या है?
- मौद्रिक नीति समिति एक वैधानिक निकाय है जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत स्थापित किया गया है।
- इसका मुख्य कार्य भारत में मौद्रिक नीति निर्धारित करना है ताकि मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए संवृद्धि के उद्देश्य को प्राप्त किया जा सके।
- प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल चार वर्ष का होता है और वे पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होते हैं।
- MPC के निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं, और टाई होने की स्थिति में RBI गवर्नर के पास निर्णायक मत (casting vote) होता है।
- समिति प्रमुख नीतिगत दरों जैसे रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर और बैंक दर पर निर्णय लेती है।
- इसका उद्देश्य मुद्रास्फीति को सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य सीमा (वर्तमान में 4% +/- 2%) के भीतर रखना है।
- MPC की बैठक के कार्यवृत्त, जिसमें संकल्प, प्रत्येक सदस्य का वोट और उनका व्यक्तिगत बयान शामिल होता है, बैठक के 14वें दिन प्रकाशित किए जाते हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक | भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत गठित, यह भारत की मौद्रिक नीति निर्धारित करने वाली प्रमुख संस्था है। |
| रेपो दर (Repo Rate) अपरिवर्तित | नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर बनाए रखना यह दर्शाता है कि MPC मुद्रास्फीति और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास कर रही है। |
| तटस्थ रुख (Neutral Stance) | यह संकेत देता है कि MPC भविष्य में दरों में वृद्धि या कमी के लिए लचीलापन बनाए रखना चाहती है, जो आर्थिक आंकड़ों पर निर्भर करेगा। |
| वैश्विक और घरेलू आर्थिक समीक्षा | MPC वैश्विक भू-राजनीतिक तनावों, अस्थिर तेल कीमतों और घरेलू मांग की स्थिति का विस्तृत मूल्यांकन करती है, जो नीतिगत निर्णयों का आधार बनता है। |
| सर्वसम्मत निर्णय | रेपो दर को अपरिवर्तित रखने का सर्वसम्मत निर्णय MPC के सदस्यों के बीच व्यापक सहमति को दर्शाता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- मौद्रिक नीति समिति का निर्णय मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देने के दोहरे उद्देश्यों को संतुलित करने का प्रयास करता है।
- रेपो दर को अपरिवर्तित रखने से ऋण (Loan) की लागत स्थिर रहती है, जिससे निवेश और उपभोग पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
- तटस्थ रुख भविष्य की आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर नीतिगत समायोजन के लिए लचीलापन प्रदान करता है।
वित्तीय स्थिरता
- स्थिर नीतिगत दरें वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता को कम करती हैं और निवेशकों को स्पष्टता प्रदान करती हैं।
- यह निर्णय बैंकों को अपनी उधार दरों की योजना बनाने में मदद करता है, जिससे ऋण वितरण में स्थिरता आती है।
शासन और पारदर्शिता
- भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZL के तहत बैठक के कार्यवृत्त (Minutes) का प्रकाशन मौद्रिक नीति निर्माण प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।
- प्रत्येक सदस्य के वोट और बयान का प्रकाशन जवाबदेही को बढ़ाता है और नीतिगत निर्णयों के पीछे के तर्क को समझने में मदद करता है।
चुनौतियाँ
1. वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता
- पश्चिम एशिया में संघर्ष का फिर से शुरू होना और अस्थिर तेल कीमतें वैश्विक आर्थिक संवृद्धि और मुद्रास्फीति के लिए जोखिम पैदा करती हैं।
- प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में चिपचिपी मुद्रास्फीति (Sticky Inflation) और कमजोर सार्वजनिक वित्त वैश्विक मांग और व्यापार को प्रभावित कर सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना
2. घरेलू मुद्रास्फीति दबाव
- वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव घरेलू मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकते हैं।
- उच्च खाद्य और ईंधन की कीमतें उपभोक्ता व्यय और क्रय शक्ति को कम कर सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मुद्रास्फीति और इसके प्रभाव
3. नीतिगत दुविधा
- MPC को आर्थिक संवृद्धि को समर्थन देने और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के बीच संतुलन बनाना होता है, जो अक्सर एक विरोधाभासी लक्ष्य होता है।
- वैश्विक और घरेलू कारकों के जटिल अंतर्संबंध के कारण सही नीतिगत रुख का निर्धारण करना चुनौतीपूर्ण होता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति
4. वित्तीय बाजार की अस्थिरता
- वैश्विक इक्विटी बाजारों में उतार-चढ़ाव और AI-संबंधित शेयरों में निवेशकों का पुनर्मूल्यांकन घरेलू वित्तीय बाजारों को भी प्रभावित कर सकता है।
- बढ़ती अमेरिकी डॉलर और उच्च प्रतिफल (Yields) पूंजी प्रवाह (Capital Flows) को प्रभावित कर सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: पूंजी बाजार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव | पश्चिम एशिया में संघर्ष का फिर से शुरू होना तेल की कीमतों में अस्थिरता और वैश्विक व्यापार में व्यवधान पैदा कर सकता है। |
| वैश्विक मुद्रास्फीति | कई केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में वृद्धि और चिपचिपी मुद्रास्फीति की उम्मीदें वैश्विक आर्थिक संवृद्धि को धीमा कर सकती हैं। |
| घरेलू मुद्रास्फीति दबाव | उच्च आवृत्ति वाले संकेतक स्थिर घरेलू मांग का संकेत देते हैं, लेकिन वैश्विक कारक और आपूर्ति पक्ष के मुद्दे मुद्रास्फीति को बढ़ा सकते हैं। |
| वित्तीय बाजार की अस्थिरता | वैश्विक इक्विटी बाजारों में उतार-चढ़ाव और AI-संबंधित शेयरों का पुनर्मूल्यांकन घरेलू बाजारों पर प्रभाव डाल सकता है। |
| राजकोषीय स्थिरता | प्रणालीगत अर्थव्यवस्थाओं में कमजोर सार्वजनिक वित्त वैश्विक वित्तीय स्थिरता के लिए जोखिम पैदा करता है। |
आगे की राह
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को वैश्विक और घरेलू आर्थिक आंकड़ों की बारीकी से निगरानी जारी रखनी चाहिए ताकि उभरते जोखिमों का समय पर आकलन किया जा सके।
- सरकार को आपूर्ति-पक्ष के मुद्दों को संबोधित करने के लिए संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिससे मुद्रास्फीति के दबावों को कम किया जा सके।
- राजकोषीय नीति (Fiscal Policy) को मौद्रिक नीति के साथ समन्वय स्थापित करना चाहिए ताकि समग्र आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके और संवृद्धि को बढ़ावा दिया जा सके।
- वित्तीय क्षेत्र को वैश्विक झटकों के प्रति अपनी लचीलापन (Resilience) बनाए रखने के लिए पर्याप्त पूंजी और तरलता (Liquidity) सुनिश्चित करनी चाहिए।
- दीर्घकालिक संवृद्धि को बढ़ावा देने के लिए निवेश को आकर्षित करने और उत्पादकता (Productivity) बढ़ाने वाले उपायों को लागू करना चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और संवाद को बढ़ावा देना चाहिए ताकि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं से निपटने के लिए समन्वित प्रतिक्रियाएं विकसित की जा सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मौद्रिक नीति समिति (MPC) · भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 · रेपो दर · स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर · सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर · बैंक दर · मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण · तरलता समायोजन सुविधा (LAF) · वैश्विक आर्थिक परिदृश्य · घरेलू आर्थिक लचीलापन · समष्टि आर्थिक स्थायित्व · मौद्रिक नीति का रुख
अवधारणा प्रवाह
मौद्रिक नीति समिति की बैठक → वैश्विक और घरेलू आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन → रेपो दर और नीतिगत रुख पर निर्णय → बैंकों की उधार दरों पर प्रभाव → निवेश, उपभोग और आर्थिक संवृद्धि पर प्रभाव → मुद्रास्फीति और वित्तीय स्थिरता पर प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. मौद्रिक नीति समिति (MPC) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत MPC का गठन किया गया है।
2. MPC की बैठक के कार्यवृत्त (मिनट्स) बैठक के चौदहवें दिन प्रकाशित किए जाते हैं।
3. MPC के अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत MPC का गठन किया गया है। कथन 2 सही है। धारा 45ZL के अनुसार, RBI MPC की बैठक के चौदहवें दिन कार्यवृत्त प्रकाशित करता है। कथन 3 गलत है। MPC के अध्यक्ष RBI गवर्नर होते हैं, न कि केंद्रीय वित्त मंत्री।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा मौद्रिक नीति समिति (MPC) के उपकरणों का हिस्सा नहीं है?
- रेपो दर
- बैंक दर
- राजकोषीय घाटा
- सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर
उत्तर: राजकोषीय घाटा — रेपो दर, बैंक दर और MSF दर MPC के मौद्रिक नीति उपकरण हैं जिनका उपयोग तरलता और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है। राजकोषीय घाटा सरकार की वित्तीय नीति से संबंधित है, न कि MPC की मौद्रिक नीति से।
Q3. अभिकथन (A): भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अगस्त 2026 की अपनी बैठक में नीतिगत रेपो दर को अपरिवर्तित रखने का सर्वसम्मति से निर्णय लिया।
कारण (R): MPC ने वैश्विक और घरेलू मोर्चे पर समष्टि आर्थिक विकास और दृष्टिकोण का विस्तृत मूल्यांकन किया, जिसमें वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएँ और घरेलू अर्थव्यवस्था का लचीलापन शामिल था।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि MPC ने नीतिगत रेपो दर को अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया। कारण (R) भी सही है, क्योंकि MPC अपने निर्णयों के लिए वैश्विक और घरेलू समष्टि आर्थिक विकास और दृष्टिकोण का विस्तृत मूल्यांकन करती है। R, A की सही व्याख्या है क्योंकि इसी मूल्यांकन के आधार पर MPC ने दरें अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मौद्रिक नीति समिति (MPC) के गठन, उद्देश्यों और कार्यप्रणाली की चर्चा कीजिए। भारतीय अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति प्रबंधन और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देने में इसकी भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** मौद्रिक नीति समिति (MPC) का संक्षिप्त परिचय और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के मौद्रिक नीति ढांचे में इसकी केंद्रीय भूमिका।
2. **गठन:** भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45ZB के तहत MPC के गठन का विवरण। सदस्यों की संख्या (छह सदस्य), उनकी नियुक्ति (तीन RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा), और अध्यक्ष (RBI गवर्नर) का उल्लेख।
3. **उद्देश्य:** MPC का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक संवृद्धि के लक्ष्य को ध्यान में रखना। मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढांचे (4% +/- 2%) का उल्लेख।
4. **कार्यप्रणाली:**
* बैठकों की आवृत्ति (कम से कम चार बार एक वर्ष में)।
* निर्णय प्रक्रिया (बहुमत से निर्णय, गवर्नर का निर्णायक मत)।
* उपयोग किए जाने वाले उपकरण (रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, MSF, SDF, बैंक दर)।
* कार्यवृत्त (मिनट्स) का प्रकाशन (धारा 45ZL के तहत 14 दिनों के भीतर)।
5. **भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण:**
* **सकारात्मक पक्ष:**
* मौद्रिक नीति निर्माण में पारदर्शिता और जवाबदेही में वृद्धि।
* नीतिगत दरों के निर्धारण में विशेषज्ञता और विविधता।
* मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में सफलता (उदाहरण यदि उपलब्ध हों)।
* निवेश और संवृद्धि के लिए स्थिर वातावरण का निर्माण।
* **चुनौतियाँ/आलोचनाएँ:**
* बाहरी झटकों (जैसे वैश्विक तेल की कीमतें, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान) पर सीमित नियंत्रण।
* मुद्रास्फीति और संवृद्धि के बीच संतुलन साधने की चुनौती।
* राजकोषीय नीति के साथ समन्वय का महत्व।
* नीतिगत निर्णयों के संचरण में समय अंतराल (transmission lag)।
6. **निष्कर्ष:** भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए MPC के महत्व को दोहराते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण, जिसमें इसकी उपलब्धियों और भविष्य की चुनौतियों पर प्रकाश डाला जाए।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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