उत्तराखंड: विधानसभा से पारित नौ विधेयक राज्यपाल की मंजूरी हेतु

उत्तराखंड: विधानसभा से पारित नौ विधेयक राज्यपाल की मंजूरी हेतु

उत्तराखंड: विधानसभा से पारित नौ विधेयक राज्यपाल की मंजूरी हेतु

उत्तराखंड में विधेयक से अधिनियम बनने की प्रक्रियाविधानसभा मेंविधेयक पारितसचिवालय द्वारात्रुटियों की जाँचविधायी विभागलोक भवन भेजाराज्यपाल कीअनुमति (अनुच्छेद 200)अधिनियमअधिसूचना जारीक्रियान्वयननियम बनाना
उत्तराखंड में विधेयक से अधिनियम बनने की प्रक्रिया

✎ राज्य विधेयक राज्यपाल की अनुमति (अनुच्छेद 200) के बाद ही अधिनियम बनता है; राज्यपाल अनुमति दे सकते हैं, रोक सकते हैं, पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकते हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था: राज्यपाल की शक्तियाँ और विधायी प्रक्रिया (अनुच्छेद 200, 201)  |  GS Paper II — शासन: संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध, राज्य विधानमंडल की विधायी स्वायत्तता  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था: राजकोषीय उत्तरदायित्व (Fiscal Responsibility) और वस्तु एवं सेवा कर (GST) से जुड़े संशोधन
  • Prelims: अनुच्छेद 200: राज्यपाल द्वारा विधेयक पर अनुमति, रोक या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना, अनुच्छेद 201: राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित विधेयक, अनुच्छेद 213: राज्यपाल की अध्यादेश जारी करने की शक्ति, अनुच्छेद 168: राज्य विधानमंडल के अंग (राज्यपाल और विधानसभा/विधान परिषद), अनुच्छेद 199: धन विधेयक की परिभाषा, अनुच्छेद 279A: वस्तु एवं सेवा कर परिषद, अनुच्छेद 30: अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन का अधिकार, राज्य सूची की प्रविष्टि: सिंचाई, जल निकासी, अग्निशमन (राज्य विषय)
  • Essay: संवैधानिक पदों की गरिमा और विधायी प्रक्रिया में विलंब: लोकतांत्रिक शासन की चुनौती, सहकारी संघवाद में राज्य विधानमंडल और राज्यपाल के बीच संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य विधेयक राज्यपाल की अनुमति (अनुच्छेद 200) के बाद ही अधिनियम बनता है; राज्यपाल अनुमति दे सकते हैं, रोक सकते हैं, पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकते हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

उत्तराखंड की विधानसभा ने ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण (भराड़ीसैंण) में नौ विधेयक पारित किए थे। विधानसभा सचिवालय ने इन विधेयकों की लिपिकीय त्रुटियों की जाँच करने के बाद इन्हें विधायी विभाग के माध्यम से लोक भवन भेजा है। अब राज्यपाल की अनुमति मिलने के बाद ही ये विधेयक अधिनियम का रूप लेंगे और इनकी अधिसूचना जारी होगी। इस समाचार में विधायी प्रक्रिया के अंतिम चरण, यानी राज्यपाल की अनुमति, को समझने का अवसर मिलता है, क्योंकि यही चरण विधि-निर्माण को संवैधानिक वैधता प्रदान करता है। पारित विधेयकों में सिंचाई एवं जल निकासी, राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन, निवेश एवं आधारभूत संरचना विकास, जन विश्वास, अल्पसंख्यक शिक्षा, सिविल विधि, अग्निशमन एवं आपात सेवा, माल और सेवा कर तथा निजी विश्वविद्यालय से संबंधित संशोधन शामिल हैं।

पृष्ठभूमि

  • भारत में राज्य विधानमंडल का गठन अनुच्छेद 168 के अंतर्गत होता है, जिसमें राज्यपाल और विधानसभा (तथा कुछ राज्यों में विधान परिषद) शामिल हैं। विधेयक तब अधिनियम बनता है जब उसे राज्यपाल की अनुमति मिल जाए।
  • उत्तराखंड 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से पृथक होकर भारत के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। इसकी राजधानी देहरादून है, जबकि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में घोषित किया गया है।
  • राज्यपाल की शक्तियों पर विवाद और न्यायिक दृष्टिकोण: हाल के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने विधेयकों पर निर्णय लेने में अनावश्यक विलंब के विरुद्ध टिप्पणियाँ की हैं, जिससे राज्यपाल की भूमिका के समय-सीमा संबंधी पहलू पर चर्चा तेज हुई है।
  • राजभवन का नाम बदलकर लोक भवन किया गया है। नाम परिवर्तन से पद की संवैधानिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं होता; राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख बने रहते हैं।
  • विधेयकों की जाँच में लिपिकीय त्रुटियों का सुधार विधायी विभाग और विधानसभा सचिवालय के स्तर पर होता है, ताकि राज्यपाल के समक्ष पाठ सही रूप में पहुँचे।

राज्यपाल की विधेयक-संबंधी शक्तियाँ क्या हैं?

  • अनुच्छेद 200 के अनुसार राज्यपाल किसी राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक पर (क) अनुमति देते हैं, (ख) अनुमति रोकते हैं, या (ग) विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटाते हैं; यदि सदन दोबारा पारित करे, तो राज्यपाल को सामान्यतः अनुमति देनी होती है। (ग) राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करने का विकल्प भी उनके पास है।
  • अनुच्छेद 201 के अंतर्गत राष्ट्रपति आरक्षित विधेयक पर अनुमति दे सकते हैं या अनुमति रोक सकते हैं; राज्य विधानमंडल को पुनर्विचार के लिए लौटाने का प्रावधान भी है।
  • राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार कार्य करते हैं, किंतु विधेयक पर विवेकाधिकार से संबंधित कुछ स्थितियाँ संविधान में मान्य हैं।
  • जब विधानमंडल का सत्र न चल रहा हो, तब राज्यपाल अनुच्छेद 213 के अंतर्गत अध्यादेश जारी कर सकते हैं; यह शक्ति विधायी शक्ति का अस्थायी विकल्प है और विधानमंडल के अगले सत्र के छह सप्ताह के भीतर इसे प्रस्तुत करना होता है।
  • राज्यपाल की अनुमति के बाद विधेयक अधिनियम बनता है और राजपत्र (Gazette) में प्रकाशन के बाद अधिसूचना के माध्यम से लागू होता है। यही कारण है कि समाचार में ‘अधिसूचना’ का उल्लेख है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
विधेयक प्रक्रिया का चरण गैरसैंण (भराड़ीसैंण) में पारित नौ विधेयक अब राज्यपाल की अनुमति (Assent) के चरण में हैं। अनुमति मिलने के बाद ही ये अधिनियम बनते हैं।
लिपिकीय त्रुटि की जाँच विधानसभा सचिवालय ने भेजने से पहले विधेयकों में लिपिकीय त्रुटि (Clerical Error) की जाँच की। इससे विधेयक का पाठ प्रामाणिक बनता है और बाद में संशोधन की आवश्यकता कम होती है।
विधायी विभाग की भूमिका सचिवालय ने विधेयक विधायी विभाग के माध्यम से लोक भवन भेजे। यह राज्य सरकार की विधायी प्रक्रिया में समन्वय की कड़ी है।
विधेयकों की विविधता इन नौ विधेयकों में सिंचाई और जल निकासी, राजकोषीय उत्तरदायित्व, निवेश और आधारभूत संरचना, अल्पसंख्यक शिक्षा, अग्निशमन एवं आपात सेवा, माल और सेवा कर (GST) तथा निजी विश्वविद्यालय जैसे कई विषय शामिल हैं।
अधिसूचना का क्रम अनुमति के बाद अधिनियम का राजपत्र में प्रकाशन होता है और फिर सरकार अधिसूचना जारी कर उसे लागू करती है। इस क्रम में विधि का प्रवर्तन (Enforcement) तिथि तय होती है।

महत्व

संवैधानिक और विधायी

  • राज्य विधानमंडल (State Legislature) द्वारा पारित विधेयक राज्यपाल की अनुमति के बिना अधिनियम नहीं बनते। यह अनुच्छेद 200 की व्यवस्था है।
  • विधेयकों की जाँच और पुनरीक्षण से विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता और कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित होती है।

प्रशासनिक

  • अधिसूचना जारी होने के बाद संबंधित विभाग नियम बनाने और अनुपालन की व्यवस्था करते हैं। इससे नीति का क्रियान्वयन आरंभ होता है।
  • एक साथ नौ विधेयकों का प्रस्तुतीकरण विधायी कार्य के समेकित प्रबंधन का उदाहरण है।

आर्थिक

  • राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन से जुड़े संशोधन राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के नियंत्रण से संबंधित होते हैं।
  • माल और सेवा कर संशोधन और निवेश से जुड़े विधेयक राज्य की कर-व्यवस्था और निवेश वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं।

शासन और सेवा वितरण

  • अग्निशमन एवं आपात सेवा से जुड़ा विधेयक आपदा प्रबंधन की क्षमता पर असर डालता है।
  • निजी विश्वविद्यालय और अल्पसंख्यक शिक्षा से जुड़े विधेयक उच्च शिक्षा के ढाँचे और संस्थागत विविधता से संबंधित हैं।

चुनौतियाँ

1. राज्यपाल की अनुमति में विलंब

  • अनुच्छेद 200 में राज्यपाल के लिए किसी समय-सीमा का उल्लेख नहीं है। इसलिए अनुमति में देरी से विधेयक लंबित रह सकते हैं।
  • लंबित विधेयकों के कारण संबंधित कानून का क्रियान्वयन टलता है और विधायी अनिश्चितता बनती है।

2. विधेयकों का आरक्षण और पुनर्विचार

  • राज्यपाल अनुमति रोक सकते हैं, पुनर्विचार के लिए लौटा सकते हैं, या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकते हैं।
  • पुनर्विचार के बाद विधेयक दोबारा पारित होने पर राज्यपाल को अनुमति देनी होती है। इससे संघीय संतुलन और राज्य की विधायी स्वायत्तता का प्रश्न उठता है।

3. लिपिकीय और तकनीकी त्रुटियाँ

  • विधेयकों में लिपिकीय त्रुटि होने पर संशोधन या पुनः प्रस्तुतीकरण करना पड़ता है। इससे प्रशासनिक समय और संसाधन खर्च होते हैं।
  • विधि निर्माण में भाषा की स्पष्टता और शुद्धता आवश्यक है, क्योंकि अधिनियम की व्याख्या न्यायालयों द्वारा होती है।

4. वित्तीय विधेयकों की जटिलता

  • राजकोषीय और बजट संबंधी विधेयकों के लिए वित्तीय नियमों और सीमाओं का पालन आवश्यक होता है।
  • राज्यों की वित्तीय स्थिति और ऋण सीमा से जुड़े प्रावधान विकास योजनाओं की गति को प्रभावित करते हैं।

5. अधिसूचना और क्रियान्वयन की समयबद्धता

  • अनुमति के बाद भी अधिसूचना और नियम निर्माण में समय लगता है। इससे अधिनियम का वास्तविक प्रभाव देर से दिखता है।
  • कई विधेयक एक साथ लागू होने पर विभागों की क्षमता और संसाधनों पर दबाव बढ़ता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
अनुमति में अनिश्चित समय-सीमा संविधान में राज्यपाल के लिए निश्चित समय-सीमा न होने से विधेयकों का लंबित रहना संभव है।
पुनर्विचार और आरक्षण विधेयक लौटाए या आरक्षित किए जाने पर राज्य की विधायी इच्छा और राज्यपाल की भूमिका के बीच संतुलन का प्रश्न उठता है।
प्रारूपण की त्रुटियाँ लिपिकीय त्रुटियों से संशोधन और पुनः प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता पड़ती है, जिससे प्रक्रिया धीमी होती है।
वित्तीय दायित्व राजकोषीय और बजट संबंधी विधेयकों का प्रभाव राज्य के वित्तीय संतुलन पर पड़ता है।
क्रियान्वयन में विलंब अनुमति के बाद अधिसूचना और नियम बनने में समय लगने से अधिनियम का लाभ देर से मिलता है।

आगे की राह

  • अनुच्छेद 200 के तहत अनुमति की प्रक्रिया के लिए स्पष्ट आंतरिक समय-सीमा और ट्रैकिंग प्रणाली विकसित की जाए।
  • विधेयक प्रस्तुत करने से पहले विधायी प्रारूपण और विधि-विभाग की समीक्षा को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि लिपिकीय त्रुटियाँ कम हों।
  • राज्य विधानमंडल, सचिवालय और राज्यपाल कार्यालय के बीच समन्वय के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार की जाए।
  • वित्तीय विधेयकों में राजकोषीय प्रभाव आकलन (Fiscal Impact Assessment) को प्रारंभिक चरण में ही शामिल किया जाए।
  • अनुमति के बाद अधिसूचना जारी करने की समय-सीमा तय की जाए और उसकी सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
  • विधेयकों के सार और उनके उद्देश्य को सरल भाषा में जनता के समक्ष रखा जाए, ताकि विधायी पारदर्शिता बढ़े।
  • विधायी विभाग और संबंधित प्रशासनिक विभागों के बीच नियमित समीक्षा बैठकें हों, जिससे क्रियान्वयन में विलंब न हो।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

विधेयक पर अनुमति (Assent to Bills) · अनुच्छेद 200 (Article 200) · राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power of Governor) · मंत्रिपरिषद की सलाह (Aid and Advice of Council of Ministers) · राज्य विधानमंडल (State Legislature) · धन विधेयक (Money Bill) · अनुच्छेद 254 (Article 254) · सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · विधायी विभाग (Legislative Department) · अधिनियम का प्रकाशन और अधिसूचना (Publication and Notification of Acts) · लोक भवन (Lok Bhavan)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 200 — विधेयक पर राज्यपाल की अनुमति, रोक या आरक्षण की शक्ति
  • अनुच्छेद 168 — राज्यपाल राज्य विधानमंडल का अंग होता है

अवधारणा प्रवाह

राज्य विधानसभा (भराड़ीसैंण, गैरसैंण) में नौ विधेयक पारित  →  विधानसभा सचिवालय द्वारा लिपिकीय त्रुटियों की जाँच  →  विधायी विभाग के माध्यम से विधेयक लोक भवन भेजे जाते हैं  →  राज्यपाल अनुच्छेद 200 के तहत अनुमति, रोक या आरक्षण का निर्णय लेते हैं  →  अनुमति मिलने पर विधेयक अधिनियम बनते हैं  →  अधिनियम की अधिसूचना जारी होती है और उसका क्रियान्वयन शुरू होता है

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य विधानमंडल द्वारा पारित कोई विधेयक यदि धन विधेयक न हो, तो राज्यपाल उसे पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है।
2. पुनर्विचार के बाद यदि विधानमंडल विधेयक को संशोधनों सहित या संशोधनों के बिना पुनः पारित कर दे, तो राज्यपाल उस पर अनुमति रोक सकता है।
3. राज्य में व्यय से संबंधित विधेयक पर विचार हेतु राज्यपाल की संस्तुति अपेक्षित हो सकती है।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 200 के परंतुक के अनुसार गैर-धन विधेयक को राज्यपाल पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं। कथन 2 गलत है: पुनः पारित विधेयक पर राज्यपाल अनुमति रोक नहीं सकते। कथन 3 सही है: अनुच्छेद 207 के अनुसार कुछ वित्तीय विधेयकों के लिए राज्यपाल की संस्तुति आवश्यक होती है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): राज्य विधेयक पर राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही अनुमति देने का निर्णय लेते हैं।
कारण (R): अनुच्छेद 163 के अनुसार राज्यपाल को अपने कार्यों के निर्वहन में सहायता और सलाह देने हेतु एक मंत्रिपरिषद होगी, जब तक संविधान द्वारा उन्हें अपने विवेक से कार्य करना अपेक्षित न हो।

उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सत्य हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सत्य है, परंतु (R) असत्य है।
  4. (A) असत्य है, परंतु (R) सत्य है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सत्य हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 163 सामान्य नियम के रूप में राज्यपाल को मंत्रिपरिषद की सलाह से बाँधता है, और इसी आधार पर विधेयकों पर अनुमति भी सामान्यतः सलाह से दी जाती है। अनुच्छेद 163(2) में विवेकाधीन अपवाद का उल्लेख है, जो कथन (A) की सामान्य प्रकृति को सीमित करता है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:

सूची-I (अनुच्छेद)
A. अनुच्छेद 200
B. अनुच्छेद 213
C. अनुच्छेद 207
D. अनुच्छेद 254

सूची-II (विषय)
1. संघ और राज्य विधि में असंगति
2. राज्यपाल की अध्यादेश प्रख्यापन शक्ति
3. वित्तीय विधेयक हेतु राज्यपाल की संस्तुति
4. राज्य विधेयक पर राज्यपाल की अनुमति

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-2, B-1, C-3, D-4
  2. A-1, B-3, C-2, D-4
  3. A-1, B-2, C-3, D-4
  4. A-3, B-2, C-1, D-4

उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4 — अनुच्छेद 200 राज्यपाल की अनुमति से संबंधित है (1)। अनुच्छेद 213 विधानमंडल के सत्र में न होने पर राज्यपाल की अध्यादेश शक्ति देता है (2)। अनुच्छेद 207 वित्तीय विधेयकों से संबंधित राज्यपाल की संस्तुति का प्रावधान करता है (3)। अनुच्छेद 254 संघ और राज्य विधि के टकराव से संबंधित है (4)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल की अनुमति का निर्णय संवैधानिक रूप से मंत्रिपरिषद की सलाह से सामान्यतः बँधा माना जाता है, फिर भी विधेयकों को रोके रखने और उन्हें आरक्षित करने की शक्ति को लेकर विवाद बना रहता है। अनुच्छेद 200 के संदर्भ में इस व्यवस्था का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी विश्लेषण कीजिए कि क्या हाल के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के आलोक में विधेयकों पर निर्णय हेतु समय-सीमा तय करना संघवाद के हित में होगा। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना:
(1) संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 200 के चार विकल्प (अनुमति देना, अनुमति रोकना, पुनर्विचार हेतु लौटाना, राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना) और इसका परंतुक; अनुच्छेद 163 (मंत्रिपरिषद की सलाह) और 163(2) का विवेकाधीन अपवाद; अनुच्छेद 201 (राष्ट्रपति द्वारा आरक्षित विधेयक); अनुच्छेद 254 (संघ-राज्य विधि में असंगति)।
(2) न्यायिक दृष्टिकोण: शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) में मंत्रिपरिषद की सलाह की प्रधानता; नबाम रेबिया मामले (2016) में राज्यपाल के विवेक की सीमा; पंजाब राज्य बनाम पंजाब के राज्यपाल (2023) में अनिश्चितकालीन रोक पर आपत्ति; तमिलनाडु राज्य मामले (2025) में विधेयकों पर निर्णय हेतु युक्तियुक्त समय-सीमा के सिद्धांत पर विचार और अनुच्छेद 142 के प्रयोग पर उठे प्रश्न। विवरण सत्यापित कर प्रस्तुत करें।
(3) आयोग और सिफारिशें: सरकारिया आयोग (1988) द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति में राज्य से परामर्श की सिफारिश; पुंछी आयोग (2010) द्वारा राज्यपाल की भूमिका पर समय-सीमा संबंधी सुझाव।
(4) विचारों का संतुलन: एक पक्ष संवैधानिक प्रमुख की निष्पक्षता, संसदीय व्यवस्था और विधि-व्यवस्था की संरक्षक भूमिका पर बल देता है; दूसरा पक्ष संघवाद, विधायी इच्छा की सम्मानजनक स्वीकृति और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर। समय-सीमा बनाम संवैधानिक संशोधन के विकल्पों की तुलना कीजिए।
(5) समसामयिक संदर्भ: उत्तराखंड में विधानसभा द्वारा पारित नौ विधेयकों को लिपिकीय त्रुटि की जाँच के बाद विधायी विभाग के माध्यम से लोक भवन भेजा गया और राज्यपाल की अनुमति के बाद ही अधिसूचना जारी होने की प्रक्रिया का उदाहरण देते हुए विधायी प्रक्रिया के चरण (सचिवालय, विधायी विभाग, राज्यपाल, गजट अधिसूचना) समझाएँ।
(6) निष्कर्ष: सहकारी संघवाद के लिए प्रक्रियात्मक पारदर्शिता, मंत्रिपरिषद की सलाह के सम्मान और संवैधानिक संस्थाओं के बीच संवाद-तंत्र पर बल देते हुए तर्कसंगत मत प्रस्तुत करें।

स्रोत: amarujala.com

Uttarakhand PCS (UKPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: उत्तराखंड विधानसभा द्वारा हाल ही में पारित नौ विधेयकों को राज्यपाल की अनुमति के लिए लोक भवन भेजा गया है। इन विधेयकों को राज्यपाल की अनुमति के बाद क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी?

  1. उच्च न्यायालय में समीक्षा के लिए भेजा जाएगा।
  2. भारत के राष्ट्रपति के अनुमोदन के लिए भेजा जाएगा।
  3. राजपत्र में अधिसूचना जारी की जाएगी।
  4. जनता के बीच जनमत संग्रह के लिए रखा जाएगा।

उत्तर: राजपत्र में अधिसूचना जारी की जाएगी। — राज्यपाल की अनुमति के बाद, विधेयकों को कानून बनाने के लिए राजपत्र में अधिसूचना जारी की जाती है।

Mains: उत्तराखंड विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को राज्यपाल की अनुमति के लिए लोक भवन भेजे जाने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए। राज्य विधानमंडल द्वारा पारित किसी विधेयक के कानून बनने में राज्यपाल की भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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